Thursday, 25 January 2018

DEEP REVIEW : Padmaavat

रणवीर सिंह पर दिलोजान से फिदा है भंसाली की फिल्म 

Rating- 3*

संजय लीला भंसाली की यह चर्चित फिल्म सही मायने में रणवीर सिंह की फिल्म है। हर सीन में रणवीर छाए हुए हैं और जिस सीन में वे मौजूद नहीं रहते वहां भी उनके किरदार की उपस्थिति आपको लगातार महसूस होती रहती है। लगता है ‘बाजीराव मस्तानी’ में रणवीर सिंह से भंसाली ज्यादा ही प्रभावित हो गए और तुरंत उन्हें लेकर अगली फिल्म बना ली। फिल्म पहले ‘पदमवती’ थी बाद में ‘पदमावत’ बनी। यही नाम सही है। पदमावती नाम इस पर ज्यादा फिट नहीं बैठता क्योंकि दीपिका पादुकोण का रोल फिल्म में संक्षिप्त है और कुछेक सीन के अलावा वे पर्दे पर नहीं नजर आती।

हाईलाइट- फिल्म का सबसे विवादित जौहर वाला सीन फिल्म की जान है। इसे भंसाली ने जिस तरह से फिल्माया है वह रोमांचित कर देता है। इसे फिल्म की हाईलाइट कह दूं तो कोई गलत नहीं होगा। इस सीन पर सिनेमाहाल में तालियां बज उठती हैं। अलबत्ता ‘पदमावत’ भंसाली की पूर्व फिल्म ‘बाजीराव मस्तानी’ के स्थापित मानदंडों को नहीं छू पाती है।

संगीत- भंसाली शानदार निर्देशक होने के साथ-साथ संगीत के बहुत जबर्दस्त जानकार हैं। संगीत में वे कितना डूब जाते हैं इसका अंदाज इसी से लगाया जाता है कि पिछली कुछ फिल्मों (गुजारिश के बाद से) का संगीत वे खुद ही देने लगे हैं। पर इस फिल्म का सबसे कमजोर पक्ष यही है। फिल्म का एक भी गीत ऐसा नहीं है जिसे आप गुनगुना सकें या फुरसत मे सुन सकें। पापुलर हो चुका ‘घूमर-घूमर’ गीत देखने में अच्छा लगता है लेकिन आप इसे बार-बार नहीं सुन सकते। फिल्म में संगीत के लिए ज्यादा गुंजाइश नहीं थी लेकिन फिर भी जो भी गीत हैं वे मन को भाते नहीं हैं। अलाउद्दीन खिलजी (रणवीर सिंह) का किरदार फिल्म में भंसाली को कितना प्यारा था इसका अनुमान इसी से लगा सकते हैं कि उन पर दो-दो सोलो गीत फिल्माए गए हैं। दोनों ही गीत बचकाने व साधारण है। किसी में भी मल्हारी जैसी मस्ती नहीं आ पाई। जंग के मैदान में खिलजी के गुलाम द्वारा उनके लिए गीत गाना बहुत ही हास्यास्पद लगता है। गाना भी क्या था समझ से बाहर है। भंसाली का संगीत नौशाद साहब की झलक देता है। ‘बाजीराव मस्तानी’ में ‘मुगले आजम’ की छाप थी तो इसमें ‘मदर इंडिया’ की। घूमर गीत में कोरस एकदम वही है जो ‘मदर इंडिया’ में था। यह उनकी पिछली फिल्मों के मुकाबले हल्की लगती है लेकिन फिर भी इस दौर में आने वाली ‘गोलमाल’, ‘बरेली की बर्फी’, ‘शुभ मंगल सावधान’ और तमाम ऐसी छोटी-बड़ी फिल्में इसके सामने कहीं नहीं टिकती। यह एक बड़े पर्दे की फिल्म है और अगर आपने इसे बड़े पर्दे पर नहीं देखा तो गुनाह करेंगे।
कहानी- अलाउद्दीन खिलजी अपने चाचा को मारकर दिल्ली का बादशाह बन जाता है। एय्याश है। मेवाड़ की रानी पदमावती की सुंदरता की कहानी सुनकर उस पर मुग्ध हो जाता है और मेवाड़ को जीतने के लिए निकल लेता है। उसे हर तरह से हासिल करना चाहता है। पदमावती के पति व मेवाड़ के राजा रतन सिंह से युद्ध करता है और उसे छल कपट से मार देता है। अपनी इज्जत बचाने के लिए पदमावती किले की सैकड़ों महिलाओं के साथ जौहर की आग में कूद जाती हैं और खिलजी के हाथ कुछ नहीं आता।
एक्शन- फिल्म में एक और कमी बहुत अखरती है। वह है शानदार एक्शन की। पूरी फिल्म युद्धों की चुनौती पर टिकी है लेकिन इसके बावजूद एक भी एक्शन सीन जोरदार नहीं बन पाया। ‘बाजीराव मस्तानी’ का वो सीन याद है जब बाजीराव हाथी पर चढ़कर दुश्मन का सिर काटता है, रोंगटे खड़े कर दिए थे उस सीन ने। इस फिल्म में एक भी सीन वैसा नहीं है। कम से कम उस सीन को तो यादगार बनाया जा सकता था जिसमें खिलजी व रतन सिहं भिड़ते हैं।
अभिनय- रणवीर सिंह फिल्म में छाए हुए हैं। कहने के लिए वे विलेन हैं लेकिन दर्शकों को उनका किरदार ही भाता है। रतन सिंह के रोल में शाहिद कपूर पूरी तरह से मिसफिट हैं। उनकी कद काठी बहुत ही हल्की है और वे न तो दीपिका के साथ फिट लगते हैं न ही रणवीर के सामने टिकते हैं। कहने का मतलब यह है कि वे एकदम गलत चुनाव रहे। दीपिका पादुकोण बेहद खूबसूरत लगी हैं और वर्तमान दौर में उनके अलावा यह रोल कोई निभा भी नहीं सकता। वे एकदम सही चुनाव रही लेकिन स्क्रिप्ट ने उन्हें सपोर्ट नहीं किया। बहरहाल जितनी भी फुटेज उन्हें मिली उन्होंने महफिल लूट ली।
निर्देशन- भंसाली का निर्देशन शानदार है और उन्होंने एक भव्य फिल्म बनाई है। सीन बड़े कैनवास पर शूट किए गए हैं और आपको बार-बार चौंका देते हैं। शुरूआती हिस्से में सिंहल देश का सेट बहुत ही आकर्षक लगाया गया है। जौहर वाला सीन का सेट भी भव्य है। कहने का मतलब है कि जाइये और बच्चों के साथ यह फिल्म देख आइए।

- हर्ष कुमार सिंह



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