Friday, 29 April 2016

DEEP REVIEW: Baaghi- an overdose of action

बागीः एक्शन के बोझ से दबी हुई एक कमजोर फिल्म

RATING- 1*
जब सलमान खान ने ‘मैंने प्यार किया’ (1989) के साथ जोरदार एंट्री की थी तो उन्हें उसी वक्त ये बात समझ आ गई थी कि उनसे अब लोगों की अपेक्षाएं बहुत ज्यादा हैं। ऐसे में उन्हें सोच समझकर फैसला लेना होगा कि उनकी अगली रिलीज कौन सी होनी चाहिए। उस समय वे दो फिल्में कर रहे थे। एक तो सुपर हिट डायरेक्टर सावन कुमार की ‘सनम बेवफा’ और दूसरी दीपक शिवदासानी की ‘बागी’। सावन कुमार बड़ा नाम थे और उनकी फिल्म पूरी तरह तैयार भी थी लेकिन सलमान ने अपनी दूसरी रिलीज ‘बागी’ को बनाया। ‘बागी’ रोमांस व एक्शन से भरपूर फिल्म थी। युवा दर्शक जो सलमान के पीछे पागल हो चुके थे उन्हें ‘बागी’ में सलमान का अवतार बहुत पसंद आया। बाद में ‘सनम बेवफा’ भी रिलीज हुई और बहुत बड़ी ब्लाकबस्टर साबित हुई। तब से आज तक सलमान ने पीछे मुड़कर नहीं देखा है।
इस कहानी को यहां बताने का उद्देश्य मेरा केवल इतना था कि टाइगर श्राफ व श्रद्धा कपूर जैसे उभरते सितारों को भी फिल्म साइन करने से पहले उसकी कहानी पर जरूर गौर करनी चाहिए। श्रद्धा कपूर की कई फिल्में आ चुकी हैं। वे बहुमुखी-प्रतिभाशाली हैं और बड़ी सफलता का स्वाद चख चुकी हैं। उनके लिए तो कोई खतरा नहीं है लेकिन टाइगर की ये केवल दूसरी फिल्म है ऐसे में उन्हें बहुत सोच समझकर फिल्में करनी होंगी। क्योंकि उनकी सीमाएं हैं। ‘बागी’ में टाइगर को एक्शन करने के अलावा कुछ भी नहीं करना था और डायरेक्टर ने इतना एक्शन फिल्म में भर दिया कि कहानी उसके बोझ तले दबकर मर ही जाती है।
फिल्म में कहानी बिल्कुल नहीं है। केवल एक्शन ही एक्शन है और कंफ्यूज निर्देशक साबिर खान (उन्होंने ‘हीरोपंती’ में टाइगर को लांच भी किया था) शुरू से आखिर तक ये ही तय नहीं कर पाए कि वे रोमांटिक फिल्म बनाना चाह रहे हैं, एक्शन फिल्म बनाना चाह रहे हैं या दक्षिण भारत की एक मार्शल आर्ट को प्रमोट करना चाह रहे हैं। बस जैसे ही उन्हें लगने लगता है कि फिल्म सुस्त हो रही है वे टाइगर के लिए एक एक्शन सीन लेकर आ जाते हैं और बाकी सारा काम तो एक्शन डायरेक्टर को ही करना होता है। टाइगर श्राफ ने अपने शरीर को इस तरह से गढ़ा है कि एक्शन सींस में वे कमाल कर देते हैं लेकिन इसके अलावा वे कुछ भी नहीं कर पाते। जब वे डांस करते हैं तो बिल्कुल भी नेचुरल नहीं लगते। बल्कि ऐसा लगता है कि जैसे वे एक्शन ही कर रहे हैं। ये हकीकत है और उन्हें इससे बचना होगा। वे हृतिक रोशन नहीं हैं। ना ही उनके पीछे राकेश रोशन जैसा घर का डायरेक्टर है जो लगातार हिट फिल्में बनाता रहेगा। अगर अच्छा निर्देशक न हो तो हृतिक रोशन भी एक बहुत ही सतही किस्म के एक्टर बन जाते हैं। टाइगर की तो खैर बात ही छोड़िए वे तो बिल्कुल नए हैं।
‘बागी’ का कहानी कुछ तो है ही कमजोर ऊपर से फ्लैश बैक में सब कुछ दिखाने के चक्कर में फिल्म को और अधिक उबाऊ बना दिया गया है। श्रद्धा कपूर पर टाइगर व खलनायक सुधीर बाबू (तेलुगु फिल्मों के जाने-माने कलाकार व पूर्व बैडमिंटन स्टार) दोनों ही फिदा हैं। सुधीर पहले ही सीन में श्रद्धा को किडनैप करके थाईलैंड ले जाते हैं। टाइगर उसे छुड़ाने के लिए वहां जाते हैं और खूब एक्शन करके अपने काम में सफल रहते हैं। बस ये ही कहानी है बाकी सब कुछ मसाला है।
फिल्म में एक के बाद एक कई गीत भी आते हैं लेकिन इनमें से कोई भी ऐसा नहीं है जिसे आप थियेटर से बाहर आकर याद रख सकें। यानी जब भी कोई गीत आता है तो लगता है कि उसे ठूंसा गया है और जबरन उसकी सिचुएशन बनाई गई है। गानों से बेहतर तो सुनील ग्रोवर हैं। वे श्रद्धा के पिता के रोल में जब भी आते हैं तभी गुदगुदा जाते हैं। उनकी कॉमिक टाइमिंग गजब की है और वे फिल्मों में कॉमेडियन के रूप में अपनी जगह बना सकते हैं।
प्रतिभा व एक्टिंग के मामले में श्रद्धा कपूर बाजी मारती हैं। कमजोर कहानी व निर्देशन के बावजूद वे अपनी छाप छोड़ने में सफल रहती हैं। उनकी आवाज इतनी मधुर है कि संवाद बोलते समय भी उसमें एक खनक महसूस होती है। श्रद्धा अपनी सिंगिंस को भी सीरियसली लें तो उनके लिए बेहतर होगा। वे पहले भी गाती रही हैं और उन्हें इसे जारी रखना चाहिए। इस फिल्म में वे सुंदर भी लगती हैं लेकिन डायरेक्टर ने एक तरह से उन्हें वेस्ट ही किया है। उनका सारा ध्यान केवल टाइगर पर था। जबकि फिल्म में लंबे-लंबे एक्शन सींस ने टाइगर के अंदर के कलाकार को बाहर ही नहीं आने दिया। टाइगर की डायलाग डिलीवरी बहुत ही कमजोर है। वे हिंदी सही तरह से नहीं बोल बाते। ये उनके लिए घातक साबित हो सकता है। पहले रणवीर सिंह के साथ भी कुछ ऐसा ही महसूस होता था लेकिन बाजीराव के रोल में उन्होंने शुद्ध हिंदी में संवाद बोलकर ये सिद्ध कर दिया कि इरादा मजबूत हो तो कुछ भी संभव है। टाइगर को ऐसा ही करना होगा। उन्हें बहुत कुछ सीखना होगा।

दो सवालः
1. कोई बताएगा कि फिल्म में बार-बार बारिश क्यों आती थी?
2. श्रद्धा कपूर को भी एक्शन में इतना परफेक्ट क्यों दिखाया गया, टाइगर तो उन्हें बचाने के लिए आ रहे थे?

- हर्ष कुमार

Thursday, 14 April 2016

DEEP REVIEW: Ki & Ka- A must watch, movie with a message

की एंड काः नसीहत कम सबक ज्यादा, देखें जरूर 

RATING- 4*


अक्सर हमें निजी व सार्वजनिक जीवन में ऐसे तमाम उदाहरण मिलेंगे जहां महिलाओं, खासकर प्रतिभाशाली महिलाओं, को घर की चौखट के अंदर रसोई में मरते-खपते देखते हैं। इसके लिए उन्हें कभी कोई क्रेडिट नहीं दिया जाता, ये कहकर कि ये तो उनका काम है। कभी ये किसी के दिमाग में नहीं आया कि क्या मर्द भी औरतों की भूमिका में आ सकते हैं ? हमेशा चुनौतीपूर्ण विषयों पर फिल्में बनाने वाले डायरेक्टर आर बल्की ने इस बार इसी मसले पर फिल्म बनाई है। फिल्म एक प्रयोग के साथ शुरू होती है और बहस करते हुए समाधान पर खत्म होती है। ये बात और है कि अपनी बात कहने के लिए फिल्म में कुछ नाटकीयता भी रखी गई है लेकिन फिल्म अपने मकसद में पूरी तरह कामयाब रहती है।

फिल्म की समीक्षा इसकी रिलीज के दूसरा हफ्ता खत्म होने पर करने की सबसे बड़ी वजह ये है कि फिल्म के प्रोमो व इसके बारे में आ रहे इंप्रेशन से इसे देखने का मन ही नहीं हो रहा था। पर फिल्म के बारे में अलग-अलग माध्यमों से कई तरह का फीडबैक मिल रहा था और खासतौर से करीना कपूर के अभिनय के बारे में जो प्रतिक्रियाएं आ रही थी उसी की वजह से फिल्म मैंने देखी। फिल्म देखने के बाद लगा कि अगर नहीं देखता तो गलती होती। फिल्म अपने विषय को पूरी ईमानदारी के साथ फोकस करती है। अगर औरतें चूल्हा चौका कर सकती हैं तो मर्द क्यों नहीं। जिस तरह से हर सफल आदमी के पीछे एक औरत का हाथ होता है उसी तरह से एक सफल औरत के पीछे मर्द का हाथ क्यों नहीं हो सकता।

