Rating: 5*
अक्षय कुमार को फिल्म नहीं एक क्रांति के लिए बधाई
“पुरस्कार मिले या न मिले लेकिन अविष्कार होता रहना चाहिए।" फिल्म में यह डॉयलाग सुपर स्टार अमिताभ बच्चन ने बोला है। और यही फिल्म का सार है। “पैडमैन” उस क्रांति की कहानी कहती है जो अभी देश में शुरू हो रही है और जिसे अभी बहुत लंबा व महत्वपूर्ण सफर पूरा करना है। यह एक ऐसे विषय को बहुत ही सजगता, गंभीरता और डंके की चोट पर उठाती है जिसे अब तक देश में जरूरी विषय माना ही नहीं गया है। हालांकि हम सब पढ़े लिखे लोग पैड्स के महत्व को समझते हैं लेकिन हम भी उस समय बहुत चौंकते जाते हैं जब पता चलता है कि देश की केवल 18 प्रतिशत महिलाएं ही पैड्स का इस्तेमाल करती हैं। इससे भी बुरी बात यह है कि पीरियड्स के दिनों को लेकर आज भी अनेक भ्रांतियां व अंधविश्वास प्रचलित हैं। उनकी तो कोई बात ही नहीं करता। यह फिल्म तो केवल पैड्स की कीमत के मसले को ही हल करने की कोशिश कर रही है जबकि समस्याएं तो इससे कहीं अधिक हैं। एक सत्यकथा से प्रेरित होकर ट्विंकल खन्ना ने अपने पति के सहयोग से फिल्म बनाई और क्या फिल्म बनाई है।
लक्ष्मीकांत चौहान (अक्षय कुमार) को पत्नी गायत्री (राधिका अप्टे) को माहवारी के समय होने वाली दिक्कत का पता चलता है तो वह उसके लिए पैड्स खरीद लाता है। पर पैड इतने महंगे थे कि पत्नी स्वीकार करने से मना कर देती है और गंदा कपड़ा ही प्रयोग करना बेहतर समझती है। चौहान तमाम प्रयास करता है लेकिन सस्ते व सफल पैड नहीं बना पाता। महिलाओं से फीडबैक लेने के चक्कर में बदनाम अलग से हो जाता है। सब उसे चरित्रहीन समझने लगते हैं। बहनें व पत्नी साथ छोड़ देती हैं। मां भी अलग हो जाती है। चौहान सबकी नजर में गिर जाता है और अंत में सम्मान अर्जित करने के लिए घर से निकल लेता है। आखिरकार सफल होता है। सम्मान भी पाता है और ईनाम भी।
फिल्म की विषय जितना गंभीर था उसके लिहाज से आर बल्कि का निर्देशक के रूप में चुनाव एकदम सही है। “पा” और “की एंड का” जैसी संवेदनशील फिल्में बनाने वाले बल्कि ने फिल्म को बहुत ही शिद्दत से बनाया है। विषय से न भटकते हुए वे फिल्म के मूल तत्व को लगातार कहानी के प्रवाह में बनाए रखते हैं। चौहान का किरदार हर समय यही सोचता रहता है कि किस तरह सस्ते सेनेटरी पैड्स बनाए जाएं और यही लगन व इच्छा शक्ति फिल्म की जान है। अक्षय का किरदार दर्शकों के दिलों दिमाग पर इस तरह से छा जाता है कि वे कभी उसकी हरकतों पर हंसते हैं तो कभी तालियां बजाने पर मजबूर हो जाते हैं। पहला हाफ चौहान के संघर्ष की कहानी है तो दूसरे हाफ में उसके उत्कर्ष की दास्तान दिखाई गई है।
