Friday, 5 October 2018

DEEP REVIEW : Andhadhun

कहानी व स्क्रीन प्ले इतना जबर्दस्त है कि कब फिल्म शुरू होती है और कब खत्म आपको पता ही नहीं चलता। आखिरी सीन में जब आयुष्मान सड़क पर पड़े एक टिन को ठोकर मारता है तो दर्शकों के मुंह से वाह निकल जाता है और सबका चेहरा खिल उठता है।
Rating 5*

 

फिल्म का पहला सीन है-एक गोभी के खेत में खरगोश व चौकीदार के बीच लुका छिपी चल रही है। खेत का मालिक हाथ में बंदूक लिए खेत में घूम रहा है और खरगोश को ढूंढ रहा है क्योंकि खरगोश ने गोभियों को कुतर-कुतरकर फसल चौपट कर दी है। मालिक खरगोश को गोली से मारना चाहता है। जैसे ही वह निशाने पर आता है तो गोली दाग देता है। खरगोश का क्या हुआ? कुछ नहीं पता। इस सीन से शुरूआत क्यों की गई यह कोई नहीं बता पाता और जब फिल्म आगे बढ़ती है तो लोग ये भी भूल जाते हैं कि पहला सीन क्या था। बाद में क्लाईमैक्स के समय अचानक यह सीन फिर से आता है और तब पता चलता है कि इस सीन का क्या महत्व है।

यह तो केवल एक सीन है। अगर आप फिल्म देख लेंगे तो हर सीन आपको इसी तरह दिलचस्प लगेगा। अगले सीन में क्या घटित होने वाला है इसका आकलन तो आप लगाएंगे लेकिन जो होगा वो आपकी कल्पना से भी परे होगा। यही इस फिल्म की खूबसूरती है जो इसे दूसरों से अलग करती है।  बहुत लंबे अर्से बाद ऐसी फिल्म आई है। इससे पहले श्रीराम राघवन ने एक हसीना थी (2004), जॉनी गद्दार (2007), एजेंट विनोद (2015) व बदलापुर (2018) जैसी फिल्में बनाई हैं। जॉनी गद्दार इन सब में मेरी फेवरेट है और अब अंधाधुन ने मुझे उनका कायल बना दिया है।

 सस्पेंस-थ्रिलर फिल्मों की कहानी बताना सबसे बड़ा गुनाह है। पर अगर मैं आपको इसकी कहानी बता दूं तो और कहीं भी बीच में छोड़ दूं तो आप जड़ तक पहुंच नहीं पाएंगे ये मेरा दावा है। फिल्म में हर सीन के बाद एक मोड़ आता है और बेहद रोमांचक तरीके से क्लाइमैक्स की ओर बढ़ती है। कहानी इस तरह है- आकाश (आयुष्मान खुराना) एक संगीतकार है और अंधा होने का नाटक करता है। इसका उसे फायदा भी मिलता है। गर्लफ्रेंड सोफी (राधिका आप्टे) उसे अपने पापा के होटल में प्यानो बजाने का काम दिला देती है। वहीं आकाश के संपर्क में आते हैं सत्तर के दशक के स्टार प्रमोद सिन्हा (अनिल धवन)। अनिल ने अनिल धवन को ही प्ले किया है बस फिल्मी नाम प्रमोद सिन्हा शायद 70 के दशक के प्रसिद्ध निर्देशक प्रमोद चक्रवर्ती व शत्रुघ्न सिन्हा के नामों का कांबिनेशन कर दिया गया है। प्रमोद की जवान बीवी सिमी (तब्बु) बहुत ही बिंदास है और उसे प्यार से पैमी बुलाती है। प्रमोद सिन्हा से मिलने के बाद ही आकाश की जिंदगी बदल जाती है। आकाश की आंखों के सामने ही एक हत्या होती है और वह अंधा होने के कारण पुलिस को यह सब बता भी नहीं पाता है। उसे डर है कि कहीं उसकी पोल न खुल जाए। इसी चक्कर में वह जाल में फंसता जाता है। अंत में वह कैसे तमाम कुचक्रों से बचकर निकलने में कामयाब होता है यही फिल्म है। अंत में वह हीरो बनकर उभरता है।


कहानी व स्क्रीन प्ले इतना जबर्दस्त है कि कब फिल्म शुरू होती है और कब खत्म आपको पता ही नहीं चलता। आखिरी सीन में जब आयुष्मान सड़क पर पड़े एक टिन को ठोकर मारता है तो दर्शकों के मुंह से वाह निकल जाता है और सबका चेहरा खिल उठता है। इसके लिए श्रीराम राघवन को जितनी भी बधाई दी जाए कम है। उन्होंने साबित कर दिया है कि अगर निर्देशक अपने हाथ में लेखन की भी कमान रखे तो वह करिश्मा कर सकता है।

अभिनय की बात करें तो आयुष्मान के जीवन की ये सबसे बेहतर फिल्म है। वे हर फिल्म में लूजर की भूमिका निभाते रहे हैं लेकिन यहां वे विजेता बनकर उभरे हैं। तब्बू तो निगेटिव किरदार निभाने में विशेषज्ञता हासिल कर चुकी हैं। उन्हें कोई भी अटपटा सा रोल दे दीजिए वे उसमें जान डाल देती हैं। उनका व्यक्तित्व किरदार के हिसाब से जिस तरह ढल जाता है यही उनकी सबसे बड़ी विशेषता है। राधिका आप्टे का रोल कोई खास नहीं है लेकिन जितना भी है वे उसमें जमती हैं। एक मॉडर्न लड़की के रोल को उन्होंने बखूबी निभाया है। डॉ. स्वामी के रोल में जाकिर हुसैन व इंस्पेक्टर मनोहर के रूप में मानव विज ने भी गजब की एक्टिंग की है।

संगीत की इसमें ज्यादा गुंजाइश नहीं थी लेकिन जो भी दो तीन गीत हैं मधुर हैं। अलबत्ता मुझे तो अनिल धवन की फिल्मों के गीतों (तेरी गलियों में न रखेंगे, ये जीवन है आदि) की प्यानो पर बजाई गई धुनें ही रोमांचित कर देती हैं।  कुल मिलाकर ये एक टॉप क्लास फिल्म है और अगर आप बढिय़ा फिल्म देखना चाहते हैं तो ये फिल्म आपके लिए है। जाइये और सपरिवार देखिए। बच्चे भी आपको धन्यवाद देंगे को क्या फिल्म दिखाई थी आपने।

- हर्ष कुमार सिंह


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