फिल्म की सबसे बड़ी खासियत है इसकी परेफेक्ट कास्टिंग। करीना व अर्जुन कपूर इस प्रयोगधर्मी फिल्म के लिए एकदम फिट हैं। करीना उम्र में अर्जुन से बड़ी हैं और वर्किंग हैं। दूसरी ओर अर्जुन आईआईएम-बी का टापर है लेकिन फिर भी सफलता की अंधी दौड़ में शामिल नहीं होना चाहता। वह चाहता है कि जिस तरह से उसकी मां ने अपने घर-परिवार के लिए अपना सब कुछ दे दिया वह भी कुछ ऐसा ही करे। इसके पीछे अर्जुन का तर्क है कि घर चलाना और संवारना एक आर्ट है और इसलिए उसकी मां एक बड़ी आर्टिस्ट थी। अर्जुन के पिता (रजत कपूर) दिल्ली के सबसे बड़े बिल्डर हैं और दूसरे पिताओं की तरह चाहते हैं कि वह उनका कारोबार संभाले। शुरू में करीना को भी यह लगता है कि शायद वह मजाक कर रहा है लेकिन अर्जुन गंभीरता से अपने काम को लेता और शादी के पहले दिन से ही कुशल ग्रहणी की तरह अपना जिम्मेदारी संभाल लेता है। जो चुनौतियां उसके सामने आनी थी वो आती हैं और अंत में वह यह साबित करने में सफल होता है कि मर्द भी किसी से कम नहीं।

फिल्म में कई बार मौके आते हैं जब झूठ का सहारा लिया जा सकता था लेकिन बल्की ने ऐसा नहीं किया और अपने विषय के प्रति ईमानदार रहे। अलबत्ता ये बात और है कि जिस वर्ग के किरदारों के माध्यम से उन्होंने अपने सच को स्थापित किया है वह वर्ग ही फिलहाल इसे स्वीकार कर सकता है। आम भारतीय समाज में शायद इस तरह के प्रयोग न चल पाएं। बहरहाल बल्की की तारीफ की जानी चाहिए कि उन्होंने इस विषय पर फिल्म बनाई और काफी हद तक दर्शकों को आकर्षित करने में भी सफल रहे।

अभिनय के लिहाज से करीना कपूर सब पर भारी पड़ती हैं। वे यह साबित कर देती हैं कि अगर उन्हें अच्छा रोल मिले और निर्देशक थोड़ी सी छूट दे दे तो वे कमाल कर सकती हैं। उनका अभिनय ‘जय गंगाजल’ की प्रियंका व ‘नीरजा’ की सोनम कपूर से कहीं ऊंचे दर्जे का है। वे कहीं भी नाटकीय नहीं होती। बेहद सुंदर लगती हैं और एक कामकाजी महिला के किरदार को उन्होंने इतने बेहतरीन तरीके से निभाया है कि कहीं लगता ही नहीं कि वे अभिनय कर रही हैं। दफ्तर की कामकाजी महिला के अलावा अपने पति के साथ रोमांस करने के लिए उत्तेजित महिला के चरित्र को भी उन्होंने शानदार तरीके से निभाया है। उनके कास्ट्यूम भी बेहतर डिजाइन किए गए हैं। अगर बेस्ट सीन की बात करें तो करीना अस्पताल में जब अर्जुन पर फटती हैं तो कमाल कर देती हैं। उनके अभिनय के सामने आज के दौर की तमाम हिरोइन बौनी नजर आती हैं।
अर्जुन कपूर अब तक जिस तरह के रोल करते रहे हैं उससे अलग नजर आए हैं और दर्शकों को खूब भाते हैं। खासतौर से जब वे अपनी जीवनशैली को लेकर टीवी पर इंटरव्यू देते हैं तो बहुत ही सहज और वास्तविक नजर आते हैं। रोमांटिक सीन में उनकी करीना के साथ जबर्दस्त कैमिस्ट्री नजर आई है। सारे रोमांटिक सीन बहुत ही कमाल के हैं और बेहतरीन तरीके से फिल्माए गए हैं। एक सीन के लिए अमिताभ बच्चन व जया बच्चन भी आए हैं और फिल्म के एक खास मोड़ पर उनके किरदार कहानी के लिए सहायक साबित होते हैं।
संगीत के लिहाज से भी फिल्म ठीक-ठाक है। गीत भले ही सुनने में एक ही (हाई हील) अच्छा है लेकिन फिल्म देखते समय वे सीन की डिमांड के हिसाब से बहुत ही अच्छे लगे हैं।
सीख:- अगर आप शादीशुदा हैं तो ये फिल्म मियां-बीवी के लिए है, और अगर शादी नहीं हुई और करने का इरादा है तो फिर तो इसे जरूर देखें, आपकी कुछ मुश्किल ही कम करेगी।

- हर्ष कुमार

Thursday, 10 March 2016

‘DOUBLE’ DEEP REVIEW: 'Neerja' & 'Jai Gangajal'

NEERJA- RATING- 3*

JAI GANGAJAL- RATING- 2*

 रीयल होकर भी रीयल नहीं लगती दोनों ही महिला प्रधान फिल्में 

सोनम और प्रियंका की बेस्ट फिल्म नहीं, कई कमजोरियां दोनों में 


शायद ये पहला मौका है कि दो फिल्मों का रीव्यू एक साथ कर रहा हूं। पहले किसी ने ऐसा नहीं किया है लेकिन मेरा इरादा कोई ऐसा रिकार्ड बनाने का नहीं था। इसकी दो वजह थी- एक तो दोनों ही महिला प्रधान फिल्में हैं और दूसरे दोनों ही एक-दो हफ्ते के अंतर पर रिलीज हो रही थी। इसलिए मैंने तय किया कि इनका एक साथ रीव्यू किया जाए। पहले से ही ये तो पता चल रहा था कि ‘नीरजा’ सत्यकथा पर आधारित है लेकिन ट्रेलर व प्रोमो से ‘जय गंगाजल’ भी वास्तविक किरदारों के करीब ही जान पड़ रही थी। इसलिए फैसला किया कि इस बार कुछ नया तरीका अपनाया जाए और दो फिल्मों की समीक्षा को एक साथ किया जाए। देखते हैं कि ये प्रयोग कितना सफल रहता है और आप सबका फीडबैक कैसा मिलता है:-

‘नीरजा’ की सोनम कपूर और ‘जय गंगाजल’ की प्रियंका चोपड़ा, दोनों ही रीयल लाइफ कैरेक्टर हैं। नीरजा के बारे में तो सब जानते ही हैं और ‘जय गंगाजल’ की महिला आईपीएस अधिकारी जैसे किरदार आपको असली जिंदगी में देखने के लिए मिल जाएंगे। जो लोग यूपी, बिहार व मध्य प्रदेश जैसे राज्यों से संबंध रखते हैं वे इस तरह की महिला आईपीएस अफसरों को देख भी चुके होंगे। ‘जय गंगाजल’ में दावा किया गया है कि ये सत्य कथा पर आधारित नहीं है और काल्पनिक है लेकिन फिल्म देखकर आप भी समझ जाएंगे कि ये प्रकाश झा की अपनी ही फिल्म ‘गंगाजल’ की सीक्वल है। ‘गंगाजल’ की कहानी बिहार में हुए सच्चे वाकये पर आधारित थी और ‘जय गंगाजल’ में प्रकाश झा ने इसी तरह का एक काल्पनिक वाकया गढ़ा है। फर्क केवल ये कर दिया है कि इस बार उन्होंने सब्जेक्ट को बिहार में केंद्रित न करके मध्य प्रदेश से जोड़ दिया है। इसके पीछे उनका क्या तर्क है ये तो समझ से बाहर है लेकिन जिस तरह से किरदार बोलते हैं और व्यवहार करते हैं उसे देखकर लगता है कि हम बिहार या पूर्वी यूपी के किसी जिले की कहानी देख रहे हैं। ये निर्देशक की कमजोरी है। ऐसी ही कमजोरी नीरजा में राम माधवानी ने की है। उन्होंने सच्चे घटनाक्रम पर एक बहुत ही नकली फिल्म बनाई है। फिल्म में हवाई जहाज का सेट लगाया गया है जो बिल्कुल भी असली प्लेन की फीलिंग नहीं देता है। एक नहीं कई ऐसे मौके आते हैं जब ‘नीरजा’ में इस तरह की कमजोरियां नजर आती हैं।

दोनों ही फिल्मों में कई कमजोरियां कॉमन ही हैं। भले ही ये फिल्में प्रियंका चोपड़ा व सोनम के किरदारों के लिए लिखी गई हैं लेकिन यह कड़वा सच है कि दोनों में ही कुछ सहायक कलाकारों के कैरेक्टर व एक्टिंग मुख्य एक्टर पर भारी पड़ जाते हैं। ‘नीरजा’ में शबाना आजमी सबको पानी पिला देती हैं तो ‘जय गंगाजल’ में प्रकाश झा का पात्र दर्शकों के दिल को भा जाता है। ये तो गनीमत रही कि प्रकाश झा संभल गए और उन्होंने अंत में प्रियंका को ही फिल्म की हीरो बना दिया लेकिन ‘नीरजा’ में ऐसा नहीं हो पाया। नीरजा की मौत के एक साल बाद हुए कार्यक्रम में शबाना का स्पीच देने वाला सीन पूरी फिल्म पर भारी पड़ गया। ये सीन लोगों की आंखों में आंसू ला देता है जबकि ‘जय गंगाजल’ का क्लाईमैक्स अधूरा सा लगता है। बस एक एक्शन सीन में ही आईपीएस अफसर ने विधायक को ठिकाने लगा दिया ? शायद इसी फर्क की वजह से ‘जय गंगाजल’ उतना प्रभाव नहीं छोड़ पाई जितना कि ‘नीरजा’।

