Wednesday, 28 January 2026

 

भारत-यूरोपीय संघ मुक्त व्यापार समझौता (FTA):

रणनीतिक एकीकरण, प्रक्रियात्मक वास्तुकला और व्यापक आर्थिक प्रभाव

27 जनवरी 2026 को नई दिल्ली में आयोजित 16वें भारत-यूरोपीय संघ (EU) शिखर सम्मेलन में मुक्त व्यापार समझौते (FTA) की वार्ताओं के समापन की घोषणा वैश्विक भू-आर्थिक परिदृश्य में एक युगांतरकारी घटना है। इसे 'सभी सौदों की जननी' (Mother of all deals) के रूप में वर्णित किया गया है, क्योंकि यह समझौता लगभग दो दशकों (2007-2026) के लंबे और जटिल वार्ता चक्र का परिणाम है । यह समझौता न केवल दुनिया के दो सबसे बड़े लोकतांत्रिक आर्थिक क्षेत्रों को जोड़ता है, बल्कि लगभग 2 बिलियन लोगों के साझा बाजार का निर्माण करता है, जो वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद (GDP) का लगभग 25 प्रतिशत प्रतिनिधित्व करता है । हालांकि वार्ताओं का औपचारिक समापन हो चुका है, लेकिन हस्ताक्षर और अंतिम कार्यान्वयन के बीच की प्रक्रिया अत्यंत जटिल, बहु-स्तरीय और तकनीकी रूप से गहन है। यह रिपोर्ट विधिक प्रमार्जन (Legal Scrubbing) की बारीकियों, अनुसमर्थन (Ratification) की समय-सीमा, और इस ऐतिहासिक सौदे से भारत और यूरोप के विभिन्न व्यावसायिक क्षेत्रों पर पड़ने वाले दूरगामी प्रभावों का विस्तृत विश्लेषण प्रस्तुत करती है।


वार्ताओं के समापन से हस्ताक्षर तक की प्रक्रियात्मक यात्रा

भारत और यूरोपीय संघ के बीच FTA की घोषणा होने का अर्थ यह नहीं है कि यह तुरंत प्रभाव से लागू हो गया है। शिखर सम्मेलन में जो हस्ताक्षर किए गए, वे वार्ताओं के "सफल समापन" को प्रमाणित करने वाले एक प्रक्रियात्मक दस्तावेज पर थे, न कि अंतिम कानूनी संधि पर । एक हस्ताक्षरित राजनीतिक सहमति को कानूनी रूप से बाध्यकारी अंतरराष्ट्रीय संधि में बदलने के लिए निम्नलिखित चरणों से गुजरना अनिवार्य है।

विधिक प्रमार्जन (Legal Scrubbing)

अंतिम समझौते के लिए सबसे महत्वपूर्ण और समय लेने वाला चरण 'विधिक प्रमार्जन' है। यह एक उच्च-स्तरीय तकनीकी और कानूनी समीक्षा प्रक्रिया है। इसके तहत, दोनों पक्षों की कानूनी टीमें समझौते के सभी 21 अध्यायों (Chapters) की सूक्ष्मता से जांच करती हैं ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि पाठ में कोई आंतरिक विरोधाभास न हो और वह दोनों पक्षों के घरेलू कानूनों के अनुकूल हो

इस प्रक्रिया में निम्नलिखित कार्य शामिल होते हैं:

  1. निरंतरता सुनिश्चित करना: यह देखना कि सेवा क्षेत्र के अध्याय में किए गए वादे निवेश या स्थिरता (Sustainability) के अध्यायों के प्रावधानों से मेल खाते हैं या नहीं

  2. कानूनी शब्दावली का मानकीकरण: शब्दों के अर्थों को स्पष्ट करना ताकि भविष्य में किसी विवाद की स्थिति में व्याख्या में भिन्नता न आए

  3. विवाद निपटान तंत्र को सुदृढ़ करना: यह सुनिश्चित करना कि संधि का प्रत्येक शब्द अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता के मानकों पर खरा उतरे