मध्यांतर के बाद कई दृश्यों में अक्षय ने कमाल कर दिया है। छोटे-छोटे सीन में उन्होंने अपने अभिनय की रेंज दिखाई है। न्यूयार्क में युनाइटेड नेशंस के दफ्तर में दी गई स्पीच फिल्म का सबसे बेहतरीन सीन है। अंग्रेजी बोलकर वे दिल को छू जाते हैं। इसके अलावा राधिका अप्टे से जुदा होने वाला सीन भी मार्मिक है। राधिका तो खैर हैं ही कमाल की अदाकारा। वे बेहद नेचुरल लगती हैं और किरदार में जीवंत नजर आती हैं। सोनम कपूर ने भी अपने रोल को बढ़िया निभाया है। पात्र के हिसाब से उनका चयन एकदम सही है।
फिल्म में गीत संगीत को केवल आवश्यकता के अनुरूप ही प्रयोग किया गया है और इसलिए फिल्म कहीं से बोझिल नहीं लगती। घटनाक्रम तेजी से घटता रहता है और दर्शक बोर नहीं होते। तकनीकी रूप से फिल्म बहुत ही मजबूत है और लोकेशंस एकदम रीयल होने के कारण बहुत ही मोहक नजर आती हैं। नर्मदा का किनारा और घाट, पुराने जमाने के मकान आदि सब कुछ मोहक लगता है। फिल्म के संवादों की भी तारीफ करनी होगी। एक सीन में सोनम के पिता अक्षय से बात करते हुए कहते हैं - मर्द होने का मजा अपने अंदर की औरत को जगा के ही आता है। यूएन में अक्षय कहते हैं- मैंने आईआईटी नहीं पढ़ी, आईआईटी ने मुझे पढ़ा। अनेक स्थान पर संवादों पर तालियां बजाने का मन करता है। कई स्थान पर व्यंग्य भी करारा है। दिखाया गया है कि महिलाओं को अपना पैड महंगा लगता है लेकिन भगवान को प्रसाद चढ़ाने के लिए वे फट से 51 रुपये दे देती है।
आप सेः
जिस विषय को फिल्म ने उठाया है वह किसी भी सरकारी एजेंडे में नहीं है। जिस तरह से देश में बालिकाओं के लिए हर स्कूल में शौचालय का अभियान प्रधानमंत्री ने चलवाया उसी प्रकार इस मसले को लेकर भी बड़े पैमाने पर काम किए जाने की जरूरत है। इस फिल्म को एक संपूर्ण पारिवारिक फिल्म कहूं तो अतिश्योक्ति नहीं होगी। हालांकि आप व हम सब पढ़े लिखे लोग हैं। हमारे घरों की महिलाएं पीरियड्स की जरूरतों व सेनेटरी पैड्स के प्रयोग को भली भांति समझती हैं लेकिन फिर भी हमें अपने बच्चों व खासतौर से बेटियों के साथ यह फिल्म देखनी चाहिए। जिससे कि वे भी समझ सकें कि हमारे देश में किस-किस तरह की समस्याओं से महिलाओं को गुजरना पड़ता है। हो सकता है फिल्म देखने के बाद आप या आपके बच्चे किसी ऐसे ही अभियान का हिस्सा बनने की प्रेरणा ले लें। इसलिए फिल्म को अवश्य देखें और परिवार के साथ देखें।
समीक्षकों सेः
फिल्म के कई रीव्यू मैंने पढ़े हैं। अच्छे व बुरे सभी प्रकार के। स्टार रेटिंग देने में बड़े-बड़े समीक्षकों ने कंजूसी की है। किसी ने भी 5 स्टार नहीं दिए। पता नहीं हमारे समीक्षकों ने 5 स्टार किस महान फिल्म के लिए बचाकर रखे हुए हैं? मैं फिल्म को 5 स्टार के लायक ही मानता हूं। अगर कोई सर्वश्रेष्ठ नहीं है तो फिर आपको जो उपलब्ध हैं उन्हीं में से बेहतर को चुनना चाहिए। पिछले कुछ साल में कई कमजोर व बेसिर पैर की फिल्मों को 4 स्टार दिए हैं हमारे महान समीक्षकों ने लेकिन “टायलेट एक प्रेम कथा” या “पैडमैन” जैसी फिल्म को देने में झिझक महसूस करते हैं। मेरे हिसाब से यह दोगलापन है। कुछ सराहना तो उस सोच की भी की जानी चाहिए जिसकी वजह से ऐसी फिल्में बनती हैं। अक्षय कुमार व टिवंकल, आप बधाई के पात्र हैं। ऐसी कुछ और फिल्में बनाएं।
