सितंबर माह शुरू हो चुका है और 2018 खत्म होने में तीन महीने ही बाकी हैं लेकिन बालीवुड के लिहाज से यह साल बहुत ज्यादा उत्साहजनक नहीं रहा है। कई फिल्मों ने 100 करोड़ के क्लब को ज्वाइन किया लेकिन वे इसके लायक नहीं थी। वीकेंड कलेक्शन और उनके स्टार्स के दम पर फिल्में धंधा कर ले गई। कुछ फिल्में ऐसी थी जिन्हें लोगों ने पंसद किया लेकिन वे पैसा नहीं कमा पाई। साल की टॉप टेन फिल्में छानने की कोशिश की तो यकीन मानिए 5 फिल्में ही ऐसी ढूंढ पाया जो लोगों को पसंद भी आई और पैसा भी कमाने में सफल रही। उन्हीं के रीव्यू एक बार फिर आपकी नजर कर रहा हूं-
1. पदमावतः
साल की सबसे बड़ी फिल्म का रीव्यू पढ़ने के लिए क्लिक करें-
3. सोनू के टीटू की स्वीटीः
युवा पीढ़ी की एक बोल्ड व मस्त फिल्म जिसने नुसरत भरूचा व कार्तिक आर्यन को स्टार बना दिया। मेरा रीव्यू- हसांती, गुदगुदाती, नचाती, रुलाती फिल्म।
साल में 5 या 6 फिल्में ही ऐसी आती हैं जिन्हें आप बार-बार देख सकते हैं। दर्शक वीकेंड में एक ऐसी फिल्म का इंतजार करते हैं जिसमें वे परिवार के साथ कुछ घंटे बिता सकें। फिल्म जरा सी औसत भी होती है तो भी लोग देख लेते हैं। पिछले दिनों रिलीज हुई ‘गोल्ड’ व ‘सत्यमेव जयते’ जैसी दोयम दर्जे की फिल्में 100 करोड़ के आसपास का कारोबार इसलिए कर ले रही हैं क्योंकि ये कम से कम टाइम पास फिल्में तो हैं ही। निर्देशक कबीर खान का कहना है कि बालीवुड में अच्छी स्क्रिप्ट का अकाल है। उनकी बात एकदम सही है। कहानी में जरा सी भी कुछ नयापन हो तो लोग फिल्म देख ही लेते हैं। ‘स्त्री’ भी एक ऐसी ही फिल्म है।
Rating 2*
‘स्त्री’ वैसे तो अंधविश्वास को बढ़ावा देने वाली फिल्म है लेकिन जिस प्रकार निर्देशक अमर कौशिक ने इसे पेश किया है उससे यह एक हॉरर कॉमडी बन गई है। थोड़ा हंस लिए लोग इसलिए फिल्म मनोरंजक बन गई और अच्छा खासा पैसा कमा रही है। इतना पैसा कि जितना किसी ने उम्मीद भी नहीं की थी। राजकुमार राव कोई सुपर स्टार नहीं हैं और न ही श्रद्धा कपूर के नाम से दर्शक खिंचे चले आते हैं। फिर भी फिल्म क्यों अच्छी चल रही है। देखिए मेरा रीव्यूः-
अक्षय कुमार के बारे में एक बात जरूर कहना चाहूंगा। बहुत अच्छे अभिनेता
नहीं होने के बावजूद उनके अंदर विषय को पहचान लेने की बहुत ही अच्छी क्षमता
है। उनके समकालीन शाहरुख खान, अजय देवगन आदि के साथ ऐसा नहीं है। अक्षय
समझ लेते हैं कि किस फिल्म से दर्शक आसानी से कनेक्ट हो सकते हैं। एक तरफ
तो वे 'हाउसफुल' जैसी माइंडलैस कॉमेडी करते हैं वहीं दूसरी ओर उनकी
सब्जेक्ट आधारित फिल्मों की लिस्ट देखिए बहुत लंबी है।
Rating 3*
मैंने पहले भी कहा है कि खेलों पर आधारित फिल्में दर्शकों से सीधे कनेक्ट हो जाती हैं। फिल्म किसी भी खेल पर बनी हो लेकिन उसका देशप्रेम से सीधा नाता हो जाता है। यानी डबल इमोशनल। फिर 'गोल्ड' तो आजादी के बाद भारत के पहले ओलंपिक गोल्ड मैडल जीतने के अभियान से जुड़ी हुई है। यहां तो और भी ज्यादा भावनाएं उमड़ पडऩा लाजिमी था। भारत कभी हाकी में दुनिया की सबसे बड़ी ताकत रहा है यह तो सब जानते होंगे लेकिन आजादी से पहले जीते दो स्वर्ण पदक व आजादी के बाद मिली जीतों के फर्क को ज्यादा लोग समझ नहीं सकते। भारत ने आखिरी बार ओलंपिक गोल्ड 1980 के मास्को ओलंपिक में जीता था और उस समय अमेरिकी व उसके समर्थक देशों ने बायकाट किया हुआ था। इसलिए उसे ज्यादा महत्व नहीं दिया जाता।
खैर मेरा मानना है कि फिल्म का प्लाट जानदार है और इस पर एक बहुत शानदार फिल्म बननी तय थी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। रीमा कागती ने यह बहुत बड़ा अवसर खो दिया। शानदार विषय को कमजोर निर्देशन की वजह से बेकार कर दिया गया। रीमा कागती ने इससे पहले 'हनीमून ट्रैवल्स लि.' व 'तलाश' फिल्में बनाई हैं। दोनों ही बुरी तरह से फेल रही थी। 'तलाश' तो पिछले 15 साल में आमिर खान की एकमात्र फ्लॉप फिल्म है। रीमा कागती लकी हैं कि उन्हें फरहान अख्तर व रीतेश सिडवानी जैसे निर्माता मिले जिन्होंने उन्हें एक और अवसर दे दिया। शायद यहां सब्जेक्ट विनर था। उन्हें लग रहा था कि इस पर 'चक दे इंडिया' जैसी फिल्म बन जाएगी। इसलिए शायद उन्होंने 'चक दे इंडिया' को बार-बार देखा भी। बस यहीं गड़बड़ हो गई। फिल्म को 'चक दे इंडिया' बनाने के चक्कर में रीमा मात खा गईं। फिल्म में देश, धर्म, क्षेत्रवाद, हाकी फेडरेशन की राजनीति आदि का ऐसा घालमेल उन्होंने किया कि फिल्म अपने मूल विषय से भटक गई। फिल्म के क्लाईमैक्स को छोड़ दिया जाए तो फिल्म कहीं भी बांध नहीं पाती है।
अक्षय कुमार के बारे में एक बात जरूर कहना चाहूंगा। बहुत अच्छे अभिनेता नहीं होने के बावजूद उनके अंदर विषय को पहचान लेने की बहुत ही अच्छी क्षमता है। उनके समकालीन शाहरुख खान, अजय देवगन आदि के साथ ऐसा नहीं है। अक्षय समझ लेते हैं कि किस फिल्म से दर्शक आसानी से कनेक्ट हो सकते हैं। एक तरफ तो वे 'हाउसफुल' जैसी माइंडलैस कॉमेडी करते हैं वहीं दूसरी ओर उनकी सब्जेक्ट आधारित फिल्मों की लिस्ट देखिए बहुत लंबी है। 'बेबी', 'पैडमेन', 'टायलेट एक प्रेम कथा', 'रुस्तम', 'एयरलिफ्ट' आदि आदि।