भले ही दोनों फिल्मों के रीव्यू में ये कहा जा रहा हो कि ये फिल्में प्रियंका व सोनम की बेस्ट फिल्में हैं लेकिन ऐसा है नहीं। प्रियंका चोपड़ा आईपीएस अफसर की वर्दी में जमती हैं लेकिन सोनम कपूर एयर होस्टेस के रूप में प्रभाव नहीं छोड़ती। वास्तविक नीरजा भनोट बेहद खूबसूरत थी और किसी सुंदर सी हिरोईन को इस रोल के लिए चुना जाता तो बेहतर होता। नीरजा भनोट की मां ने भी कहीं कहा था कि मेरी बेटी सोनम से सुंदर थी और उनकी ये बात सही है। दोनों ही फिल्मों में एक भी सीन ऐसा नहीं डवलेप किया गया है जिसमें प्रियंका व सोनम की एक्टिंग का लोहा आप मान सकें।

दोनों ही फिल्मों की सबसे बड़ी कमजोरी हैं इसके डायलाग। ‘नीरजा’ में तो दमदार डायलाग के लिए गुंजाइश कम ही थी और उसमें ठीक-ठाक संवाद लिखे गए हैं लेकिन ‘जय गंगाजल’ में तो इसकी अपार संभावना थी और यहां लेखक चूक गए हैं। कुछ सीन ऐसे थे जहां लेखक चाहता तो तालियां बजवा सकता था। उदाहरण के तौर पर जब प्रियंका प्रकाश झा से कहती हैं कि वर्दी की गंदगी को गंदे पानी से नहीं धोया जा सकता तो इसके जवाब में वे कह सकते थे कि मैं अपने खून से इसे धोऊंगा, तो तालियां बज जातीं।

दोनों ही फिल्मों के निर्देशकों ने नाटकीयता का सहारा ज्यादा लिया है। कहीं भी रीयल होने की कोशिश नहीं की। ‘नीरजा’ में हाईजैक हो चुके जहाज के भीतर का घटनाक्रम कुछ और लंबा व रोमांचक हो सकता था लेकिन ये बोझिल सा लगता है। दर्शक सोचता है कि जल्द ही सेना हमला करे और कहानी को खत्म करे। हालांकि ‘नीरजा’ में 30 साल पुराना घटनाक्रम दिखाया गया है और इस वजह से ये आज के संदर्भ में कमजोर लगती है लेकिन इससे पहले ‘एयरलिफ्ट’ में कुछ इसी तरह की हकीकत को बहुत ही रीयल तरीके से दिखाया गया था और उसे बहुत ही पसंद किया गया था। ‘जय गंगाजल’ में प्रकाश झा ने काफी रीयल होने की कोशिश की लेकिन वे ओवर हो गए। वे भूल गए कि वे माहौल तो जरूर वास्तविकता की ओर बनाने की कोशिश कर रहे हैं लेकिन वर्तमान समय में आए बदलावों के बारे में वे भूल ही गए। वे भूल गए कि आज के दौर में इस तरह का नंगा नाच संभव नहीं है जैसा वे दिखा रहे हैं। खुलेआम लोगों को मारा जा रहा है और किसी के पास कोई सबूत नहीं। हर किरदार पांच मिनट में आईफोन पर बात करता नजर आता है। यहां तक की आईफोन के फेसटाइम (वीडियो कॉलिंग) के जरिये विधायक को ये तक दिखा दिया जाता है कि बच्चे का अपहरण कर लिया गया है लेकिन जब सरे आम विधायक के आदमियों को पेड़ से लटकाकर मारा जाता है तो कोई उसकी मोबाइल से क्लिप नहीं बना पाता। चलो मान लिया कि आम पब्लिक ने जानबूझकर ऐसा किया क्योंकि वे विधायक के आदमियों से पीड़ित थे, लेकिन जब विधायक बबलू पांडे खुलेआम लोगों को देख लेने की धमकी देता है और पुलिस अफसर को बीच चौराहे पर अधमरा कर देता है तो आम पब्लिक में से तब भी कोई इसकी वीडियो नहीं बनाता या फोटो नहीं खींचता। ये बहुत बड़ी खामी है जो अखरती है। अजय देवगन की ‘गंगाजल’ तो उन्होंने उस दौर से ली थी जिस दौर में मोबाइल नहीं थे लेकिन ‘जय गंगाजल’ तो आज की फिल्म है इसमें ऐसी गलती कैसे हो गई प्रकाश झा से?

कुल मिलाकर बार ‘नीरजा’ एक बार देखने लायक फिल्म है। बच्चों के साथ इसे देखें तो बेहतर होगा क्योंकि फिल्म ये सिखाती है कि किसी भी हालात में हार नहीं माननी चाहिए लेकिन ‘जय गंगाजल’ में ऐसा कुछ नहीं है। ये फिल्म केवल हमारे पुलिस अफसरों व नेताओं को देखनी चाहिए और इससे सबक लेने का प्रयास करना चाहिए। पर ऐसा हुआ नहीं होगा।

- हर्ष कुमार सिंह


Friday, 5 February 2016

DEEP REVIEW: Ghayal once again - But don’t expect another Ghayal

सनी के फैन हैं तो जरूर देखें पर फिर से ‘घायल’ की उम्मीद न करें 

RATING- 2*

25 साल पहले आई ‘घायल’ अगर आपने देखी है तो आप उसकी एनर्जी, डायरेक्शन के लेवल, कलाकारों के दमदार अभिनय से अब तक जरुर जुड़े हुए होंगे। जब वह फिल्म आई तो उसने बाकी सभी फिल्मों को बौना साबित कर दिया था। 11 फिल्मफेयर पुरस्कार जीतकर इस फिल्म ने कामयाबी के झंडे गाड़ दिए थे। सनी देयोल के कैरियर की ट्रेड मार्क माइलस्टोन फिल्म ‘घायल’ के अलावा कोई दूसरी नहीं है। शायद यही वजह है कि बढ़ती उम्र के इस दौर में खुद को फिर से रिइस्टेबलिश करने के लिए सनी ने ‘घायल’ को हथियार बनाते हुए कम बैक करने की कोशिश की है।

अब घायल के निर्देशक राजकुमार संतोषी में भी वो बात नहीं रही और न ही वे ऐसी फिल्में बना रहे हैं। शायद इसलिए सनी ने डायरेक्शन का भी जिम्मा अपने ऊपर ले लिया। वैसे ये कोई पहला मौका नहीं है जब सनी ने निर्देशन किया है। करीब 15 साल पहले सनी ने ‘दिल्लगी’ बनाई थी जिसमें वे खुद, भाई बॉबी देयोल व उर्मिला मातोंडकर थे। फिल्म चली नहीं थी। वैसे आज आप ‘दिल्लगी’ देखेंगे तो ये आपके दिल को छू जाएगी। रोमांस से भरपूर व बिना एक्शन की इस फिल्म का आपको सब कुछ अच्छा लगेगा लेकिन चूंकि उस समय सनी देयोल एक्शन फिल्मों के बेताज बादशाह हुआ करते थे इसलिए दर्शकों ने उन्हें ऐसी फिल्म में नकार दिया था। अब खुद को व अपने बैनर ‘विजेता फिल्म्स’ की कमबैक कराने के लिए सनी ने फिर एक्शन की राह पकड़ी है और इस फिल्म में एक्शन ही एक्शन है।

25 साल पहले आई ‘घायल’ और अब ‘घायल वंस अगेन’ में एक पूरी पीढ़ी का अंतर आ गया है इसलिए फास्ट टेक्नोलोजी और यंग जनरेशन के प्रतिनिधि किरदारों का फिल्म में भरपूर इस्तेमाल किया गया है। चार युवा एक बड़े कारोबारी के बिगडैल बेटे की एक हत्या करते हुए वीडियो फुटेज अनायास ही हासिल कर लेते हैं। फुटेज हासिल करने के लिए कारोबारी अपनी पूरी ताकत लगा देता है और सारा सरकारी सिस्टम उसके बेटे को बचाने के लिए लग जाता है। उसकी मुश्किल उस समय बढ़ जाती है जब ये बच्चे एक सच्चे पत्रकार अजय मेहरा (सनी) की मदद लेते हैं। फिल्म के पहले हाफ में ये बच्चे उस फुटेज को अजय तक पहुंचाने के लिए जिस हिम्मत का परिचय देते हैं वो देखने वाला है। कम से कम एक घंटे तक चेज होती है जो बहुत ही रोमांचक तरीके से फिल्माई गई है। फिल्म कमजोर पड़ती है दूसरे हाफ में। पुरानी घायल से इस घायल को जोड़ने के लिए बार-बार इस्तेमाल किए गए फ्लैश बैक फिल्म को वीक बनाते हैं। उस समय तो फिल्म लगभग ढेर ही हो जाती है जब इन चार बच्चों में से एक लड़की सनी की बेटी निकल आती है। जहां पहले फिल्म ये सिखाने की कोशिश कर रही थी कि सच्चाई हर रिश्ते नाते संबंध से बड़ी होती है वहीं अंत में ये फिल्म केवल एक ही ढर्रे पर चल निकलती है कि मां-बाप के लिए औलाद से प्यारा कोई नहीं होता। सनी अपनी बेटी को बचाने के लिए विलेन के घर में हेलीकाप्टर लेकर घुस जाते हैं। एक्शन होता है और सनी सबको मार-पीटकर जीत हासिल करने में सफल होते हैं।

