Monday, 26 February 2018

...और अभिशप्त रही इस 'चांदनी' के जीवन की रात

श्रीदेवी की मौत से सब इसलिए भी ज्यादा स्तब्ध हैं क्योंकि वे न तो बीमार थी और न ही खराब दौर से गुजर रही थीं। इन दिनों वे अपनी बेटी जहानवी के करियर को लेकर व्यस्त थीं। जहानवी की पहली फिल्म 'धड़क' जुलाई में रिलीज होने के लिए तैयार है। काम पूरा हो चुका है और शायद श्रीदेवी भी अपने बेटी को बड़ी स्क्रीन पर देखने के लिए बेचैन रही होंगी लेकिन ईश्वर ने उन्हें वह समय दिखाया ही नहीं। इससे बड़ा दुर्भाग्य और क्या होगा? यहां ये भी बता दूं कि बोनी कपूर की पहली पत्नी मोना भी अपने बेटे अर्जुन की पहली फिल्म की रिलीज तक जिंदा नहीं रही थी।

भले ही हम श्रीदेवी के जीवन की सतरंगी कहानियों को देखकर यह समझ रहे हों कि उनकी निजी जीवन बहुत ही सुखी रहा लेकिन यह पूरी तरह सही नहीं है। श्रीदेवी के करियर में जब भी कोई महत्वपूर्ण समय आया उन्हें निजी जीवन में कठिन दौर से गुजरना पड़ा। जिस समय श्रीदेवी ने बोनी कपूर से शादी की थी तो उस समय बोनी की पहली पत्नी मोना शौरी कपूर  जिंदा थी। उन्होंने बीमारी के बाद 25 मार्च 2012 को दम तोड़ा। श्रीदेवी से शादी करने के लिए बोनी और मोना में 1996 में ही अलगाव हो गया था। उसी साल 2 जून को बोनी ने श्रीदेवी से शादी की थी। कहा जाता है कि दोनों ने शादी इसलिए की थी क्योंकि श्रीदेवी मां बनने वाली थी। शादी के ठीक 9 माह बाद जहानवी का जन्म हुआ था। कहा जाता है कि श्रीदेवी और बोनी की शादी बैकडेट में दिखाई गई जिससे की जहानवी के जन्म की अवधि को सही दिखाया जा सके। सब कुछ आनन-फानन में हुआ था।



बोनी कपूर की सास सत्ती शौरी, जो फिल्म निर्माता भी थीं, ने श्रीदेवी को लेकर 'फरिश्ते' जैसी मल्टीस्टारर फिल्म बनाई थी। इसमें विनोद खन्ना, रजनीकांत व धर्मेंद्र जैसे सितारे भी थे। सत्ती शौरी ने श्रीदेवी-बोनी की शादी के बाद कहा था कि वे श्रीदेवी को कभी माफ नहीं करेंगी। उन्होंने उनकी बेटी का घर तोड़ा है। अर्जुन कपूर ने कभी श्रीदेवी को अपनी मां नहीं माना। वे उनके पिता की दूसरी पत्नी मात्र थी। श्रीदेवी की दोनों बेटियां उन्हें भाई  मानती हैं लेकिन अर्जुन ने कभी उन्हें अपनी बहनें नहीं माना।

बोनी से पहले श्रीदेवी की शादी मिथुन चक्रवर्ती से भी होते-होते रह गई, लेकिन मिथुन अपनी पहली पत्नी योगिता बाली को छोडऩे के लिए तैयार नहीं हुए। कहा तो यह भी जाता है कि श्रीदेवी व मिथुन ने गुप्त शादी कर ली थी जो बाद में टूट गई। श्रीदेवी के दुर्भाग्य ने उनकी पीछा कभी नहीं छोड़ा। जब वे 'मि. इंडिया' की अपार सफलता के बाद बोनी कपूर की 'रूप की रानी चोरों का राजा' के लिए विदेश में शूटिंग कर रही थीं तो उनके पिता का निधन हो गया था। वे श्रीदेवी का घर बसता नहीं देख पाए। यही नहीं श्रीदेवी की छोटी बहन श्रीलता की शादी भी उनसे पहले हो गई थी और उनका भरा पूरा परिवार है। अगर श्रीदेवी की निजी जिंदगी को श्रापित जीवन कहा जाए तो गलत नहीं होगा।
       
 - हर्ष कुमार सिंह

first published in Navodaya Times , 26 February 2018 



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https://www.navodayatimes.in/news/khabre/night-of-the-life-of-this-moonlight-being-cursed/74792/



Friday, 9 February 2018

DEEP REVIEW : Padman

Rating: 5*
अक्षय कुमार को फिल्म नहीं एक क्रांति के लिए बधाई
“पुरस्कार मिले या न मिले लेकिन अविष्कार होता रहना चाहिए।"  फिल्म में यह डॉयलाग सुपर स्टार अमिताभ बच्चन ने बोला है। और यही फिल्म का सार है। “पैडमैन” उस क्रांति की कहानी कहती है जो अभी देश में शुरू हो रही है और जिसे अभी बहुत लंबा व महत्वपूर्ण सफर पूरा करना है। यह एक ऐसे विषय को बहुत ही सजगता, गंभीरता और डंके की चोट पर उठाती है जिसे अब तक देश में जरूरी विषय माना ही नहीं गया है। हालांकि हम सब पढ़े लिखे लोग पैड्स के महत्व को समझते हैं लेकिन हम भी उस समय बहुत चौंकते जाते हैं जब पता चलता है कि देश की केवल 18 प्रतिशत महिलाएं ही पैड्स का इस्तेमाल करती हैं। इससे भी बुरी बात यह है कि पीरियड्स के दिनों को लेकर आज भी अनेक भ्रांतियां व अंधविश्वास प्रचलित हैं। उनकी तो कोई बात ही नहीं करता। यह फिल्म तो केवल पैड्स की कीमत के मसले को ही हल करने की कोशिश कर रही है जबकि समस्याएं तो इससे कहीं अधिक हैं। एक सत्यकथा से प्रेरित होकर ट्विंकल खन्ना ने अपने पति के सहयोग से फिल्म बनाई और क्या फिल्म बनाई है।

