जो गलतियां पहली की फिर से उन्हें न दोहराएं !
अगर आप लोगों ने 'मनमर्जियां' देखी होगी तो अभिषेक बच्चन का किरदार आपको जरूर पसंद आया होगा। शांत और सौम्य स्वभाव के रॉबी के किरदार में वे बहुत ही कूल नजर आते हैं। अपनी इसी सौम्यता के बल पर वे फिल्म की हिरोईन को भी जीतने में सफल रहते हैं। अभिषेक को इस रोल के लिए तारीफ भी मिली है लेकिन फिर भी 'मनमर्जियां' उनके कैरियर की बेहतरीन फिल्म नहीं कही जा सकती। आज भी अगर उनके कैरियर की बेहतरीन फिल्मों का जिक्र किया जाता है तो 'युवा', 'धूम', 'गुरु', 'सरकार', 'बंटी और बबली' या 'ब्लफमास्टर' का जिक्र करेंगे। जरा इन सभी फिल्मों में उनके द्वारा निभाए गए चरित्र को ध्यान से समझिए। सब के सब चालू, तेज तरार्र और गुस्सैल किस्म के कैरेक्टर। इसका सीधा सा मतलब क्या लगाया जाए? यही कि अभिषेक बच्चन रफ एंड टफ रोल्स में ही बेहतर काम कर सकते हैं।
किरदार जो पसंद आए
2004 में आई 'युवा' फिल्म में अभिषेक बच्चन ने एक गुंडे का किरदार निभाया था। एकदम कमीने किस्म का इंसान जिसके लिए जीवन में न बीवी का महत्व है और न भाई-दोस्त का। न कोई दिशा है न कोई लक्ष्य। इस रोल के लिए अभिषेक ने बाल भी बड़े किए थे। यकीन मानिए अभिषेक ने लल्लन के रोल में जान डाल दी थी। 'धूम' में उन्होंने पुलिस आफिसर का रोल तीनों ही भागों में निभाया है। और उन्हें सभी ने पसंद किया। इसमें एक्शन था, गुस्सा था और चैलेंज था। इसी तरह 'गुरु' में उन्होंने एक ऐसे आदमी का रोल किया जो येड़ा बनकर पेड़ा खाता है और देश का सबसे बड़ा कारोबारी बन जाता है। मणिरत्नम के साथ अभिषेक ने तीन फिल्में (युवा, गुरु और रावण) की और तीनों में ही उनको सराहा गया। 'गुरु' के लिए तो वे सर्वश्रेष्ठ अभिनेता के लिए नामांकित भी किए गए।
कैरियर का अहम मोड़
अभिषेक को इंडस्ट्री में 18 साल हो चुके हैं और उनकी आयु 42 साल है। बालीवुड में कहावत है कि यहां नायक 35 से 50 साल की आयु में ही असली स्टारडम का मजा चखते हैं। यानी अभी अभिषेक के पास लगभग 8-10 साल का समय बाकी है अपने आपको स्थापित करने के लिए।
फिल्में चुनने में हुई गलितयां
अभिषेक से फिल्मों के चयन में शुरू से ही गलतियां होती रही हैं। शुरूआत में 'रिफ्यूजी' (2000) में तो खैर वे लांच ही हो रहे थे और नौसिखिए थे लेकिन उसी समय उन्होंने 'मैं प्रेम की दीवानी हूं' (2003) के लिए हां करके बड़ी गलती की। इसमें उनका रोल वही था तो 'मनमर्जियां' में है। 26-27 साल के अभिषेक को वह रोल बिल्कुल भी सूट नहीं करता था। इसी बीच 'युवा' (2004) व 'धूम' (2004) आ गई और उनके कैरियर को बूस्ट मिल गया। इसी साल उन्होंने 'फिर मिलेंगे' और 'नाच' जैसी फिल्में करके अपने पैर पर कुल्हाड़ी मारी। इसके अलाव समय-समय पर कुछ मल्टीस्टारर फिल्में करके भी उन्होंने नुकसान उठाया। 'कभी अलविदा ना कहना' (2006), 'दस' (2005) में उन्हें तारीफ मिली लेकिन माइलेज नहीं। सबसे बड़ी गलत कर दी उन्होंने 'उमराव जान' करके। हालांकि ये भी सही है कि उन्हें इसी फिल्म की वजह से अपनी जीवन संगिनी ऐश्वर्या राय मिली लेकिन यह भी तो सही है कि वह एक महिला प्रधान फिल्म थी। इसमें उनके लिए कुछ नहीं था।