शायद ये फिल्म भी अक्षय ने यह समझकर साइन कर ली कि सब्जेक्ट बढिय़ा है। इसमें अक्षय की कोई गलती नहीं। हालांकि जब फिल्म बन रही थी तो उन्हें इसका आभास होना चाहिए था कि कहां गलती हो रही है। कम से कम फिल्म की फाइनल कॉपी देखकर उन्हें वे दो गीत तो जरूर निकलवा देने चाहिए थे जिसमें वे शराब पीकर क्लब में नाचते हैं। फिल्म छोटी भी हो जाती और अक्षय का कैरेक्टर भी बैलेंस हो जाता। यकीन मानिए तपनदास (अक्षय कुमार) के किरदार का खराब चरित्र चित्रण इस फिल्म की सबसे बड़ी कमजोरी है। उसे शराबी, जुआरी, सट्टेबाज, बीवी (मौनी रॉय) से पिटने वाला, झूठा और न जाने क्या-क्या दिखा दिया गया है। फिल्म ने बॉक्स आफिस पर ओपनिंग अच्छी ली है लेकिन यदि निर्देशक ने थोड़ी मेहनत की होती तो यह फिल्म बहुत बड़ी हिट हो सकती थी।
कहानी आपको पहले ही बता चुका हूं लेकिन फिर भी बता देता हूं। भारत आजादी से पहले बर्लिन ओलंपिक में गोल्ड मेडल जीतता है तो टीम व उसके असिस्टेंट मैनेजर को लगता है कि यह जीत तो ब्रिटिश सरकार के नाम गई। तपनदास सपना देखता है कि एक दिन उसकी टीम आजाद भारत में भी गोल्ड जीतेगी। अगले दो ओलंपिक विश्व युद्ध की भेंट चढ़ जाते हैं। 1948 के ओलंपिक लंदन में होने तय होते हैं तो तपनदास फिर से टीम जुटाने लगता है। काफी मेहनत के बाद जब टीम तैयार होने वाली होती है तो देश का बंटवारा हो जाता है और आधी टीम पाकिस्तान चली जाती है। तपन फिर से प्रयास करता है तमाम कठिनाइयों के बाद आखिरकार भारत गोल्ड जीतने में सफल रहता है।
फिल्म की कहानी ठीक-ठाक है और स्क्रीनप्ले में भी कोई कमी नहीं है बस निर्देशन में खराबी है। कुछ सीन बहुत ही जल्दी में शूट किए गए हैं। मैदान में ईंटें एक ओर से दूसरी ओर रखने वाला सीन यदि गंभीरता से फिल्माया गया होता यह बड़ा संदेश दे सकता था। किसी भी सीन की आत्मा में निर्देशक घुस नहीं पाई हैं।
इसके अलावा फिल्म का संगीत बहुत ही कमजोर है। ऐसी फिल्मों में संगीत का अच्छा होना भी जरूरी है। अक्षय की फिल्मों में एकाध गीत जरूर अच्छा होता है लेकिन यहां कोई भी गीत यादगार नहीं है। शराब पीकर बंगाली तपनदास जब पंजाबी गीत पर भंगड़ा करता है तो बहुत ही बेहूदा लगता है। संवाद खराब हैं। अच्छे संवाद भी फिल्म को मजबूती देते हैं। अभिनय में अक्षय कुमार ने हमेशा की तरह अच्छा काम किया है। मौनी रॉय को पहली बार बड़ा ब्रेक मिला है लेकिन वे प्रभावित नहीं करती। उनके बड़े बड़े होंठ अजीब लगते हैं। इस मामले में टायलेट में भूमि पेढनेकर ने कमाल किया था। साधारण नैन नक्श होने के बाद भी झंडे गाड़ दिए थे।
कुल मिलाकर यह फिल्म केवल एक बार देखी जा सकती है। यह तो इस फिल्म की किस्मत है कि 15 अगस्त की रिलीज की वजह से इसे अच्छी ओपनिंग मिली और इसके सामने 'सत्यमेव जयते' जैसी कमजोर फिल्म है नहीं तो इसका बाक्स आफिस कलेक्शन ज्यादा अच्छा नहीं रह पाता। वीकेंड पर टाइम पास करना चाहते हैं तो यह फिल्म बुरी नहीं है।
- हर्ष कुमार सिंह
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अनुष्का-वरुण के सच्चे किरदारों वाली दर्शक से कनेक्ट होती नजर आने वाली कहानी
हमारे फिल्मकार देश दुनिया में घटित हो रही घटनाओं से प्रेरणा लेकर फिल्में बनाना सीख रहे हैं। ऐसा अच्छे लेखकों व कहानियों के अभाव की वजह से हुआ है। अच्छे किरदार घडऩा लेखकों के बूते नहीं है। इसलिए रीयल लाइफ हीरोज ढूंढे जा रहे हैं। चाहे वे खिलाड़ी (धोनी, सूरमा, सचिन, मिल्खा, मैरीकॉम, दंगल, गोल्ड आदि) हों या फिर समाज में कुछ नया करने वाले सोशल हीरो (मांझी, शाहिद, नीरजा, पैडमैन, टॉयलेट आदि)। ऐसा हमेशा से होता रहा है। कभी बालीवुड में उपन्यासों पर फिल्में बनाने का दौर भी था।
हमारी सरकार के मेड इन इंडिया व स्किल इंडिया के स्लोगन से निकला हुआ लगता है 'सुई धागा' का सब्जेक्ट। राजस्थान की बैकग्राउंड पर बनाई गई है फिल्म। ट्रेलर देखने के बाद लगता है कि इसका मुख्य किरदार मौजी (वरुण धवन) जो घर परिवार में सम्मान अर्जित करने के लिए संघर्ष कर रहा है अचानक अपने पैर पर खड़े होने का फैसला ले लेता है।
इसमें उसकी प्रेरणा बनती है पत्नी ममता (अनुष्का शर्मा)। ममता उसके आत्मसम्मान को झकझोरती है और सिलाई मशीन की दुकान पर मामूली नौकरी करने वाला मौजी अपने संघर्ष से बन जाता है एक टैक्सटाइल कंपनी का मालिक। ट्रेलर देखकर तो ऐसा ही लगा। अब वह टैक्सटाइल कंपनी में काम करता दिखाया गया है या मालिक बनता दिखाया गया है यह तो फिल्म में ही साफ हो पाएगा? लेकिन जिस वरुण को यह कहते हुए दिखाया गया है कि जब कंपनी इंडिया की है तो कपड़े पर भी मेड इन इंडिया ही लिखेंगे। अब यह फैसला तो कोई मालिक ही ले सकता है। इस तरह की कई फिल्में पहले भी बनी हैं जिनमें हीरो को फर्श से अर्श पर पहुंचते हुए दिखाया गया है।
इस तरह के सब्जेक्ट लोगों को लुभाते हैं और दर्शक बहुत जल्दी कनेक्ट हो जाते हैं। हमारे देश में हर इंसान अपने संघर्ष में जुटा हुआ है और उसे फिल्मी हीरो को जीतते हुए देखने में अपनी जीत नजर आती है। बहरहाल फिल्म अच्छी नजर आ रही है। यशराज का बैनर है और आदित्य चोपड़ा जैसा प्रोड्यूसर, प्रोडक्ट तो बेहतर बनना ही है। सबसे खास बात है कि लीड स्टार्स मुख्य किरदारों में एकदम परफेक्ट नजर आ रहे हैं। वरुण धवन से ज्यादा अनुष्का रोल के अधिक करीब नजर आ रही हैं। वरुण फिर भी फिल्मी हीरो टाइप लग रहे हैं लेकिन अनुष्का ने तो खुद को पूरी तरह से बदल दिया है। 200 रुपये की धोती में लिपटी गांव देहात की घरेलू महिला। फिल्म कैसी होगी यह तो आने वाले समय में ही पता चलेगा लेकिन अनुष्का शर्मा और वरुण के खाते में एक और बेहतर फिल्म आती नजर आ रही है। गीत-संगीत के बारे में अभी कोई आइडिया नहीं हुआ है। निर्देशक शरत कटारिया ने इससे पहले 'दम लगा के हईशा' बनाई थी जो अपने सब्जेक्ट की वजह से सराही गई थी। उसमें तो अनु मलिक ने संगीत भी अच्छा दिया था, देखते हैं इस बार क्या करेंगे?
