Sunday, 9 July 2017

एक कंगना ही काफी नहीं है, बालीवुड को और चाहिए

साल भर में न जाने कितने फिल्म पुरस्कार समारोह होते हैं। उनमें तमाम हिंदी फिल्मी गीतों पर कलाकार परफोर्म करते हैं। हिंदी फिल्मों के लिए पुरस्कार भी जीतते हैं लेकिन जैसे ही थैंकिंग स्पीच देने की बात आती है तो सब अंग्रेजी में शुरू हो जाते हैं। सब हिंदी फिल्मों में काम करते हैं लेकिन जब भी मौका आता है तो हिंदी बोलने में शर्म महसूस करते हैं।
 
 हम लोग भी उन्हीं सितारों को अच्छा व पढ़ा लिखा समझते हैं जो ताबड़तोड़ अंग्रेजी बोलते हैं। गोविंदा या नवाजुद्दीन सिद्दीकी जैसा कोई कलाकार हिंदी में धन्यवाद देता है तो हम कहते हैं- लगता है इसे अंग्रेजी नहीं आती। फिल्में ही क्यों क्रिकेट की दुनिया में भी तो कुछ ऐसा ही है। जो खिलाड़ी अंग्रेजी नहीं बोल पाते उन्हें हम हेय दृष्टि से देखते हैं। शुक्र है वीरेंद्र सहवाग जैसे बल्लेबाजों का जिन्होंने अपनी सारी जिंदगी आक्रामक बल्लेबाजी करते हुए दुनियाभर के गेंदबाजों की पिटाई की और हिंदी का झंडा भी बुलंद रखा। अब हिंदी की कमेंट्री में भी उन्होंने नए आयाम स्थापित किए। बात खेलों की करूं तो अक्सर देखता हूं कि क्रोएशिया, रूस, जर्मनी, उक्रेन, चीन, जापान, कोरिया जैसे देशों के खिलाड़ी अपने देश की भाषा में ही बोलना पसंद करते हैं। उन्हें जरा भी झिझक नहीं होती।
हिंदी बोलने में हमारे बालीवुड में ही सबसे ज्यादा शर्म महसूस की जाती है। जबकि यह भी सब जानते हैं कि हिंदी फिल्मों की पहुंच देश में सबसे ज्यादा है और अगर अमिताभ बच्चन आज देश के सबसे बड़े महानायक हैं तो इसलिए क्योंकि वे हिंदी फिल्म इंडस्ट्री से आते हैं। रजनीकांत तमिल भाषाई होने के कारण सुपर स्टार होते हुए भी देश में वो पहचान नहीं रखते जो उनके समकालीन अमिताभ बच्चन की है। जिक्र अमिताभ बच्चन का चला है तो यह भी लिखना जरूरी है कि हिंदी बोलने में अमिताभ बच्चन को कोई जवाब नहीं। अक्सर कई अभिनेत्रियों को मैंने यह कहते सुना है कि वे बच्चन साहब को केवल इसलिए पसंद करती हैं क्योंकि वे हिंदी बहुत अच्छी बोलते हैं। बेबी डॉल सिंगर कनिका कपूर ने तो उन्हें दुनिया का सबसे सैक्सी मर्द बता दिया था केवल उनकी हिंदी बोलने की अदा की वजह से ही। पर जानते हैं अमिताभ बच्चन को हिंदी बोलने के लिए केवल इसलिए इतना पसंद किया जाता है क्योंकि वे अंग्रेजी भी उतनी दक्षता से बोलते हैं। या यूं कहें कि जिस तरह की अंग्रेजी वे बोलते हैं वो बालीवुड के दूसरे फिल्म स्टार्स के भी बस की बात नहीं है। एकदम इंटरनेशनल क्लास और ग्रामर की दृष्टि से एकदम परफेक्ट।

बालीवुड में हिंदी व अंग्रेजी की लड़ाई को एक नया रूप दिया है क्वीन कंगना रनौत ने। कंगना बालीवुड में अपनी शर्तों पर काम करने वाली हिरोईन के रूप में पहचान बना चुकी हैं। लगभग 10 साल तक संघर्ष करने के बाद कंगना ने अपना जो मुकाम बनाया है उसकी जितनी भी तारीफ की जाए कम है। हिमाचल प्रदेश से आई और बालीवुड की सुपर स्टार बन गई। कंगना ने अक्सर हिंदी भाषी होने के कारण अपनी अनदेखी की बात कही। कंगना ने साफ कहा कि बालीवुड में उनसे कुछ लोग केवल इसलिए खुलकर बात नहीं करते थे क्योंकि वे अंग्रेजी नहीं जानती थी। आज वे अंग्रेजी भी बोलती हैं और उन्हें फैशन आईकन तक कहा जाने लगा है।
मेरे इस ब्लॉग के पीछे कंगना रनौत ही एक मुख्य वजह हैं। कंगना ने पिछले दिनों दो टीवी शो में कुछ बातें कहीं और उन्हें लेकर काफी कुछ लिखा गया। काफी विद करण में कंगना ने होस्ट व निर्माता निर्देशक करण जौहर पर भाई भतीजावाद को बढ़ावा देने का आरोप लगाया। शो का फोरमेट कुछ ऐसा है जिससे कुछ विवाद हमेशा होते रहे हैं लेकिन इस बार इस बात ने तूल पकड़ लिया। कंगना ने कह दिया कि करण जौहर बालीवुड में भाई भतीजावाद को सबसे ज्यादा बढ़ावा देते हैं और हमेशा बड़े बालीवुड घरानों के बच्चों को ही अपनी फिल्मों में लेते हैं। हालांकि बाद में कंगना ने यह भी कहा कि उन्होंने ऐसा इसलिए भी कहा क्योंकि शो में थोड़ा मिर्च मसाला आ जाएगा लेकिन मामला मजाक तक नहीं रहा गंभीर हो गया। कंगना के आरोप के जवाब में करण जौहर ने सोशल मीडिया पर लिखा कि वे क्या करें जब बालीवुड घरानों के बच्चे हैं ही इतने प्रतिभाशाली? अगर बालीवुड में ही अच्छे कलाकार सामने आ रहे हैं तो वे उन्हें क्यों नहीं साइन करें?

करण ने अपने तर्क दिए लेकिन बात यहीं नहीं थमी। कंगना रनौत ने करण के इन तर्कों को खारिज किया। हाल ही में कंगना रनौत नजर आई रिपब्लिक वल्र्ड चैनल पर अनुपम खेर के चैट शो में। इस इंटरव्यू में जब अनुपम खेर ने उनसे करण के साथ हुए विवाद के बारे में पूछा तो कंगना ने खुलकर अपनी बात कही। कंगना ने कहा कि करण की यह बात उन्हें बिल्कुल हजम नहीं हुई कि केवल बालीवुड में ही टैलेंट पैदा हो रहा है। केवल चार घरानों तक ही बालीवुड सीमित नहीं है। कंगना ने जोर देकर कहा कि दरअसल यहां अंग्रेजी में बात करने वालों को ज्यादा तवज्जो दी जाती है, उन्हें ही सम्मान मिलता है। पर ऐसा नहीं है। उन्होंने अपनी और अनुपम की ओर इशारा करते हुए कहा कि यहां ऐसे भी लोग हैं जो बाहर से आए और अपना स्थान बनाया। अनुपम ने भी उनसे सहमति जताई। करण जौहर के जवाब में कंगना ने बहुत तफ्सील से अपनी बात कही। कंगना का तर्क था कि बालीवुड के बच्चे बचपन से ही फिल्मों के माहौल में आंख खोलते हैं। उन्हें उसी तरह की ट्रेनिंग मिलती है। उन्हें तैयार करने में कई लोग जुटे होते हैं। इसके अलावा जब वे पहली फिल्म के लिए तैयार होते हैं तो उनकी एक फैन आडियंस भी तैयार हो चुकी होती है जो उनके माता-पिता या परिवार की वजह से उन्हें देखने जाती है। जबकि बाहर से आए कलाकारों को सब कुछ जीरो से शुरू करना होता है।

दरअसल बालीवुड में भाई भताजीवाद, हिंदी-अंग्रेजी का भेदभाव पहले भी था और आगे भी बना रहेगा। सवाल यह है कि क्या एक कंगना रनौत से यह फासला खत्म करना संभव होगा? नहीं हमें एक नहीं सैकड़ों कंगना चाहिए ऐसा करने के लिए।

सलाम है कंगना और उनके जज्बे को।
 

हम आपके साथ हैं कंगना। 


- हर्ष कुमार सिंह

 