अगर आप सनी देयोल के फैन हैं तो ये फिल्म आपके लिए है। इसमें झुर्रियों से भरे चेहरे वाले सनी देयोल हैं जो समय-समय पर अपने पुराने तेवर में नजर आते दिखते हैं लेकिन ये कहना होगा कि सनी देयोल अभिनेता से बेहतर अच्छे डायरेक्टर हैं। कई बार वे अपनी निर्देशन क्षमता से प्रभावित करते हैं। फिल्म में शुरू में कथानक बहुत ही उलझे हुए तरीके से शुरू होता है लेकिन बाद में फिल्म एक ही पटरी पर दौड़ने लगती है। बस आप देखते जाइये, एक्शन होता रहता है और फिल्म कब खत्म हो जाती है पता ही नहीं चलता। सनी फिल्म में गति बनाने में सफल रहते हैं लेकिन पुरानी घायल से जुड़े किस्से फ्लैश बैक में दिखाने के चक्कर में वे फिल्म में बाधा खड़ी करते हैं।

ओम पुरी एकमात्र किरदार हैं जो पुरानी व नई घायल में कॉमन हैं। घायल में वे एक ऐसे पुलिस अफसर बने थे जो अजय मेहरा की मदद करता है। वे पुलिस की नौकरी छोड़ने के बाद आरटीआई एक्टिविस्ट के रूप में सक्रिय दिखाए गए हैं। लगता है कि वे कोई बड़ा खुलासा करेंगे और फिल्म आगे बढ़ेगी, लेकिन उन्हें मार दिया जाता है और फिर बदले की कहानी शुरू हो जाती है। शुरू में सनी अपने ‘आदर्श दोस्त’ ओम पुरी के लिए लड़ते हैं और फिर अपनी बेटी के लिए।

फिल्म में गीत-संगीत बिल्कुल नहीं है। जरूरत भी नहीं थी। बैकग्राउंड संगीत की ही जरूरत थी और उस पर काफी काम हुआ है। पुरानी घायल के बैकग्राउंड म्यूजिक की छाप लगातार इस पर बनी रहती है। एक्शन कुछ जगह पर जोरदार है। खासतौर से बच्चों के पीछे विलेन की फौज जिस तरह से टूट पड़ती है वो सीन जोरदार तरीके से शूट किया गया है। अलबत्ता एक्शन में एक कमी खलती है कि सनी देयोल कभी भी पुराने तेवर में नहीं दिखाए गए हैं। लगता है कि अब सनी देयोल का एक्शन होगा, अब सनी ढाई किलो का हाथ उठाएंगे लेकिन ऐसा होता नहीं। क्लाइमैक्स में वे जिस तरह से हेलीकाप्टर हाईजैक कर विलेन के घर में घुसते हैं वो बचकाना सा लगता है। यहां जोरदार एक्शन की गुंजाइश थी लेकिन चूक गए हैं।

बहरहाल सनी ने अपनी उम्र के हिसाब से किरदार प्ले करने का प्रयास किया है और वे सहज लगते हैं। ‘यमला पगला दीवाना’ जैसी बेहूदा कॉमेडी फिल्में उन पर नहीं जंचती हैं। थोड़ा वजन भी उनका ज्यादा बढ़ गया है उन्हें अपने समकालीन अनिल कपूर से सबक लेना चाहिए। फिल्म में विलेन राज बंसल के रूप में नरेंद्र झा ने जोरदार काम किया है। वैसे अनजाने में फिल्म एक सबक दे जाती है कि अगर जरूरत पड़े तो बच्चों को प्यार के साथ दो चार तमाचे भी लगा देने चाहिए नहीं तो वे बिगड़ जाते हैं और बेकाबू हो जाते हैं।

- हर्ष कुमार


Friday, 22 January 2016

DEEP REVIEW: Airlift- A strong film with good ‘Political Message’

एयरलिफ्टः  गंभीर राजनीतिक संदेश वाली मजबूत फिल्म 

 RATING- 4*

अक्षय ‘भारत’ कुमार की नई फिल्म ‘एयरलिफ्ट’ जो काम सबसे बेहतर तरीके से करने में सफल हुई है वो है ‘राजनीतिक मैसेज’ देने का काम। पिछले कुछ समय में भारत सरकार ने कुछ अशांत देशों में फंसे भारतीयों को निकालने के काम तत्परता और प्राथमिकता से किए हैं। इस फिल्म को देखने के बाद आपको आभास हो जाएगा कि इस तरह के अभियानों में तेजी की जरूरत क्यों आवश्यक है।
 -मुसीबत में फंसे लोगों पर क्या गुजर रही है उसे भारत में बैठे हुक्मरान व डिप्लोमेट नहीं समझ पाते। ये फिल्म यही सिखाने का संदेश सबसे पहले देती है।
 -इसके अलावा ये फिल्म उन लोगों को भी मैसेज देती है जो भारत से दूसरे देशों में जाते हैं और वहां पैसा कमाकर अपने देश को भूल जाते हैं। वे भूल जाते हैं कि उनकी सबसे बड़ी पहचान भारतीय होना ही है।
-तीसरा सबसे अहम व बड़ा मैसेज ‘एयरलिफ्ट’ यह देती है कि भारत से ज्यादा शांत व सुरक्षित देश कोई दूसरा नहीं हो सकता।

फिल्म की कहानी सच्ची घटना पर आधारित है। 90 के दशक में कुवैत में फंसे डेढ़ लाख भारतीयों को निकालने के लिए वहां रहने वाले कुछ भारतीयों के प्रयासों को ये फिल्म सलाम करने की सफल कोशिश करती है। फिल्म की पटकथा कसी हुई है और आपको एक मिनट के लिए भी अपनी सीट से हिलने की इजाजत नहीं देती। एक के बाद एक घटनाएं होती रहती हैं और फिल्म कब खत्म हो जाती है पता ही नहीं चलता।

फिल्म में गीत-संगीत को जितना जरूरी है उतना ही स्थान दिया गया है। क्लाइमेक्स के सींस में बजने वाला गीत दिल में देश के प्रति सम्मान की भावनाएं जगाने में सफल रहता है। फिल्म में गीत संगीत पर ज्यादा फोकस न करके स्क्रीनप्ले को गतिमान बनाए रखने पर जोर रहता है और इसलिए फिल्म अपेक्षित प्रभाव छोड़ने में सफल रहती है।

अक्षय कुमार फिल्म की जान हैं। वे इस रोल के लिए एकदम परफेक्ट हैं। बढ़ती उम्र के साथ जिस तरह के रोल वे कर रहे हैं वे उन्हें बतौर अभिनेता स्थापित कर रहे हैं। ‘होलीडे’, ‘बेबी’ और ‘एयरलिफ्ट’, लगातार तीन अच्छी फिल्में करने वाले अक्षय कुमार अब ‘मिशन-आपरेशन टाइप’ की फिल्मों के स्पेशलिस्ट बनते जा रहे हैं। वे इन रोल्स में जमते हैं और कभी ये नहीं लगता कि उनके अलावा भी कोई ऐसे किरदार निभा सकता है।

फिल्म में सबसे ज्यादा चौंकाया है निमरत कौर ने। लग नहीं रहा था कि अक्षय कुमार की फिल्म में हिरोईन भी अपना प्रभाव जमा सकती है। मुसीबत के समय अपने पति व परिवार के लिए चिंतित हो जाने वाली महिला के किरदार को उन्होंने बखूबी निभाया है। वे परिपक्व नजर आती हैं और ऐसे रोल्स के लिए परफेक्ट हैं। इंटरवल के बाद, एक सीन में जब वे अक्षय के समर्थन में रिफ्यूजी कैंप में अपना मत जाहिर करती हैं तो छा जाती हैं। आप ताली भी बजा सकते हैं। बहरहाल वे बालीवुड की टिपिकल हिरोइन के खांचे में फिट हो पाएंगी या नहीं ये देखने वाली बात होगी। उन्हें रोल चुनते समय ध्यान रखना होगा कि वो उन्हें फबता है या नहीं। कुछ वैसे ही जैसे विद्या बालन को करना होता है।

अगर आप अच्छी फिल्म देखने ही थियेटर जाते हैं तो इस फिल्म को जरूर देखें। खासतौर से युवा पीढ़ी जो खाड़ी संकट के इतिहास से वाकिफ नहीं हैं उन्हें ये फिल्म देखनी चाहिए। वैसे फिल्म जिस ईमानदारी से बनाई गई है उसे देखते हुए इसके बाक्स आफिस पर पैसा बरसाने की संभावनाएं कम हैं पर तारीफ खूब मिलने वाली हैं।

- हर्ष कुमार 

Thursday, 21 January 2016

Sunny Leone: Welcome to Bollywood

सनी लियोनी के पोर्न स्टार से बालीवुड स्टार बनने का सफर एक झटके में पूरा हो गया है। CNN-IBN के जिस इंटरव्यू के लिए भूपेंद्र चौबे नामक टीवी पत्रकार को तमाम आलोचनाओं का सामना करना पडा है असल में वह इंटरव्यू सनी लियोनी के लिए वरदान साबित हुआ है। अब इंतजार कीजिए सनी लियोनी की ऐसी फिल्म के ऐलान का जिसमें उनके नायक तुषार कपूर, सचिन जोशी, वीर दास जैसे नाम नहीं होंगे। उनकी अगली फिल्म ऐसी भी हो सकती है जिसमें शायद वे बिकिनी में नहीं बल्कि साड़ी में नजर आएं। वे ऐसे किरदार में भी नजर आ सकती हैं जो उनके शरीर को नहीं बल्कि अभिनय की बानगी भी पेश करने का प्रयास करे।