अभिषेक बच्चन ने कुछ महीने पहले अनुपमा चोपड़ा के साथ एक इंटरव्यू में कहा था कि वे तीन साल से कोई फिल्म इसलिए नहीं साइन कर रहे हैं क्योंकि वे कुछ ऐसा करना चाहते हैं जो उन्हें व उनके फैंस को चौंका दे। 'हाउसफुल 3' के बाद से उनकी कोई फिल्म आई भी नहीं है। 'मनमर्जियां' साइन करते समय वे उलझन में थे कि अनुराग कश्यप के साथ फिल्म करें या नहीं? अनुराग से उनकी पुरानी अनबन भी थी लेकिन फिर भी अभिषेक ने इस फिल्म को साइन किया और ट्रेलर को देखकर लग रहा है कि अभिषेक वास्तव में अलग नजर आ रहे हैं इस फिल्म में। एक सिख युवक रॉबी के किरदार में वे बहुत ही संयत व मैच्योर नजर आ रहे हैं।
अनुपमा चोपड़ा के साथ अभिषेक का बेहतरीन इंटरव्यू यहां देखें-
हो सकता है कि यह फिल्म उनके कैरियर को एक नई दिशा दे दे, लेकिन ट्रेलर देखने के बाद तो मुझे यही लगा कि और किसी का फायदा हो या न हो लेकिन विक्की कौशल का रोल जरूर सबको पसंद आने वाला है। वे हंगामा किए दे रहे हैं और तापसी पन्नू के साथ उनकी कैमिसट्री आग लगा देने वाली नजर आ रही है। मुझे डर है कि कहीं विक्की इस फिल्म में भी वही न कर दें जो उन्होंने 'संजू' में किया। 'संजू' में उन्होंने रणबीर की चमक को भी फीका कर दिया था। इस फिल्म में भी विक्की सबको चौंकाने की तैयारी में हैं।
मनमर्जियां का ट्रेलर देखें-
ट्रेलर देखने के बाद कहानी मुझे कुछ इस तरह समझ में आई- पंजाब की पृष्ठभूमि है। जैसा कि मोहल्लों में अक्सर होता है। लड़के-लड़की की प्रेम कहानी चल रही है। जिसमें लव से ज्यादा लस्ट है। फिर अचानक ही शादी की बात और तीसरे लड़के का प्रवेश। विक्की (विक्की कौशल) व रुमी (तापसी) के जबर्दस्त किसिंग सीन से ट्रेलर शुरू होता है और दोनों जल्द ही बिस्तर में दिखाए जाते हैं। मतलब दोनों में रोमांस से कुछ आगे भी चल रहा है। बिंदास व मुंहफट रुमी उससे कहती है कि वह घरवालों से शादी की बात करे नहीं तो वह किसी और से शादी कर लेगी। पर विक्की को तो शादी से ज्यादा मां के गोभी के परांठे प्यारे हैं। ऐसे में ही एंट्री होती है एक और सिख युवक रॉबी (अभिषेक बच्चन) की। रॉबी घरवालों के कहने पर रुमी को देखने आता है। पहले तो रुमी घबराती है कंफ्यूज होती है लेकिन फिर विक्की के व्यवहार को देखकर रॉबी से शादी को तैयार हो जाती है। इससे विक्की उत्तेजित होता है और लड़ाई झगड़ा भी होता है लेकिन रुमी व रॉबी की शादी हो जाती है। क्या दोनों की शादी कामयाब हो जाती है? विक्की का क्या होता है? यह साफ नहीं किया गया है। ट्रेलर के अंत में दिखाया गया है कि रुमी को रॉबी का साथ नहीं पसंद आ रहा है और फोन पर वह चाची से कहती नजर आती है कि जब सब कुछ होने वाला होता है तो वह (रॉबी) कंडोम ही भूल जाता है। यहीं से हिंट मिलता है कि फिल्म के अंत में ट्विस्ट है। तनु वेड्स मनु के हिट गीत -
संगीत कुछ वैसा लगता है जैसा आनंद एल राय (निर्माता) की 'तनु वेड्स मनु' में था। फिल्म का प्रस्तुतिकरण भी उसी तरह का लगता है। पर यहां डायरेक्टर अनुराग हैं। कुछ तो फर्क होगा। फिल्म युवा एनर्जी से भरपूर लगती है। तापसी पन्नू इस समय देश की सबसे प्रतिभाशाली और तेजी से उभरती हिरोईनों में से एक हैं और उन्हें अब तक परिपक्व किरदारों में देखने के आदी उनके फैंस इस बोल्ड किरदार में देखकर चौंक सकते हैं। तापसी ने भी कहा है कि वे इस रोल को करके बहुत ही खुश हैं और उन्होंने खूब मजा किया है इस रोल में।
देखते हैं क्या होता है। फिल्म 14 सितंबर 2018 को रिलीज हो रही है।
अंतहीन बहस को मुकाम तक पहुंचाने की कोशिश है 'मुल्क'
" दरअसल मुल्क एक फिल्म नहीं एक अंतहीन बहस है। यह बहस बरसों बरस दुनिया में चलती रही है कि क्या आतंकवाद का कोई मजहब होता है या सारे आतंकवादी मुसलमान ही क्यों होते हैं। इसका न कोई अंत है न हल। अतः यह फिल्म भी अंत में एक लंबी चौड़ी बहस पर ही खत्म होती है। डायरेक्टर अनुभव सिन्हा ने बहुत ही साधारण व सीधे शब्दों में इस बहस को निपटाया है।"
Rating - 4*
मनोज पाहवा का नाम आपमें से कम लोग जानते होंगे। वे छोटे-छोटे किरदारों को बड़ा बनाने की कुव्वत रखते हैं। पर आपने उन्हें हमेशा हास्य कलाकार के रूप में ही देखा है। मोटा सा आदमी जो अपने शरीर व मोटी गर्दन से अजीब सा नजर आता है और बस उसे देखकर हंसा जा सकता है, लेकिन यकीन मानिए 'मुल्क' देखने के बाद आपकी अवधारणा पाहवा के बारे में बदल जाएगी। फिल्म में इंटरवल से पहले एक सीन है जिसमें वे अपने बड़े भाई से जेल के भीतर बातचीत करते हैं और कहते हैं कि मैं तो नहीं बच पाऊंगा लेकिन हो सके तो तुम (तापसी) भाई साहब (ऋषि कपूर) को बचा लेना बेटा। इस सीन में पाहवा ने झंडे गाड़ दिए हैं। वैसे तो इस फिल्म में सभी कलाकार खरे सोने की तरह हैं लेकिन पाहवा और तापसी पन्नू की चमक देखते ही बनती है।