Friday, 7 July 2017

DEEP REVIEW: MOM ***

कुछ नया नहीं, केवल श्रीदेवी और अपने बच्चों के लिए देखें 

Ratings- 3*

 महिला प्रधान फिल्मों के नाम पर पिछले कुछ साल से दिल्ली का निर्भया कांड या यूं कहें गैंगरेप की घटनाएं पसंदीदा विषय बन गया है। पिछले दो साल में ही इस तरह के थीम को लेकर मातृ, जज्बा, पिंक और मॉम जैसी कई फिल्में बनी हैं। मेरा तो मानना है कि बेगम जान भी इसी सब्जेक्ट को दिमाग में रखकर बनाई गई थी। इन सभी में मां और बेटी की कहानियां हैं। बेटी को तकलीफ में देखकर नायिका के भीतर की मां जाग जाती है और फिर सभी अपने-अपने तरीके से अपनी कहानी को अंजाम तक ले जाती हैं। मॉम भी कुछ अलग नहीं है। मुझे तो आश्चर्य यह हो रहा है कि मॉम व अभी कुछ महीने पहले आई फिल्म मातृ की कहानी में इतनी समानता कैसे है? दोनों में ही नायिका स्कूल टीचर हैं। दोनों में ही पुलिस अंत में हिरोईन को एक के बाद एक हत्याएं करते हुए रंगे हाथ पकडऩे के बाद भी कुछ नहीं कहती। केवल फर्क यह है कि मातृ में मां व बेटी, दोनों रेप का शिकार होती हैं जबकि मॉम में केवल बेटी। अब चूंकि दोनों ही फिल्में एक साथ बन रही थी और हो सकता है कि लेखकों को इस बात की भनक हो गई थी कि दोनों की कहानी एक ही है और इसलिए कुछ फर्क कर दिया गया। मातृ में रवीना टंडन का पति उन्हें ही सारी घटना के लिए जिम्मेदार ठहराता है जबकि मॉम में श्रीदेवी के पति को उनके सपोर्ट में दिखाया गया है।

मूल कहानी को छोड़ दिया जाए तो मॉम और मातृ में बहुत से बुनियादी फर्क हैं। मॉम एक बड़े स्केल पर बनाई गई फिल्म है। इसमें सब कुछ बड़े पैमाने पर रचा गया है। सपोर्टिंग कास्ट में नवाजुद्दीन सिद्दीकी व अक्षय खन्ना जैसे मंझे हुए कलाकार रखे गए हैं जिनकी वजह से फिल्म में दर्शकों की दिलचस्पी बनी रहती है। कहानी एक लाइन की है। श्रीदेवी की 18 साल की बेटी से चार लोग गैंगरेप करते हैं और आरोपी सबूतों के अभाव में छूट जाते हैं। सिस्टम से नाराज होकर श्रीदेवी एक जासूस की मदद से आरोपियों से बदला लेती हैं। फिल्म बहुत ही साधारण बन जाती अगर इसमें श्रीदेवी, और ए आर रहमान का बैकग्राउंड म्यूजिक न होता। ए आर रहमान ने बैकग्राउंड संगीत से फिल्म के स्केल को बहुत ऊपर उठा दिया है। कुछ संवाद भी अच्छे हैं। जैसे- भगवान हर जगह नहीं हो सकता इसलिए उसने मां बना दी, गलत और बहुत गलत में से कुछ चुनना हो तो आप क्या करोगे?

श्रीदेवी ने इंग्लिश विंग्लिश के पांच साल बाद यह फिल्म की है लेकिन मेरा मानना है कि यह फिल्म उतनी बेहतर नहीं बन सकी है। न ही इसकी बाक्स आफिस पर सफलता के कोई आसार नजर आते हैं। इस तरह की फिल्में बहुत ही डार्क होने के कारण रिपीट वैल्यू वाली नहीं होतीं। मनोरंजन कम होता है तो लोग फिल्म देखने सपरिवार नहीं जाते। इंग्लिश-विंग्लिश बहुत ही मनोरंजक व पारिवारिक फिल्म थी और उसे आप बार-बार देख सकते हैं। मैसेज देने में सबसे ज्यादा सफल पिंक रही थी जिसमें इस विषय को सबसे ज्यादा खूबसूरती से हैंडल किया गया था।
श्रीदेवी का फैन होने के नाते मैं मॉम में इससे कुछ ज्यादा उम्मीद कर रहा था। जहां तक एक्टिंग का सवाल है तो श्रीदेवी ने जबर्दस्त काम किया है। हाल फिलहाल आई दूसरी महिला प्रधान फिल्मों से यह थोड़ी मजबूत अगर नजर आती है तो इसका पूरा श्रेय श्रीदेवी को ही है। जब अस्पताल में श्रीदेवी पहली बार अपनी बेटी को देखती हैं और फूट-फूटकर रोती हैं तो उनके अभिनय की बुलंदियां नजर आती हैं। यह सबूत मिल जाता है कि उन्हें क्यों इतनी आला दर्जे की अभिनेत्री माना जाता है। इसके अलावा कई और दृश्यों में भी श्रीदेवी अपनी छाप छोड़ती हैं। वैसे लगता है श्रीदेवी कुछ ज्यादा ही डाइटिंग करती हैं। खासतौर से क्लोज अप्स में चेहरे की हड्डियां नजर आती हैं, अगर थोड़ा सा वजन बढ़ा लें तो भी कोई दिक्कत नहीं होगी। फिल्म में श्रीदेवी की बेटी का रोल निभाने वाली सजल अली व पति बने अदनान सिद्दीकी, दोनों ही पाकिस्तानी कलाकार हैं, और उन्होंने अपने रोल के साथ पूरा न्याय किया है। अदनान को हमने कई पाकिस्तानी टीवी सीरियल्स में देखा है वे शानदार कलाकार हैं। सजल अली बेहद खूबसूरत हैं और एक्टिंग के लक्षण उनमें इस फिल्म में नजर आते हैं। बाप-बेटी के बीच भी कुछ मार्मिक सीन हैं। खासतौर से जब दोनों मोबाइल पर मैसेजिंग के जरिये बात करते हैं तो दर्शकों की आंखें भर आती हैं। ऐसी फिल्में भले ही बाक्स आफिस पर क्रांति नहीं करती लेकिन सबक तो देकर जाती हैं। इसलिए मेरी सलाह है कि आप भी बच्चों के साथ जाकर इस फिल्म को जरूर देखें। कम से कम फिल्म देखने से बच्चों की समझ में तो यह तो आएगा कि मां-बाप की सलाह मानना उनके लिए क्यों जरूरी है और अभिभावक अपने बच्चों के दुश्मन नहीं हैं। इसके अलावा उन लोगों के लिए भी इनमें सबक होता है जिनके बच्चे गलत सोहबत में बिगड़ रहे हैं।

- हर्ष कुमार सिंह

Friday, 26 May 2017

DEEP REVIEW: Sachin - A Billion Dreams *****


Rating: 5*
सचिन और क्रिकेट के दीवानों के लिए अनमोल तोहफा

अगर आप किसी परीक्षा में बैठने जा रहे हैं तो इस फिल्म को देख लीजिए। आपमें वो एनर्जी आ जाएगी जो किसी इम्तहान को पास करने के लिए जरूरी है।

यदि आप अपने दफ्तर में विपरीत हालात से गुजर रहे हैं परेशान हैं तो सचिन की ये फिल्म आपको दिक्कतों से निपटने के लिए जरूरी हौसला दे देगी।

अगर आप खिलाड़ी हैं और आपको लग रहा है कि आप के साथ इंसाफ नहीं हो रहा है या फिर खराब परफोर्मेंस से जूझ रहे हैं तो फिर ये फिल्म आपके लिए है।

और अगर आप क्रिकेट में दिलचस्पी नहीं रखते हैं या फिर क्रिकेट के भगवान कहे जाने वाले इस महान क्रिकेटर में आपकी दिलचस्पी कभी नहीं रही है तो फिर ये फिल्म आपके लिए नहीं है। पैसे खराब मत कीजिए।



सचिन तेंदुलकर ने 24 साल इंटरनेशनल क्रिकेट खेली। 100 से ज्यादा इंटरनेशनल शतक लगाए। इस दौरान देश में भी 10 प्रधानमंत्री बदले, देश बदला, क्रिकेट का स्वरूप बदला। देश ने न जाने कितने उतार चढ़ाव देखे। ऐसे में इस मास्टर ब्लास्टर की लाइफ पर अगर फिल्म बनाने की कोई सोचता है तो फिर इसे केवल डॉक्यूमेंट्री फार्म में ही बनाया जा सकता था। ऐसी ही फिल्म बनी भी है। ज्यादातर हिस्से ओरिजनल वीडियों को कंपाइल करके बनाए गए हैं और कई बार ऐसी फील आती है कि जैसे आप स्टार स्पोर्ट्स का सुपर स्टार सीरीज का कोई कार्यक्रम देख रहे हैं। लेकिन ए आर रहमान की धुनें और सचिन के निजी जीवन से जुड़े क्षणों का भावुक चित्रण फिल्म को फीचर फिल्म की फील देने में सफल रहता है। इस तरह की फिल्म की समीक्षा नहीं की जा सकती और न ही की जानी चाहिए।

फिल्म में ही इंग्लैंड के पूर्व कप्तान नासिर हुसैन कहते हैं- “सचिन तेंदुलकर पर स्लेजिंग (क्रिकेट के मैदान में होने वाली गाली गलौच) का असर कोई होने वाला नहीं है क्योंकि वे मैदान में खेल रहे 11 खिलाड़ियों की नहीं बल्कि करोड़ों लोगों की आवाज सुनते हैं।“ यही फिल्म का मूड है। यह फिल्म सचिन के फैंस के लिए है।