लक्ष्मीकांत चौहान (अक्षय कुमार) को पत्नी गायत्री (राधिका अप्टे) को माहवारी के समय होने वाली दिक्कत का पता चलता है तो वह उसके लिए पैड्स खरीद लाता है। पर पैड इतने महंगे थे कि पत्नी स्वीकार करने से मना कर देती है और गंदा कपड़ा ही प्रयोग करना बेहतर समझती है। चौहान तमाम प्रयास करता है लेकिन सस्ते व सफल पैड नहीं बना पाता। महिलाओं से फीडबैक लेने के चक्कर में बदनाम अलग से हो जाता है। सब उसे चरित्रहीन समझने लगते हैं। बहनें व पत्नी साथ छोड़ देती हैं। मां भी अलग हो जाती है। चौहान सबकी नजर में गिर जाता है और अंत में सम्मान अर्जित करने के लिए घर से निकल लेता है। आखिरकार सफल होता है। सम्मान भी पाता है और ईनाम भी।
फिल्म की विषय जितना गंभीर था उसके लिहाज से आर बल्कि का निर्देशक के रूप में चुनाव एकदम सही है। “पा” और “की एंड का” जैसी संवेदनशील फिल्में बनाने वाले बल्कि ने फिल्म को बहुत ही शिद्दत से बनाया है। विषय से न भटकते हुए वे फिल्म के मूल तत्व को लगातार कहानी के प्रवाह में बनाए रखते हैं। चौहान का किरदार हर समय यही सोचता रहता है कि किस तरह सस्ते सेनेटरी पैड्स बनाए जाएं और यही लगन व इच्छा शक्ति फिल्म की जान है। अक्षय का किरदार दर्शकों के दिलों दिमाग पर इस तरह से छा जाता है कि वे कभी उसकी हरकतों पर हंसते हैं तो कभी तालियां बजाने पर मजबूर हो जाते हैं। पहला हाफ चौहान के संघर्ष की कहानी है तो दूसरे हाफ में उसके उत्कर्ष की दास्तान दिखाई गई है।
मध्यांतर के बाद कई दृश्यों में अक्षय ने कमाल कर दिया है। छोटे-छोटे सीन में उन्होंने अपने अभिनय की रेंज दिखाई है। न्यूयार्क में युनाइटेड नेशंस के दफ्तर में दी गई स्पीच फिल्म का सबसे बेहतरीन सीन है। अंग्रेजी बोलकर वे दिल को छू जाते हैं। इसके अलावा राधिका अप्टे से जुदा होने वाला सीन भी मार्मिक है। राधिका तो खैर हैं ही कमाल की अदाकारा। वे बेहद नेचुरल लगती हैं और किरदार में जीवंत नजर आती हैं। सोनम कपूर ने भी अपने रोल को बढ़िया निभाया है। पात्र के हिसाब से उनका चयन एकदम सही है।


फिल्म में गीत संगीत को केवल आवश्यकता के अनुरूप ही प्रयोग किया गया है और इसलिए फिल्म कहीं से बोझिल नहीं लगती। घटनाक्रम तेजी से घटता रहता है और दर्शक बोर नहीं होते। तकनीकी रूप से फिल्म बहुत ही मजबूत है और लोकेशंस एकदम रीयल होने के कारण बहुत ही मोहक नजर आती हैं। नर्मदा का किनारा और घाट, पुराने जमाने के मकान आदि सब कुछ मोहक लगता है। फिल्म के संवादों की भी तारीफ करनी होगी। एक सीन में सोनम के पिता अक्षय से बात करते हुए कहते हैं - मर्द होने का मजा अपने अंदर की औरत को जगा के ही आता है। यूएन में अक्षय कहते हैं- मैंने आईआईटी नहीं पढ़ी, आईआईटी ने मुझे पढ़ा। अनेक स्थान पर संवादों पर तालियां बजाने का मन करता है। कई स्थान पर व्यंग्य भी करारा है। दिखाया गया है कि महिलाओं को अपना पैड महंगा लगता है लेकिन भगवान को प्रसाद चढ़ाने के लिए वे फट से 51 रुपये दे देती है।

आप सेः

जिस विषय को फिल्म ने उठाया है वह किसी भी सरकारी एजेंडे में नहीं है। जिस तरह से देश में बालिकाओं के लिए हर स्कूल में शौचालय का अभियान प्रधानमंत्री ने चलवाया उसी प्रकार इस मसले को लेकर भी बड़े पैमाने पर काम किए जाने की जरूरत है। इस फिल्म को एक संपूर्ण पारिवारिक फिल्म कहूं तो अतिश्योक्ति नहीं होगी। हालांकि आप व हम सब पढ़े लिखे लोग हैं। हमारे घरों की महिलाएं पीरियड्स की जरूरतों व सेनेटरी पैड्स के प्रयोग को भली भांति समझती हैं लेकिन फिर भी हमें अपने बच्चों व खासतौर से बेटियों के साथ यह फिल्म देखनी चाहिए। जिससे कि वे भी समझ सकें कि हमारे देश में किस-किस तरह की समस्याओं से महिलाओं को गुजरना पड़ता है। हो सकता है फिल्म देखने के बाद आप या आपके बच्चे किसी ऐसे ही अभियान का हिस्सा बनने की प्रेरणा ले लें। इसलिए फिल्म को अवश्य देखें और परिवार के साथ देखें।

समीक्षकों सेः

फिल्म के कई रीव्यू मैंने पढ़े हैं। अच्छे व बुरे सभी प्रकार के। स्टार रेटिंग देने में बड़े-बड़े समीक्षकों ने कंजूसी की है। किसी ने भी 5 स्टार नहीं दिए। पता नहीं हमारे समीक्षकों ने 5 स्टार किस महान फिल्म के लिए बचाकर रखे हुए हैं? मैं फिल्म को 5 स्टार के लायक ही मानता हूं। अगर कोई सर्वश्रेष्ठ नहीं है तो फिर आपको जो उपलब्ध हैं उन्हीं में से बेहतर को चुनना चाहिए। पिछले कुछ साल में कई कमजोर व बेसिर पैर की फिल्मों को 4 स्टार दिए हैं हमारे महान समीक्षकों ने लेकिन “टायलेट एक प्रेम कथा” या “पैडमैन” जैसी फिल्म को देने में झिझक महसूस करते हैं। मेरे हिसाब से यह दोगलापन है। कुछ सराहना तो उस सोच की भी की जानी चाहिए जिसकी वजह से ऐसी फिल्में बनती हैं। अक्षय कुमार व टिवंकल, आप बधाई के पात्र हैं। ऐसी कुछ और फिल्में बनाएं।