यह भी पढें-
जब अभिषेक ने कॉमेडी में हाथ आजमाए, पढें-
2007 में उन्होंने 'गुरु' के जरिए अपनी प्रतिभा से लोगों को परिचित कराया तो 'झूम बराबर झूम', 'लागा चुनरी में दाग', 'द्रोण' जैसी फिल्में करके नुकसान भी उठाया। इनमें उनके लिए कुछ नहीं था। 2009 में आई 'पा' में भी सारी तारीफ उनके पिता को मिली लेकिन अभिषेक बच्चन के भीतर के अभिनेता को परिपक्व होते हुए सबने इसी में देखा। 2010 में 'रावण' ने उन्हें तारीफ तो दिलाई लेकिन बाक्स आफिस पर यह फिल्म फेल रही। इसी समय आई 'गेम', 'प्लेयर्स', 'दम मारो दम' जैसी फिल्मों ने उन्हें बहुत नुकसान पहुंचाया। इस दौर में उनकी फिल्मों ने इतनी खराब प्रदर्शन किया कि उनकी 'धूम 3' की सफलता का भी उन्हें लाभ नहीं मिल सका। इसके अलावा 'हैप्पी न्यू ईयर', 'हाउसफुल 3', 'आल इज वैल' जैसी फिल्मों ने रही सही कसर पूरी कर दी।
दोहराव से बचें
'हाउसफुल 3' के बाद लंबा ब्रेक लिया और अब 'मनमर्जियां' में नजर आए। अभिषेक ने अपने लंबे ब्रेक के बारे में कहा था कि वे कुछ ऐसी फिल्म करना चाहते थे जिसमें उन्हें कुछ नया लगे। 'मनमर्जियां' देखने के बाद तो नहीं लगता कि इसमें कुछ नया वे कर पाए हैं। अब अभिषेक को कुछ नए किरदारों को तलाशना होगा। जो बड़े हों और उन्हें निभाकर आप भी बड़े नजर आएं।
सही वक्त पर सही फैसलें करें
सुनने में आया है कि वे संजय लीला भंसाली की नई फिल्म करने जा रहे हैं। इसमें संजय साहिर लुधियानवी व अमृता प्रीतम की प्रेम कहानी को दिखाने जा रहे हैं। संजय इस क्राफ्ट के मास्टर हैं और रणवीर सिंह के कैरियर को बनाने में उनका बहुत बड़ा हाथ है। अभिषेक के लिए यह रोल एकदम फिट नजर आता है। उनके पिता 'सात हिंदुस्तानी', 'कभी कभी' व 'सिलसिला' में कवि का किरदार निभा चुके हैं। उन्हें खूब तारीफ मिली थी। सुनने में आया था कि प्रियंका चोपड़ा इसमें अमृता प्रीतम का रोल निभाने वाली थी लेकिन वे शादी करने जा रही हैं। अब सुना है कि ऐश्वर्या इस रोल को करेंगी। वैसे भी ऐश्वर्या के साथ अभिषेक के जोड़ी 'गुरु' में खूब पसंद की गई थी। यह फिल्म उनके कैरियर को फायदा पहुंचा सकती है। बेहतर होगा कि अभिषेक एक समय में एक ही फिल्म करें और किरदार पर काम करें। उन्हें मल्टी स्टारर फिल्मों से परहेज करना चाहिए।
क्या करें-
एक्शन फिल्में करें और एक सलाह है कि वे बाल बड़े ही रखें। छोटे बाल उन पर बिल्कुल सूट नहीं करते। क्लीन शेव तो बिल्कुल भी नहीं रहें। अपनी फिटनस पर वर्क करें और झुककर चलना बंद करें।
क्या न करें-
रोमांटिक व नाचने गाने वाले किरदारों से दूर ही रहें तो बेहतर है। इन रोल्स में वे बिल्कुल भी स्वाभाविक नहीं लगते।
- हर्ष कुमार सिंह