महान सचिन तेंदुलकर को अनगिनत सलामियां इस फिल्म में दी गई हैं। फिल्म सचिन के बचपन से शुरू होती है और उनकी रिटायरमेंट स्पीच तक जाती है लेकिन इसका मूल सचिन के उस ख्वाब मे छिपा है जो उन्होंने विश्व कप ट्राफी जीतने के लिए देखा था और जो 2011 में पूरा हुआ। फिल्म में सचिन ने बताया भी है कि 2003 के विश्व कप में उन्हें मैन आफ द सीरीज के रूप में सोने का बैट दिया गया था लेकिन उन्होंने उसे पैक करके रख दिया गया था क्योंकि जिस ट्राफी को वो जीतना चाहते थे वो बगल के ड्रैंसिंग रूम में आस्ट्रेलियाई टीम के पास थी। सब जानते हैं कि भारत फाइनल में कंगारुओं के हाथों पराजित हो गया था।

फिल्म में उन क्षणों को भी दिखाया गया है जिनमें सचिन ने अपने कैरियर के बुरे दिन देखे। सचिन ने फिल्म के जरिये शायद पहली बार अपनी पीड़ा बयान की है कि जब उन्हें पहली बार कप्तानी से हटाया गया था तो किसी ने उन्हें फोन करने की जहमत भी नहीं उठाई थी। फिल्म में यह भी संकेत दिए गए हैं कि अपने से काफी सीनियर अजहरुद्दीन को हटाकर जब सचिन को कप्तान बनाया गया था तो भारतीय टीम दो खेमों में बंट गई थी और सचिन को कप्तान के रूप में बहुत बुरे अनुभव से गुजरना पड़ा था। अजहर पर टीम में गुटबाजी कराने के आरोप भी अप्रत्यक्ष रूप से लगाए गए हैं। 2007 के विश्व कप से पहले जिस तरह से कोच चैपल ने भारतीय टीम के बैटिंग आर्डर का बदल दिया था उस पर भी विस्तार से रोशनी इसमें डाली गई है। ग्रेग चैपल के ओरिजिनल वीडियो दिखाए गए हैं जिसमें वे खुद हार की जिम्मेदारी न लेते हुए टीम के खराब खेल को दोषी ठहराते नजर आते हैं। यह फिल्म का सबसे शानदार हिस्सा है। यहीं बताया गया है कि 2007 में सचिन ने संन्यास के बारे में सोचना शुरू कर दिया था लेकिन इसी समय उनके पास उनके क्रिकेटिंग हीरो विव रिचर्ड्स का फोन आता है जो उन्हें खेलना जारी रखने के लिए कहते हैं। और इसके बाद का दौर उनके जीवन का सबसे सुनहरा दौर साबित हुआ, ये बात सब जानते हैं।

2011 के विश्व कप में जीत को सचिन ने अपने जीवन की सबसे शानदार पल बताया है और एक तरह से धोनी की फिल्म की तरह ये फिल्म भी यहीं खत्म हो जाती है। अंत में केवल कुछ अंश उनकी रिटायरमेंट स्पीच के हैं और फिर भारत रत्न का सम्मान। 2011 के विश्व कप के सेमीफाइनल में पाकिस्तान को हराने के बाद जब ड्रैसिंग रूम में कोच गैरी कर्सटन टीम को संबोधित कर रहे होते हैं उसका वीडियो भी आप पहली बार देखेंगे। कर्सटन कहते हैं कि आप लोग शायद सेलीब्रेट करना चाहते हैं लेकिन वे चाहते हैं आप सब लोग आराम करें फिर मुंबई में फाइनल के लिए सफर करें और दो दिन उसकी तैयारी करें। सेलीब्रेट करके समय खराब न करें। इस समय का सदुपयोग आराम करके करें। इस तरह के क्षण आपके रोंगटे खड़े कर देते हैं।


फिल्म में गीत संगीत की जो गुंजाइश थी वो केवल बैकग्राउंड संगीत तक ही सीमित है। ए आर रहमान ने तीन धुनें बनाई हैं जो फिल्म में शानदार तरीके से इस्तेमाल की गई हैं। फिल्म में समीक्षा करने लायक कुछ नहीं है लेकिन बताने के लायक बहुत कुछ है। बस यही कहना चाहूंगा कि अगर आप क्रिकेट के दीवाने हैं तो ये फिल्म आपके लिए है। जाएं और परिवार के साथ इसका आनंद लें आप निराश नहीं होंगे।



- हर्ष कुमार सिंह

Friday, 19 May 2017

Full Text of Sachin Tendulkar's interview

करोड़ों देशवासियों को समर्पित है 'सचिन-ए बिलियन ड्रीम्स' : सचिन तेंदुलकर 

दिनांकः 19 मई 2017
स्थानः होटल आईटीसी मौर्य, नई दिल्ली
समयः शाम 6.30 बजे


''कोई भी खिलाड़ी सचिन तेंदुलकर बन सकता है। बस उसे फोकस करना चाहिए अपने वर्तमान पर। अतीत की विफलताओं को भुलाकर नए लक्ष्य निर्धारित करें, मेहनत करें और इसके बाद सफलता आपको खुद फॉलो करेगी।"
ये प्रेरक शब्द हैं महान क्रिकेटर सचिन तेंदुलकर के नए क्रिकेटरों के लिए।
सचिन अपने जीवन पर बनी फिल्म 'सचिन-ए बिलियन ड्रीम्स' के सिलसिले में 'नवोदय टाइम्स/पंजाब केसरी' से बात कर रहे थे। 26 मई को रिलीज होने जा रही इस फिल्म का निर्देशन जेम्स एरस्कीन ने किया है और संगीत दिया है ए आर रहमान ने। भारत रत्न सचिन तेंदुलकर और फिल्म के निर्माता रवि भागचंदका ने इस फिल्म से जुड़े कई दिलचस्प पहलू शेयर किए:-

जो मिला मां- बाप के आशीर्वाद से
सचिन ने बताया कि वे आज जो कुछ भी हैं वह सब कुछ माता-पिता का आशीर्वाद व भगवान की देन है। बचपन से ही घर में ऐसा माहौल मिला कि किसी और चीज के बारे में सोचने की जरूरत ही नहीं पड़ी। घर में हर समय क्रिकेट का ही जिक्र रहता था। बस खेलना और सिर्फ खेलना। घर पर इतना क्रिकेटिंग माहौल रहा कि कभी बैंक अकाउंट की बात नहीं होती थी। बस मां-पिताजी सब यही पूछते थे कि कितने रन बनाए, कितने विकेट लिए? सचिन का कहना है कि उनके घर में सबका एक ही मंत्र था- अप और डाउन की भूल जाओ। पिछले मैच में क्या हुआ इसकी मत सोचा बल्कि अगले मैच में क्या करना है इसकी योजना बनाओ।

अंजलि का योगदान भी अद्भुत
सचिन का 24 साल लंबा क्रिकेट करियर 13 साल की उम्र से ही शुरू हो गया था। सचिन बताते हैं कि 13 साल की उम्र में ही अंडर 15 के नेशनल कैंप के लिए उनका चयन हो गया था और उसके बाद यह सफर रिटायरमेंट मैच पर ही जाकर थमा। सचिन के अनुसार, जहां उनके शुरूआती करियर में माता-पिता व भाई-बहन को योगदान अहम रहा वहीं इंटरनेशनल क्रिकेट खेलते समय उनकी पत्नी अंजलि का योगदान महत्वपूर्ण रहा। अंजलि गोल्ड मैडलिस्ट डॉक्टर हैं और उनका अपना भी करियर था लेकिन मेरे खेल और क्रिकेट के प्रति जुनून को देखते हुए उन्होंने अपने करियर की परवाह नहीं की और घर-परिवार की सारी जिम्मेदारियों को बखूबी निभाया।

जीवन में एक हीरो का होना जरूरी
44 वर्षीय सचिन तेंदुलकर का मानना है कि आप किसी भी फील्ड से हों लेकिन आपके लिए अपना एक हीरो होना जरूरी है। हो सकता है कि आज के बच्चे सचिन तेंदुलकर बनना चाहते हों लेकिन जब वे खेलते थे तो उनके आदर्श महान सुनील गावस्कर व विव रिचर्ड्स हुआ करते थे। गावस्कर की ठोस बल्लेबाजी और विव रिचर्ड्स की आक्रामकता का मिश्रण उन्होंने अपने खेल में लाने की हमेशा कोशिश की। उभरते हुए खिलाडिय़ों के लिए बहुत ही जरूरी टिप्स देते हुए सचिन ने कहा कि विफलता के भय को बिल्कुल दिमाग से बाहर निकाल दें। अगर दिल से क्रिकेट निकल रही है तो खेलो वरना इसका ख्याल दिमाग से निकाल दो। 


जीवन की दूसरी इनिंग के भी बनाए हैं लक्ष्य
एक सवाल के जवाब में सचिन ने कहा कि क्रिकेट करियर की इनिंग उनके रिटायरमेंट मैच के साथ ही खत्म गई थी अब वे अपनी दूसरी इनिंग खेल रहे हैं। जिस देश ने उन्हें इतना प्यार व सम्मान दिया है उसके बदले वे भी देश को बहुत कुछ देना चाहते हैं। उन्होंने अपनी फिल्म का पहला शो भी देश के सैनिकों के लिए आयोजित किया है। सचिन बताते हैं कि वे यूनिसेफ से जुड़े हुए हैं। एक गांव भी गोद लिया हुआ है और अब दूसरा लेने की तैयारी है। इसके अलावा स्प्रैडिंग हैप्पीनेस के नाम से एक अभियान से भी वे जुड़ गए हैं। इसका लक्ष्य उन वंचित लोगों की सहायता करना है जो बिजली जैसी मूलभूत सुविधाओं से भी दूर हैं। सचिन का कहना है कि यह दूसरी इनिंग वे आत्म संतुष्टि के लिए खेलना चाहते हैं।