ये सब बातें बहुत ही अजीब लग रही हैं लेकिन ये सब सही साबित हो सकती हैं। जिस सनी लियोनी का नाम बालीवुड के नामचीन सितारे अपने मुंह से लेते हुए भी झिझक महसूस करते थे उसी सनी के बारे में सोशल मीडिया पर जमकर समर्तन जताया जा रहा है। ऐसा लगता है जैसे सारा बालीवुड सनी लियोनी के समर्थन में उठ खड़ा हुआ है। आमिर खान ने तो फेसबुक पर ये लिखकर फाइनल मुहर ही लगा दी कि उन्हें सनी लियोनी के साथ काम करने में कोई दिक्कत नहीं होगी और उनके अतीत से उन्हें कोई लेना देना नहीं है।

सब जानते हैं कि हाल ही में सनी को चौबे को दिए साक्षात्कार के दौरान अपने कैरियर को लेकर कई कठिन सवालों का सामना करना पड़ा था। सनी से सवाल किया गया कि वह आमिर खान के साथ काम करना चाहती हैं लेकिन आमिर उनके साथ काम करना नहीं चाहते तो उन्हें कैसा लगता है? इसके अलावा सनी से पूछा गया कि विवाहित महिलाएं सनी लियोनी को अपने पतियों के लिए चुनौती मानती हैं, क्या वह इसकी परवाह करती हैं? सनी ने साक्षात्कार में पूछे गए सवालों के जवाब बहुत ही साहस के साथ दिए थे। उन्होंने चेहरे पर जरा भी शिकन लाए बिना सब सवालों के जवाब दिए। सनी ने मासूमियत के साथ ये भी कहा था कि हो सकता है कि आमिर उनके साथ काम करना पसंद न करें लेकिन वे उन जैसे कलाकार के साथ काम करके बहुत ही गर्व महसूस करेंगी।

चौबै ने उन पर बार-बार दबाव बनाया था कि वे किसी तरह अपने अतीत को लेकर नकारात्मक बात कहें या फिर ये ही कह दें कि अब उन्हें (सनी को) पोर्न स्टार होने पर शर्म आती है या पछतावा होता है, लेकिन सनी ने ऐसा कुछ भी नहीं कहा और उनके सवालों को चेहरे पर अडिग भाव रखते हुए झेला। वैसे 20-21 मिनट का ये इंटरव्यू सनी के लिए किसी पुलिस थाने में हो रही पूछताछ से कम नहीं था लेकिन वे इसमें सफल रही और फिल्म इंडस्ट्री में उनके लिए लगाव उमड़ पड़ा। विद्या बालन, अनुष्का शर्मा, सुशांत सिंह, राधिका आप्टे, अर्जुन कपूर, शोभा डे, सुबी सैमुअल, शाहिद कपूर, अरशद वारसी, अदिति राव हैदरी, फराह खान, गीता बसरा, जेनिलिया देशमुख, अनिल कपूर, रीतेश देशमुख, श्रुति हसन समेत तमाम लोगों ने ट्वीट करके सनी के प्रति अपना समर्थन जाहिर किया और सनी ने सभी को थैंक्यू भी कहा।

आमिर ने अपने Facebook पेज पर लिखा, 'मुझे लगता है कि सनी बेहद शालीनता और गरिमा से पेश आईं। काश कि मैं साक्षात्कार लेने वाले के बारे में भी ऐसा कह पाता।‘ आमिर ने आगे लिखा, 'सनी मुझे तुम्हारे साथ काम करके खुशी होगी। मुझे तुम्हारे अतीत को लेकर किसी तरह की परेशानी नहीं है, जैसा कि साक्षात्कार लेने वाले ने कहा था। खुश रहो।‘ आमिर ने Twitter पर भी यह पोस्ट शेयर की। सनी ने आमिर के समर्थन पर आभार व्यक्त करते हुए जवाब में लिखा, 'यह देखकर मेरा दिल खुश हो गया। आपके समर्थन के लिए आपका बेहद आभार। यह मेरे लिए बेहद मायने रखता है। यह कहकर आपने मेरा पूरा साल बना दिया। आपका बेहद सम्मान करती हूं। मुझे यकीन नहीं हो रहा है। ‘
रियलिटी शो ‘बिग बास’ के जरिये हिंदुस्तान आने वाली पैंटहाउस की स्टार सनी को महेश भट्ट ने सबसे पहले पहचाना था और शो के दौरान घर में ही जाकर अपनी फिल्म ‘जिस्म 2’ के लिए साइन किया था। ‘जिस्म 2’ के पहले भाग में बिपाशा बसु थी और वे बड़ी स्टार बन गई थी लेकिन सनी के साथ ऐसा नहीं हुआ। उन्हें ‘रागिनी एमएमएस’, ‘लीला’, ‘जैकपाट’ जैसी बी ग्रेड फिल्में ही करने को मिली। इनमें उन्हें अपने शरीर को दिखाने के अलावा कुछ नहीं करना था। वे बार-बार कहती रही हैं कि वे अच्छे रोल करना चाहती हैं। उनके पास डायरेक्टर आते हैं ये कहकर वे उन्हें बहुत अच्छा रोल देंगे। उनकी इमेज को बदल देंगे लेकिन (हंसकर कहती हैं) सब वो ही सब चीजें कराने लगते हैं।
पर अब ऐसा नहीं होगा। बहुत संभव है कि इस बार डायरेक्टर उनके पास आएं एक अच्छी स्क्रिप्ट लेकर और शायद उनसे वो भी न करवाएं जो वे अब तक करती रही हैं और करना नहीं चाहती हैं।
 

Big Welcome to Bollywood Sunny
- हर्ष कुमार




Friday, 15 January 2016

Inside Story: Break up of Ranbeer Kapoor and Katrina Kaif

रनबीर कपूर और कैटरीना कैफ के ब्रेकअप की खबर शुक्रवार को जंगल की आग की तरह फैल गई। शुक्रवार की रात को मुंबई में हुए ‘फिल्मफेयर अवार्ड्स समारोह’ के दौरान बस यही चर्चा होती देखी गई। मीडिया से लेकर स्टार तक इस बारे में बात करते सुने गए। सोशल मीडिया पर ये खबर दोपहर बाद ब्रेक हुई और रात तक सुर्खी बन गई। सबकी जुबान पर सवाल एक ही था कि दोनों अलग हो गए हैं ये कैसे पता चला ? पूरी तरह से पड़ताल की गई तो पता चला कि दरअसल रनबीर ने एक अलग घर ले लिया है और वहीं से ये खबर चली कि दोनों ने अलग होने का फैसला कर लिया है।

दरअसल कई साल से रनबीर और कैटरीना ‘लिव इन रिलेशनशिप’ में थे और कार्टर रोड स्थित घर पर रह रहे थे। पता चला है कि रनबीर ने विल्सन अपार्टमेंट्स में शिफ्ट कर लिया है जबकि कैटरीना सिल्वर स्टैंड्स वाले घर में रहेंगी। रनबीर अपने नए घर में मां-बाप के साथ रहने की योजना बना रहे हैं। मुंबई से प्रकाशित अंग्रेजी के प्रमुख अखबार DNA ने इस बारे में एक बड़ी स्टोरी भी दी है। स्टोरी में इस बात का भी आकलन करने का प्रयास किया गया है कि दोनों के बीच क्यों नहीं बन पाई। हालांकि इनमें से कोई भी तर्क गले नहीं उतर रहा है। फिर भी ये खबर सही है कि दोनों ने अलग होने का फैसला कर लिया है।
रनबीर व कैटरीना की ये सैर सपाटे वाली फोटो कुछ साल पहले खूब वायरल हुई थी।

फिल्म स्टार्स की सोशल व फैशन लाइफ को कवर करने वाली वेबसाइट ‘मिस मालिनी’ ने भी दोनों के ब्रेक अप की खबर को कंफर्म किया है। इस साइट के स्टार्स में अच्छे सोर्स बताए जाते हैं। DNA का कहना है कि रनबीर की मां नीतू सिंह कभी भी कैटरीना को स्वीकार करने के मूड में नहीं नजर आई। इंस्टाग्राम पर नीतू ने कभी कैट की अपने परिवार के साथ फोटो शेयर नहीं की। जब कभी ग्रुप फोटो शेयर करने की बारी आई तो नीतू ने हमेशा ही कैटरीना को उसमें से क्राप कर दिया।
गौर से देखिये ये फोटो। जिसमें कैट को कट कर दिया गया।
कुछ समय पहले खबर चली थी कि ऋषि कपूर को कैटरीना ने पापा कहना शुरू कर दिया है। एक इंटरव्यू में जब ऋषि कपूर से ये सवाल किया गया तो वे भड़क गए थे। चिंटू ने कहा था- ये क्या बकवास है। मैं किसी को इतनी लिबर्टी नहीं देता हूं कि वह मेरे इतने नजदीक आ जाए। मैंने कैटरीना के साथ ‘नमस्ते लंदन’ व ‘जब तक है जान’ में काम किया है वह अच्छी लड़की है लेकिन उसके मुझे पापा कहने वाली बात सही नहीं है।