अधिकारियों के अनुसार, इस प्रक्रिया में लगभग पांच से छह महीने का समय लगना अपेक्षित है

अनुवाद और भाषाई प्रमाणीकरण

यूरोपीय संघ की अपनी विशिष्ट प्रक्रियाएं हैं, जो किसी भी व्यापार समझौते को और अधिक लंबा बना देती हैं। यूरोपीय संघ की नीति के अनुसार, किसी भी अंतरराष्ट्रीय समझौते को संघ की सभी 24 आधिकारिक भाषाओं में अनुवादित और प्रमाणित किया जाना अनिवार्य है

प्रत्येक भाषाई संस्करण का कानूनी मूल्य समान होता है, इसलिए अनुवाद की सटीकता पर अत्यधिक ध्यान दिया जाता है। यह प्रक्रिया केवल भाषाई रूपांतरण नहीं है, बल्कि एक कानूनी प्रमाणीकरण भी है। जब तक सभी 24 भाषाओं में दस्तावेज तैयार नहीं हो जाते, तब तक यूरोपीय संघ परिषद (Council of the EU) इसे औपचारिक हस्ताक्षर के लिए अनुमोदित नहीं कर सकती

औपचारिक हस्ताक्षर की प्रक्रिया

विधिक प्रमार्जन और अनुवाद पूरा होने के बाद, यूरोपीय आयोग (European Commission) इस समझौते को यूरोपीय संघ की परिषद को प्रस्तावित करता है। परिषद द्वारा गोद लिए जाने (Adoption) के बाद ही भारत और यूरोपीय संघ के बीच औपचारिक हस्ताक्षर समारोह आयोजित किया जा सकता है । वाणिज्य सचिव राजेश अग्रवाल के अनुसार, यह हस्ताक्षर 2026 के उत्तरार्ध में होने की संभावना है

अनुसमर्थन और कार्यान्वयन की समय-सीमा

हस्ताक्षर के बाद भी, समझौते को 'प्रवर्तन' (Entry into Force) के लिए अनुसमर्थन की आवश्यकता होती है। यह प्रक्रिया दोनों क्षेत्रों के संवैधानिक ढांचे के आधार पर भिन्न है।

भारत में अनुसमर्थन प्रक्रिया

भारत में, किसी भी अंतरराष्ट्रीय व्यापार समझौते को लागू करने के लिए केंद्रीय मंत्रिमंडल (Union Cabinet) की स्वीकृति पर्याप्त होती है । चूंकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वयं इस समझौते को 'ऐतिहासिक' बताया है, इसलिए भारत की ओर से कैबिनेट की मंजूरी में कोई विलंभ होने की आशंका नहीं है

यूरोपीय संघ में अनुसमर्थन की जटिलता

यूरोपीय संघ की प्रक्रिया अधिक लोकतांत्रिक लेकिन समय लेने वाली है। हस्ताक्षर के बाद, इस समझौते को यूरोपीय संसद (European Parliament) द्वारा अनुमोदित किया जाना आवश्यक है

एक महत्वपूर्ण बिंदु यह है कि क्या यह एक "विशुद्ध-यूरोपीय संघ समझौता" (EU-only agreement) है या एक "मिश्रित समझौता" (Mixed agreement)।

  • EU-only: यदि समझौता केवल उन क्षेत्रों को कवर करता है जहां यूरोपीय संघ के पास विशेष अधिकार (Exclusive Competence) है, तो केवल यूरोपीय संसद की मंजूरी पर्याप्त होगी

  • Mixed Agreement: यदि इसमें निवेश संरक्षण (Investment Protection) या ऐसे प्रावधान शामिल हैं जो सदस्य देशों की राष्ट्रीय शक्तियों को प्रभावित करते हैं, तो इसे यूरोपीय संघ के सभी 27 सदस्य देशों की राष्ट्रीय संसदों (और कुछ मामलों में क्षेत्रीय संसदों) द्वारा भी अनुमोदित करना होगा