- हर्ष कुमार सिंह






Tuesday, 30 January 2018

स्वरा भास्कर के भंसाली को लिखे पत्र का जवाब

स्वरा जी,

सबसे पहले तो बधाई ! आपने जो पत्र संजय लीला भंसाली को लिखा है उसका एक-एक शब्द दिल से लिखा है। आपकी पीड़ा समझ में आती है। तीसरे पैरे में सही मतलब समझ में आया। भंसाली ने बरसों पहले आपको ‘गुजारिश’ में रोल दिया था वो भी छोटा सा। इसके बाद वे आपको भूल ही गए शायद। वैसे भी भंसाली की आदत है कि वे छोटे से छोटे रोल में भी बड़े कलाकारों को लेकर भूल जाया करते हैं। बताइए, ‘पदमावत’ में अदिति राव हैदरी को लिया भी तो एक छोटे से रोल के लिए। शायद उन्हें भी भूल जाएंगे वे। लेकिन इसके बाद भी उनके साथ काम करने वाले कलाकार उनके साथ किए काम का अनुभव कभी नहीं भूल पाते। आपने भी लिखा है कि आप कभी नहीं भूल सकती कि किस तरह से छोटे से छोटे से सीन के लिए भंसाली फिल्म में मगन हो जाते हैं। वे डायरेक्टर ही कमाल के हैं। इसलिए तो उनकी फिल्में देखने के लिए सबसे पहले उनके आलोचक ही भागते हैं।

मेरी समझ में नहीं आता कि आपने ‘पदमावत’ क्यों देखी। सब जानते थे कि रानी पदमावती की कहानी का अंत जौहर पर ही होता है। आपने इतिहास नहीं पढ़ा क्या ? जहां तक मेरी जानकारी है आप दिल्ली में ही पली बढ़ी हैं। जेएनयू जैसे प्रतिष्ठित संस्थान से आपका सीधा ताल्लुक रहा है और वहां कोई भी ऐसा इतिहासकार आपको नहीं मिला जो यह बता सके कि पदमावती की कहानी जौहर के साथ खत्म होती है? इतिहास में जो लिखा हुआ है उसे भंसाली को बदल देना चाहिए था ? जौहर शब्द का अर्थ हिम्मत व साहस से जुड़ा हुआ है। और जिन हालात में यह जौहर हुआ था उन हालात में तो यह हिम्मत का ही काम था। हो सकता है जौहर के समय उन महिलाओं के भाव ऐसे न रहे हों जैसे फिल्म में दिखाए गए हैं। शायद वे विलाप करती हुई आग में कूदी हों। लेकिन अगर ऐसा दिखाया जाता तो क्या उससे महिलाओं का सम्मान बढ़ जाता ?

सही बताऊं, आपने जिस तरह से vagina शब्द का प्रयोग करके अपने खत को सुर्खियों में लाने का प्रयास किया है वह दिखाता है कि दरअसल आपकी मंशा केवल सस्ती लोकप्रियता हासिल करना था। पूरे हिंदुस्तान में और किसी महिला को इस तरह की फीलिंग क्यों नहीं आई? अंग्रेजी में सोचने वालों को ही इस तरह के विचार आते हैं? और बेहतर होता यदि आपने पत्र हिंदी में लिखा होता और vagina शब्द की जगह हिंदी का शब्द प्रयोग किया होता। वैसे मीडिया ने आपके पत्र का हिंदी में तर्जुमा छापा है। उसमें उन्होंने शालीनता दिखाते हुए इसके स्थान पर योनि शब्द का प्रयोग किया है। वैसे vagina के लिए और भी शब्द प्रचलित हैं हिंदी में लेकिन उनका प्रयोग कोई शरीफ आदमी सोशल मीडिया के मंच पर नहीं करना चाहेगा। लेकिन आपने अंग्रेजी शब्द vagina का खुलकर इस्तेमाल किया और जो आप फिल्मों में नहीं कर पा रही हैं वह इस पत्र के माध्यम से कर लिया।

हर अभिनेत्री चाहती है कि लाखों करोड़ों लोग उसके फैन बनें। उसे चाहें, खून से लिखे पत्र भेजें आदि-आदि। कौन हिरोईन नहीं चाहती कि उसे ग्लैमरस रोल करने के लिए मिलें और मुख्य धारा की हिरोईनों में उसे भी प्रियंका चोपड़ा, दीपिका या कैटरीना की तरह गिना जाए। आपने भी तो कोशिश की थी ? Maxim मैगजीन के लिए आपने कुछ साल पहले ये फोटो शूट कराया था। याद है आपको ? फोटो साथ में ही पोस्ट कर रहा हूं।


Maxim मैगजीन जानती हैं किस लिए जानी जाती है ? Nude यानी नग्न तस्वीरों के लिए। फोटो शूट कराने से पहले आपको भी पता होगा इसका ? और महिलाओं की नग्न (और भी शब्द हैं इसके लिए) तस्वीरें छापने के पीछे vagina के अलावा और दूसरा क्या कारण हो सकता है ? या आपको पता नहीं था कि इस तरह का फोटो शूट कराने के बाद उनका क्या इस्तेमाल होगा ? पता होगा आपको जरूर। तभी तो आपने कराया था यह फोटो सेशन। पर अफसोस आपको उससे कुछ लाभ नहीं हो सका। एक भी फिल्म में आपको ऐसा रोल नहीं मिला जिसे देखकर युवा आहें भर सकें। आपको रोल मिला तो ‘प्रेम रतन धन पायो’ में सलमान खान की बहन का। क्या आपको नहीं लगता कि आप इसी तरह के रोल में फिट हैं ?