ये बात सब जानते हैं कि दीपिका व रनबीर की जोड़ी घर में सबको पसंद थी लेकिन दोनों का रिश्ता आगे नहीं बढ़ सका। रनबीर की जगह रणवीर ले चुके हैं लेकिन इसमें जरा भी शक नहीं है कि दीपिका की जोड़ी आज भी रनबीर के साथ गजब ढाती है। ‘ये जवानी है दीवानी’ में दोनों ने बड़ी सफलता हासिल की थी। कहा गया था कि इस फिल्म को अच्छा रिस्पांस इसलिए मिला क्योंकि इसमें रनबीर व दीपिका की जोड़ी थी। दोनों की कैमिस्ट्री ही गजब है। ‘तमाशा’ में भी दोनों की कैमिस्ट्री शानदार थी। दोनों के रोमांटिक सीन बेहद ही रीयल नजर आते थे।
हालांकि रनबीर की बहनें करीना व करिश्मा कैटरीना का पसंद करती हैं। दोनों के साथ वे अक्सर पार्टी करती नजर आती थी लेकिन जब तक ऋषि व नीतू की ओर से हरी झंडी नहीं मिलती तब तक दोनों का रिश्ता आगे बढ़ पाना संभव नहीं था। इंतजार कीजिए दूसरी खबर का।

Friday, 8 January 2016

DEEP REVIEW : Wazir – A Farhan Akhtar movie with Big B in lead role

वजीरः एक भटकी हुई, कमजोर बदले की कहानी
REVIEW RATING - 2*

अमिताभ का किरदार फिल्म की जान है। 
पिछले कुछ सालों में कई बार ऐसा हुआ है जब फिल्मकारों ने मेगा स्टार अमिताभ बच्चन को लेकर प्रयोग किए हैं। कुछ सफल (पा व पीकू) हुए हैं तो कुछ विफल (शामिताभ), लेकिन एक बात सत्य है कि अमिताभ की फिल्म में उनके किरदार से ज्यादा पसंदीदा और कुछ नहीं होता। लोग अमिताभ को देखने जाते हैं। यही वजह है कि जब लोग ‘पीकू’ देखने जाते हैं तो उन्हें दीपिका से ज्यादा अमिताभ के किरदार से लगाव हो जाता है। कुछ ऐसा ही ‘वजीर’ के साथ भी है। फिल्म शुरू भी फरहान अख्तर पर होती है और खत्म भी फरहान पर लेकिन बीच में अमिताभ का पात्र सबके दिलो-दिमाग पर छा जाता है। ऐसा लगने लगता है कि अमिताभ बच्चन और फरहान अख्तर की जोड़ी कुछ ऐसा कमाल करेगी जो चौंका देगा, हिला देगा। पर ऐसा कुछ नहीं होता और एक धमाके के साथ अमिताभ का किरदार खत्म हो जाता है और फिल्म वहीं चार्म खो देती है।

DEEP REVIEW में डालते हैं फिल्म के प्लस व माइनस प्वाइंट्स पर नजरः-
1. ये जान लेना जरूरी है कि यह न तो एक्शन फिल्म है, न थ्रिलर, न दो दोस्तों की कहानी और न ही इमोशनल ड्रामा। ये एक साधारण रिवेंज यानी बदले की कहानी है। फरहान अख्तर अपनी बेटी के हत्यारों से बदला शुरू में ही ले लेते हैं और अमिताभ बच्चन बाद में। फिल्म के बारे में शुरू से ही प्रचारित किया जा रहा है कि ये दोस्ती की कहानी है लेकिन ऐसा कुछ नहीं है। अमिताभ बच्चन अपनी बेटी की हत्या का बदला लेने के लिए फरहान अख्तर को मोहरे की तरह यूज करते हैं और यही फिल्म की कहानी है।
फरहान ने एटीएस अफसर का रोल बखूबी निभाया। 
2. एक बात समझ से बाहर है कि अमिताभ बच्चन को एक व्हील चेयर पर बैठा रहने वाला इंसान क्यों बनाया गया है ? क्या केवल इसलिए कि फरहान अख्तर को फिल्म में मुख्य नायक के रूप में पेश किया जा सके? अगर ऐसा ही करना था तो फिर इसमें अमिताभ बच्चन की जगह किसी भी कलाकार को लिया जा सकता था। अमिताभ बच्चन को अत्याधुनिक व्हील चेयर पर बैठे हुए देखकर दर्शक ये अंदाजा लगाने लगते हैं कि जो व्यक्ति खुद ही गाड़ी में बैठकर उसे चलाकार कहीं भी जा सकता है उसे अपना बदला लेने के लिए फरहान को यूज करने की क्या जरूरत थी?

3. फिल्म का क्लाइमेक्स बहुत ही कमजोर तरीके से शूट किया गया है। फरहान अख्तर जिस तरह से एक मिनिस्टर को कश्मीर में मारने के लिए जाते हैं उसमें कुछ भी नया नहीं था। न उसमें कोई प्लानिंग नजर आती है और न ही कोई रोमांच बाकी रह जाता है। मंत्री जी खुलेआम घूम रहे थे और उन्हें कोई भी आसानी से मार सकता था।

4. फिल्म पहले हाफ में कई अच्छे प्रभावशाली संवादों के व सींस के जरिये दर्शकों को बांधने में सफल रहती है। फिल्म के पहले ही सीन में ‘तेरे बिन’ गीत आ जाता है। जिसमें फरहान व खूबसूरत अदिति की पूरी कहानी दिखा दी जाती है। इससे संकेत मिलते हैं कि निर्देशक उनकी प्रेम कहानी आदि पर ज्यादा समय न खर्च करके अमिताभ बच्चन व फरहान पर फोकस करने जा रहा है। ऐसा ही होता भी है। फरहान और अमिताभ के बीच कई अच्छे सीन क्रिएट किए गए हैं। खासतौर से प्यादों को प्यालो में भरी वोदका में डुबोकर शतरंज खेलने वाला सीन तो बहुत बेहतरीन लिखा गया है। इस सीन में शर्त ये थी कि जिसके प्यादे मरते जाएंगे वो उन प्यालों को पीता रहेगा। बच्चन जान बूझकर हार रहे थे और पी रहे थे, और सब जानते हैं कि शराब पीकर संवाद बोलने का अंदाज अमिताभ बच्चन का कुछ और ही होता है। उनके कुछ संवादों पर आप अनायास ही ताली बजा उठेंगे।

5. अमिताभ बच्चन जिस समय अपनी पुरानी व्हील चेयर जल जाने के बाद दूसरी व पहली से ज्यादा आधुनिक चेयर लेते हैं तो दर्शकों को यकीन हो जाता है कि वे कुछ बड़ा करने की योजना बना रहे हैं। ये उत्सुकता उस समय और अधिक बढ़ जाती है जब वे फरहान को बिना बताए कश्मीर के लिए रवाना हो जाते हैं लेकिन जब एक ही धमाके में वे खत्म हो जाते हैं तो ऐसा लगता है कि फिल्म अपने मकसद से भटक गई। जो दर्शक बंधकर पहले हाफ को देख रहे थे वे दूसरे हाफ में खुद को ठगा हुआ महसूस करते हैं।
सबसे पापुलर 'अतरंगी' गीत क्लाइमेक्स में आता है 
6. फिल्म का संगीत इसका सबसे मजबूत पक्ष है। सारे गीत बैकग्राउंड में बजते है और अच्छे लगते हैं। इसके लिए कई संगीतकारों का प्रयोग किया गया है जिससे विविधता का आभास होता है, लेकिन संगीत के मामले में निर्देशक ने एक बड़ी भारी गलती की है। अमिताभ व फरहान अख्तर का गाया गीत ‘अतरंगी यारी’ फिल्म के एंड में टाइटल्स के साथ प्रयोग किया गया है जबकि इसे मुख्य फिल्म में यूज किया जाता तो ये ज्यादा प्रभावशाली साबित होता। अंत में दर्शक केवल थियेटर से बाहर निकलने की सोचने लगता है और एक गीत के लिए सिनेमा में बैठे रहना बोझ लगता है। गीत बहुत ही अच्छा है और इसे कैश करने के लिए इसे फिल्म में बीच में कहीं यूज किया जाता तो बेहतर होता।
अदिति सजल आंखों से दिल को छू लेती हैं। 

