Saturday, 23 September 2017

DEEP REVIEW: Newton

सफल होने के तमाम गुणों से भरपूर है ‘न्यूटन’

Rating- 5*

‘न्यूटन’ को आस्कर के लिए चुने जाने का फिल्म को जबर्दस्त लाभ होने जा रहा है। इसे व्यवसायिक सफलता मिलने जा रही है। मैंने यह फिल्म रिलीज के एक दिन बाद नई दिल्ली के मिराज सिनेमा (पूर्व नाम अजंता), सुभाष नगर में मौजूद, में देखी जो अब डबल स्क्रीन बन चुका है। 90 के दशक में इस सिनेमा को दिल्ली के सबसे बड़े (सीटों के हिसाब से) सिनेमाघरों में गिना जाता था। इसमें ‘अग्निपथ’ व ‘लव लव लव’ जैसी फिल्में कालेज के समय में हमने देखी थी। इसमें लगभग एक हजार लोग एक साथ बैठ जाया करते थे। अभी भी इसकी दोनों स्क्रीन काफी विशाल हैं। ‘न्यूटन’ जैसी फिल्म को दिल्ली में मुश्किल से 20-25 स्क्रीन मिल पाई हैं। ऐसे में मजबूरी में यह फिल्म मिराज में देखनी पड़ी। फिल्म शुरू होने के दस मिनट बाद अंदर घुसा और देखकर दंग रह गया कि ऑडी में सारी सीटें फुल थी। यानी हाउसफुल। ये आज के दौर में दुर्लभ नजारा है। इतनी बड़ी-ब़ड़ी फिल्में हाल फिलहाल देखी हैं लेकिन ‘बाहुबली’ व इससे पहले ‘बाजीराव मस्तानी’ के अलावा किसी में भी सीटें फुल नहीं नजर आई। ‘न्यूटन’ जैसी फिल्म में हाउसफुल मिलना सुखद आश्चर्य से कम नहीं था। दरअसल फिल्म रिलीज होने के दिन ही फिल्म को आस्कर के लिए भारत की एंट्री घोषित कर दिया गया और फिल्म को वो प्रचार मिल गया जो करोड़ों खर्च के भी नहीं मिल पाता।
बहरहाल फिल्म में भीड़ की वजह केवल आस्कर ही नहीं है बल्कि फिल्म को बनाया भी गया है बहुत ही गंभीरता से। बस आस्कर के लिए नामांकित हो जाने से इसके बारे में लोग जान गए और इसे अब ज्यादा दर्शक मिल जाएंगे जो सही बात है। ऐसी फिल्में ज्यादा से ज्यादा बड़े वर्ग तक पहुंचनी चाहिए। फिल्म में किसी भी मुद्दे पर भाषणबाजी नहीं की गई है। सकारात्मक व निष्पक्ष तरीके से निर्देशक अमित मसुरकर ने लोकतंत्र में मतदान की अहमियत को दिखाने का प्रयास किया है और वे अपना संदेश देने में सफल रहे हैं। कहानी इस तरह से है- नूतन उर्फ न्यूटन कुमार (राजकुमार राव) एक सरकारी मुलाजिम है और पूरी तरह से अपने काम के प्रति सजग व ईमानदार है। नक्सली इलाके (सुकमा, छत्तीसगढ़) में एक 76 मतदाताओं के बूथ पर निष्पक्ष मतदान कराने का जिम्मा उन्हें सौपा जाता है। वे अर्धसैनिक बलों की टुकड़ी के साथ पोलिंग बूथ पर जाते हैं और तमाम मुश्किलों के बीच वोट डलवाने में सफल रहते हैं। हालांकि जिस तरीके से मतदान सैनिक कराते हैं उससे वे सहमत नहीं थे लेकिन फिर भी आधे लोग मतदान कर देते हैं। बस इसके बाद सब लोग वापस लौट जाते हैं और अपने-अपने काम में लग जाते हैं।

 फिल्म की खासियत यह है कि इसमें किसी भी प्रकार का उपदेश नहीं दिया गया है। नक्सल प्रभावित व दूर दराज के इलाकों में चुनावी प्रक्रिया कैसे होती है और चुनाव प्रणाली के बारे में वहां के आदिवासी लोगों को कितनी जानकारी है इसकी तस्वीर फिल्म में बहुत ही ईमानदारी से खींची गई है। शानदार स्क्रीनप्ले व डायलाग हैं जो व्यवस्था पर व्यंग्य करने के साथ-साथ दर्शकों को गुदगुदाते भी रहते हैं। उदाहरण के तौर पर वह सीन जिसमें सैन्य अफसर यह कहता है- मैं लिखकर देता हूं कि कोई वोट डालने नहीं आएगा। इस पर पीठासीन अधिकारी का दायित्व निभा रहे राजकुमार राव उसके सामने कागज-पेन रखते हैं और कहते हैं लिखो। इस सीन पर दर्शक तालियां बजाने को मजबूर हो जाते हैं। फिल्म में एकमात्र महिला किरदार के रूप में एक आदिवासी टीचर को भी पोलिंग टीम में दिखाया गया है जो अपने क्षेत्र की समस्याओं से भी अवगत कराती रहती है। मतदानकर्मियों में से एक रघुबीर यादव हैं जो अच्छी कॉमेडी करते हैं। उनकी कॉमेडी भी व्यंग्य से भरी हुई है और कई मौकों पर चोट करने में सफल रहती है। फिल्म में नक्सली इलाकों में तैनात सैनिकों की समस्या भी उठाई गई है जो सुविधाओं के अभाव में वहां रहते हैं। जिनकी तनख्वाह बहुत कम होती है, आधुनिक हथियारों की कमी है।


कुल मिलाकर फिल्म एक संदेश देती है। संदेश यह है कि देश में आज भी ऐसे इलाके भी हैं जहां लोगों को अपने मताधिकार के बारे में नहीं पता है। उनका प्रत्याशी कौन है लोग यह भी नहीं जानते। इसलिए जब न्यूटन उनसे कहता है कि उनका चुना हुआ प्रतिनिधि दिल्ली में जाकर उनकी बात कहेगा तो वे अपने सरपंच को ही भेजने की बात करने लगते हैं। यह अच्छी बात है कि ऐसी फिल्म को लोग देख रहे हैं। इसी हफ्ते रिलीज हुई ‘भूमि’ जैसी बड़ी फिल्म से यह कई गुना बेहतर है। इसमें ‘टायलेट-एक प्रेम कथा’ की तरह से व्यवसायिक लटके झटके तो नहीं हैं लेकिन संदेश देने के मामले में यह उससे कहीं कम नहीं है। इसे देखें और पूरे परिवार के साथ देखें, यकीन मानिए पैसे व्यर्थ नहीं जाएंगे।

- हर्ष कुमार सिंह

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