और हां आपकी एक फिल्म आई थी- अनारकली आफ आरा। इस फिल्म में भी तो सारा लफड़ा vagina के लिए हो रहा था। क्या आपको इस फिल्म का विषय नहीं पता था ? जबकि ये तो एक काल्पनिक कहानी थी। पदमावती तो फिर भी इतिहास में दर्ज एक झूठी सच्ची कहानी है। ऐसे में आपको संजय लीला भंसाली से शिकायत केवल यह हो गई कि उन्होंने जौहर को महिमामंडित कर दिया। जौहर के इस तथाकथित महिमा मंडन को देखकर मुझे तो नहीं लगा कि किसी महिला का मन जौहर के लिए किया होगा। अलबत्ता सिनेमाघर में तालियां जरूर बजती सुनी मैंने। पर यकीन मानिए Maxim के लिए किया गया आपका फोटो शूट जरूर युवकों को vagina की ओर आकर्षित करने की कोशिश था। यह बात और है कि आपको देखकर युवकों को ऐसी भावनाएं कम ही आई होंगी। और यही बात आपको सता रही है शायद।

“You may be wondering why the hell I am going on and on thus about vaginas. Because Sir, that’s what I felt like at the end of your magnum opus. I felt like a vagina. I felt reduced to a vagina–only. I felt like all the ‘minor’ achievements that women and women’s movements have made over the years– like the right to vote, the right to own property, the right to education, equal pay for equal work, maternity leave, the Vishakha judgement, the right to adopt children…… all of it was pointless; because we were back to basics.”

आपके खत का यह पैराग्राफ मुझे बहुत ही आपत्तिजनक लगा। ‘पदमावत’ फिल्म से इन सब बातों का क्या ताल्लुक? क्या आपकी फिल्मों में इन सब सामाजिक समस्याओं को हाईलाइट किया गया था? क्या आपकी आने वाली फिल्म ‘वीरे दि वेडिंग’ महिलाओं की समस्याओं को जोर-शोर से उठाने जा रही है ? नाम से तो ऐसा लगता है कि जैसे शादी ब्याह और नाच गाने में रची बसी कोई कहानी होगी। वैसे आपके हिसाब से शादी क्या है ? सामाजिक रस्म या महिलाओं के उत्थान की कोई मुहीम ? जहां तक मेरा ख्याल है आपके नजरिए से शादी का अंत भी vagina पर ही होता होगा ? सैकड़ों लोग शादी को सेलीब्रेट करने के लिए नहीं बल्कि vagina के लिए ही तो एकत्र होते हैं।

बहरहाल आपका पत्र बहुत बड़ा है और तमाम बातों का जवाब इसी प्रकार दिया भी जा सकता है लेकिन मेरा उद्देश्य कतई आपको अपमानित करना नहीं है। मुझे आप किसी फिल्म में अच्छी नहीं लगी तो इसका मतलब यह नहीं कि मैं आपको अपमानित करूं। मेरे कहने का मतलब केवल यह है कि अगर फिल्मों को हम इस तरह के नजरिए से आंकना शुरू कर देंगे तो आपको सभी अभिनेत्रियां vagina ही नजर आने लगेंगी। जबकि ऐसा है नहीं। हमारी फिल्मों में नायिकाओं ने कई मानदंड स्थापित किए हैं केवल vagina आधारित रोल करके ही। आप 80 के दशक की ‘मंडी’ में शबाना आजमी और स्मिता पाटिल को देख लीजिए या फिर 15 साल पहले आई तब्बू की ‘चांदनी बार’ को देख लीजिए। ‘चांदनी बार’ में तो सब कुछ vagina के लिए ही हो रहा था। फिल्में आपको केवल समाज का एक रूप दिखाती हैं और यह आप पर होता है कि आप उसे स्वीकारें या अस्वीकारें। ‘पदमावत’ को जनता ने स्वीकार किया है और ऐसे में आपका यह विचारोत्तेजक पत्र केवल पब्लिसिटी स्टंट ही नजर आता है।



- हर्ष कुमार सिंह

Thursday, 25 January 2018

DEEP REVIEW : Padmaavat

रणवीर सिंह पर दिलोजान से फिदा है भंसाली की फिल्म 

Rating- 3*

संजय लीला भंसाली की यह चर्चित फिल्म सही मायने में रणवीर सिंह की फिल्म है। हर सीन में रणवीर छाए हुए हैं और जिस सीन में वे मौजूद नहीं रहते वहां भी उनके किरदार की उपस्थिति आपको लगातार महसूस होती रहती है। लगता है ‘बाजीराव मस्तानी’ में रणवीर सिंह से भंसाली ज्यादा ही प्रभावित हो गए और तुरंत उन्हें लेकर अगली फिल्म बना ली। फिल्म पहले ‘पदमवती’ थी बाद में ‘पदमावत’ बनी। यही नाम सही है। पदमावती नाम इस पर ज्यादा फिट नहीं बैठता क्योंकि दीपिका पादुकोण का रोल फिल्म में संक्षिप्त है और कुछेक सीन के अलावा वे पर्दे पर नहीं नजर आती।

हाईलाइट- फिल्म का सबसे विवादित जौहर वाला सीन फिल्म की जान है। इसे भंसाली ने जिस तरह से फिल्माया है वह रोमांचित कर देता है। इसे फिल्म की हाईलाइट कह दूं तो कोई गलत नहीं होगा। इस सीन पर सिनेमाहाल में तालियां बज उठती हैं। अलबत्ता ‘पदमावत’ भंसाली की पूर्व फिल्म ‘बाजीराव मस्तानी’ के स्थापित मानदंडों को नहीं छू पाती है।