7. अभिनय के लिहाज से अमिताभ बच्चन व फरहान अख्तर बेजोड़ हैं। भले ही निर्देशक कितना भी कमजोर हो ये दोनों ही अपने पात्र को उठा देने में सक्षम हैं और दोनों ने यही किया भी है। अमिताभ जिस तरह से संवाद बोलते हैं वो अद्भुत है। उनका किरदार बेहद जिंदादिल है और दर्शकों पर छा जाता है। एटीएस आफिसर के रोल में फरहान अख्तर एकदम फिट नजर आते हैं। उनमें वो परिपक्वता नजर आती है जो इस तरह के रोल निभाते समय दिखाई जानी चाहिए। अदिति राव हैदरी नेचुरल ब्यूटी हैं और वे हर समय सुंदर लगती हैं। उनके कास्ट्यूम बेहतरीन तरीके से डिजाइन किए गए हैं जो उनके मुस्लिम किरदार को उभारकर सामने लाते हैं। अभिनय करने के नाम पर उन्हें ज्यादातर समय रोना ही था बस। एक धूर्त राजनीतिक का रोल मानव कौल ने शानदार निभाया है। कश्मीरी होने का लाभ भी उन्हें मिला है।
मानव कौल सबको चौंका देते हैं। 
8. फिल्म का कहानी में बहुत ही झोल हैं। अमिताभ बच्चन शुरू से ही कहते हैं कि उनकी बेटी की मौत हादसे में नहीं हुई बल्कि मर्डर किया गया है। पर किस आधार पर? केवल मानव कौल की आंखों से उन्होंने ये कैसे जान लिया कि उसने उनकी बेटी की हत्या की थी। मानव कौल की बेटी फरहान के पूछने पर कुछ नहीं बोलती लेकिन जब फरहान अख्तर मानव की हत्या करने के लिए आते हैं तो सब कुछ उगल देती है। वह इतने बड़े रहस्य से पर्दा उठाती है जो अविश्वनीय है। एक आतंकी हमले में सारे गांव के पचास से ज्यादा लोग मार दिए गए और किसी को मानव कौल पर शक नहीं हुआ ? मानवकौल आतंकी था तो उसने गांव की ही एक बच्ची को अपनी बेटी कैसे दिखा दिया? एक आतंकी का चंद साल में ही केंद्र सरकार में मंत्री बन जाना भी एक अविश्सनीय बात नजर आती है। इसी तरह से अमिताभ बच्चन का दिल्ली के राष्ट्रपति भवन की ओर से आने वाली रोड से गुजर रहे मंत्री की कार पर जूता फेंकने वाला सीन हजम नहीं होता। इसे कहीं सार्वजनिक कार्यक्रम के दौरान भी दिखाया जा सकता था। इसी तरह के अनगिनत झोल पूरी फिल्म में हैं।
बेहतरीन सीन को कमजोर फिल्मांकन। 
9. फरहान अख्तर बेहतरीन कलाकार हैं लेकिन ये जान लेना भी जरूरी है कि अगर आप अमिताभ बच्चन को मुख्य किरदार में ले रहे हैं तो उनके सामने किसी दूसरे कलाकार को जबरन मुख्य किरदार में स्थापित करने का प्रयास नहीं करना चाहिए। ‘शामिताभ’ पूरी तरह से अमिताभ की फिल्म थी लेकिन उसमें धनुष को जरूरत से ज्यादा फुटेज देकर आर बाल्की जैसे डायरेक्टर भी मात खा गए थे। यहां भी यही होता नजर आता है।

10. फिल्म में रिपीट वैल्यू का अभाव है। आप इसे एक बार देख सकते हैं लेकिन दोबारा देखने के लिए इसमें कुछ नहीं है। शतरंज की बाजी में बादशाह के बाद सबसे ताकतवर वजीर होता है पर यहां फिल्म का टाइटल वजीर होने के बावजूद अंत तक ये स्थापित नहीं हो पाता कि वजीर अमिताभ बच्चन का किरदार है या फिर फरहान अख्तर का ? अगर आप अमिताभ के फैन हैं तो इसे जरूर देख ही लेंगे और अगर आपको फरहान अख्तर पसंद हैं तो उनके लिए भी ये फिल्म देखी जा सकती है। वे यहां अब तक अपने सबसे अलग रोल में नजर आए हैं और उनके लिए एक बार तो फिल्म देखी ही जा सकती है।

- हर्ष कुमार













Wednesday, 6 January 2016

Farhan Akhtar: A versatile personality...more than a film artist

फरहान अख्तरः कलाकार ही नहीं एक बेहतरीन बौद्धिक व्यक्तित्व भी
हिंदी सिनेमा के सबसे प्रतिभाशाली कलाकारों में से एक फरहान अख्तर का मानना है कि फिल्म इंडस्ट्री लोगों का मनोरंजन करके देश के प्रति अपने योगदान को भली भांति निभा रही है। इसके अलावा फिल्म इंडस्ट्री के लोग कुछ इस तरह से भी देश के लिए अपना योगदान कर रहे हैं जिसका बखान करने की वे (योदगान करने वाले कलाकार) जरूरत नहीं समझते।

फरहान अपनी फिल्म ‘वजीर’ के प्रमोशन के सिलसिले में मंगलवार को दिल्ली में थे और अपने निर्माता विधु विनोद चोपड़ा, निर्देशक बिजॉय नांबियार व फिल्म में अपनी नायिका अदिति राव हैदरी के साथ ‘पंजाब केसरी (जालंधर)/नवोदय टाइम्स’ के दफ्तर आए थे। फरहान के साथ बातचीत से ये साफ नजर आया कि वे जितने बेहतरीन निर्माता, निर्देशक, लेखक, गायक व अभिनेता हैं उससे भी बेहतरीन वे इंसान के तौर पर हैं। दूसरी फिल्मी हस्तियों से बिल्कुल अलग फरहान देश, समाज और अपनी फिल्म बिरादरी के बारे में बहुत सजग व सतर्क नजर आते हैं और चीजों को बहुत ही गंभीरता से लेते हैं।


सवाल जवाब का सिलसिला चला तो फरहान से सवाल उनकी फिल्म ‘वजीर’ के बारे में कम और दूसरे विषयों पर ज्यादा हो रहे थे। दरअसल फरहान में ये गुण अपने पिता जावेद अख्तर से आया है। जावेद साहब भी समाज के बारे में अपना एक नजरिया रखते हैं और ये उनकी बातों व शायरी में भी झलकता है। फरहान का कहना था कि फिल्म कलाकारों से लोगों की आशाएं बहुत होती हैं। हर विषय पर लोग हम लोगों का व्यू जानना चाहते हैं। ऐसे में हम लोग कई बार निशाने पर भी आ जाते हैं। सबसे बड़ी दिक्कत ये है कि अगर आप किसी विषय पर अपना कोई स्टैंड रखते हैं तो फिर आपको इसे निभाना भी चाहिए। ऐसे में हम लोग कुछ ऐसे मुद्दों पर बात करने से बचते हैं जिन पर बाद में चलकर कायम रह पाना मुमकिन न हो पाए। वैसे लोग हमसे तो अपेक्षा रखते हैं कि हम हर विषय पर बोलें लेकिन क्या आपने कभी डाक्टर्स को किसानों के आत्महत्या के मसले पर बोलते या धरना प्रदर्शन करते देखा है ? मैंन तो दूसरे वर्गों के लोगों को इस तरह के मुद्दों पर आवाज उठाते बहुत कम देखा है। जब हमें लगता है कि किसी मुद्दे पर बोलना जरूरी है तो हम बोलते भी हैं और अपना पक्ष भी रखते हैं। कभी इसे पॉजिटिव तरीके से देखा जाता है तो कभी निगेटिव।

‘वजीर’ के बारे में फरहान का कहना था कि ये फिल्म उनकी अब तक बतौर अभिनेता की गई दूसरी फिल्मों से बिल्कुल अलग है। इसमें वे एक एटीएस अफसर की भूमिका में है जिसके लिए एक अलग तरह की मनःस्थिति की जरूरत होती है। इसके लिए उन्होंने काफी मेहनत भी की है। पिछले काफी समय से फरहान बतौर अभिनेता (जिंदगी ना मिलेगी दोबारा, भाग मिल्खा भाग, दिल धड़कने दो) ही नजर आ रहे हैं। जबकि डायरेक्टर के रूप में उनकी अंतिम फिल्म ‘डॉन 2’ थी जिसे आए कई साल बीत चुके हैं। इस बारे में उनसे सवाल किया तो फरहान का कहना था कि अभी डायरेक्शन से उन्होंने ब्रेक लिया हुआ है। अभिनय व गायकी को वे काफी इंजॉय करते हैं और फिलहाल इसी पर फोकस कर रहे हैं। डायरेक्शन के बारे में उनका कहना था कि जब उन्हें लगेगा कि उनके पास कोई ऐसी कहानी आ गई है जिसे डायरेक्ट किया जाना चाहिए तो वे जरूर करेंगे। अपनी आने वाले फिल्म ‘रॉक आन2’ को लेकर भी फरहान काफी उत्साहित हैं और उन्हें उम्मीद है कि वे इस फिल्म से भी सबका दिल जीत सकेंगे जैसा कि उन्होंने ‘रॉक आन’ में किया था।
‘वजीर’ में मेगा स्टार अमिताभ बच्चन के साथ काम करने के अनुभव को भी उन्होंने अद्भुत बताया। फरहान का कहना है कि अमित जी बतौर साथी कलाकार व बतौर निर्देशक उन्हें अलग-अलग रूप में नजर आए। ‘वजीर’ में उनके साथ गीत भी गाने का मौका मिला और ये अनुभव भी लाइफ टाइम रहा।