आज की भारतीय टीम की बैंच स्ट्रैंथ कमाल की देश में अगला सचिन कौन हो सकता है, इस सवाल के जवाब में सचिन का कहना था कि भारतीय क्रिकेट टीम इस समय एक से एक खिलाडिय़ों से भरी पड़ी है। अगर मैदान में खेल रही एकादश मजबूत है तो बाहर बैंच पर बैठे खिलाड़ी भी कमजोर नहीं हैं। किसी भी खिलाड़ी को चोट लगती है तो उसकी जगह लेने के लिए एक से एक क्रिकेटर बाहर तैयार बैठे हैं। उन्होंने जून में चैंपिंयस ट्राफी के लिए जा रही टीम को बहुत ही संतुलित भी बताया।

असली वीडियो हैं फिल्म का हिस्सा 
सचिन ने बताया कि इस फिल्म में उनके जीवन के कुछ असली वीडियो भी शामिल किए गए हैं जिन्हें उन्होंने अपने परिवार के लोगों के साथ सलाह मशविरा करने के बाद चुना है। सचिन ने कहा कि उनके जीवन की तीन टीमें रही हैं। एक घर पर, दूसरी ड्रैसिंग रूम में और तीसरी लाखों-करोड़ो वो लोग जो उन्हें चाहते व प्यार करते हैं। यह फिल्म उन्हीं को वे समर्पित करना चाहते हैं।

'पंजाब केसरी' के लिए पंजाब का किस्सा
कई गंभीर मुद्दों पर बेबाकी व दिल से जवाब देने के बीच सचिन तेंदुलकर ने एक दिलचस्प किस्सा भी सुनाया। उन्होंने कहा कि 'पंजाब केसरी' से बात कर रहा हूं तो किस्सा भी पंजाब का ही सुनाता हूं। सचिन ने बताया कि 1994 में हम लोग पंजाब में खेल रहे थे तो हरभजन सिंह(भज्जी) वहां भारतीय टीम के लिए नेट्स पर गेंदबाजी करने के लिए आए हुए थे। वे कोई भी शाट मारते तो कुछ ही देर में भज्जी उनके सामने आकर खड़े हो जाते थे। मैं पूछता था कि क्या बात है तो भज्जी पूछते थे कि आपने ही तो बुलाया है। दरअसल सचिन को बार-बार अपना हेलमेट ठीक करने के लिए गर्दन ऊपर नीचे हिलाने की आदत थी और वहां फील्ड में मौजूद भज्जी को लग रहा था कि वे शायद उन्हें बुला रहे हैं।

(यह इंटरव्यू पंजाब केसरी जालंधर, नवोदय टाइम्स नई दिल्ली, जगबानी (पंजाबी) व हिंद समाचार (उर्दू) के 21 मई 2017 के अंकों में छपा।)

Saturday, 22 April 2017

DEEP REVIEW : Maatr ****

Rating-4*

रवीना टंडन के दमदार अभिनय से सजी एक कसी हुई फिल्म 

 

रेप की घटनाओं को लेकर पिछले कुछ सालों में कई फिल्में बनी हैं। इनमें बार-बार यह दिखाया गया है कि कैसे इन घटनाओं में शामिल पीडि़ताओं को इंसाफ यहां तक समाज में खुद को एडजस्ट करने तक के लिए चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। एक साल पहले आई फिल्म पिंक ने इस बारे में काफी जागरुकता का माहौल बनाया। जीरो एफआईआर क्या होती है, जैसे मुद्दे को इससे बड़े पैमाने पर प्रचार भी मिला लेकिन मातृ इस मुद्दे पर एक दूसरे पहलू को पेश करती है। यह हम आप सभी जानते हैं कि जिस तरह से पिंक में दिखाया गया है वह आसान नहीं है और हर मामले में उस तरह से इंसाफ हासिल कर पाना सरल नहीं है। मातृ में थोड़ी सी नाटकीयता के साथ यही दिखाया गया है कि अगर इंसाफ मिलने की कोई उम्मीद न रहे तो खुद भी ऐसे लोगों से निपटा जा सकता है। इस फिल्म की खासियत यही है कि जिस समय आप फिल्म देख रहे होते हैं तो दर्शकों को भी यह लगने लगता है कि फिल्म में विद्या चौहान (रवीना टंडन) ने जो तरीका अपनाया है वही सही है। रवीना टंडन ने अपने जानदार अभिनय से फिल्म को प्रभावशाली बना दिया है। वे रोल में एकदम फिट नजर आती हैं और तमाम संवेदनाओं को बेहतरीन तरीके से सामने लाने में सफल रही हैं। भले ही वह एक मां की वेदना हो या एक अबला का प्रतिशोध।
फिल्म की कहानी एक स्कूल फंक्शन से शुरू होती है। स्कूल टीचर विद्या अपनी बेटी के साथ देर रात घर लौट रही होती है। गाड़ी शार्टकर्ट के चक्कर में एक सुनसान रास्ते पर डाल देती है। स्कूल से ही उनका पीछा कर रहे कुछ बिगडै़ल नौजवान मां-बेटी से गैंगरेप करते हैं और इस हादसे में बेटी की मौत हो जाती है। पेंच यह है कि इन सात आरोपियों का सरगना मुख्यमंत्री का बेटा था। पुलिस इस वजह से मामले को रफा-दफा करने का प्रयास करती है और तीन फर्जी आरोपियों को पकड़कर केस निपटा देती है। विद्या का पति भी इस पूरे घटनाक्रम के लिए उसे ही दोषी ठहराता है और उससे अलग हो जाता है। विद्या अपनी एक दोस्त के घर रहने पर मजबूर हो जाती है। विद्या हालात से लडऩे का पूरा प्रयास करती है। बेटी की यादों के बीच खुद को गुमा देने की भी कोशिश करती है लेकिन एक दिन गाड़ी ड्राइव करते हुए सात आरोपियों में से एक को बाइक पर जाते हुए देखती है तो उसके मन में बदला लेने की भावना जाग जाती है। वह सुनियोजित तरीेके से एक-एक करके सारे आरोपियों को मौत के घाट उतारती है। पुलिस लगातार इस मामले में उस पर नजर भी रखती है। अंत में जब विद्या सीएम व उसके बेटे की हत्या करती है तो पुलिस को भी उसके साथ सहानुभूति की मुद्रा में दिखा दिया गया है।

फिल्म छोटी व कसी हुई है। पहला हाफ रवीना टंडन की एक्टिंग के सभी रंग दिखाता है। वैसे तो रवीना ने सभी सीन अच्छे से निभाए हैं लेकिन जब वह घर पर बेटी को याद करके बाथरूम में तौलिये से लिपटकर रोती है तो दर्शकों का दिल भर आता है। ऐसे ही कुछ और अच्छे सीन भी हैं जहां रवीना ने अपने अभिनय की रेंज दिखाई है। शुरू में जब वह घायल रहती है तो  वैसे भी रवीना नेशनल अवार्ड जीत चुकी हैं और दमन, अक्स व सत्ता जैसी फिल्मों में वे पहले भी अपना लोहा मनवा चुकी हैं।
ऐसी फिल्मों के साथ सबसे बड़ा दुर्भाग्य यह होता है कि इन्हें सेंसर बोर्ड ए सर्टीफिकेट दे देता है। जबकि इस तरह की फिल्में उन किशोरों के लिए देखना बहुत जरूरी है जो इस तरह के दौर से या घटनाओं से गुजरते हैं। उनके लिए इनमें एक सबक भी होता है कि अगर क्षणिक भावनाओं में आकर आप गलत करेंगे तो उसका अंजाम भी बुरा ही होगा। मेरे हिसाब से यह फिल्म आप पूरे परिवार के साथ भी देख सकते हैं।

अश्तर सईद का निर्देशन ठीक ठाक है। फिल्म बहुत सीमित बजट में बनाई गई है और इसमें ज्यादा खर्च की कोई गुंजाइश भी नहीं थी। फोटोग्राफी कई बार अच्छी है। रेप सीन में कैमरे का प्रयोग बहुत ही खूबसूरत तरीके से किया गया है। इसके अलावा स्काई शॉट्स कई स्थान पर बहुत अच्छे हैं। स्वीमिंग पूल का एक शॉट तो बहुत ही मोहक लगता है। संगीत की इसमें जरूरत ही नहीं थी। एक गीत बार-बार बजता है जो सुनने में अच्छा लगता है।

यह फिल्म रवीना की फिल्म है और एक लंबे समय बाद उन्होंने जोरदार वापसी की है। अगर उन्होंने इस तरह के ही रोल चुने तो वे खुद को शानदार अदाकारा के रूप में पूरी तरह स्थापित कर लेंगी।