संगीत- भंसाली शानदार निर्देशक होने के साथ-साथ संगीत के बहुत जबर्दस्त जानकार हैं। संगीत में वे कितना डूब जाते हैं इसका अंदाज इसी से लगाया जाता है कि पिछली कुछ फिल्मों (गुजारिश के बाद से) का संगीत वे खुद ही देने लगे हैं। पर इस फिल्म का सबसे कमजोर पक्ष यही है। फिल्म का एक भी गीत ऐसा नहीं है जिसे आप गुनगुना सकें या फुरसत मे सुन सकें। पापुलर हो चुका ‘घूमर-घूमर’ गीत देखने में अच्छा लगता है लेकिन आप इसे बार-बार नहीं सुन सकते। फिल्म में संगीत के लिए ज्यादा गुंजाइश नहीं थी लेकिन फिर भी जो भी गीत हैं वे मन को भाते नहीं हैं। अलाउद्दीन खिलजी (रणवीर सिंह) का किरदार फिल्म में भंसाली को कितना प्यारा था इसका अनुमान इसी से लगा सकते हैं कि उन पर दो-दो सोलो गीत फिल्माए गए हैं। दोनों ही गीत बचकाने व साधारण है। किसी में भी मल्हारी जैसी मस्ती नहीं आ पाई। जंग के मैदान में खिलजी के गुलाम द्वारा उनके लिए गीत गाना बहुत ही हास्यास्पद लगता है। गाना भी क्या था समझ से बाहर है। भंसाली का संगीत नौशाद साहब की झलक देता है। ‘बाजीराव मस्तानी’ में ‘मुगले आजम’ की छाप थी तो इसमें ‘मदर इंडिया’ की। घूमर गीत में कोरस एकदम वही है जो ‘मदर इंडिया’ में था। यह उनकी पिछली फिल्मों के मुकाबले हल्की लगती है लेकिन फिर भी इस दौर में आने वाली ‘गोलमाल’, ‘बरेली की बर्फी’, ‘शुभ मंगल सावधान’ और तमाम ऐसी छोटी-बड़ी फिल्में इसके सामने कहीं नहीं टिकती। यह एक बड़े पर्दे की फिल्म है और अगर आपने इसे बड़े पर्दे पर नहीं देखा तो गुनाह करेंगे।
कहानी- अलाउद्दीन खिलजी अपने चाचा को मारकर दिल्ली का बादशाह बन जाता है। एय्याश है। मेवाड़ की रानी पदमावती की सुंदरता की कहानी सुनकर उस पर मुग्ध हो जाता है और मेवाड़ को जीतने के लिए निकल लेता है। उसे हर तरह से हासिल करना चाहता है। पदमावती के पति व मेवाड़ के राजा रतन सिंह से युद्ध करता है और उसे छल कपट से मार देता है। अपनी इज्जत बचाने के लिए पदमावती किले की सैकड़ों महिलाओं के साथ जौहर की आग में कूद जाती हैं और खिलजी के हाथ कुछ नहीं आता।
एक्शन- फिल्म में एक और कमी बहुत अखरती है। वह है शानदार एक्शन की। पूरी फिल्म युद्धों की चुनौती पर टिकी है लेकिन इसके बावजूद एक भी एक्शन सीन जोरदार नहीं बन पाया। ‘बाजीराव मस्तानी’ का वो सीन याद है जब बाजीराव हाथी पर चढ़कर दुश्मन का सिर काटता है, रोंगटे खड़े कर दिए थे उस सीन ने। इस फिल्म में एक भी सीन वैसा नहीं है। कम से कम उस सीन को तो यादगार बनाया जा सकता था जिसमें खिलजी व रतन सिहं भिड़ते हैं।
अभिनय- रणवीर सिंह फिल्म में छाए हुए हैं। कहने के लिए वे विलेन हैं लेकिन दर्शकों को उनका किरदार ही भाता है। रतन सिंह के रोल में शाहिद कपूर पूरी तरह से मिसफिट हैं। उनकी कद काठी बहुत ही हल्की है और वे न तो दीपिका के साथ फिट लगते हैं न ही रणवीर के सामने टिकते हैं। कहने का मतलब यह है कि वे एकदम गलत चुनाव रहे। दीपिका पादुकोण बेहद खूबसूरत लगी हैं और वर्तमान दौर में उनके अलावा यह रोल कोई निभा भी नहीं सकता। वे एकदम सही चुनाव रही लेकिन स्क्रिप्ट ने उन्हें सपोर्ट नहीं किया। बहरहाल जितनी भी फुटेज उन्हें मिली उन्होंने महफिल लूट ली।
निर्देशन- भंसाली का निर्देशन शानदार है और उन्होंने एक भव्य फिल्म बनाई है। सीन बड़े कैनवास पर शूट किए गए हैं और आपको बार-बार चौंका देते हैं। शुरूआती हिस्से में सिंहल देश का सेट बहुत ही आकर्षक लगाया गया है। जौहर वाला सीन का सेट भी भव्य है। कहने का मतलब है कि जाइये और बच्चों के साथ यह फिल्म देख आइए।

- हर्ष कुमार सिंह



Friday, 22 December 2017

DEEP REVIEW : Tiger Zinda Hai

सलमान खान के फैन हैं तो जरूर देखें वरना नहीं!

 Ratings- 2*

'टाइगर जिंदा है' कई तरह की नजीर पेश करने की कोशिश करती है। इसमें संदेश दिया गया है कि यदि भारत और पाकिस्तान एक हो जाएं तो दुनिया की सबसे बड़ी ताकत बन सकते हैं। अमेरिका से भी बड़ी। यही नहीं अगर दोनों देश एक होते और सचिन व अकरम एक ही टीम के लिए खेलते तो सारे विश्व कप इनके पास ही होते। यही नहीं एक जगह तो यह तक कह दिया गया है कि अगर हमारे सारे संगीतकार व गायक भी एक ही साथ गाया करते तो क्या बात होती। यही नहीं इसमें यह भी दिखाया गया है कि पाकिस्तानी आतंकियों को शरण नहीं देता बल्कि उसे यूं ही बदनाम किया जा रहा है। असली आतंकी तो अमेरिका है। वाह क्या बात है!  एकदम नई सोच के साथ बनाई गई फिल्म है। पर जैसे-जैसे आप फिल्म देखते जाते हैं वैसे-वैसे आपको लगने लगता है कि यह तो पिछले कुछ साल में आई 'बेबी', 'एयरलिफ्ट', 'एजेंट विनोद' आदि की तरह ही एक मसाला फिल्म है। 'बेबी' और 'एयरलिफ्ट' तो बहुत ही कमाल की फिल्में थी। इसकी तुलना तो 'एजेंट विनोद' से ही सही रहेगी। अगर इस फिल्म में सलमान खान न होते तो गारंटी देता हूं कि यह फिल्म बाक्स आफिस पर पहले ही दिन ढेर हो जाती। 