- हर्ष कुमार

Tuesday, 29 December 2015

A day with Sanjay Leela Bhansali at his office

'बाजीराव मस्तानी' के महान फिल्मकार संजय लीला भंसाली के मुंबई आफिस में बिताया एक यादगार दिन 
मुंबई में 20 नवंबर को “बाजीराव मस्तानी” के ट्रेलर लांच इवेंट में भाग लिया तो रणवीर सिंह व दीपिका पादुकोण का इंटरव्यू फन सिनेमा में ही हो गया लेकिन जब मैं और बाहर से कवर करने के लिए आए कुछ और पत्रकारों ने संजय लीला भंसाली से इंटरव्यू के लिए आयोजकों से कहा तो हमें बताया गया कि संजय जी इस तरह से सार्वजनिक कार्यक्रमों में बात करना पसंद नहीं करते हैं। इसलिए हमें अगले दिन उनके आफिस जाना होगा। अगले दिन होटल सन एंड सैंड से लगभग डेढ़ घंटे की ड्राइव के बाद हम जूहू के जिस इलाके में भंसाली से मिलने पहुंचे वह काफी प्रसिद्ध जगह थी। रास्ते में ड्राइवर चंद्रमा ने बताया कि वहीं पास में एकता कपूर का घर भी है। रास्ते में जब चंद्रमा ने लोगों से भंसाली का आफिस पूछा तो बार-बार ये भी हिंट दिया कि एकता कपूर के घर के पास है। इस से ये भी लग रहा था कि संजय लीला भंसाली के आफिस के बारे में ज्यादा लोग नहीं जानते थे।
स्वाति मित्रा नाम की सात मंजिला बिल्डिंग के सामने हम पहुंचे तो वहां काफी शांति थी। कोई ट्रैफिक नहीं था। बस एक बड़ी सी मर्सिडीज गाड़ी बैक करके इमारत की छोटी सी पार्किंग में लगाई जा रही थी। हम अपनी गाड़ी से उतरकर लिफ्ट की ओर बढ़ने लगे तो देखा की सामने ही संजय लीला भंसाली कान पर मोबाइल लगाए वहीं टहल रहे हैं। गाड़ी उन्हीं की थी। तभी लिफ्ट ( जो पुराने चैनल सिस्टम की थी) नीचे आई और भंसाली उसमें सवार होकर ऊपर चले गए। मैं और मेरे एक साथी पत्रकार, जो हैदराबाद से आए थे, भंसाली के साथ ऊपर नहीं गए। हमने बाद में जाना ही उचित समझा। हमारे साथ लिफ्ट में थे संजय के ड्राइवर। उन्होंने ही बताया कि हमें छठी मंजिल पर जाना है।
इसी बिल्डिंग की 7वीं मंजिल पर भंसाली का आफिस है।
छठी मंजिल पर संजय लीला भंसाली का सामान्य आफिस था जबकि सातवें फ्लोर पर उनका निजी कार्यालय व अपार्टमेंट। इंटरव्यू सातवें फ्लोर पर ही होना था। हम से पहले भी कुछ पत्रकार ऊपर गए हुए थे इसलिए हमें नीचे ही रुकने के लिए कहा गया। हम वहीं सोफे पर बैठ गए। ये आफिस का मुख्य हिस्सा नहीं था। आफिस के बाहर बनी एक लॉबी थी जिसे दो हिस्सों में बांटा गया था। एक और भंसाली का कुत्ता बंधा हुआ था और दूसरी ओर के हिस्से में बैठने की व्यवस्था की गई थी।यहां लगभग डेढ़ घंटा इंतजार करना अच्छा ही रहा। इस दौरान काफी कुछ जानने का समय मिल गया। इस दौरान वहीं कुछ ऐसी चीजें भी देखने के लिए मिली जो आम आदमी के लिए कभी संभव नहीं हैं। मैंने उनके आफिस का आकलन किया और पाया कि वे सादगी पसंद हैं।

उनका ये कुत्ता खूब ड्रामा करता है। एसी में सोता है और तब
तक खाना नहीं खाता जब तक सब लोग उससे दूर न हट जाएं। 

रामलीला के कास्ट्यूम व अन्य जरूरी कागजातों से भरे बक्से। 

ये ढेर लगा है बाजीराव मस्तानी की कास्ट्यूम्स का। देख कर भी
आश्चर्य हो रहा था कि क्या इतने कपड़े इस्तेमाल हुए हैं? 

आफिस में बड़े-बडे लोहे के बक्से रखे हुए थे जिन पर लिखा था कि उनमें “रामलीला” व “बाजीराव मस्तानी” की कास्ट्यूम भरी हुई हैं। इसके अलावा दीवार में बने एक शो केस के ऊपर खुले में ही कुछ ट्राफियां रखी हुई थी जो धूल फांक रही थी। इनमें फिल्मफेयर पुरस्कार के अलावा बाकी सभी ट्राफियां थीं जो समय-समय पर भंसाली को मिली होंगी। इनमें स्क्रीन, जी व स्टारडस्ट जैसे तमाम अवार्ड थे जो साल भर होते रहते हैं। देखने से लग रहा था कि भंसाली के लिए पुरस्कार के लिए कितने मायने हैं।
बाहरी हिस्से में ही रखे गए ये सभी पुरस्कार धूल ही फांक रहे हैं। 
भंसाली के निजी कक्ष में रखा गुजारिश का फ्रेम किया हुआ पोस्टर। 

यहीं बैठकर भंसाली ने बाजीराव मस्तानी की कहानी व संगीत रचा। 

मैं उनके निजी कक्ष में हूं और बाहर भंसाली अपनी टीम से
मीटिंग करते हुए साफ नजर आ रहे हैं। इसी दरवाजे से हम
उनके कक्ष में आए थे। 

इसी काउच पर बैठकर भंसाली ने हमसे बात की। 

दीवार पर लगे भंसाली के कुछ पुराने फोटो। 

उनकी कुछ अन्य फिल्मों के पोस्टर इस तरह से उनके कमरे की शोभा बढ़ा रहे हैं। 

उनके कामकाज में प्रयोग आने वाली एक और टेबल। 


उनकी मुख्य टेबल, जिस के साथ एक शानदार म्यूजिक सिस्टम भी रखा है। भंसाली
संगीत के बहुत बडे़ शौकीन हैं। 

भंसाली के स्टाफ के लोगों के बीच केवल एक ही चर्चा थी। ट्रेलर की। सभी ट्रेलर की अपनी-अपनी ओर से समीक्षा कर रहे थे। सभी के मोबाइल में ट्रेलर ही चल रहा था। वहां रखे कंप्यूटर पर भी स्क्रीन सेवर “बाजीराव मस्तानी” का ही सेट था।  इंतजार के बाद हमें सातवीं मंजिल से बुलावा आया तो वहां पहले से ही भंसाली व उनके असिस्टेंट किसी मीटिंग में बिजी थे। एक खुली छत पर शीशे से कवर करके उनका आफिस बनाया गया था। रोशनी काफी थी। सब कुछ साफ दिख रहा था। हम घुसे तो एक और खतरनाक नस्ल के कुत्ते ने हमारा स्वागत किया। हमने भंसाली का अभिवादन किया और उन्होंने मुस्कुरा कर जवाब दिया। हमें जिस कमरे में बैठाया गया उसे देखकर लगता था कि वहीं बैठकर भंसाली अपनी फिल्मों पर काम करते हैं।
भंसाली के निजी कक्ष में ये यादगार सैल्फी। 
कमरे में उनकी फिल्मों के फ्रेम किए हुए फोटो लगे हुए थे। संजय बाहर बरामदेनुमा आफिस में मीटिंग कर रहे थे और मुझे मौका मिल गया उनके निजी रूम में कुछ फोटो क्लिक करने का। मन में बार-बार ख्याल आ रहा था कि एक-एक लम्हे को कैमरे में कैद कर लूं। हालांकि साथ आई पीआर कंपनी की स्टाफर ने फोटो न लेने का आग्रह किया लेकिन उसके टोकने से पहले ही मैं कई फोटो ले चुका था और डिलीट करने का कोई इरादा नहीं था। भंसाली मीटिंग करने के बाद कुछ समय फोन पर बात करते हुए बाहर ही टहलते रहे और फिर अंदर आकर हमारे सामने आ बैठे। उनके चेहरे पर मुस्कुराहट थी और बैठते ही बोले- जी जनाब फरमाइये। मेरे मुंह से अचानक ही निकल गया- सर किसी को फिल्मकार को कुर्ते-पायजामे में देखता हूं तो बहुत अच्छा लगता है। संजय मुस्कुरा दिए। इसके बाद इंटरव्यू हुआ (जो आप पहले ही मेरे ब्लाग में दो भागों में पढ़ चुके हैं। यू ट्यूब पर भी आप सर्च करेंगे तो ये मिल जाएगा)।
सैल्फी नंबर 1

इंटरव्यू के बाद सैल्फी क्लिक कराई तो भंसाली बहुत ही विनम्र पेश आए। बातों ही बातों में मैंने अपने मन की बात भी कह दी। मैंने कहा- सर मेरी भी तमन्ना डायरेक्टर बनने की थी लेकिन संभव नहीं हो पाया। इस पर भंसाली ने कहा- तो अब कौन सी देर हो गई है। आ जाओ मैदान में अगर जूझने की क्षमता है तो। मैंने कहा- देख लीजिए सर मैं आ भी जाऊंगा। भंसाली बोले- आ जाओ यार जब मर्जी।
इंटरव्यू के बाद भंसाली संग सैल्फी नंबर 2 

इंटरव्यू इतने शानदार माहौल में हुआ कि मन बाग-बाग हो गया। भंसाली का व्यवहार तो कमाल का है। वे बहुत ही मंझे हुए व्यक्ति हैं और कोई भी उनसे प्रभावित हुए बिना रह ही नहीं सकता।

ट्रेलर लांच के समय हमारे साथ बातचीत करते रणवीर-दीपिका। 
बाजीराव मस्तानीः इंटरव्यू में दीपिका ही बोले जा रही थी। एक बार तो रणवीर नाराज होकर चुप हो गए और
दीपिका से बोले- आप ही बोलो मेरा हो गया। बाद में वे नार्मल भी हो गए। आप मेरी पुरानी पोस्ट में
दोनों से बातचीत के अंश पढ़ सकते हैं।