- हर्ष कुमार सिंह


Saturday, 15 April 2017

DEEP REVIEW: Begum Jaan****

टैक्स फ्री क्यों नहीं किया जाता इस तरह की फिल्मों को ?
 RATING- 4*
कायदे से यह लेखक की फिल्म है। फिल्म के पहले सीन से ही यह संकेत मिल जाता है कि इसे लिखने का ख्याल लेखक को दिल्ली में हुए निर्भया गैंगरेप कांड के बाद ही आया होगा। इसके बाद लेखक ने एक ऐसे हिंदुस्तान की कल्पना की जो बेगम जान के कोठे में बसता है। वहां अलग-अलग जुबान बोलने वाली औरते हैं जो सैक्स वर्कर होने के साथ-साथ एक परिवार भी हैं। लेखक ने बहुत ही खूबसूरती से इसे भारत की आजादी के वक्त हुए घटनाक्रम से जोड़ते हुए वर्तमान हालात का आइना दिखाने की कोशिश की है। कश्मीर के विवादित मुद्दे को भी छूने का प्रयास किया गया है। फिल्म का अंत बहुत ही विचारोत्तेजक है और देश को मिली आजादी और उसके मायनों पर यह गहरे सवाल छोड़ता है।

फिल्म की कहानी बेगम जान (विद्या) के उस कोठीनुमा कोठे की है जो एक ऐसी जगह पर स्थित है जो भारत और पाकिस्तान के बटवारे के समय बिल्कुल बीचों बीच आ जाती है। अंग्रेजों ने जो सीमारेखा बनाई थी उस पर पूरी तरह पालन करने के लिए कांग्रेस व मुस्लिम लीग के नेता मौके पर पहुंचते हैं। बेगम जान को एक महीने का समय दिया जाता है मकान खाली करने के लिए। इस दौरान बेगम जान तमाम प्रयास करती है कि किसी तरह से ऐसा न हो पाए। तमाम कोशिशें करने के बाद भी जब सफलता नहीं मिलती तो कोठे की सारी औरतें बंदूकें लेकर हमलावरों का सामना करती हैं। यहां पुलिस, नेता, अफसर, हिंदू-मुसलमान, राजा-रंक किसी को नहीं छोड़ा गया है। सब पर कटाक्ष किए गए हैं।

फिल्म बहुत ही डार्क व हार्ट हिटिंग है। मनोरंजन के तत्व इसमें बहुत ही कम हैं। गीत-संगीत भी ऐसा नहीं है जो सुकून दे सके। यह उस क्लास के दर्शकों की फिल्म है जो सिनेमा को समाज का दर्पण समझते हैं। केवल मनोरंजन या वीकएंड पर परिवार के लोगों के साथ कुछ घंटे बिताने की इच्छा रखने वालों के लिए यह फिल्म नहीं है। फिल्म चूंकि वेश्याओं के किरदारों को लेकर गढ़ी गई है इसलिए इसे पारिवारिक बनाने की कोशिश भी फिल्मकार ने नहीं की है। कुछ बहुत ही बोल्ड सीन व डायलाग भी फिल्म में रखे गए हैं। अलबत्ता हर सीन व डायलाग के पीछे एक मतलब है। जब बेगम जान को एक महीने का समय दिया जाता है तो उसका जवाब होता है- ‘महीना गिनना हमें आता है। जब भी आता है हमें लाल करके जाता है।‘ देश आजाद होता है और सब औरतें खुशियां मनाती हैं। तब बेगम जान कहती है- ‘आजादी तो मर्दों के लिए आई है औरतों के लिए कैसी आजादी। आजादी का दिन इज्जत वाले लोग अपने घरों में मनाएंगे, कोठे पर भी कोई नहीं आएगा।‘

वास्तव में कई स्थानों पर फिल्म बहुत ही ऊंचे दर्जे का व्यंग्य कसने में कामयाब होती है। फिल्म में तमाम लेखकीय खूबियां होने के बावजूद यह फिल्म कुछेक सीन के अलावा अपेक्षित रूप से प्रभावी नहीं नजर आती। इसकी कई वजहें हैं। फिल्म को बहुत ही जल्दबाजी, शायद 32 दिन, में ही शूट कर दिया गया है। कुछ सीन और भी अच्छे हो सकते थे लेकिन लगता है कि टीम के पास कम समय था और सब कुछ फटाफट निपटा देना था। कलाकार भी बड़े-बड़े नहीं थे और एक ही सेट पर फिल्म शूट होनी थी इसलिए सब कुछ तेजी से किया गया। पूरी तकनीकी टीम वही थी जो बंगाली फिल्म से जुड़ी थी। उन्हें भी भरोसा था कि उन्हें फिल्म को केवल री-शूट ही तो करना है। इसी में गलती हुई है। कलाकारों को कुछ और समय दिया जाता तो सीन अच्छे हो सकते थे। आर्ट डायरेक्शन भी कुछ खास नहीं है। बटवारे के सीन बहुत ही साधारण नजर आते हैं। ऐसा लगता है जैसे स्टूडियो में ही शूट किए गए हों। चूंकि लेखक की फिल्म है तो हर कलाकार को काम दिखाने का अवसर मिलता है लेकिन कलाकारों की भीड़ के बीच विद्या के अलावा इला अरुण, गौहर खान व चंकी पांडे ने अपनी उपस्थिति मजबूती से दर्ज कराई है। चंकी पांडे तो चौंका देते हैं। उनका गेटअप अलग है। उन्हे कमीने आदमी के रोल में कभी देखा नहीं इसलिए वे बेहद प्रभावित करते हैं। नसीरुद्दीन शाह व विवेक मुश्रान बहुत ही साधारण रहे।
चंकी पांडे सबको चौंका देते हैं।

बंगाली में रितुपर्णों सेनगुप्ता लीड में थीं और इसमें विद्या बालन हैं। दोनों ही एकदम परफेक्ट हैं। अलबत्ता विद्या का भारी भरकम शरीर कई बार उनकी एक्टिंग पर भी भारी पड़ता नजर आता है। इस रोल के लिए तो वे एकदम सही हैं लेकिन कोई अन्य रोल निभाने के लिए उन्हें बहुत मेहनत करनी होगी। एक्टिंग उन्होंने बढिया की है।

फिल्म में सबसे खास है इसके जरिये दिया जाने वाला संदेश। इसमें आजादी के मायनों व उसकी अहमियत को समझने पर बल दिया गया है। पर दुख की बात यह है कि इस तरह की फिल्म को देखने के लिए जो लोग सिनेमा तक जाते हैं या जाएंगे वे तो इस मतलब को पहले से ही समझते हैं। फिल्म का संदेश भी दर्शक समझ जाते हैं लेकिन यह संदेश उन लोगों तक कैसे पहुंचाया जाए जो ज्यादा पढ़े लिखे वर्ग से नहीं आते। जो 400 रुपये का टिकट लेकर फिल्म नहीं देखते बल्कि मोबाइल में डाउनलोड करके ही काम चला लेते हैं। मेरा मानना है कि इस तरह की फिल्म का फायदा तभी है जब उसे ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचाया जाए। फिल्मकार को फिल्म में ऐसे दृश्यों से बचना चाहिए था जो इसे ए सर्टीफिकेट दिलाते हैं। इसके अलावा इस फिल्म को टैक्स फ्री किया जाना चाहिए था जिससे यह समाज के उस वर्ग तक भी पहुंचती जो कायदे से निर्भया गैंगरेप जैसी घटनाओं को अंजाम देते हैं।

फिल्म के दो सीन में पूरी कहानी का सार हैं-

1. पहले सीन में जब कनाट प्लेस में एक युवती से रेप की प्रयास किया जाता है तो एक बुजुर्ग महिला उसकी रक्षा के लिए आती है। बुजुर्ग महिला हमलावरों के सामने खुद को निर्वस्त्र करना शुरू कर देती है तो उन युवकों को शर्म आने लगती है और वे भाग खड़े होते हैं। सभी का मन घृणा से भर उठता है।

2. बेगम जान जब दुश्मनों से लोहा लेने की ठान लेती है तो घर में रह रही बच्चियों को अपनी एक साथी के साथ वहां से निकल जाने को कह देती है। जब सीमा पर उन्हें पुलिसवाला रोकने का प्रयास करता है तो एक बच्ची अपने कपड़े उतारने लगती है। दरोगा हाथ जोड़ता है गिड़गिड़ाता है लेकिन बच्ची कपड़े उतारती चली जाती है। दरोगा ऐसा मत करो तुम तो मेरी बच्ची की तरह हो कहते हुए उल्टी तक कर देता है।

ये दोनों सीन झकझोर देने वाले हैं। फिल्म कमजोर निर्देशन के चलते कई स्थानों पर बहुत ही साधारण नजर आती है। इस फिल्म के लिए तो लेखक को बधाई देनी चाहिए। कहानी लिखते समय जिस तरह एक-एक बात का बारीकी से ध्यान रखा गया है वह कमाल है। फिल्म में देश की वीरांगनाओं के किस्सों को जिस तरह से मुख्य कहानी से क्लब किया गया है वह शानदार व उच्चकोटि की फ्यूजन क्षमता को दर्शाता है। दुख केवल यही है कि फिल्म लोग परिवार के साथ नहीं देख सकते और डाउनलोडिंग के इस दौर में महंगे टिकट लेकर इसे चंद लोग ही देखने जाएंगे।