वर्तमान में, भारत और यूरोपीय संघ ने निवेश संरक्षण और भौगोलिक संकेत (GI) के लिए अलग-अलग वार्ताओं का मार्ग अपनाया है । इससे FTA के "EU-only" मार्ग से पारित होने की संभावना बढ़ गई है, जिससे कार्यान्वयन की गति तेज हो सकती है।

चरणअपेक्षित अवधि/तिथि
विधिक प्रमार्जन (Legal Scrubbing)जनवरी 2026 - जून 2026
अनुवाद और भाषाई प्रमाणीकरणजुलाई 2026 - सितंबर 2026
औपचारिक हस्ताक्षरअक्टूबर 2026 - दिसंबर 2026
अनुसमर्थन (Ratification)देर 2026 - प्रारंभिक 2027
लागू होना (Entry into Force)2027 की शुरुआत

वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने संकेत दिया है कि सरकार का प्रयास इसे कैलेंडर वर्ष 2026 के भीतर ही लागू करने का है, हालांकि 2027 की शुरुआत अधिक वास्तविक लक्ष्य प्रतीत होता है

द्विपक्षीय व्यापार पर प्रभाव: एक व्यापक विश्लेषण

भारत और यूरोपीय संघ के बीच वस्तु व्यापार 2024-25 में लगभग 136.5 बिलियन डॉलर रहा । FTA लागू होने के बाद, यह अनुमान है कि यूरोपीय संघ से भारत को होने वाला निर्यात 2032 तक दोगुना हो जाएगा । यह समझौता न केवल टैरिफ कटौती के बारे में है, बल्कि यह मूल्य श्रृंखलाओं (Value Chains) के एकीकरण और आपूर्ति श्रृंखला की लचीलापन (Supply Chain Resilience) के बारे में भी है

टैरिफ उदारीकरण की सीमाएं

इस समझौते के तहत, यूरोपीय संघ भारत से होने वाले 99.3% आयात (व्यापार मूल्य के आधार पर) के लिए अपने बाजार खोलेगा । इसके जवाब में, भारत यूरोपीय संघ से होने वाले 96.6% निर्यात के लिए टैरिफ को समाप्त या कम करेगा

मानकयूरोपीय संघ की प्रतिबद्धताभारत की प्रतिबद्धता
कुल टैरिफ लाइनों का कवरेज>90% (तात्कालिक)~70.4% (तात्कालिक)
कुल व्यापार मूल्य का उदारीकरण99.3% (7 वर्षों में)96.6% (10 वर्षों में)
औसत टैरिफ में गिरावट3.8% से 0.1%15.9% से महत्वपूर्ण कमी

यह उदारीकरण भारतीय निर्यातकों को उन प्रतिस्पर्धी देशों (जैसे बांग्लादेश और वियतनाम) के समकक्ष ला खड़ा करेगा, जो पहले से ही अधिमान्य व्यापार समझौतों का लाभ उठा रहे हैं

भारतीय उद्योगों पर प्रभाव: अवसर और चुनौतियां

भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए यह समझौता निर्यात में विविधता लाने और 'मेक इन इंडिया' पहल को वैश्विक स्तर पर ले जाने का एक सुनहरा अवसर है

कपड़ा और परिधान (Textiles and Apparel)

कपड़ा क्षेत्र इस सौदे का सबसे बड़ा लाभार्थी माना जा रहा है। वर्तमान में, भारतीय परिधानों पर यूरोपीय संघ में 10-12% का आयात शुल्क लगता है । FTA के लागू होते ही यह शुल्क शून्य हो जाएगा।

  • प्रतिस्पर्धात्मक लाभ: भारत अब वियतनाम और बांग्लादेश के साथ समान धरातल पर प्रतिस्पर्धा कर सकेगा

  • रोजगार सृजन: कपड़ा क्षेत्र भारत में कृषि के बाद दूसरा सबसे बड़ा रोजगार प्रदाता है। अनुमान है कि इस समझौते से 6-7 मिलियन नए रोजगार पैदा हो सकते हैं