अगर आप लोगों ने 'मनमर्जियां' देखी होगी तो अभिषेक बच्चन का किरदार आपको जरूर पसंद आया होगा। शांत और सौम्य स्वभाव के रॉबी के किरदार में वे बहुत ही कूल नजर आते हैं। अपनी इसी सौम्यता के बल पर वे फिल्म की हिरोईन को भी जीतने में सफल रहते हैं। अभिषेक को इस रोल के लिए तारीफ भी मिली है लेकिन फिर भी 'मनमर्जियां' उनके कैरियर की बेहतरीन फिल्म नहीं कही जा सकती। आज भी अगर उनके कैरियर की बेहतरीन फिल्मों का जिक्र किया जाता है तो 'युवा', 'धूम', 'गुरु', 'सरकार', 'बंटी और बबली' या 'ब्लफमास्टर' का जिक्र करेंगे। जरा इन सभी फिल्मों में उनके द्वारा निभाए गए चरित्र को ध्यान से समझिए। सब के सब चालू, तेज तरार्र और गुस्सैल किस्म के कैरेक्टर। इसका सीधा सा मतलब क्या लगाया जाए? यही कि अभिषेक बच्चन रफ एंड टफ रोल्स में ही बेहतर काम कर सकते हैं।
किरदार जो पसंद आए
2004 में आई 'युवा' फिल्म में अभिषेक बच्चन ने एक गुंडे का किरदार निभाया था। एकदम कमीने किस्म का इंसान जिसके लिए जीवन में न बीवी का महत्व है और न भाई-दोस्त का। न कोई दिशा है न कोई लक्ष्य। इस रोल के लिए अभिषेक ने बाल भी बड़े किए थे। यकीन मानिए अभिषेक ने लल्लन के रोल में जान डाल दी थी। 'धूम' में उन्होंने पुलिस आफिसर का रोल तीनों ही भागों में निभाया है। और उन्हें सभी ने पसंद किया। इसमें एक्शन था, गुस्सा था और चैलेंज था। इसी तरह 'गुरु' में उन्होंने एक ऐसे आदमी का रोल किया जो येड़ा बनकर पेड़ा खाता है और देश का सबसे बड़ा कारोबारी बन जाता है। मणिरत्नम के साथ अभिषेक ने तीन फिल्में (युवा, गुरु और रावण) की और तीनों में ही उनको सराहा गया। 'गुरु' के लिए तो वे सर्वश्रेष्ठ अभिनेता के लिए नामांकित भी किए गए।
कैरियर का अहम मोड़
अभिषेक को इंडस्ट्री में 18 साल हो चुके हैं और उनकी आयु 42 साल है। बालीवुड में कहावत है कि यहां नायक 35 से 50 साल की आयु में ही असली स्टारडम का मजा चखते हैं। यानी अभी अभिषेक के पास लगभग 8-10 साल का समय बाकी है अपने आपको स्थापित करने के लिए।
फिल्में चुनने में हुई गलितयां
अभिषेक से फिल्मों के चयन में शुरू से ही गलतियां होती रही हैं। शुरूआत में 'रिफ्यूजी' (2000) में तो खैर वे लांच ही हो रहे थे और नौसिखिए थे लेकिन उसी समय उन्होंने 'मैं प्रेम की दीवानी हूं' (2003) के लिए हां करके बड़ी गलती की। इसमें उनका रोल वही था तो 'मनमर्जियां' में है। 26-27 साल के अभिषेक को वह रोल बिल्कुल भी सूट नहीं करता था। इसी बीच 'युवा' (2004) व 'धूम' (2004) आ गई और उनके कैरियर को बूस्ट मिल गया। इसी साल उन्होंने 'फिर मिलेंगे' और 'नाच' जैसी फिल्में करके अपने पैर पर कुल्हाड़ी मारी। इसके अलाव समय-समय पर कुछ मल्टीस्टारर फिल्में करके भी उन्होंने नुकसान उठाया। 'कभी अलविदा ना कहना' (2006), 'दस' (2005) में उन्हें तारीफ मिली लेकिन माइलेज नहीं। सबसे बड़ी गलत कर दी उन्होंने 'उमराव जान' करके। हालांकि ये भी सही है कि उन्हें इसी फिल्म की वजह से अपनी जीवन संगिनी ऐश्वर्या राय मिली लेकिन यह भी तो सही है कि वह एक महिला प्रधान फिल्म थी। इसमें उनके लिए कुछ नहीं था।