- हर्ष कुमार सिंह

Tuesday, 14 February 2017

DEEP REVIEW: Jolly LLB 2 ****

अक्षय कुमार की एक और बेहतरीन फिल्म
RATING- ****
अक्षय कुमार एक बार फिर विनर लेकर आए हैं। ‘जौली एलएलबी 2’ उस तरह की फिल्म है जिसके लिए अक्षय कुमार जाने जाते हैं। यानी नई कहानी, कॉमेडी और सस्ती फिल्म मेकिंग। ये तीन कांबिनेशन जब मिल जाते हैं तो फिल्म की सफलता भी तय जानिए।

अक्षय कुमार के बारे में कहा जाता है कि वे फिल्म मेकिंग की समझ बहुत रखते हैं और इसलिए फिल्म के मेहनताने के रूप में उसके बिजनेस को साझा करते हैं। इसके फायदे भी हैं और नुकसान भी। फिल्म चलती तो कमाई ही कमाई और नहीं चली तो घाटा। पर अगर आपके पास अच्छी स्टोरी सेंस है तो आपसे बेहतर अभिनेता कोई और नहीं हो सकता। शाहरुख खान का फिल्में क्यों नहीं चलती, क्योंकि उन्हें कहानी की समझ कम है। मैं पहले भी कहता रहा हूं कि आमिर या सलमान की तरह उन्हें यह समझ नहीं आता कि वे किस तरह की कहानी चुनें। इसके अलावा वह फिल्म के लिए पब्लिसिटी इतनी कर देते हैं कि फिल्म ओवरबजट हो जाती है और ऐसे में फिल्म की कीमत वसूलना बहुत ही कठिन हो जाता है। पर अक्षय कुमार बाक्स आफिस के खिलाड़ी हैं।

पिछले कुछ सालों में अक्षय कुमार की कोई भी फिल्म घाटे में नहीं गई है। ‘एयरलिफ्ट’ जैसी फिल्म, जिसका विषय बहुत ही अलग था, 100 करोड़ से ज्यादा की कमाई करने में सफल रही थी। अक्षय कुमार की पहचान देशभक्ति की फिल्में करने के लिए भी बन रही है और इसलिए वे जनता के बीच बहुत ही पापुलर होते जा रहे हैं। यह बात नजर आती है ‘जौली एलएलबी 2’ के बिजनेस में। बड़े से बड़े व छोटे से छोटे सेंटर पर इसका रिस्पांस एक जैसा है। फिल्म शानदार बिजनेस कर रही है।


जौली एलएलबी के पहले भाग में जो रोल अरशद वारसी ने निभाया था वह इसमें अक्षय कुमार ने किया है। पहली फिल्म भी यूपी के वकीलों की कहानी थी और यह भी। फर्क केवल इतना है कि उसमें हीरो मेरठ का था तो इसमें कानपुर का है। पहले भाग में वकील के रूप में जौली के सामने बोमन ईरानी थे तो इसमें अन्नू कपूर हैं। जज के रोल में सौरभ शुक्ला हैं और फिल्म की जान हैं। अक्षय कुमार ने वारसी की तरह ही इस रोल में जान डाल दी है, हालांकि अन्नू बोमन ईरानी की तरह किरदार में जान नहीं डाल पाए लेकिन उनका अभिनय अच्छा है।

जौली (अक्षय) एक बहुत बड़े वकील के असिस्टेंट हैं और खुद की स्वतंत्र वकालत करने का सपना देखते हैं। न्याय की तलाश में भटक रही एक गर्भवती महिला से दो लाख रुपये ठग लेते हैं। जब उसको सच्चाई का पता चलता है तो जौली को खुलेआम जलील करके वह लड़की आत्महत्या कर लेती है। यह प्रकरण जौली को अंदर तक झकझोर देता है। वह उस पीडित महिला के पति की फर्जी एनकाउंटर में हत्या के मामले में घुस जाता है। याचिका कोर्ट में दाखिल कर मामले को फिर से खोल देता है। कुछ दिक्कतें आती हैं लेकिन अंत में जीत सच की होती है।

फिल्म की पटकथा इतनी चुस्त है कि बस पूछिए मत। अगर कोई गीत भी आता है तो दुश्मन नजर आता है। फिल्म में कोर्ट रूम की कहानी है और इसे बनाने में न ज्यादा समय लगा होगा और न ही पैसा। फिल्म की असली जान तो इसके संवाद हैं। बेहद चुटीले और व्यंग्य करने वाले।

फिल्म के अंत में अक्षय कुमार जब स्कूटर पर कपड़ा मारने वाले बच्चे को पैसा नहीं देते तो एक आदमी उनसे कहता है कि तुम्हें ऐसा करते हुए शर्म नहीं आती ? इस पर अक्षय जवाब देते हैं- वकील हूं शर्म नहीं आती। यह फिल्म न्याय के पेशे पर भी बड़े सवाल खड़े करती है और बिना किसी विवाद में फंसे अपनी बात कहने में सफल रहती है। वकीलों को तो यह फिल्म जरूर देखनी चाहिए। फिल्म में सबसे बड़ा संदेश उन वकीलों के लिए ही है जो किसी भी पीड़ित को आसामी समझते हैं और उसे न्याय दिलाने के बजाय बरसों-बरस केवल उसका शोषण ही करते रहते हैं। इसके अलावा पुलिसवालों को भी इसमें संदेश दिया गया है। फर्जी एनकाउंटर एक कड़वा सच है जो पुलिस झूठी वाह वाही के लिए करती रहती है और उसके दुष्प्रभावों को नहीं देखती। फिल्म में हिरोईन के रूप में हुमा कुरैशी भी हैं। हुमा को करने के लिए कुछ नहीं था इसलिए उनके लिए एक होली सॉंग डाल दिया गया। एक दो सीन भी उन्हें दे दिए गए जिसमें वह ठीक ठाक काम करने में सफल रही हैं। फिल्म देखिये और पूरे परिवार के साथ देखिये, मजा आ जाएगा।

- हर्ष कुमार सिंह



Friday, 27 January 2017

DEEP REVIEW: Raees

शाहरुख के फैंस के लिए सब कुछ है इसमें 
 RATING- 3*



शाहरुख खान की कई साल बाद कोई फिल्म सिनेमाहाल में देखी। शायद ‘डॉन 2’ अंतिम थी इससे पहले। कई साल से उनकी किसी भी फिल्म को देखने की उत्सुकता ही नहीं बन पाती थी। हकीकत यह भी है कि इस दौरान उनकी कोई ऐसी फिल्म आई भी नहीं जिसने बाक्स आफिस पर तहलका मचाया हो या फिर शाहरुख के रोल की तारीफें हुई हों। मेरा मानना है कि तीनों खानों में शाहरुख खान को स्टोरी सेंस सबसे कम है। आमिर व सलमान को उनसे कहीं ज्यादा समझ है कि कौन सी कहानी ज्यादा क्लिक कर सकती है। शाहरुख अमूमन यह देखकर फिल्म करते हैं कि उसके निर्माता-निर्देशक कौन हैं। करण जौहर उनसे कोई भी रोल करने के लिए कहें वे कर लेते हैं। रोहित शेट्टी के साथ ‘चेन्नई एक्सप्रेस’ ने ठीक-ठाक बिजनेस कर लिया तो ‘दिलवाले’ जैसी बोझिल फिल्म भी उनके साथ कर लेते हैं। फराह खान से झगड़ा हुआ तो उनसे संबंध सुधारने के लिए ‘हैप्पी न्यू ईयर’ जैसी निहायती बेसिर पैर की फिल्म कर लेते हैं। यानी उनका ताल्लुक अब अपने फैंस से ज्यादा बल्कि फिल्म इंडस्ट्री में उनके दोस्तों-साथियों के साथ ज्यादा मजबूत हो गया है। यही वजह है कि लगातार उनकी फिल्मों का बाक्स आफिस कलेक्शन नीचे की तरफ जा रहा है। ‘दिलवाले’ और उसके बाद ‘फैन’ व ‘डियर जिंदगी’ का क्या हुआ सब जानते हैं। ‘रईस’ भी इसी श्रेणी की फिल्म है। दोनों प्रोड्यूसर (रीतेश व फरहान) उनके दोस्त हैं और शायद इसलिए उन्होंने कहानी पर ज्यादा गौर नहीं किया।