अक्सर फिल्म शुक्रवार को ही देखकर रीव्यू कर दिया करता हूं लेकिन 'मुल्क' देखने का वक्त रविवार को मिला। ये देखकर बहुत ही धक्का लगा कि जिस मल्टीप्लेक्स में देखना था उसमें केवल दो ही शो में फिल्म चल रही है। दोनों में टिकट तेजी से बिक रहे थे। पत्नी के साथ जल्दी से निकला और जाकर बारिश के मौसम में जहां भी टिकट मिली ले ली और फिल्म देखी। बाहर निकले तो बारिश हो रही थी। सिनेमा ज्यादा दूर नहीं था इसलिए गाड़ी घर पर ही खड़ी कर पैदल गए और भीगते हुई वापस आए, पर यकीन मानिए जरा भी अफसोस नहीं हुआ। इतनी बेहतरीन फिल्म देखकर किसी को भी किसी बात का मलाल नहीं होना चाहिए।
दरअसल 'मुल्क' एक फिल्म नहीं अंतहीन बहस है। यह बहस बरसों बरस दुनिया में चलती रही है कि क्या आतंकवाद का कोई मजहब होता है या सारे आतंकवादी मुसलमान ही क्यों होते हैं? इसका न कोई अंत है न हल। अतः यह फिल्म भी अंत में एक लंबी चौड़ी बहस पर ही खत्म होती है। डायरेक्टर अनुभव सिन्हा ने बहुत ही साधारण व सीधे शब्दों में इस बहस को निपटाया है। उतना ही खींचा जितना कि दर्शक हजम कर सकें। इससे ज्यादा खींचते तो बोझिल हो जाती फिल्म।
कहानी वाराणसी में रहने वाले वकील मुराद अली (ऋषि) के परिवार की है। उनके छोटे भाई बिलाल (मनोज पाहवा) का बेटा शाहिद (प्रतीक बब्बर) आतंकवादियों के बहकावे में आ जाता है। एक बम धमाके में लिप्त होने के बाद शाहिद को पुलिस मुठभेड़ में मार गिराती है। अचानक ही पूरे परिवार पर मुसीबत का पहाड़ टूट पड़ता है। बिलाल को गिरफ्तार कर लिया जाता है। सरकारी वकील संतोष आनंद (आशुतोष राणा) पूरे परिवार पर आरोप लगाता है कि सभी आतंकवादी नेटवर्क से जुड़े हैं। मुराद अली को भी इस मामले में आरोपी बना दिया जाता है। मुराद अली को अचानक अपने दोस्तों-पड़ोसियों में भी भारी बदलाव नजर आने लगता है। सभी उनके परिवार को दोषी मानते हैं। सबको लगता है कि पूरा परिवार यह जानता था और सभी इसमें लिप्त हैं। मुराद अली के सामने दिक्कत थी वे केस लड़ें या समाज से। बिलाल की मुकदमे के दौरान दिल का दौरा पड़ने से मौत हो जाती है। थककर वे मुकदमा लड़ने का जिम्मा अपनी हिंदू बहु आरती (तापसी पन्नू) पर छोड़ देते हैं। लंदन में रहने वाली आरती कुछ समय के लिए ही यहां आई थी। अंत में सच की जीत होती है।
फिल्म को ओरिजनल लोकेशंस पर शूट किया गया है। यही सबसे बड़ी ताकत है फिल्म की। मुराद अली का घर सेट नहीं नजर आता। गली-मोहल्ला वास्तविक नजर आता हैं और कलाकार तो सभी कमाल के थे ही। तापसी पन्नू तो इसकी हीरो हैं। कोर्ट में बहस के दौरान तापसी ने जबर्दस्त काम किया है। ऐसे किरदारों के लिए तो वे एकदम फिट हैं। कई फिल्में इस तरह की कर लेने के बाद अब उनमें किरदार में घुस जाने की कला खूब आ गई है। वकील के लबादे में वे वकील नजर आती हैं और यही उनके व्यक्तित्व की सबसे बड़ी जीत है। इस रोल के लिए उन्हें सभी अवार्ड नोमिनेशंस तो मिलने ही हैं। हो सकता है कोई पुरस्कार भी मिले।
ऋषि कपूर के लिए तो ऐसे किरदार बाएं हाथ का खेल हैं। वे अपने कैरियर के सबसे खूबसूरत दौर से गुजर रहे हैं। एक से एक भिन्नता लिए हुए रोल उन्हें मिल रहे हैं और वे बहुत ही सहजता से उन्हें निभा देते हैं। नीना गुप्ता भी काफी समय बाद दिखी और शानदार रोल निभाया उन्होंने। जज के रोल में कुमुद मिश्रा, पुलिस अफसर के रोल में रजत कपूर और बिलाल की बीवी के रोल में प्राची शाह ने भी अपने रोल को बढ़िय़ा निभाया है। लेखक की खास बात यह रही कि उसने सभी कलाकारों को कम से कम एक जोरदार सीन जरूर दिया है। फिल्म तकनीकि रूप से भी बढ़िया है। संगीत की जरूरत थी नहीं। तीन गीत हैं जो सिचुएशन के हिसाब से अच्छे लगते हैं।
फिल्म जिस उद्देश्य से बनाई गई है उसमें यह सफल रहती है और काफी हद तक इस बहस को तार्किक रूप से खत्म करने में सफल रहती है कि हर आतंकी मुसलमान नहीं होता और आतंक का कोई मजहब नहीं होती है। एक सीख भी देती है कि हमारे बच्चे किस राह पर जा रहे हैं उन पर भी नजर रखना हमारा फर्ज है। नहीं तो जैसा ऋषि कपूर ने कहा- 'मैं यह कैसे साबित करूं कि मैं अपने मुल्क से बेहद प्यार करता हूं?' यह काम बड़ा कठिन है और कठिन ही रह जाएगा।
'बॉर्डर' का मोह नहीं छो़ड़ पा रहे हैं दत्ता साहब
जेपी दत्ता को 'बॉर्डर' (1997) का हैंगओवर हो गया है। उनके कैरियर की इस सबसे हिट फिल्म ने उन पर इस कदर अपनी छाप छोड़ दी है कि वे इससे बाहर शायद कभी नहीं निकल पाएंगे। 'बॉर्डर' के बाद दत्ता साहब ने 'एलओसी-कारगिल' भी बनाई थी जो बुरी तरह से फेल रही थी। उसकी स्टार कास्ट व स्केल किसी भी तरह से 'बॉर्डर' से कम नहीं था लेकिन फिल्म फेल रही थी।