  • ब्रांड्स की रुचि: ज़ारा (Zara), एच एंड एम (H&M), और आइकिया (IKEA) जैसे बड़े ब्रांडों ने भारत से अपनी सोर्सिंग बढ़ाने के संकेत दिए हैं

फार्मास्यूटिकल्स और विनियामक सहयोग

भारत 'दुनिया की फार्मेसी' है, लेकिन यूरोपीय बाजार में इसकी हिस्सेदारी केवल 2.2% है

  • पंजीकरण की आसानी: FTA केवल टैरिफ कम नहीं करेगा, बल्कि विनियामक प्रक्रियाओं (Regulatory Approvals) को सुव्यवस्थित करेगा। वर्तमान में, यूरोपीय संघ में दवा की मंजूरी में 2-3 साल लग सकते हैं

  • लागत में कमी: विपणन अनुमोदन लागतों में कमी और तकनीकी बाधाओं (TBT) के निराकरण से भारतीय जेनेरिक दवाओं की यूरोप में पहुंच सुगम होगी

कृषि और समुद्री उत्पाद

भारत ने चाय, कॉफी, मसाले, ताजे फल और समुद्री उत्पादों (Marine Products) के लिए अधिमान्य पहुंच प्राप्त की है

  • समुद्री भोजन: झींगा (Shrimp) और फ्रोजन मछली पर लगने वाले 0-26% के शुल्क में भारी कटौती होगी, जिससे आंध्र प्रदेश, केरल और गुजरात के तटीय समुदायों को लाभ होगा

  • जीआई-टैग्ड उत्पाद: मुजफ्फरनगर और शामली का 'जीआई-टैग्ड गुड़' (Jaggery) एक विशिष्ट उदाहरण है। FTA और भौगोलिक संकेत (GI) समझौते के माध्यम से, इस गुड़ को यूरोपीय सुपरमार्केट में एक प्रीमियम उत्पाद के रूप में स्थान मिल सकता है । हालांकि, इसके लिए यूरोपीय संघ के सख्त कीटनाशक अवशेष मानकों (MRLs) को पूरा करना अनिवार्य होगा

यूरोपीय उद्योगों पर प्रभाव: भारत के विशाल बाजार तक पहुंच

यूरोपीय कंपनियों के लिए, यह समझौता दुनिया के सबसे तेजी से बढ़ते मध्यम वर्ग तक निर्बाध पहुंच प्रदान करता है

ऑटोमोबाइल: एक रणनीतिक उद्घाटन

यूरोपीय कार निर्माताओं (जैसे Volkswagen, BMW, Mercedes-Benz) के लिए भारत का उच्च टैरिफ (110%) एक बड़ी बाधा रहा है

  • टैरिफ कोटा: भारत ने 2,50,000 कारों के वार्षिक कोटे के तहत शुल्क को 110% से घटाकर 10% करने पर सहमति दी है

  • कैलिब्रेटेड सुरक्षा: घरेलू निर्माताओं को बचाने के लिए 15,000 यूरो से कम कीमत वाली सस्ती कारों को इस रियायत से बाहर रखा गया है

वाइन और स्पिरिट्स

भारत यूरोपीय वाइन और व्हिस्की पर 150% शुल्क लगाता रहा है

  • मूल्य में गिरावट: समझौते के लागू होने पर प्रीमियम वाइन पर शुल्क तुरंत 75% और अंततः 20% तक गिर जाएगा

  • बाजार विस्तार: इससे शहरी भारतीय उपभोक्ताओं के बीच यूरोपीय वाइन और बियर की खपत बढ़ने की संभावना है

मशीनरी और रसायनों का निर्यात

यूरोपीय मशीनरी और औद्योगिक रसायनों पर वर्तमान में 44% और 22% तक का शुल्क लगता है 。 FTA के तहत इन्हें अधिकांशतः समाप्त कर दिया जाएगा, जिससे भारत में औद्योगिक बुनियादी ढांचे के निर्माण की लागत कम होगी और यूरोपीय निर्यात को बढ़ावा मिलेगा

संवेदनशील क्षेत्र और सुरक्षा उपाय (Exclusions and Safeguards)