जिन लोगों को 90 के दशक की ‘अग्निपथ’ और फिर बाद में आई ‘सत्या’, ‘कंपनी’ और ‘वंस अपॉन ए टाइम इन मुंबई’ जैसी फिल्में याद हैं उन्हें ‘रईस’ में कुछ नया नहीं लगेगा। रईस (शाहरुख) बचपन से ही मुफलिसी की जिंदगी जिया और इसलिए शराब के गलत धंधे में पड़ गया। कोई भी काम गलत नहीं होता और कोई भी धर्म धंधे से बड़ा नहीं होता, मां की यह सीख उसने पल्ले बांध ली। इसी को फार्मूला बनाकर बड़ा आदमी बनता गया। इस धंधे में लगे तमाम दूसरे लोगों को पीछे छोड़कर रईस गुजरात (जहां शराबबंदी है और यह कहानी जिसकी पृष्ठभिम पर आधारित है) का सबसे बड़ा डॉन बन गया। बाद में जनता की सहानूभूति पाकर वह जेल में होने के बावजूद एमएलए तक बन जाता है। इस दौरान पूरी फिल्म में उसके सामने एक पुलिस आफिसर मजमूदार (नवाजुद्दीन सिद्दीकी) चट्टान की तरह खड़ा रहता है। लगातार कोशिश करता है कि किसी भी तरह रईस को जेल में बंद किया जाए। अंत में जब इंतहा हो जाती है तो तमाम नेता व पुलिसवाले रईस के खिलाफ हो जाते हैं और उसे खत्म कर डालने की ठान लेते हैं। होता भी यही है। रईस अंत में पुलिस के सामने सरेंडर करता है और पुलिस उसे जंगल में ले जाकर फर्जी एनकाउंटर मे ढेर कर देती है। इस दौरान उसकी एक प्रेम कहानी (माहिरा खान से) भी दिखाई गई है। माहिरा उसकी बीवी बनती है और बच्चे की मां भी। यह कहानी अलग ट्रैक पर है और राइटर ने इसे मूल कहानी से जोड़ने की कोशिश में फिल्म को कई बार बोझिल किया है।

कहानी में एक नहीं सैकड़ों खामियां हैं। एक भी सीन ऐसा नहीं है जो पहले आपने किसी फिल्म में नहीं देखा हो। गैंगस्टर्स की फिल्मों में जैसा होता है अक्सर वैसा ही इसमें होता दिखाया गया है। शाहरुख खान जब भी पुलिस को चकमा देते हैं तो दर्शकों को मजा आता है लेकिन जब भी उनका सामना नवाजुद्दीन सिद्दीकी से होता है तो वे कमजोर नजर आते हैं। यह लेखक व निर्देशक, दोनों की ही कमी है कि हीरो पर साइड हीरो इस तरह भारी पड़ता है। संवाद भी नवाज को बेहतर मिले हैं और उनका किरदार दर्शक के दिलो दिमाग पर छाने लगता है। लेकिन यह भी मानना होगा को शाहरुख खान सुपर स्टार हैं और उनकी स्क्रीन प्रेजेंस बहुत ही जोरदार है। इस फिल्म में उन्होंने कमजोर कहानी व निर्देशन के बाद भी अपने किरदार में जान डाल दी है। उन्होंने अपने रोल को शिद्दत से निभाया है। शायद उनके कैरियर की यह पहली फिल्म है जिसमें इतना एक्शन व खून खराबा दिखाया गया है। अंडरवर्ल्ड डॉन का किरदार उन्होंने जोरदार तरीके से निभाया है। ‘डॉन’ व ‘डॉन 2’ से भी बेहतर वे यहां नजर आते हैं। जिस सीन में भी वे आते हैं छा जाते हैं। पाकिस्तानी अभिनेत्री माहिरा खान सुंदर हैं लेकिन उनमें बड़ा स्टार बनने की खासियत नहीं दिखी। शाहरुख के साथ उनकी जोड़ी जमती नहीं। वे उम्र में भी उनसे छोटी नजर आती हैं। नवाजुद्दीन सिद्दीकी साइड हीरो के रोल में अक्सर बढिया काम कर जाते हैं और यहां भी उन्होंने यही किया है।

फिल्म का संगीत केवल सिनेमाहाल में देखने में ही अच्छा लगता है अलबत्ता कोई भी गीत ऐसा नहीं है जो दिल पर छा जाए या जुबां पर चढ़ जाए। सनी लियोनी को एक आइटम गीत ‘लैला मैं लैला’ में लाया गया है। 80 के दशक में जीनत अमान पर फिल्माए गए इस गीत को रिक्रिएट करने के चक्कर में बुरी तरह से मसल दिया गया है। यह न देखने में अच्छा लगता है न ही सुनने में। न सनी लियोनी इसमें मादक लगती हैं और न ही उन्हें अच्छे डांस स्टेप दिए गए हैं। इत्तेफाक की बात है कि इस सप्ताह रिलीज हुई दोनों ही फिल्मों ‘रईस’ व ‘काबिल’ (सारा जमान हसीनों का दीवाना/उर्वशी रौतेला) में पुराने गीतों को दोबारा पेश किया गया है लेकिन दोनों ही प्रभावहीन हैं और केवल फिल्म में बाधा बनते हैं।

अगर आप शाहरुख खान के फैन हैं तो आपके लिए यह फिल्म है। शुरू से लेकर अंत तक हर सीन में शाहरुख ही शाहरुख हैं। यानी आपके लिए फुल पैसा वसूल है। अलबत्ता इस फिल्म से शाहरुख के कैरियर की माइलस्टोन फिल्म की उम्मीद नहीं की जानी चाहिए। ऐसा इसमें कुछ नहीं है।

- हर्ष कुमार सिंह




Wednesday, 25 January 2017

DEEP REVIEW: Kaabil

हृतिक रोशन के कैरियर की सबसे बेहतरीन परफोर्मेंस
RATING- 4*

थ्रिलर फिल्में अक्सर आपको लुभाती हैं क्योंकि इस तरह की फिल्में बहुत कम बनती हैं। 2015 में एक फिल्म आई थी ‘जज्बा’। जिसे बाक्स आफिस पर तो ज्यादा सफलता नहीं मिली थी लेकिन फिल्म को सराहा गया था। वह ऐश्वर्या राय की कमबैक फिल्म होने के कारण जरूर खबरों में रही थी। कुछ वैसी ही फिल्म है ‘काबिल’। दोनों ही के निर्देशक हैं संजय गुप्ता। गुप्ता ऐसी फिल्में बनाने के लिए मशहूर हैं। अब यह फिल्म भी ‘जज्बा’ की तरह साबित होगी या सफलता के कीर्तिमान स्थापित करेगी यह समय बताएगा। अगर एक लाइन में इस फिल्म के बारे में कुछ कहना हो तो आप कह सकते हैं – पहली बार हृतिक रोशन बेहतरीन एक्टिंग करते नजर आए। शायद यह उनके कैरियर की सबसे जोरदार परफोर्मेंस है। जी हां ‘अग्निपथ’ से भी बेहतरीन।

रोहन (हृतिक) एक डबिंग आर्टिस्ट है और अकेले ही कई कैरेक्टर्स की आवाजें निकालने में सक्षम है। कार्टून फिल्मों में डबिंग करता है और पैसा भी ठीक-ठाक कमा लेता है। कमी है तो यह कि वह देख नहीं सकता। उसकी मुलाकात सुप्रिया (यामी गौतम) से होती है जो उसी की तरह नेत्रहीन है। दोनों में प्यार हो जाता है और शादी कर लेते हैं। एक बड़े कार्पोरेटर (रोनित राय) का भाई अमित (रोहित राय) अपने दोस्त के साथ सुप्रिया का रेप करता है। रोहन व सुप्रिया पुलिस के पास जाना चाहते हैं लेकिन अमित का भाई उन्हें सफल नहीं होने देता। रोहन व सुप्रिया दोनों इस वाकये को भूलना चाहते हैं लेकिन हद तब हो जाती है जब दोनों फिर से सुप्रिया का रेप करते हैं। सुप्रिया जान लेती है कि वह रोहन की कमजोरी बन रही है और बार-बार ऐसा होगा तो दोनों का जीवन सामान्य नहीं हो पाएगा। वह आत्महत्या कर लेती है। रोहन को जब पता चलता है कि सुप्रिया के साथ फिर से रेप हुआ है तो वह होश खो बैठता है और पुलिस की मौजूदगी में इसका बदला लेने का चैलेंज कर देता है। दूसरे हाफ में केवल बदला लेने की ही कहानी है।

जिस तरह से रोहन बदला लेता है वह एक अंधे व्यक्ति के लिए सरल नहीं है लेकिन फिर भी सिनेमा में इस तरह की चीजें दिखाई जाती हैं और फिल्म देखते समय दर्शक भी पूरी तरह सहमत न होने के बावजूद सहानुभूति की वजह से नायक के साथ जुड़ जाते हैं। कुछ ऐसा ही ‘काबिल’ में भी होता है। रोहन अपनी आवाजें बदलने की काबलियत का फायदा उठाता है और अपने दुश्मनों के बीच पहले तो गलतफहमी पैदा करता है और फिर एक के बाद एक सबको मारना शुरू करता है। इस दौरान एक काबिल पुलिस आफिसर उसे लगातार रोकने की कोशिश भी करता रहता है लेकिन रोहन तो हीरो है और उसे कौन रोक सकता है। अंत में उसका बदला पूरा होता है और वह सुप्रिया की अस्थियों को विसर्जित कर अपना कर्तव्य निभाता है।