एकदम झटका लगने के बाद दत्ता साहब ने आफबीट जाते हुए अपने मिजाज से हटकर 'उमराव जान' (2006) भी बनाई। इसमें ऐश्वर्या राय व अभिषेक बच्चन थे लेकिन फिल्म चली नहीं। हां इस फिल्म के दौरान दोनों के बीच प्यार पनपा और वे जीवनसाथी जरूर बन गए।
अब जेपी दत्ता लगभग 12 साल बाद एक फिल्म लेकर आए हैं - 'पलटन'। जैसा कि नाम से जाहिर है यह फिल्म भी युद्ध की बैकग्राउंड पर ही आधारित है। 2 अगस्त को 'पलटन' का ट्रेलर रिलीज किया गया और फिल्म 7 सितंबर को रिलीज हो रही है। फिल्म में वैसे तो सितारों की भरमार है लेकिन पापुलर स्टार केवल अर्जुन रामपाल, जैकी श्रॉफ व सोनू सूद ही हैं। बाकी गुरमीत चौधरी, हर्षवर्धन राणे, रोहित राय, सिद्धांत कपूर (शक्ति कपूर का बेटा) लव सिन्हा (शत्रुघ्न सिन्हा का बेटा) आदि हैं। इन सबको मैं पहचानता नहीं और फिल्म के ट्रेलर में सभी आर्मी की वेशभूषा में एक जैसे ही नजर आ रहे हैं।
see trailer of 'PALTAN'
3 मिनट 11 सेकेंड लंबे इस ट्रेलर में दिखाया गया है कि 1962 में भारत चीन से युद्ध हार गया। बाद में 5 साल बाद नाथूला इलाके में एक जमीन के टुकड़े को लेकर भारत व चीन की सेनाएं भिड़ी थी। इसी सच्ची घटना को लेकर यह फिल्म बनाई गई है। इस ट्रेलर में केवल यही दिखाया गया है कि घटना के दौरान फौजियों के बीच क्या हुआ। कैसे एक दूसरे से भिड़े, कैसे पथराव हुआ, कैसे गोलियां चलीं आदि-आदि।
लव सिन्हा
इसे देखने के बाद फिल्म की मूल कहानी का अंदाज तो हो जाता है लेकिन यह पता नहीं चलता कि इसमें इस युद्ध के अलावा क्या दिखाया गया है? हिरोईनों की झलक एक-एक सेकेंड के लिए दिखाई गई। उनके सीन देखकर लगा कि जिस तरह से फौजी 'बॉर्डर' फिल्म में अपनी पत्नियों व प्रेमिकाओं को छोड़कर आए थे उसी तरह यहां भी हुआ है। हिरोईनों को मैं पहचान ही नहीं पाया। इंटरनेट पर तलाशा तो पता चला कि इसमें सोनल चौहान, मोनिका गिल, एशा गुप्ता आदि हिरोईनें हैं। वैसे अर्जुन व जैकी की बाक्स आफिस पर क्या हैसियत है आज के दौर में यह सब जानते हैं। ट्रेलर से इसके गीत-संगीत का कोई आइडिया नहीं होता। इसमें पता नहीं कोई गीत भी है या नहीं। जबकि 'बॉर्डर' का सबसे सशक्त पहलू उसका संगीत ही था। फिल्म चूंकि 1967 के कालखंड पर आधारित है इसलिए मुझे नहीं लगता कि इसमें ज्यादा प्रयोग दत्ता साहब कर पाए होंगे। फिल्म में कितने इमोशंस जेपी साहब जगा पाते हैं इसी पर सारा दारोमदार टिका है इस फिल्म का। ट्रेलर को देखकर तो ज्यादा उम्मीदें नहीं जग रही हैं।
अगर कोई मुझसे पूछे कि इस समय बालीवुड की सबसे संभावनाओं वाली अभिनेत्री कौन है तो मेरा जवाब होगा तापसी पन्नु। दिल्ली की इस लड़की का फिल्मों में संघर्ष वैसे तो 8 साल पुराना हो चुका है लेकिन बालीवुड से उनका परिचय पिछले दो तीन साल से ही हुआ है। वैसे तो उनकी एंट्री 2012 में ही गई थी 'चश्मे बद्दूर' के साथ लेकिन 2016 में आई 'पिंक' ने उन्हें पहचान दी और 2017 व 2018 में आई फिल्मों ने उनके नाम को बालीवुड में बड़ा बनाया। 2019 उनके लिए बहुत अहम साबित होगा। बस मुझे चिंता इस बात की है कि उनका फिल्मों का चयन कुछ हद तक सही नहीं हो पा रहा है। तापसी को मुख्य धारा में बने रहना है तो उन्हें जुड़वां 2 जैसी कम से कम एक फिल्म हर साल करनी चाहिए। 'जुड़वां 2' भले ही 'पिंक' की तरह से लोकप्रिय नहीं रही लेकिन बालीवुड में लंबे समय से तक टिके रहने के लिए इस तरह की फिल्में जरूरी हैं।
याद कीजिए जब 70 के दशक में शबाना आजमी 'अंकुर' व 'मंडी' कर रही थीं तो 'अमर अकबर एंथनी' व 'परवरिश' जैसी तमाम मसाला फिल्में भी वे करती रही। बालीवुड में आप एक ही दायरे में बंधकर नहीं चल सकते। अगर आप बड़े स्टार हैं तो आपको आफबीट फिल्में भी मिलेंगी लेकिन अगर आप केवल आफबीट फिल्में ही ज्यादा करेंगे तो कमर्शियल सिनेमा, जो कि बहुत ज्यादा कमजोर मानसिकता से काम करता है, आपसे दूर होता चला जाएगा। हालांकि तापसी पन्नु अभी उस स्थिति में नहीं पहुंची हैं कि वे बहुत ज्यादा चॉयस फिल्मों को लेकर कर सकें लेकिन उन्हें फिल्मों में अपने किरदार छांटने होंगे और यह भी सोचना है कि किस फिल्म को करने से उनकी पहचान ज्यादा बनेगी।
तापसी की मजबूती:
तापसी की सबसे खास बात यह है कि उनके चेहरे में नॉर्थ इंडियन लड़कियों वाली खूबसूरती है। उनकी बॉडी स्किन एक तरह की नजाकत लिए हुए है इसलिए वे टिपिकल बालीवुड हिरोईन की तरह से नजर आती हैं। जो आलिया भट्ट, श्रद्धा कपूर, जैकलिन फर्नांडीज आदि उनके दौर की दूसरी लड़कियां कर रही हैं वो वे भी कर सकती हैं। जैकलिन को तो हिंदी भी नहीं आती। तब भी उनके पास बड़ी फिल्में आसानी से आ जा रही हैं। भले ही उनके किरदार प्रभावशाली नहीं है लेकिन उनके नायक सलमान खान, रणबीर कपूर, सिद्धार्थ मल्होत्रा आदि रहे हैं। स्क्रीन पर बहुत ही बबली व सुंदर नजर आने वाली जैकलिन उम्र में तापसी से दो साल बड़ी हैं। उम्र का जिक्र यहां इसलिए किया क्योंकि बालीवुड में 30 साल की उम्र तक ज्यादातर हिरोईनें अपने मकाम का हासिल कर लेती हैं और अगले 8-10 साल उसे अच्छी तरह से आगे बढ़ा सकती हैं। जैसे ऐश्वर्या राय, प्रियंका चोपड़ा, करीना आदि ने किया और अब कैटरीना, दीपिका व अनुष्का कर रही हैं। इन सभी ने ग्लैमरस व मसाला फिल्में भी खूब की और आफबीट किरदार भी जब मिले तो लपक लिए। कैटरीना अपनी हिंदी की वजह से मात खा गई और इसलिए अभिनय में उतना प्रभाव नहीं छोड़ पाई जितना दीपिका या अनुष्का कमर्शियल सिनेमा करते हुए ही कर पा रही हैं। दीपिका को भंसाली ने तीन फिल्मों में ही कमर्शियल व आफबीट का स्वाद चखा दिया। जबकि अनुष्का ने खुद प्रोड्यूसर बनकर एनएच 10 से ऐसा कर लिया।
सजग रहने की जरूरत:
तापसी को आने वाले समय में अपने किरदारों को लेकर सजग रहना होगा। ग्लैमरस रोल, नाचना गाना, बिकिनी फोटो शूट आदि में कोई बुराई नहीं है और मौका मिले तो ये सब भी करना चाहिए। इससे पहचान बड़ी होती है और जब आप फिल्म में अच्छा करते हैं तो दर्शक चौंक जाते हैं। लगभग 10 हिंदी फिल्में कर चुकी तापसी ने लगभग इतनी ही फिल्में 2010 से 2012 के बीच में तेलुगु, तमिल व मलयालम भाषाओं में भी की और वहां उन्होंने ग्लैमरस रोल भी किए और आफबीट किरदार भी निभाए।
क्या करें तापसी-
- फिल्मों के चयन के समय उनमें आफर किए जा रहे रोल पर और अधिक सजग रहना होगा। फिल्म में ज्यादा दिखना भी जरूरी है।
- हीरो कौन है यह ज्यादा जरूरी नहीं है लेकिन निर्देशक कौन है यह जानना बहुत ही आवश्यक है। मसाला फिल्में बनाने के लिए मशहूर निर्देशक डेविड धवन आपके काम आ सकते हैं लेकिन अनुराग कश्यप जैसे निर्देशक आपको ज्यादा ऊंचाइयों पर पहुंचा सकते हैं।
- 'सूरमा' भले ही कमर्शियली उतनी बड़ी हिट नहीं बन सकी लेकिन फिर भी मेरे हिसाब से यह फिल्म तापसी के कैरियर में पिंक से कम महत्वपूर्ण नहीं है। ऐसी और भी फिल्में उन्हें करनी होंगी।
- फिल्मों में अपनी ड्रैसेज पर उन्हें सबसे ज्यादा ध्यान देना होगा। 'जुड़वां 2' में भले ही वे ग्लैमर की छटा बिखेर चुकी हैं लेकिन अपने ड्रैस डिजाइनर को और अधिक बेहतर तरीके से इस्तेमाल करना होगा। बालीवुड में जो अच्छा दिखता है वही बिकता है।
आने वाला साल-
- 'मुल्क' : यह फिल्म इसी सप्ताह रिलीज हो रही है। इसमें वे एक वकील के किरदार में हैं। देश के राजनीतिक माहौल को दिखाने वाली यह फिल्म उन्हें एक और अच्छा रोल तो दे सकती है लेकिन इसमें बालीवुड फतेह करने का मंत्रा मुझे नजर नहीं आता।
- 'मनमर्जियां' : पहली बार वे अनुराग कश्यप के साथ काम कर रही हैं। पंजाब की बैकग्राउंड पर बन रही इस फिल्म की कहानी के बारे में अभी ज्यादा आइडिया तो नहीं हो पा रहा है लेकिन फिल्म में चूंकि उनके नायक अभिषेक बच्चन हैं इसलिए प्रोजेक्ट कमर्शियल नजर आ रहा है। फिल्म में कहानी व संगीत अगर अच्छे हुए तो यह उनके लिए तो महत्वपूर्ण फिल्म साबित होगी। साथ ही अभिषेक का कैरियर भी फिर से पटरी पर आ सकता है।
- 'बदला': यह फिल्म अगले साल जनवरी में रिलीज होगी। इसमें वे एक बार फिर अमिताभ बच्चन के साथ काम कर रही हैं। सुजोय घोष निर्देशक हैं। यह फिल्म में उनके लिए 'पिंकÓ की तरह से ही बड़ी फिल्म साबित हो सकती है।
तापसी की यह शॉर्ट फिल्म जरूर देखें-
तापसी की फिल्में-
2012- चश्मे बद्दूर
2014- बेबी
2016- पिंक
2017 - रनिंग शादी, द गाजी अटैक, नाम शबाना, जुड़वां 2
2018 - दिल जंगली, सूरमा व मुल्क ।
तापसी पन्नू के अनुपमा चोपड़ा के साथ इस इंटरव्यू को देखें, जान जाएंगे कि यह दिल्ली की यह लड़की कितनी सादी है और जीवन के बारे में उसके आदर्श कितने साफ हैं :-
किरदारों की भीड़ के बीच अगर कुछ राहत मिलती है तो चित्रांगदा सिंह को
देखने से मिलती है। वे सुंदर लगती हैं, एक्टिंग अच्छी करती हैं और उनका
किरदार फिल्म में सबसे मासूम दिखाया गया है लेकिन धूलिया को अच्छे लोग कहां
पसंद आते हैं। उन्हें भी मार दिया गया। फिल्म फिर से ऐसे मकाम पर खत्म की
गई है जहां से पार्ट 4 का गुंजाइश बनी रहती है।
Rating : 2*