- हर्ष कुमार सिंह
अक्षय कुमार को फिल्म नहीं एक क्रांति के लिए बधाई
“पुरस्कार मिले या न मिले लेकिन अविष्कार होता रहना चाहिए।" फिल्म में यह डॉयलाग सुपर स्टार अमिताभ बच्चन ने बोला है। और यही फिल्म का सार है। “पैडमैन” उस क्रांति की कहानी कहती है जो अभी देश में शुरू हो रही है और जिसे अभी बहुत लंबा व महत्वपूर्ण सफर पूरा करना है। यह एक ऐसे विषय को बहुत ही सजगता, गंभीरता और डंके की चोट पर उठाती है जिसे अब तक देश में जरूरी विषय माना ही नहीं गया है। हालांकि हम सब पढ़े लिखे लोग पैड्स के महत्व को समझते हैं लेकिन हम भी उस समय बहुत चौंकते जाते हैं जब पता चलता है कि देश की केवल 18 प्रतिशत महिलाएं ही पैड्स का इस्तेमाल करती हैं। इससे भी बुरी बात यह है कि पीरियड्स के दिनों को लेकर आज भी अनेक भ्रांतियां व अंधविश्वास प्रचलित हैं। उनकी तो कोई बात ही नहीं करता। यह फिल्म तो केवल पैड्स की कीमत के मसले को ही हल करने की कोशिश कर रही है जबकि समस्याएं तो इससे कहीं अधिक हैं। एक सत्यकथा से प्रेरित होकर ट्विंकल खन्ना ने अपने पति के सहयोग से फिल्म बनाई और क्या फिल्म बनाई है।
लक्ष्मीकांत चौहान (अक्षय कुमार) को पत्नी गायत्री (राधिका अप्टे) को माहवारी के समय होने वाली दिक्कत का पता चलता है तो वह उसके लिए पैड्स खरीद लाता है। पर पैड इतने महंगे थे कि पत्नी स्वीकार करने से मना कर देती है और गंदा कपड़ा ही प्रयोग करना बेहतर समझती है। चौहान तमाम प्रयास करता है लेकिन सस्ते व सफल पैड नहीं बना पाता। महिलाओं से फीडबैक लेने के चक्कर में बदनाम अलग से हो जाता है। सब उसे चरित्रहीन समझने लगते हैं। बहनें व पत्नी साथ छोड़ देती हैं। मां भी अलग हो जाती है। चौहान सबकी नजर में गिर जाता है और अंत में सम्मान अर्जित करने के लिए घर से निकल लेता है। आखिरकार सफल होता है। सम्मान भी पाता है और ईनाम भी।
फिल्म की विषय जितना गंभीर था उसके लिहाज से आर बल्कि का निर्देशक के रूप में चुनाव एकदम सही है। “पा” और “की एंड का” जैसी संवेदनशील फिल्में बनाने वाले बल्कि ने फिल्म को बहुत ही शिद्दत से बनाया है। विषय से न भटकते हुए वे फिल्म के मूल तत्व को लगातार कहानी के प्रवाह में बनाए रखते हैं। चौहान का किरदार हर समय यही सोचता रहता है कि किस तरह सस्ते सेनेटरी पैड्स बनाए जाएं और यही लगन व इच्छा शक्ति फिल्म की जान है। अक्षय का किरदार दर्शकों के दिलों दिमाग पर इस तरह से छा जाता है कि वे कभी उसकी हरकतों पर हंसते हैं तो कभी तालियां बजाने पर मजबूर हो जाते हैं। पहला हाफ चौहान के संघर्ष की कहानी है तो दूसरे हाफ में उसके उत्कर्ष की दास्तान दिखाई गई है।
