Friday, 28 September 2018

Deep Review : Sui Dhaaga

"अनुष्का ने केवल हावभाव से ही कमाल कर दिया है। जिस समय पति को कुत्ता बना देखती हैं तो उनके चेहरे पर उभरने वाले दर्द के भाव दर्शकों को भी असहज कर देते हैं। इसी तरह सिलाई की प्रतियोगिता वाले सीन में पति की गैरहाजिरी में उनका रोना और फिर पति को देखते ही खिल उठना, सब कुछ कमाल लगता है। किस किस सीन की बात करें। सब कुछ कमाल ही है।"
Rating 3*


'बढिया है' ये डायलाग बार-बार वरूण धवन इस फिल्म में बोलते रहते हैं और फिल्म पर यह एकदम फिट बैठता है। फिल्म बढिया है और आप एक बार जरूर देखकर आइये परिवार के साथ। इस फिल्म को देखकर मैं हैरान इसलिए हूं कि आखिर आज के दौर की कोई भी सफल हिरोईन इस तरह का रोल निभाने के लिए कैसे तैयार हो गई? तैयार हो भी गई तो इतनी खूबसूरती से कैसे निभा गई? सच अनुष्का शर्मा ने इस फिल्म में कमाल कर दिया है। एक गरीब व सीधी साधी घरेलू महिला के रोल को कोई इतनी सादगी भरे तरीके से भी निभा सकता है इस पर यकीन नहीं होता। एक लाइन में अगर कहना चाहूं तो यह फिल्म पूरी तरह से अनुष्का शर्मा की फिल्म है। उनके कैरियर की अब तक की सबसे बेहतरीन फिल्म अगर इसे कह दूं तो गलत नहीं होगा।
वैसे अगर पूरी फिल्म की बात करें तो इसमें कुछ भी नया नहीं है। इस तरह की सक्सेस स्टोरीज हम हाल ही में 'टॉयलेट एक प्रेम कथा', 'पैडमैन', 'सूरमा', 'गोल्ड' आदि में भली भांति देख चुके हैं लेकिन इस फिल्म की सबसे खास बात यह है कि यह फिल्म पहले सीन से लेकर अंत तक माहौल बनाकर रखती है और इसमें नाटकीयता या फिल्मी लटके झटके नहीं हैं, मूल आत्मा बरकरार रहती है।
 निर्देशक शरत कटारिया ने फिल्म को इतनी वास्तविक लोकेशंस पर शूट किया है कि दर्शक खो जाते हैं उस माहौल में। फोटोग्राफी भी लाजवाब है और संगीत भी अनु मलिक ने बढिय़ा दिया है। हालांकि कोई ब्लॉकबस्टर गीत इसमें नहीं है लेकिन टाइटल गीत 'सुई धागा' और 'तेरा चाव लागा' बहुत ही अच्छे लगते हैं। संगीत फिल्म के माहौल के अनुरूप सहज और मधुर है।




दो कहावतें हैं- 1. इरादे हों तो कोई काम कठिन नहीं, 2. हर सफल आदमी के पीछे एक औरत होती है। ये दोनों ही इस फिल्म पर फिट बैठती हैं। कहानी मौजी (वरुण) व ममता (अनुष्का) के जीवन की है। पिता (रघुवीर यादव) के ताने सुन सुनकर बड़ा हुआ मौजी इतना भोला है कि उसकी दुकान के मालिक का बेटा उससे कुत्ते की तरह भी व्यवहार करता है तो वह उसे मजाक समझता है। मौजी को बुरा नहीं लगता लेकिन एक दिन जब ममता अपने पति को मालिकों के घर में कुत्ता बनते देख लेती है तो उसका दिल रो उठता है। वह उसे स्वाभिमान से जीने के लिए और अपना कोई काम करने के लिए कहती है। बीवी की बात से प्रेरणा पाकर वरुण नौकरी छोड़ देता है और अपना खानदानी दर्जी का काम शुरू करने का फैसला करता है। कई दुश्वारियां आती हैं, कभी मशीन नहीं मिलती तो कभी दोस्त ही धोखा देते हैं। अंत में मेहनत सफल होती है और एक बड़े मंच पर मौजी व ममता की जोड़ी को सम्मानित करने के साथ फिल्म खत्म होती है।

एक्टिंग की बात करें तो पहला नाम अनुष्का शर्मा का आएगा। वे शानदार कलाकार तो हैं ही साथ ही मैं उन्हें सबसे साहसी अभिनेत्री का भी दर्जा देना चाहूंगा। उन्होंने अपना साहस 'एनएच 10' जैसी फिल्म का निर्माण करके ही दिखा दिया था। जिस समय उन्हें यह कहानी सुनाई गई होगी तो वे समझ भी नहीं पाई होंगी कि उन्हें कितनी गरीब महिला का रोल निभाना है। पूरी फिल्म 200 रुपये की पोलिएस्टर की साड़ी में ही करना आज के दौर की बहुत कम हिरोईनों के ही बूते की बात है। अनुष्का ने केवल हावभाव से ही कमाल कर दिया है। जिस समय पति को कुत्ता बना देखती हैं तो उनके चेहरे पर उभरने वाले दर्द के भाव दर्शकों को भी असहज कर देते हैं। इसी तरह सिलाई की प्रतियोगिता वाले सीन में पति की गैरहाजिरी में उनका रोना और फिर पति को देखते ही खिल उठना, सब कुछ कमाल लगता है। किस किस सीन की बात करें। सब कुछ कमाल ही है।
वरुण धवन भी नैसर्गिक एक्टर हैं और हर रोल में एकदम फिट हो जाते हैं। उन्होंने भी बेहतरीन काम किया है। रघुवीर यादव व दूसरे कलाकारों ने भी अपने रोल को ठीक से निभाया है। इस तरह की फिल्मों का बाक्स आफिस पर सफल होना बहुत जरूरी है। चूंकि इनकी रिपीट वैल्यू कम होती है इसलिए संदेह बना रहता है कि पैसा वसूल हो भी पाएगा या नहीं। खैर इस फिल्म को परिवार के साथ देखा जा सकता है।

- हर्ष कुमार सिंह

No comments:

Post a Comment