Saturday, 22 April 2017

DEEP REVIEW : Maatr ****

Rating-4*

रवीना टंडन के दमदार अभिनय से सजी एक कसी हुई फिल्म 

 

रेप की घटनाओं को लेकर पिछले कुछ सालों में कई फिल्में बनी हैं। इनमें बार-बार यह दिखाया गया है कि कैसे इन घटनाओं में शामिल पीडि़ताओं को इंसाफ यहां तक समाज में खुद को एडजस्ट करने तक के लिए चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। एक साल पहले आई फिल्म पिंक ने इस बारे में काफी जागरुकता का माहौल बनाया। जीरो एफआईआर क्या होती है, जैसे मुद्दे को इससे बड़े पैमाने पर प्रचार भी मिला लेकिन मातृ इस मुद्दे पर एक दूसरे पहलू को पेश करती है। यह हम आप सभी जानते हैं कि जिस तरह से पिंक में दिखाया गया है वह आसान नहीं है और हर मामले में उस तरह से इंसाफ हासिल कर पाना सरल नहीं है। मातृ में थोड़ी सी नाटकीयता के साथ यही दिखाया गया है कि अगर इंसाफ मिलने की कोई उम्मीद न रहे तो खुद भी ऐसे लोगों से निपटा जा सकता है। इस फिल्म की खासियत यही है कि जिस समय आप फिल्म देख रहे होते हैं तो दर्शकों को भी यह लगने लगता है कि फिल्म में विद्या चौहान (रवीना टंडन) ने जो तरीका अपनाया है वही सही है। रवीना टंडन ने अपने जानदार अभिनय से फिल्म को प्रभावशाली बना दिया है। वे रोल में एकदम फिट नजर आती हैं और तमाम संवेदनाओं को बेहतरीन तरीके से सामने लाने में सफल रही हैं। भले ही वह एक मां की वेदना हो या एक अबला का प्रतिशोध।
फिल्म की कहानी एक स्कूल फंक्शन से शुरू होती है। स्कूल टीचर विद्या अपनी बेटी के साथ देर रात घर लौट रही होती है। गाड़ी शार्टकर्ट के चक्कर में एक सुनसान रास्ते पर डाल देती है। स्कूल से ही उनका पीछा कर रहे कुछ बिगडै़ल नौजवान मां-बेटी से गैंगरेप करते हैं और इस हादसे में बेटी की मौत हो जाती है। पेंच यह है कि इन सात आरोपियों का सरगना मुख्यमंत्री का बेटा था। पुलिस इस वजह से मामले को रफा-दफा करने का प्रयास करती है और तीन फर्जी आरोपियों को पकड़कर केस निपटा देती है। विद्या का पति भी इस पूरे घटनाक्रम के लिए उसे ही दोषी ठहराता है और उससे अलग हो जाता है। विद्या अपनी एक दोस्त के घर रहने पर मजबूर हो जाती है। विद्या हालात से लडऩे का पूरा प्रयास करती है। बेटी की यादों के बीच खुद को गुमा देने की भी कोशिश करती है लेकिन एक दिन गाड़ी ड्राइव करते हुए सात आरोपियों में से एक को बाइक पर जाते हुए देखती है तो उसके मन में बदला लेने की भावना जाग जाती है। वह सुनियोजित तरीेके से एक-एक करके सारे आरोपियों को मौत के घाट उतारती है। पुलिस लगातार इस मामले में उस पर नजर भी रखती है। अंत में जब विद्या सीएम व उसके बेटे की हत्या करती है तो पुलिस को भी उसके साथ सहानुभूति की मुद्रा में दिखा दिया गया है।

फिल्म छोटी व कसी हुई है। पहला हाफ रवीना टंडन की एक्टिंग के सभी रंग दिखाता है। वैसे तो रवीना ने सभी सीन अच्छे से निभाए हैं लेकिन जब वह घर पर बेटी को याद करके बाथरूम में तौलिये से लिपटकर रोती है तो दर्शकों का दिल भर आता है। ऐसे ही कुछ और अच्छे सीन भी हैं जहां रवीना ने अपने अभिनय की रेंज दिखाई है। शुरू में जब वह घायल रहती है तो  वैसे भी रवीना नेशनल अवार्ड जीत चुकी हैं और दमन, अक्स व सत्ता जैसी फिल्मों में वे पहले भी अपना लोहा मनवा चुकी हैं।
ऐसी फिल्मों के साथ सबसे बड़ा दुर्भाग्य यह होता है कि इन्हें सेंसर बोर्ड ए सर्टीफिकेट दे देता है। जबकि इस तरह की फिल्में उन किशोरों के लिए देखना बहुत जरूरी है जो इस तरह के दौर से या घटनाओं से गुजरते हैं। उनके लिए इनमें एक सबक भी होता है कि अगर क्षणिक भावनाओं में आकर आप गलत करेंगे तो उसका अंजाम भी बुरा ही होगा। मेरे हिसाब से यह फिल्म आप पूरे परिवार के साथ भी देख सकते हैं।

अश्तर सईद का निर्देशन ठीक ठाक है। फिल्म बहुत सीमित बजट में बनाई गई है और इसमें ज्यादा खर्च की कोई गुंजाइश भी नहीं थी। फोटोग्राफी कई बार अच्छी है। रेप सीन में कैमरे का प्रयोग बहुत ही खूबसूरत तरीके से किया गया है। इसके अलावा स्काई शॉट्स कई स्थान पर बहुत अच्छे हैं। स्वीमिंग पूल का एक शॉट तो बहुत ही मोहक लगता है। संगीत की इसमें जरूरत ही नहीं थी। एक गीत बार-बार बजता है जो सुनने में अच्छा लगता है।

यह फिल्म रवीना की फिल्म है और एक लंबे समय बाद उन्होंने जोरदार वापसी की है। अगर उन्होंने इस तरह के ही रोल चुने तो वे खुद को शानदार अदाकारा के रूप में पूरी तरह स्थापित कर लेंगी।

- हर्ष कुमार सिंह


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