फिल्म में गीत संगीत को केवल आवश्यकता के अनुरूप ही प्रयोग किया गया है और इसलिए फिल्म कहीं से बोझिल नहीं लगती। घटनाक्रम तेजी से घटता रहता है और दर्शक बोर नहीं होते। तकनीकी रूप से फिल्म बहुत ही मजबूत है और लोकेशंस एकदम रीयल होने के कारण बहुत ही मोहक नजर आती हैं। नर्मदा का किनारा और घाट, पुराने जमाने के मकान आदि सब कुछ मोहक लगता है। फिल्म के संवादों की भी तारीफ करनी होगी। एक सीन में सोनम के पिता अक्षय से बात करते हुए कहते हैं - मर्द होने का मजा अपने अंदर की औरत को जगा के ही आता है। यूएन में अक्षय कहते हैं- मैंने आईआईटी नहीं पढ़ी, आईआईटी ने मुझे पढ़ा। अनेक स्थान पर संवादों पर तालियां बजाने का मन करता है। कई स्थान पर व्यंग्य भी करारा है। दिखाया गया है कि महिलाओं को अपना पैड महंगा लगता है लेकिन भगवान को प्रसाद चढ़ाने के लिए वे फट से 51 रुपये दे देती है।
आप सेः
जिस विषय को फिल्म ने उठाया है वह किसी भी सरकारी एजेंडे में नहीं है। जिस तरह से देश में बालिकाओं के लिए हर स्कूल में शौचालय का अभियान प्रधानमंत्री ने चलवाया उसी प्रकार इस मसले को लेकर भी बड़े पैमाने पर काम किए जाने की जरूरत है। इस फिल्म को एक संपूर्ण पारिवारिक फिल्म कहूं तो अतिश्योक्ति नहीं होगी। हालांकि आप व हम सब पढ़े लिखे लोग हैं। हमारे घरों की महिलाएं पीरियड्स की जरूरतों व सेनेटरी पैड्स के प्रयोग को भली भांति समझती हैं लेकिन फिर भी हमें अपने बच्चों व खासतौर से बेटियों के साथ यह फिल्म देखनी चाहिए। जिससे कि वे भी समझ सकें कि हमारे देश में किस-किस तरह की समस्याओं से महिलाओं को गुजरना पड़ता है। हो सकता है फिल्म देखने के बाद आप या आपके बच्चे किसी ऐसे ही अभियान का हिस्सा बनने की प्रेरणा ले लें। इसलिए फिल्म को अवश्य देखें और परिवार के साथ देखें।
समीक्षकों सेः
फिल्म के कई रीव्यू मैंने पढ़े हैं। अच्छे व बुरे सभी प्रकार के। स्टार रेटिंग देने में बड़े-बड़े समीक्षकों ने कंजूसी की है। किसी ने भी 5 स्टार नहीं दिए। पता नहीं हमारे समीक्षकों ने 5 स्टार किस महान फिल्म के लिए बचाकर रखे हुए हैं? मैं फिल्म को 5 स्टार के लायक ही मानता हूं। अगर कोई सर्वश्रेष्ठ नहीं है तो फिर आपको जो उपलब्ध हैं उन्हीं में से बेहतर को चुनना चाहिए। पिछले कुछ साल में कई कमजोर व बेसिर पैर की फिल्मों को 4 स्टार दिए हैं हमारे महान समीक्षकों ने लेकिन “टायलेट एक प्रेम कथा” या “पैडमैन” जैसी फिल्म को देने में झिझक महसूस करते हैं। मेरे हिसाब से यह दोगलापन है। कुछ सराहना तो उस सोच की भी की जानी चाहिए जिसकी वजह से ऐसी फिल्में बनती हैं। अक्षय कुमार व टिवंकल, आप बधाई के पात्र हैं। ऐसी कुछ और फिल्में बनाएं।
- हर्ष कुमार सिंह






Waah sir....Isko padhne ke baad me is film ko dekhe bina raha nahi jayega....!!!
ReplyDeleteThanks, show this film to others too -:)
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