दोनों पक्षों ने अपनी अर्थव्यवस्था के अत्यंत संवेदनशील क्षेत्रों को उदारवाद से सुरक्षित रखा है

भारत द्वारा संरक्षित (Exclusion List)यूरोपीय संघ द्वारा संरक्षित (Exclusion List)
डेयरी उत्पाद (दूध, पनीर, घी)चीनी और इथेनॉल
अनाज (गेहूं, चावल)गोमांस (Beef) और मुर्गे का मांस
पोल्ट्री और सोयाबीन मीलचावल
संवेदनशील फल और सब्जियांशहद और पाउडर दूध

भारत के लिए डेयरी क्षेत्र का संरक्षण अनिवार्य था क्योंकि यह करोड़ों छोटे और सीमांत किसानों की आजीविका से जुड़ा है । इसी तरह, यूरोपीय संघ ने अपने चीनी और मांस उद्योग को विदेशी प्रतिस्पर्धा से बचाया है । इसके अतिरिक्त, एक 'द्विपक्षीय सुरक्षा तंत्र' (Bilateral Safeguard Mechanism) स्थापित किया गया है, जिसके तहत यदि आयात में अचानक वृद्धि से घरेलू उद्योग को गंभीर क्षति पहुंचती है, तो अधिमान्य शुल्क को अस्थायी रूप से निलंबित किया जा सकता है

सेवा क्षेत्र और डिजिटल व्यापार: नया मोर्चा

भारत और यूरोपीय संघ दोनों ही सेवा-आधारित अर्थव्यवस्थाएं हैं। भारत ने 144 सेवा उप-क्षेत्रों में पहुंच प्राप्त की है, जबकि भारत ने यूरोपीय संघ के लिए 102 उप-क्षेत्र खोले हैं

पेशेवरों की गतिशीलता (Mobility)

भारत के लिए 'मोड 4' (पेशेवरों की आवाजाही) हमेशा से एक प्राथमिकता रही है। समझौते के तहत, भारतीय आईटी पेशेवरों, इंजीनियरों और चिकित्सकों को यूरोपीय संघ में अल्पावधि कार्य के लिए सुगम वीजा प्रक्रिया और "अस्थाई प्रवेश और प्रवास" (Temporary Entry and Stay) की सुविधा मिलेगी । विशेष रूप से, आयुष (AYUSH) चिकित्सकों को चुनिंदा यूरोपीय देशों में अपनी सेवाएं देने की मान्यता दी जाएगी

वित्तीय सेवाएँ और समुद्री परिवहन

यूरोपीय संघ की कंपनियों को भारतीय वित्तीय सेवा बाजार और समुद्री परिवहन क्षेत्र में विशेष पहुंच मिलेगी 。 भारत ने अन्य किसी भी व्यापारिक साझेदार की तुलना में इस क्षेत्र में सबसे अधिक महत्वाकांक्षी प्रतिबद्धताएं व्यक्त की हैं

कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म (CBAM) और जलवायु चुनौतियां

यूरोपीय संघ का 'कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म' (CBAM) भारतीय निर्यातकों के लिए एक गंभीर गैर-टैरिफ बाधा के रूप में उभर रहा है । जनवरी 2026 से, यूरोपीय संघ स्टील, एल्यूमीनियम और रसायनों जैसे उच्च-कार्बन उत्सर्जन वाले उत्पादों पर कार्बन कर लगाना शुरू कर रहा है

भारतीय इस्पात उद्योग पर प्रभाव

भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा इस्पात उत्पादक है, लेकिन इसका उत्पादन कोयले पर आधारित होने के कारण उच्च कार्बन-गहन (Carbon Intensive) है

  • लागत में वृद्धि: CBAM के कारण भारतीय इस्पात की लागत में 20-35% तक की वृद्धि हो सकती है, जिससे यूरोपीय बाजार में इसकी प्रतिस्पर्धात्मकता कम हो जाएगी