निर्देशक तिगमांशु धूलिया की अपनी अलग ही दुनिया है। वे बहुत डार्क सोचते हैं और उसी के हिसाब से कहानी रचते हैं। उनकी फिल्मों में सारे किरदार अव्वल दर्जे के हरामी होते हैं। किसी साले का कोई दीन ईमान नहीं होता। अरे, ये क्या हो गया, मैं भी उनके किरदारों की तरह ही हो गया? भूल के लिए माफी लेकिन क्या करूं उनकी फिल्म देखने के बाद तो ऐसा लगता है कि दुनिया में किसी आदमी पर भरोसा नहीं करना चाहिए। तीन भागों की इस फिल्म को देखने के बाद तो यह लगने लगा है कि संसार में मां, बेटा, बीवी, बाप, भाई कोई अपना नहीं होता। धूलिया की फिल्म में साहिब (जिमी शेरगिल) व बीवी (माही गिल) के किरदार स्थायी हैं जबकि गैंगस्टर बदलते रहते हैं।
पहले दो भागों में रणदीप हुड्डा व इरफान खान थे तो इस भाग को बड़ा बनाने के लिए संजय दत्त को ले लिया गया। पर यकीन मानिए संजय दत्त अब स्क्रीन पर अच्छे नहीं लगते। जब से वे जेल से छूटकर आए हैं लगता है ज्यादा पीने लगे हैं। पेट बाहर आ गया है और चेहरा बहुत ही डरावना हो गया है। अगर फिल्म में कबीर बेदी (जिनका चेहरा भी बुरी तरह से बिगड़ गया है) न होते तो संजय दत्त ही सबसे खराब लगते। संजय को अपनी बॉडी का ख्याल रखना चाहिए। गाने गाते हुए वे बिल्कुल भी अच्छे नहीं लगते।
वैसे कई बेहतरीन फिल्में बना चुके धूलिया को उम्र में बड़े, अधेड़ टाइप के कलाकार भाते हैं। माही गिल, जिमी शेरगिल, चित्रांगदा सिंह, सोहा अली खान आदि 40 पार हैं। अन्य कलाकारों का भी यही हाल है। लंबे अरसे बाद दीपक तिजोरी नजर आए हैं और वे भी बूढ़े, मोटे व थके हुए लगे हैं। किरदारों की भीड़ के बीच अगर कुछ राहत मिलती है तो चित्रांगदा सिंह को देखने से मिलती है। वे सुंदर लगती हैं, एक्टिंग अच्छी करती हैं और उनका किरदार फिल्म में सबसे मासूम दिखाया गया है लेकिन धूलिया को अच्छे लोग कहां पसंद आते हैं। उन्हें भी मार दिया गया। फिल्म फिर से ऐसे मकाम पर खत्म की गई है जहां से पार्ट 4 का गुंजाइश बनी रहती है। इस पार्ट में साहिब व बीवी को ही पूरी तरह से भिड़ा दिया गया है। शायद अगले पार्ट में दोनों के बीच कहानी अंजाम तक पहुंचे?
कहानी पिछले पार्ट से ही आगे बढ़ती है। माधवी (माही) विधायक बन चुकी है। साहिब आदित्य प्रताप सिंह (जिमी) जेल में ही हैं। माधवी ने सारा साम्राज्य कब्जा लिया है। लोग आदित्य को भूलने लगे हैं। माधवी भी इसी कोशिश में है कि वह किसी तरह बाहर न आए। साहिब की दूसरी बीवी रंजना (सोहा) शराब के नशे में डूब चुकी है। रंजना का पिता साहिब को बचाने की कोशिश करता है तो माधवी रंजना को ही गोली मार देती है और वह कोमा में चली जाती है। पैसे की कमी के कारण साहिब बाहर नहीं आ पा रहे हैं। उसका खासमखास कन्हैया (दीपक राणा) अपनी वफादारी दिखाता है और साहिब की जमानत करा देता है। साहिब फिर से सारी कमान हाथ में लेने की कोशिश शुरू कर देते हैं। अब तक पूरी तरह चरित्रहीन हो चुकी माधवी गर्भवती हो जाती है। साहिब इसलिए उसकी जान बख्श देते हैं क्योंकि बच्चा उनका था। माधवी लंदन जाती है तो वहां अपना मौत के खेल का कारोबार चलाने वाले उदय (संजय दत्त) से मिलती है। उदय भी भारत के ही रजवाड़ों के खानदान से ताल्लुक रखता है। वह किसी केस में फंस जाने के कारण भाग गया था। उदय फिर से भारत जाना चाहता है। जहां उसके भाई (दीपक तिजोरी) व पिता (कबीर बेदी) व मां (नफीसा अली) रहते हैं। माधवी को लगता है कि साहिब को मारने में उदय उसकी मदद कर सकता है। वह उदय से करीबी बढ़ाती है और उसे आदित्य को मारने के लिए तैयार करती है। अंत में षडय़ंत्रों का खूनी खेल होता है और सब मारे जाते हैं। बचते हैं साहिब व बीवी। साहिब समझ जाते हैं कि सब खेल माधवी ने रचा था। वह माधवी को चेतावनी देते हैं कि जिस दिन वह मां बनेगी उस दिन वे अपने बच्चे के सामने उसकी हत्या करेंगे। पर माधवी यहां भी चालकी से बच निकलती है।
फिल्म में इतने किरदार हैं कि उन्हें रचने में ही फिल्म उलझ जाती है। कौन किरदार क्या कर रहा है यह किसी के ध्यान नहीं रहता। सब गड्ड मड्ड हो जाता है। बस इतना पता रहता है कि साहिब व बीवी दुश्मन बन चुके हैं। धूलिया कल्पना तो बढिय़ा करते हैं लेकिन इस बार उनकी लेखनी किरदारों के बोझ में दब गई है। इसलिए कोई भी चरित्र आपको पसंद नहीं आएगा। मैंने पहले भी कहा कि चित्रांगदा के अलावा कुछ भी अच्छा नहीं लगता।
जिमी शेरगिल तो पूरी तरह से साहिब ही बन चुके हैं। वे जंचते हैं लेकिन माही गिल पर उम्र का प्रभाव बुरी तरह से पड़ा है। वे खुद को मेंटेन नहीं कर पाई हैं। चेहरे की झुर्रियां नजर आती हैं और उनका मेकअप बहुत ही खराब तरीके से किया गया है। अभिनय के लिहाज से माही व जिमी नंबर वन रहे हैं। बढ़ती उम्र के साहिब व बीवी के रोल में दोनों ने पूरा न्याय किया है। बाकी सभी कलाकार औसत हैं।
