Rating- 2*
कुछ महीने पहले रवीना टंडन की 'मातृ' व श्रीदेवी की 'मॉम' में जो दिखाया गया था उससे इसमें कुछ भी अलग नहीं दिखाया गया है। बल्कि अगर इन्हें रैंक किया जाए तो 'भूमि' का नंबर तीसरा ही होगा। श्रीदेवी की फिल्म इन सबसे ज्यादा संवेदनशील थी। 'भूमि' की बस एक ही खासियत है कि इसमें संजय दत्त वापसी कर रहे हैं। उनके फैंस इसे देख सकते हैं। जेल से बाहर आने के बाद यह उनकी पहली फिल्म है और लगता है कि निर्देशक ओमंग कुमार इसे कैश कराना चाहते थे। उन्होंने फटाफट कहानी गढ़ी और संजय दत्त को सुना दी। फिल्म भी जल्दबाजी में शूट की गई है। ओमंग कुमार फिल्म जल्दी बनाने में एक्सपर्ट हैं। तीन साल में उनकी तीसरी फिल्म है। पहले 'मैरीकॉम', फिर 'सरबजीत' और अब 'भूमि'। और यकीन मानिए जो मौलिकता उनकी 'मैरीकॉम' में थी वह बाकी किसी में नहीं नजर आई। 'भूमि' तो उनकी सबसे कमजोर फिल्म है।
कहानी आगरा की दिखाई गई है। बार-बार ताजमहल दिखाया जाता है लेकिन इसका फिल्म से कोई ताल्लुक नहीं है। अरुण (संजय दत्त) जूते का काम करता है लेकिन यह नहीं साफ किया गया है कि क्या वह मोची (या दलित बिरादरी का) है? उनके रहन सहन को देखकर तो यह नहीं लगता। वैसे आगरा में बहुत से दूसरा जातियों के जूता व्यवसायी भी हैं। भूमि (अदिति राव हैदरी) संजय की बेटी है जिसे वह बहुत प्यार करते हैं। शुरू की आधा घंटे की फिल्म में तो यही दिखाने की कोशिश की गई है कि वे अपनी बेटी से कितना प्यार करते हैं। यह हिस्सा बहुत ही बोर करता है। अदिति के अपने प्रेमी (कोई नया हीरो) के साथ दो गाने भी इसी हिस्से में दिखा दिए गए हैं लेकिन कोई भी गीत ऐसा नहीं है जो आप याद रख सकें। इसके बाद वही कहानी शुरू हो जाती है जो रेप के मामलों में दिखाई जाती रही है। चार लोग भूमि से रेप करते हैं। उसकी शादी भी टूट जाती है। पुलिस व कानून कुछ नहीं कर पाते और अंत में संजय दत्त व अदिति खुद ही बदला लेने की ठान लेते हैं। बदला लेने का कहानी भी बेहद घिसी पिटी हुई है। या यूं कहें कि बहुत ही कमजोर है। संजय इतनी आसानी से सब को मार डालते हैं कि बस पूछिए मत। पुलिस भी उनकी मदद करने लगती है। इससे पहले 'मातृ' व 'मॉम' में भी पुलिस को मददगार दिखाया गया था।
संजय दत्त इस फिल्म में बुजुर्ग नजर आते हैं जो उनकी उम्र के हिसाब से सही है। एक जवान बेटी के पिता वे असली जीवन में भी हैं और यहां भी उसके लिए उपयुक्त नजर आते हैं। वैसे जेल से आने के बाद संजय दत्त ने अपने शरीर पर मेहनत नहीं की और उनका पेट बाहर निकला नजर आता है। वे उतने फिट भी नहीं दिखे। एक्शन सींस में वे उतने प्रभावशाली नहीं नजर आए। कुछ सींस में उन्होंने अभिनय अच्छा किया है। अदालत में अपनी बेटी के समर्थन में आवाज उठाना और शराब पीकर मोहल्ले के लोगों को धिक्कारने वाले सीन में उन्होंने प्रभावित किया है। अदिति राव हैदरी अच्छी कलाकार हैं। आंसू बहाने का काम उन्हें मिला था जिसे वे अच्छी तरह से निभा गई हैं। कोई और अभिनेत्री होती तो वह भी यही करती। उन्हें केवल आंसू बहाने थे और 'बेचारी बेटी' की भूमिका निभानी थी और इसमें वे सफल रही हैं। हां लंबे समय बाद शेखर सुमन को बड़े पर्दे पर देखकर अच्छा लगा। संजय के दोस्त ताज की भूमिका उन्होंने बढिय़ा निभाई है। बाकी कलाकार औसत हैं।
ऐसे गंभीर विषयों पर फिल्म बनाने के लिए अच्छे डायलाग व संगीत की जरूरत होती है और इसमें ये दोनों ही गायब हैं। ओमंग कुमार ने 'सरबजीत' की तरह इसमें भी इन पर ध्यान नहीं दिया। सबसे गलत बात तो यह लगी जब इंटरवल के एकदम बाद सन्नी लियोनी का वाहियात आयटम सांग ठूंस दिया। इसकी कतई जरूरत नहीं थी। न गीत समझ में आया कि क्या है और न ही सनी लियोनी का डांस? इससे फिल्म केवल कमजोर व लंबी ही हुई। फोटोग्राफी कुछ हिस्सों में अच्छी है। खासतौर से क्लाइमेक्स में राजस्थान की बावड़ी का सीन बहुत ही बढिय़ा पिक्चराइज किया गया है। लगता है ओमंग कुमार ने फिल्म के निर्माण के दौरान इसमें चेंज भी किए तभी तो श्राद्ध व नवरात्र की टाइमिंग सही बैठी है। अभी एक ही दिन पहले नवरात्र शुरू हुए हैं और फिल्म के क्लाइमेक्स में जय माता दी की गूंज सुनाई गई है।
कुल मिलाकर फिल्म प्रभावित नहीं करती। परिवार के साथ आप इसे देखेंगे तो समय खराब होगा और न आप अपने परिवार को मनोरंजन कर पाएंगे और ना ही कोई सीख हासिल करा पाएंगे।
- हर्ष कुमार सिंह
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