बेहद कमजोर स्टोरी लाइन है इस फिल्म की। जो लोग सीरिया और उसके आसपास के देशों में चल रही आतंकी गतिविधियों के बारे में मीडिया में पढ़ते सुनते रहते हैं उन्हें इसमें कोई खास मजा नहीं आएगा। कुछ सच्ची घटनाओं से भी प्रेरणा ली गई है। फिल्म का मुख्य आधार आईएसआईएस (इस्लामिक स्टेट आफ इराक एंड सीरिया) नामक आतंकी संगठन को बनाया गया है। इस ग्रुप का एक आतंकी लीडर अमेरिकी हमले में घायल हो जाता है और अपना इलाज कराने के लिए सीरिया के एक अस्पताल में घुस जाता है और उस पर कब्जा कर लेता है। अस्पताल में 25 हिंदुस्तानी और 15 पाकिस्तानी नर्सें हैं जिन्हें बंधक बना लिया जाता है। एक नर्स भारतीय दूतावास में फोन कर देती है और भारत सरकार इसके लिए एक मिशन चलाने का फैसला करती है। भारत सरकार की एजैंसी रॉ के पास बस एक ही एजेंट है जो ऐसे काम कर सकता है। वो है टाइगर (सलमान)।

'एक था टाइगर' में सलमान अंत में गायब हो गए थे और रॉ के हाथ नहीं आए थे लेकिन वे ईमेल्स के जरिए अपने बॉस (गिरीश कर्नाड) के टच में लगातार थे। यही बताया गया है इस फिल्म में। इसी आधार पर उन्हें ढूंढा जाता है। टाइगर अब अपनी पाकिस्तानी बीवी जोया (कैटरीना) और बेटे के साथ किसी बर्फीले इलाके में रहता है। वहीं उसे ढूंढ लिया जाता है और मिशन पर भेज दिया जाता है। बाद में जोया भी पाकिस्तानी लड़कियों को बचाने के लिए इस मिशन में साथ हो जाती है। और इस तरह शुरू होता है भारत-पाकिस्तान का अद्भुत मिशन। देखिये उन लड़कियों को छुड़ाने के लिए कितना बचकाना प्लान बनाया जाता है। सभी तेल रिफाईनरी में मजदूर बनकर भर्ती होते हैं और एक नकली आग लगने का हादसा गढ़ते हैं जिसमें वे झुलस जाएं और फिर इलाज के लिए उन्हें उसी अस्पताल में ले जाया जाए जिसमें नर्स बंधक हैं। सब कुछ मजाक नजर आता है। बहरहाल मिशन पूरा होता है और अंत में टाइगर व जोया फिर गायब हो जाते हैं जिससे एक और सीक्वल बनाने के आप्शन खुले रहें। और अब तो फिल्म जमकर पैसा कमा रही है। ऐसे में तो इसका सीक्वल बनना लाजिमी है।

अगर फिल्म को रोमांचक ही बनाना था तो केवल अस्पताल में घुसने व फिर सबको बाहर निकालने की ही प्लॉटिंग की जानी चाहिए थी लेकिन निर्देशक-लेखक ने ऐसा ताना बाना बुना है कि आम आदमी तो समझ ही नहीं पाता कि हो क्या रहा है। बहरहाल दर्शक केवल इसलिए फिल्म देखते रहते हैं कि जब-जब सलमान खान स्क्रीन पर आते हैं तो कुछ रोमांचक होता है और बोरियत दूर हो जाती है। सलमान की फिल्मों में इमोशन बहुत अहम होते हैं लेकिन इस फिल्म में ऐसा कुछ नहीं है। 'बजरंगी भाईजान' या फिर 'सुल्तान' वाली बात इसमें नहीं है। हां यह फिल्म 'ट्यूबलाइट' से बेहतर है और कई हफ्ते से लोग किसी बड़ी फिल्म को देखने के लिए तरस रहे थे और इसलिए इसे देख रहे हैं।

फिल्म का संगीत अच्छा है लेकिन गीतों का उपयोग सही नहीं किया जा सका है। एक गीत शुरू में ही आ जाता है इसका सबसे हिट गीत 'स्वैग से करेंगे स्वागत' अंत में टाइटल्स के साथ आता है। बाकी गीतों का पता नहीं क्या हुआ, वे कब आए और कैसे आए? सलमान और अली अब्बास जफर की जोड़ी ने 'सुल्तान' के रूप में ब्लॉकबस्टर दी थी लेकिन 'टाइगर जिंदा है' कहीं भी टिक नहीं पाती है उसके सामने। सलमान के लिए न इसमें इमोशन दिखाने का मौका था न कॉमेडी दिखाने का। एक्शन ही एक्शन है और वो भी ऐसा नहीं कि जो आपने पहले न देखा हो। इसे आप देख सकते हैं केवल सलमान के लिए। बाकी फिल्म में कुछ नहीं है।


-हर्ष कुमार सिंह

Saturday, 23 September 2017

DEEP REVIEW: Newton

सफल होने के तमाम गुणों से भरपूर है ‘न्यूटन’