  • SME समूहों की चिंता: मुजफ्फरनगर जैसे क्षेत्रों में स्थित सेकेंडरी स्टील रोलिंग मिलों के लिए यह एक 'दोहरी मार' है—एक तरफ GSP लाभों का अंत और दूसरी तरफ कार्बन टैक्स का बोझ

समाधान और हरित सहयोग

FTA के हिस्से के रूप में, भारत और यूरोपीय संघ ने एक 'क्लाइमेट प्लेटफॉर्म' लॉन्च करने का निर्णय लिया है । यूरोपीय संघ भारतीय कंपनियों को अपने उत्सर्जन को कम करने के लिए तकनीकी सहायता और हरित हाइड्रोजन (Green Hydrogen) जैसी तकनीकों के हस्तांतरण में सहयोग करेगा 。 यह सहयोग भारतीय उद्योगों को भविष्य की "ग्रीन स्टील" मांग के लिए तैयार करने में मदद करेगा

भू-राजनीतिक महत्व: 'चाइना प्लस वन' रणनीति

यह समझौता केवल आर्थिक लाभों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके गहरे भू-राजनीतिक निहितार्थ हैं

  1. चीन पर निर्भरता कम करना: यूरोपीय संघ सक्रिय रूप से अपनी आपूर्ति श्रृंखलाओं को चीन से दूर विविधतापूर्ण बनाने (De-risking) की कोशिश कर रहा है। भारत, अपनी विशाल विनिर्माण क्षमता और लोकतांत्रिक मूल्यों के साथ, एक विश्वसनीय विकल्प के रूप में उभरा है

  2. वैश्विक व्यापार अनिश्चितता से सुरक्षा: अमेरिका की बदलती व्यापार नीतियों और टैरिफ युद्धों के बीच, भारत-यूरोपीय संघ FTA दोनों पक्षों को एक स्थिर और नियम-आधारित व्यापार ढांचा प्रदान करता है

  3. सुरक्षा और रक्षा साझेदारी: व्यापार के साथ-साथ, दोनों पक्षों ने एक व्यापक रक्षा और सुरक्षा रणनीतिक साझेदारी पर भी हस्ताक्षर किए हैं, जिसमें समुद्री सुरक्षा, साइबर खतरों और अंतरिक्ष सहयोग पर ध्यान केंद्रित किया जाएगा

निष्कर्ष और भविष्य की राह

भारत-यूरोपीय संघ मुक्त व्यापार समझौता एक ऐतिहासिक उपलब्धि है जो 21वीं सदी की आर्थिक साझेदारी का खाका तैयार करती है। वार्ताओं का समापन होने के बावजूद, विधिक प्रमार्जन, अनुवाद और संसदीय अनुसमर्थन की लंबी प्रक्रिया यह सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक है कि यह समझौता कानूनी रूप से अटूट और भविष्य के लिए सुरक्षित हो।

व्यवसायों के लिए मुख्य निष्कर्ष:

  • 2027 का प्रारंभ: अधिकांश व्यावसायिक लाभ और टैरिफ कटौती 2027 की शुरुआत से लागू होने की उम्मीद है

  • क्षेत्रीय विनिर्माण को बढ़ावा: कपड़ा, फार्मा और समुद्री उत्पादों में लगे भारतीय एमएसएमई (MSMEs) के लिए यह वैश्विक स्तर पर विस्तार करने का समय है

  • अनुपालन की तैयारी: भारतीय कंपनियों को केवल टैरिफ कटौती पर निर्भर रहने के बजाय यूरोपीय संघ के कड़े ESG मानकों और CBAM नियमों के अनुरूप खुद को ढालने के लिए निवेश करना होगा

संक्षेप में, यह FTA केवल दो बाजारों का मिलन नहीं है, बल्कि यह दो महान लोकतंत्रों के बीच साझा समृद्धि और रणनीतिक विश्वास की एक नई गाथा है। प्रक्रिया की जटिलता ही इसकी मजबूती की गारंटी है, जो अंततः 2 बिलियन लोगों के जीवन स्तर को ऊंचा उठाने में सहायक सिद्ध होगी।