Friday, 1 September 2017

DEEP REVIEW : Baadshaho

इलियाना डी क्रूज के कैरियर की सबसे अहम फिल्म  
Rating - 1*

इस फिल्म को देखने के बाद अगर आप यह बता दें कि इसका नाम 'बादशाहो' क्यों है तो समझिए आप कौन बनेगा करोड़पति में 7 करोड़ का इनाम जीतने के हकदार हैं। इस फिल्म को इलियाना डी क्रूज के अलावा किसी भी अन्य कलाकार ने क्या सोचकर साइन किया होगा इसका जवाब वे ही दे सकते हैं। वैसे मिलन लुथारिया व अजय देवगन की जोड़ी ने इससे पहले 'कच्चे धागे' व 'वंस अपॉन ए टाइम इन मुंबई' जैसी बेहतरीन फिल्में दी हैं लेकिन यहां यह जोड़ी बुरी तरह मात खा गई।

एक छोटी सी कहानी को इतनी खींच दिया गया कि दर्शक इंटरवल तक आते-आते ही यह पूछने लगते हैं कि यार बहुत बड़ी फिल्म है। अभी तो इंटरवल ही नहीं हुआ खत्म कब होगी? समझ में नहीं आता कि 'द डर्टी पिक्चर' जैसी बेहतरीन आल टाइम क्लासिक बनाने वाला मिलन लुथारिया जैसा निर्देशक कैसे इतनी घटिया फिल्म बना सकता है। वैसे राजस्थान से मिलन को हमेशा प्यार रहा है और उन्होंने इसका ताना बाना भी वहीं बुना लेकिन कहानी इतनी कमजोर चुनी कि बात नहीं बन सकी। इस फिल्म से अगर किसी को फायदा हो सकता है तो वो है इलियाना। उनके कैरियर की यह सबसे बड़ी फिल्म है। मेरा मानना है कि इतना लंबा व सेंटर कैरेक्टर वाला किरदार आज की तारीख में किसी अभिनेत्री को निभाने के लिए नहीं मिलता है। इलियाना को इसका आभास हो गया था और उन्होंने इसका पूरा फायदा उठाया। न्यूड सीन से लेकर लंबे-लंबे किस तक उन्होंने किसी भी चीज में कोई कसर नहीं छोड़ी। फिल्म चले या न चले लेकिन इलियाना को इससे फायदा होना तय है।

कहानी गीतांजलि (इलियाना) के ईर्द गिर्द घूमती है। गीतांजलि राजस्थान की एक रियासत की रानी है। 1975 में देश में इमरजैंसी लगती है तो सरकार मनमानी करने लगती है। इंदिरा गांधी के पुत्र संजय गांधी की तरह दिखने वाला संजीव (एक नेता) गीतांजलि पर गंदी नीयत रखता है और उसके इनकार करने पर उसके पीछे पड़ जाता है। उसे जेल में डालकर उसका सारा खजाना हड़प कर लेने की साजिश करता है। गीतांजलि का बॉडीगार्ड भवानी (अजय देवगन) अपने दोस्त दलिया (इमरान हाशमी) व गुरुजी (संजय मिश्रा) के साथ मिलकर खजाने को बचाने की कोशिश करता है। इसमें गीतांजलि की दोस्त संजना (एशा गुप्ता) भी उनकी मदद करती है। लंबी खिचड़ी पकती है। बिना किसी गीत संगीत के फिल्म यूं ही राजस्थान की लोकेशंस व राजस्थान जैसे दिखने वाले स्टूडियो सेट्स पर धक्के खाते रहती है और अंत में बिना किसी तार्किक नतीजे पर पहुंचे खत्म हो जाती है। खजाना जनता के बीच पहुंच जाता है और बाकी किसी को कुछ हाथ नहीं लगता। कुछ ऐसा ही हाल दर्शकों का हो चुका होता है। वे भी खुद को ठगा हुआ सा महसूस करते हैं। अरे ये क्या हुआ? इलियाना कहां गई? उसका प्रेमी कहां गया? कुछ पता नहीं चलता।
पहली बात तो यह समझ में नहीं आई कि इस फिल्म को इमरजैंसी की बैकग्राउंड पर क्यों बनाया गया? हाल ही में 'इंदु सरकार' भी उसी टाइम पीरियड पर बनी थी और उसका बाक्स आफिस पर क्या हाल हुआ था सब जानते हैं। यहां तो हालत और भी बुरी है। इतनी बड़ी स्टार कास्ट के बाद भी फिल्म में रत्तीभर रोमांच नहीं है। कहानी को 1975 का दिखाने के लिए बस इतना किया गया है कि इमरान हाशमी, इलियाना व एशा को बैलबाटम पहना दी गई हैं। मोबाइल के बजाए लैंडलाइन फोन का इस्तेमाल होता है। बाकी कुछ भी 1975 का नहीं लगता। सनी लियोनी आइटम सांग के लिए आती है तो ऐसा लगता है जैसे आजकल का ही कोई अन्य चालू आइटम सांग देख रहे हैं। गोलियां चलती हैं तो धड़ाधड़ चलती ही रहती हैं। सारी गन्स व पिस्टल ऑटोमैटिक हैं जिनकी गोलियां खत्म होने का नाम नहीं लेती।
एक्टिंग की बात करें तो अजय देवगन, इमरान हाशमी, विद्युत जामवाल, एशा गुप्ता व संजय मिश्रा सभी साधारण हैं। अजय देवगन को कहानी अच्छी मिलती है तो वे जोरदार काम करते हैं लेकिन पिछले कुछ समय से उनका कहानी का चुनाव बहुत खराब रहा है। 'एक्शन जैक्शन' व 'शिवाय' जैसी बेसिर पैर की फिल्में वे कर रहे हैं। इमरान हाशमी तो कभी अच्छे अभिनेता थे ही नहीं। संजय मिश्रा फिर भी दिल लगा देते हैं थोड़ा बहुत।
कुल मिलाकर यह फिल्म एक बार देखने लायक भी नहीं है। यदि आप कोई फिल्म देखना ही चाहते हैं तो 'बादशाहो' के बजाय 'टायलेट एक प्रेम कथा' या फिर 'बाबूमोशाए बंदूकबाज' ही देख लें तो बेहतर होगा। कम से कम पैसा खराब होने का पछतावा तो नहीं होगा।
- हर्ष कुमार 

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