Rating- 5*

‘न्यूटन’ को आस्कर के लिए चुने जाने का फिल्म को जबर्दस्त लाभ होने जा रहा है। इसे व्यवसायिक सफलता मिलने जा रही है। मैंने यह फिल्म रिलीज के एक दिन बाद नई दिल्ली के मिराज सिनेमा (पूर्व नाम अजंता), सुभाष नगर में मौजूद, में देखी जो अब डबल स्क्रीन बन चुका है। 90 के दशक में इस सिनेमा को दिल्ली के सबसे बड़े (सीटों के हिसाब से) सिनेमाघरों में गिना जाता था। इसमें ‘अग्निपथ’ व ‘लव लव लव’ जैसी फिल्में कालेज के समय में हमने देखी थी। इसमें लगभग एक हजार लोग एक साथ बैठ जाया करते थे। अभी भी इसकी दोनों स्क्रीन काफी विशाल हैं। ‘न्यूटन’ जैसी फिल्म को दिल्ली में मुश्किल से 20-25 स्क्रीन मिल पाई हैं। ऐसे में मजबूरी में यह फिल्म मिराज में देखनी पड़ी। फिल्म शुरू होने के दस मिनट बाद अंदर घुसा और देखकर दंग रह गया कि ऑडी में सारी सीटें फुल थी। यानी हाउसफुल। ये आज के दौर में दुर्लभ नजारा है। इतनी बड़ी-ब़ड़ी फिल्में हाल फिलहाल देखी हैं लेकिन ‘बाहुबली’ व इससे पहले ‘बाजीराव मस्तानी’ के अलावा किसी में भी सीटें फुल नहीं नजर आई। ‘न्यूटन’ जैसी फिल्म में हाउसफुल मिलना सुखद आश्चर्य से कम नहीं था। दरअसल फिल्म रिलीज होने के दिन ही फिल्म को आस्कर के लिए भारत की एंट्री घोषित कर दिया गया और फिल्म को वो प्रचार मिल गया जो करोड़ों खर्च के भी नहीं मिल पाता।
बहरहाल फिल्म में भीड़ की वजह केवल आस्कर ही नहीं है बल्कि फिल्म को बनाया भी गया है बहुत ही गंभीरता से। बस आस्कर के लिए नामांकित हो जाने से इसके बारे में लोग जान गए और इसे अब ज्यादा दर्शक मिल जाएंगे जो सही बात है। ऐसी फिल्में ज्यादा से ज्यादा बड़े वर्ग तक पहुंचनी चाहिए। फिल्म में किसी भी मुद्दे पर भाषणबाजी नहीं की गई है। सकारात्मक व निष्पक्ष तरीके से निर्देशक अमित मसुरकर ने लोकतंत्र में मतदान की अहमियत को दिखाने का प्रयास किया है और वे अपना संदेश देने में सफल रहे हैं। कहानी इस तरह से है- नूतन उर्फ न्यूटन कुमार (राजकुमार राव) एक सरकारी मुलाजिम है और पूरी तरह से अपने काम के प्रति सजग व ईमानदार है। नक्सली इलाके (सुकमा, छत्तीसगढ़) में एक 76 मतदाताओं के बूथ पर निष्पक्ष मतदान कराने का जिम्मा उन्हें सौपा जाता है। वे अर्धसैनिक बलों की टुकड़ी के साथ पोलिंग बूथ पर जाते हैं और तमाम मुश्किलों के बीच वोट डलवाने में सफल रहते हैं। हालांकि जिस तरीके से मतदान सैनिक कराते हैं उससे वे सहमत नहीं थे लेकिन फिर भी आधे लोग मतदान कर देते हैं। बस इसके बाद सब लोग वापस लौट जाते हैं और अपने-अपने काम में लग जाते हैं।

 फिल्म की खासियत यह है कि इसमें किसी भी प्रकार का उपदेश नहीं दिया गया है। नक्सल प्रभावित व दूर दराज के इलाकों में चुनावी प्रक्रिया कैसे होती है और चुनाव प्रणाली के बारे में वहां के आदिवासी लोगों को कितनी जानकारी है इसकी तस्वीर फिल्म में बहुत ही ईमानदारी से खींची गई है। शानदार स्क्रीनप्ले व डायलाग हैं जो व्यवस्था पर व्यंग्य करने के साथ-साथ दर्शकों को गुदगुदाते भी रहते हैं। उदाहरण के तौर पर वह सीन जिसमें सैन्य अफसर यह कहता है- मैं लिखकर देता हूं कि कोई वोट डालने नहीं आएगा। इस पर पीठासीन अधिकारी का दायित्व निभा रहे राजकुमार राव उसके सामने कागज-पेन रखते हैं और कहते हैं लिखो। इस सीन पर दर्शक तालियां बजाने को मजबूर हो जाते हैं। फिल्म में एकमात्र महिला किरदार के रूप में एक आदिवासी टीचर को भी पोलिंग टीम में दिखाया गया है जो अपने क्षेत्र की समस्याओं से भी अवगत कराती रहती है। मतदानकर्मियों में से एक रघुबीर यादव हैं जो अच्छी कॉमेडी करते हैं। उनकी कॉमेडी भी व्यंग्य से भरी हुई है और कई मौकों पर चोट करने में सफल रहती है। फिल्म में नक्सली इलाकों में तैनात सैनिकों की समस्या भी उठाई गई है जो सुविधाओं के अभाव में वहां रहते हैं। जिनकी तनख्वाह बहुत कम होती है, आधुनिक हथियारों की कमी है।


कुल मिलाकर फिल्म एक संदेश देती है। संदेश यह है कि देश में आज भी ऐसे इलाके भी हैं जहां लोगों को अपने मताधिकार के बारे में नहीं पता है। उनका प्रत्याशी कौन है लोग यह भी नहीं जानते। इसलिए जब न्यूटन उनसे कहता है कि उनका चुना हुआ प्रतिनिधि दिल्ली में जाकर उनकी बात कहेगा तो वे अपने सरपंच को ही भेजने की बात करने लगते हैं। यह अच्छी बात है कि ऐसी फिल्म को लोग देख रहे हैं। इसी हफ्ते रिलीज हुई ‘भूमि’ जैसी बड़ी फिल्म से यह कई गुना बेहतर है। इसमें ‘टायलेट-एक प्रेम कथा’ की तरह से व्यवसायिक लटके झटके तो नहीं हैं लेकिन संदेश देने के मामले में यह उससे कहीं कम नहीं है। इसे देखें और पूरे परिवार के साथ देखें, यकीन मानिए पैसे व्यर्थ नहीं जाएंगे।

- हर्ष कुमार सिंह

Watch : Deep Review of Newton 


Friday, 22 September 2017

DEEP REVIEW : Bhoomi

बदले की कहानी है संजय दत्त की कमबैक फिल्म

Rating- 2*

'भूमि' फिल्म के उस हिस्से की विशेष रूप से तारीफ होनी चाहिए जिसमें उसने बलात्कार करने वाले नाबालिग आरोपी की उम्र को लेकर सवाल खड़े किए हैं। दिखाया गया है कि अफगानिस्तान, सऊदी अरब, ईरान व कोरिया जैसे देशों में ऐसे आरोपी को कितनी बेरहमी से मारा जाता है। जबकि हमारे देश में उसे सुधार गृह भेजा जाता है। यहां तक की उसे क्षमायाचना का भी प्रावधान है। फिल्म के इस हिस्से को छोड़ दिया जाए तो 'भूमि' फिल्म कहीं भी रेप के मुद्दे पर कोई बहस शुरू करती नहीं नजर आती। यह एक बदले की कहानी है जिसमें एक पिता अपनी बेटी के बलात्कारियों को मौत के घाट उतारता है।