यह भी पढें-
जब अभिषेक ने कॉमेडी में हाथ आजमाए, पढें-
2007 में उन्होंने 'गुरु' के जरिए अपनी प्रतिभा से लोगों को परिचित कराया तो 'झूम बराबर झूम', 'लागा चुनरी में दाग', 'द्रोण' जैसी फिल्में करके नुकसान भी उठाया। इनमें उनके लिए कुछ नहीं था। 2009 में आई 'पा' में भी सारी तारीफ उनके पिता को मिली लेकिन अभिषेक बच्चन के भीतर के अभिनेता को परिपक्व होते हुए सबने इसी में देखा। 2010 में 'रावण' ने उन्हें तारीफ तो दिलाई लेकिन बाक्स आफिस पर यह फिल्म फेल रही। इसी समय आई 'गेम', 'प्लेयर्स', 'दम मारो दम' जैसी फिल्मों ने उन्हें बहुत नुकसान पहुंचाया। इस दौर में उनकी फिल्मों ने इतनी खराब प्रदर्शन किया कि उनकी 'धूम 3' की सफलता का भी उन्हें लाभ नहीं मिल सका। इसके अलावा 'हैप्पी न्यू ईयर', 'हाउसफुल 3', 'आल इज वैल' जैसी फिल्मों ने रही सही कसर पूरी कर दी।
दोहराव से बचें
'हाउसफुल 3' के बाद लंबा ब्रेक लिया और अब 'मनमर्जियां' में नजर आए। अभिषेक ने अपने लंबे ब्रेक के बारे में कहा था कि वे कुछ ऐसी फिल्म करना चाहते थे जिसमें उन्हें कुछ नया लगे। 'मनमर्जियां' देखने के बाद तो नहीं लगता कि इसमें कुछ नया वे कर पाए हैं। अब अभिषेक को कुछ नए किरदारों को तलाशना होगा। जो बड़े हों और उन्हें निभाकर आप भी बड़े नजर आएं।
सही वक्त पर सही फैसलें करें
सुनने में आया है कि वे संजय लीला भंसाली की नई फिल्म करने जा रहे हैं। इसमें संजय साहिर लुधियानवी व अमृता प्रीतम की प्रेम कहानी को दिखाने जा रहे हैं। संजय इस क्राफ्ट के मास्टर हैं और रणवीर सिंह के कैरियर को बनाने में उनका बहुत बड़ा हाथ है। अभिषेक के लिए यह रोल एकदम फिट नजर आता है। उनके पिता 'सात हिंदुस्तानी', 'कभी कभी' व 'सिलसिला' में कवि का किरदार निभा चुके हैं। उन्हें खूब तारीफ मिली थी। सुनने में आया था कि प्रियंका चोपड़ा इसमें अमृता प्रीतम का रोल निभाने वाली थी लेकिन वे शादी करने जा रही हैं। अब सुना है कि ऐश्वर्या इस रोल को करेंगी। वैसे भी ऐश्वर्या के साथ अभिषेक के जोड़ी 'गुरु' में खूब पसंद की गई थी। यह फिल्म उनके कैरियर को फायदा पहुंचा सकती है। बेहतर होगा कि अभिषेक एक समय में एक ही फिल्म करें और किरदार पर काम करें। उन्हें मल्टी स्टारर फिल्मों से परहेज करना चाहिए।
क्या करें-
एक्शन फिल्में करें और एक सलाह है कि वे बाल बड़े ही रखें। छोटे बाल उन पर बिल्कुल सूट नहीं करते। क्लीन शेव तो बिल्कुल भी नहीं रहें। अपनी फिटनस पर वर्क करें और झुककर चलना बंद करें।
क्या न करें-
रोमांटिक व नाचने गाने वाले किरदारों से दूर ही रहें तो बेहतर है। इन रोल्स में वे बिल्कुल भी स्वाभाविक नहीं लगते।
- हर्ष कुमार सिंह




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