फिल्म में इमोशन है। इसलिए यह आपको बांधे रखती है। अगर आप पटकथा की बात करें तो पहला हाफ बेहद कसा हुआ है। खासतौर से हृतिक व यामी के बीच जितने भी सीन हैं सारे दिल को छू लेते हैं। मॉल में दोनों का बिछड़ जाना और फिर मिलना। रेप के बाद यामी का उससे दूर हो जाने का फैसला सुनाने वाला सीन व कुछ रोमांटिक सीन बहुत ही अच्छे बने हैं। यामी खूबसूरत तो हैं ही अच्छी कलाकार भी हैं और उनकी उपस्थिति स्क्रीन को चमका देती है। शायद यही वजह है कि निर्देशक ने यामी की मौत के बाद भी उसके कैरेक्टर को गायब नहीं किया और समय-समय पर वह आती रहती हैं। रोहन से बात भी करती हैं। एक्टिंग में हृतिक ने अपनी छाप छोड़ी है। पहले हाफ में एक रोमांटिक पति व दूसरे हाफ में एक उग्र नायक के रूप में जमते हैं। शायद पहली फिल्म है जिसमें उन्होंने इस तरह का किरदार निभाया है। पहले वह कमजोर नजर आते हैं लेकिन बाद में बेहद ताकतवर हो जाते हैं। यानी पूरी तरह हीरो नजर आते हैं। इंटरवल से ठीक पहले सीन में जब वह पुलिस को चैलेंज करते हैं तो छा जाते हैं।


तमाम खूबियों के बाद भी इसमें अनेक खामियां हैं। दूसरा हाफ बेहद कमजोर तरीके से लिखा गया है। संवाद अच्छे हैं लेकिन और भी बेहतर हो सकते थे। संगीत कमजोर है। टाइटिल गीत के अलावा कोई गीत याद नहीं रहता। आइटम गीत के रूप में अस्सी के दशक के गीत ‘सारा जमान हसीनों का दीवाना’ को रीक्रिएट किया गया है लेकिन वह न देखने में अच्छा लगता है न सुनने में। आइटम गीत दूसरे हाफ के शुरू में ही आता है और ठूंसा हुआ नजर आता है। अगर उर्वशी रोतेला का यह आइटम गीत न भी होता तो कोई फर्क नहीं पड़ने वाला था।

फिल्म के साथ सबसे बड़ा प्लस प्वाइंट यह है कि इसकी कहानी में नयापन है। इसी हफ्ते रिलीज हुई शाहरुख खान की ‘रईस’ पुरानी घिसी पिटी कहानी पर आधारित फिल्म है, उसके मुकाबले यह फिल्म बहुत मजबूत नजर आती है। देखना यह है कि इसे सफलता कितनी मिलती है।

- हर्ष कुमार सिंह

Friday, 23 December 2016

DEEP REVIEW: Dangal


दंगल: अच्छी फिल्म पर बेस्ट नहीं
RATING- 4*
खेलों को लेकर बनाई जाने वाली फिल्मों का एक प्लस प्वाइंट यह होता है कि आप भावनात्मक रूप से फिल्म के साथ जुड़ जाते हैं। आप किसी खिलाड़ी के संघर्ष की कहानी को खुद से जोडऩे लगते हैं। पिछले कुछ समय में आई कई फिल्मों जैसे ‘मैरीकॉम’,’ एमएस धोनी’, ‘सुल्तान’ की सफलता इसका सबूत हैं। और अगर फिल्म किसी खिलाड़ी की सच्ची कहानी पर आधारित हो तो बात ही क्या है। यही वजह है कि धोनी ने तो सफलता का कीर्तिमान ही बना दिया। कुछ यही बात ‘दंगल’ में नजर आती है। निर्देशन की कमजोरी के बावजूद ‘दंगल’ आपके दिलो दिमाग पर शुरू के दस मिनट में ही छा जाती है। आपको महावीर सिंह फोगट के किरदार से सहानुभूति हो जाती है। सहानुभूति इसलिए क्योंकि वह अपने बेटे के जरिये देश के लिए गोल्ड जीतना चाहते हैं और भगवान की कृपा से उनके घर में एक के बाद एक चार बेटियां पैदा हो जाती हैं। इससे ज्यादा इमोशनल बात और क्या हो सकती है।


2010 के कॉमनवेल्थ गेम्स में कुश्ती का गोल्ड मैडल जीतने वाली गीता फोगाट व उनके पिता व पूर्व पहलवान महावीर सिंह फोगाट के जीवन पर आधारित यह फिल्म भी यही दिखाती है कि अगर किसी खिलाड़ी को इंटरनेशनल लेवल पर सफल होना है तो उसे पारिवारिक सपोर्ट सबसे ज्यादा जरूरी है। सरकारी सुविधाएं और सरकारी अफसरों का खिलाडिय़ों के प्रति नजरिया दूसरे नंबर पर आते हैं। यह कड़वा सच है कि पारिवारिक सपोर्ट व घर में सकारात्मक माहौल के बिना बड़ा खिलाड़ी बन पाना आसान नहीं है।

इसी साल आई सलमान खान की ‘सुल्तान’ से 50 प्रतिशत तक मेल खाने वाली ‘दंगल’ की कहानी सत्य घटना का पुट हो जाने के कारण अलग नजर आने लगती है। दोनों ही फिल्में हरियाणा की बैकग्राउंड पर बनी हैं और दोनों में ही पहलवानों, खासतौर से महिला पहलवानों, की कहानी कही गई है। एक में लड़की अपने पति के लिए अपना करियर दांव पर लगा देती है तो दूसरी में बेटी अपने पिता का अरमान पूरा करती है। सुल्तान चूंकि काल्पनिक कहानी पर आधारित थी इसलिए थोड़ी नाटकीय थी। कहानी की बात करें, महावीर सिंह फोगाट जब बेटा पाने में सफल नहीं हो पाते तो बेटियों पर ही दांव खेलते हैं। तमाम तरह के सामाजिक विरोध के बावजूद महावीर सिंह दो बेटियों को नेशनल लेवल की चैंपियन बनाने में सफल रहते हैं। उनका सपना पूरा तब होता है जब एक बेटी कॉमनवेल्थ गेम्स में गोल्ड मैडल जीतती है।

फिल्म में यह भी दिखाया गया है कि अगर आप नेशनल स्तर पर सफलता हासिल कर भी लेते हैं जरूरी नहीं कि आपको इंटरनेशनल स्तर पर भी उसी तरह से कामयाबी मिल जाए। कोचिंग का एक बड़ा रोल है। नेशनल टीम का कोच उस भावना से नहीं सोच सकता जिस तरह से एक पिता या फिर देश के लिए कुछ करने का सपना रखने वाला खिलाड़ी।
फिल्म के निर्देशक नितेश तिवारी के निर्देशन में उतनी परिपक्वता नहीं नजर आती जितनी इस तरह की फिल्मों में दरकार होती है। कई स्थानों पर वे पंच देने का मौका मिस कर देते हैं। जब गीता अपने पिता को कुश्ती में हराकर पटियाला लौटती है तो उस सीन को और अधिक प्रभावशाली बनाया जा सकता था। इसी तरह जब महावीर सिंह अपनी बेटियों के बाल कटवाते हैं वह सीन और अधिक गंभीरता से फिल्माया जाना चाहिए था। उस सीन को लेकर दर्शक को अगर हंसी आ रही है तो इसका मतलब है कि निर्देशक उस सीन की अहमियत समझाने में विफल रहा है। यह फिल्म का एक टर्निंग प्वाइंट था। फिल्म में एक सीन में जब किशोर उम्र की गीता व उसकी बहन एक सहेली की शादी में जाती हैं तो दुल्हन से कहती हैं कि ऐसा बाप किसी को न मिले जो अपनी बेटियों से कुश्ती करवाता है। इस पर उनकी सहेली कहती है कि तुम खुशकिस्मत हो कि तुम्हारा बाप तुम्हें कुछ बनाना चाहता है दूसरे पिताओं की तरह नहीं जो अपनी बेटियों को बोझ समझते हैं और शादी करके इससे छुटकारा पा लेते हैं। यह सीन संवादों की कमजोरी की वजह से हल्का लगता है जबकि यह बहुत ही खास सीन था। इसी तरह पटियाला स्थित एनआईएस (नेशनल इंस्टीट्यूट आफ स्पोट्र्स) को फिल्म में इस तरह से पेश किया गया है जैसे वहां खिलाड़ी खेलने के बजाय मौज मस्ती करने ही जाते हैं। वहां की कोचिंग को भी बहुत ही सतही स्तर की बताया गया है। हो सकता है कि गीता फोगट के केस में ऐसा रहा हो लेकिन एनआईएस देश का सबसे बड़ा खेल संस्थान है और न जाने कितने खिलाड़ी वहां से निकलते हैं। खैर फिल्मों में अक्सर ऐसा दिखाया जाता रहा है।

फिल्म की कहानी अच्छी है लेकिन संवाद उतने उच्च कोटि के नहीं हैं। प्रीतम का संगीत केवल फिल्म देखने तक ही सीमित है। ‘सुल्तान’ संगीत के लिहाज से इससे अधिक मजबूत फिल्म थी। अभिनय में आमिर खान हमेशा की तरह अव्वल साबित हुए हैं। बिना किसी निर्देशकीय सपोर्ट के बगैर भी उन्होंने बेहतरीन काम किया है। उनकी पत्नी के रूप में साक्षी तंवर का चुनाव एकदम परफेक्ट है और उन्होंने अपने किरदार से पूरा न्याय किया है। बाकी कलाकारों का काम भी बेहतर है। फिल्म के बारे में सोचा था कि बहुत लंबा चौड़ा लिखा जा सकेगा लेकिन फिल्म देखने के बाद यह कमोबेश आमिर खान की दूसरी फिल्मों से कमजोर ही प्रतीत होती है। यह देखने वाली बात होगी कि यह सुल्तान से आगे निकल पाती है या नहीं?


- हर्ष कुमार सिंह