कुछ महीने पहले रवीना टंडन की 'मातृ' व श्रीदेवी की 'मॉम' में जो दिखाया गया था उससे इसमें कुछ भी अलग नहीं दिखाया गया है। बल्कि अगर इन्हें रैंक किया जाए तो 'भूमि' का नंबर तीसरा ही होगा। श्रीदेवी की फिल्म इन सबसे ज्यादा संवेदनशील थी। 'भूमि' की बस एक ही खासियत है कि इसमें संजय दत्त वापसी कर रहे हैं। उनके फैंस इसे देख सकते हैं। जेल से बाहर आने के बाद यह उनकी पहली फिल्म है और लगता है कि निर्देशक ओमंग कुमार इसे कैश कराना चाहते थे। उन्होंने फटाफट कहानी गढ़ी और संजय दत्त को सुना दी। फिल्म भी जल्दबाजी में शूट की गई है। ओमंग कुमार फिल्म जल्दी बनाने में एक्सपर्ट हैं। तीन साल में उनकी तीसरी फिल्म है। पहले 'मैरीकॉम', फिर 'सरबजीत' और अब 'भूमि'। और यकीन मानिए जो मौलिकता उनकी 'मैरीकॉम' में थी वह बाकी किसी में नहीं नजर आई। 'भूमि' तो उनकी सबसे कमजोर फिल्म है।
कहानी आगरा की दिखाई गई है। बार-बार ताजमहल दिखाया जाता है लेकिन इसका फिल्म से कोई ताल्लुक नहीं है। अरुण (संजय दत्त) जूते का काम करता है लेकिन यह नहीं साफ किया गया है कि क्या वह मोची (या दलित बिरादरी का) है? उनके रहन सहन को देखकर तो यह नहीं लगता। वैसे आगरा में बहुत से दूसरा जातियों के जूता व्यवसायी भी हैं। भूमि (अदिति राव हैदरी) संजय की बेटी है जिसे वह बहुत प्यार करते हैं। शुरू की आधा घंटे की फिल्म में तो यही दिखाने की कोशिश की गई है कि वे अपनी बेटी से कितना प्यार करते हैं। यह हिस्सा बहुत ही बोर करता है। अदिति के अपने प्रेमी (कोई नया हीरो) के साथ दो गाने भी इसी हिस्से में दिखा दिए गए हैं लेकिन कोई भी गीत ऐसा नहीं है जो आप याद रख सकें। इसके बाद वही कहानी शुरू हो जाती है जो रेप के मामलों में दिखाई जाती रही है। चार लोग भूमि से रेप करते हैं। उसकी शादी भी टूट जाती है। पुलिस व कानून कुछ नहीं कर पाते और अंत में संजय दत्त व अदिति खुद ही बदला लेने की ठान लेते हैं। बदला लेने का कहानी भी बेहद घिसी पिटी हुई है। या यूं कहें कि बहुत ही कमजोर है। संजय इतनी आसानी से सब को मार डालते हैं कि बस पूछिए मत। पुलिस भी उनकी मदद करने लगती है। इससे पहले 'मातृ' व 'मॉम' में भी पुलिस को मददगार दिखाया गया था।
संजय दत्त इस फिल्म में बुजुर्ग नजर आते हैं जो उनकी उम्र के हिसाब से सही है। एक जवान बेटी के पिता वे असली जीवन में भी हैं और यहां भी उसके लिए उपयुक्त नजर आते हैं। वैसे जेल से आने के बाद संजय दत्त ने अपने शरीर पर मेहनत नहीं की और उनका पेट बाहर निकला नजर आता है। वे उतने फिट भी नहीं दिखे। एक्शन सींस में वे उतने प्रभावशाली नहीं नजर आए। कुछ सींस में उन्होंने अभिनय अच्छा किया है। अदालत में अपनी बेटी के समर्थन में आवाज उठाना और शराब पीकर मोहल्ले के लोगों को धिक्कारने वाले सीन में उन्होंने प्रभावित किया है। अदिति राव हैदरी अच्छी कलाकार हैं। आंसू बहाने का काम उन्हें मिला था जिसे वे अच्छी तरह से निभा गई हैं। कोई और अभिनेत्री होती तो वह भी यही करती। उन्हें केवल आंसू बहाने थे और 'बेचारी बेटी' की भूमिका निभानी थी और इसमें वे सफल रही हैं। हां लंबे समय बाद शेखर सुमन को बड़े पर्दे पर देखकर अच्छा लगा। संजय के दोस्त ताज की भूमिका उन्होंने बढिय़ा निभाई है। बाकी कलाकार औसत हैं।
ऐसे गंभीर विषयों पर फिल्म बनाने के लिए अच्छे डायलाग व संगीत की जरूरत होती है और इसमें ये दोनों ही गायब हैं। ओमंग कुमार ने 'सरबजीत' की तरह इसमें भी इन पर ध्यान नहीं दिया। सबसे गलत बात तो यह लगी जब इंटरवल के एकदम बाद सन्नी लियोनी का वाहियात आयटम सांग ठूंस दिया। इसकी कतई जरूरत नहीं थी। न गीत समझ में आया कि क्या है और न ही सनी लियोनी का डांस? इससे फिल्म केवल कमजोर व लंबी ही हुई। फोटोग्राफी कुछ हिस्सों में अच्छी है। खासतौर से क्लाइमेक्स में राजस्थान की बावड़ी का सीन बहुत ही बढिय़ा पिक्चराइज किया गया है। लगता है ओमंग कुमार ने फिल्म के निर्माण के दौरान इसमें चेंज भी किए तभी तो श्राद्ध व नवरात्र की टाइमिंग सही बैठी है। अभी एक ही दिन पहले नवरात्र शुरू हुए हैं और फिल्म के क्लाइमेक्स में जय माता दी की गूंज सुनाई गई है।
कुल मिलाकर फिल्म प्रभावित नहीं करती। परिवार के साथ आप इसे देखेंगे तो समय खराब होगा और न आप अपने परिवार को मनोरंजन कर पाएंगे और ना ही कोई सीख हासिल करा पाएंगे।

- हर्ष कुमार सिंह 


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