फिल्म को लोकेशंस बढिय़ा हैं। ज्यादातर शूटिंग राजस्थान में हुई है और वहीं के रजवाड़े दिखाए गए हैं लेकिन सब गाडिय़ों के नंबर यूपी के दिखते हैं। यह गलती है। इसके अलावा जब जिमी जेल से बाहर आते हैं तो पोस्टर लगे थे विधायक माधवी के समर्थन में लेकिन जब कबीर बेदी अपने मेहमानों से उन्हें मिलवाते हैं तो मेंबर आफ पार्लियामेंट बताते हैं। ये भी गलती है। संगीत बेकार हैं। लता जी के प्रसिद्ध गीत 'लग जा गले' को कई बार बजाया गया है। बाकी कौन सा गाना था फिल्म में यह मुझे याद नहीं रहा। बैकग्राउंड म्यूजिक तगड़ा है। फिल्म चूंकि हरामी किरदारों से भरी है इसलिए आप फैमिली के साथ घुसने की हिम्मत मत कर बैठिए। अकेले देखें तो वन टाइम मूवी है।
जहानवी कल की सुपर स्टार, पर पहली फिल्म का चुनाव सही नहीं
जहानवी व ईशान को भविष्य उज्जवल है। ईशान नेचुरल हैं वे बियोंड द क्लाउड्स
में पहले ही खुद को साबित कर चुके हैं। और जहानवी तो पैदाईशी स्टार हैं ही।
आज नहीं तो कल वे अपना स्थान बना ही लेंगी। पर मेरा मानना है कि उन्हें
लांच करने के लिए यह कहानी सही नहीं थी। एक दो फिल्में करने के बाद वे इस
तरह का रोल करती तो बेहतर होता।
Rating: 2*
अगर आपने 'सैराट' देखी है तो यह फिल्म आपके लिए नहीं है। जिन लोगों ने मराठी भाषा की वह सुपर हिट फिल्म देख ली है उन्हें 'धड़क' नहीं धड़काएगी। यह बात शायद करण जौहर व शशांक खेतान भी जानते थे और इसलिए उन्होंने फिल्म के क्लाइमैक्स में बदलाव कर दिया। पर मेरा मानना है कि 'धड़क' का क्लाइमैक्स हिंदी भाषी दर्शकों को नहीं पसंद आएगा। अगर 'सैराट' वाले क्लाइमैक्स को ही रिपीट कर दिया जाता तो ज्यादा सही रहता। 'धड़क' का क्लाइमैक्स बिल्कुल भी हजम नहीं होता है। जहां 'सैराट' में लोग सन्न रह जाते थे वहीं 'धड़क' में वे निराश व ठगा हुआ महसूस करते हैं।
यहां एक सवाल बोनी कपूर से पूछना चाहूंगा कि उन्होंने जहानवी को लांच करने के लिए 'सैराट' का रीमेक क्यों चुना? जहानवी में ग्लैमर है और वे स्टार मैटीरियल है। जबकि 'सैराट' की हिरोईन एक साधारण घरेलू लड़की थी। जहानवी चूंकि सुपर स्टार मां श्रीदेवी की बेटी है तो उनके लिए पूरी टीम तैयार थी। मेकअप से लेकर उनकी कास्ट्यूम तक में स्टारडम नजर आता है। लीड स्टार के रूप में ईशान खट्टर तो एकदम सही चुनाव हैं, क्योंकि वे साधारण गली ब्वॉय नजर आते हैं, लेकिन जहानवी बिल्कुल भी एक आम लड़की नहीं लगती। जहानवी के लिए तो 'स्टूडेंट आफ द ईयर' या फिर 'जब वी मेट' जैसी कोई रोमांटिक फिल्म बनाई जानी चाहिए थी। दिल की बात कहूं तो जहानवी के साथ अन्याय हुआ है। करण को उनके लिए कोई मॉडर्न लव स्टोरी बनानी चाहिए थी, आलिया भट्ट की तरह। ग्लैमरस रोल मिलता तो जहानवी हंगामा कर देती। अब तक जहानवी को सोशल मीडिया पर लोगों ने जिम में आते-जाते खूब देखा था। जिम आउटफिट में वे बेहद आकर्षक नजर आती थी लेकिन 'धड़क' में वे 'गर्ल टू नेक्स्ट डोर' बना दी गई। राजस्थानी भाषा बोलते हुए वे अजीब लगती है। उनके मुकाबले ईशान सहज रहे।
फिल्म की कहानी तो आप जानते ही होंगे। पार्थवी (जहानवी) बड़े घर व ऊंची जाति की लड़की है और मधुकर (ईशान) छोटी जाति व साधारण घर का लड़का। दोनों में प्यार हो जाता है जो पार्थवी के परिवार को मंजूर नहीं। दोनों विरोध के बीच घर से भाग जाते हैं ओर कोलकाता जाकर घर बसा लेते हैं। बाकी फिल्म का अंत आपको बता दूंगा तो फिल्म एक बार देखने के लायक भी नहीं रहेगी।
फिल्म में एक नहीं कई खामियां हैं। फिल्म लगभग 5 साल का पीरियड कवर करती है। जहानवी के पिता रतन सिंह (आशुतोष राणा) चुनाव जीतते हैं और फिर अगला चुनाव हार जाते हैं। यानी कम से कम पांच साल बीतते हैं। जहानवी को पांच साल पहले आईफोन के बड़े मॉडल (जो 6 प्लस के बाद शुरू हुए) को यूज करते हुए दिखाया गया है जबकि उस समय आईफोन 5 ही आता था (छोटे साइज वाला)। शायद जहानवी को बड़े घर की बेटी दिखाने के चक्कर में निर्देशक इस बात को भूल गए। जहानवी को सुजुकी बाइक का आधुनिक मॉडल चलाते दिखाया गया जो पांच साल पहले लांच भी नहीं हुआ था।
शशांक खेतान का निर्देशन बहुत कमजोर है। फिल्म की सबसे बड़ी कमजोरी इसका संगीत है। सैराट के संगीत ने धूम मचा दी थी लेकिन 'धड़क' में तो हू ब हू कॉपी किया गया 'जिंगाट' गीत भी उत्तेजना नहीं पैदा कर पाया।
फिल्म की शुरुआत में जहानवी व ईशान के बीच रोमांस पनपने के जो सीन बनाए गए हैं वे बहुत ही बनावटी लगते हैं। (नोट: हो सकता है मुझसे उम्र में 20-25 साल छोटे युवाओं को वे अच्छे लगें। उम्र का फर्क हो सकता है।) फिल्म का टीनएज रोमांस दिल को नहीं छू पाया।
मुख्य कलाकारों के लिए मैं पहले ही काफी बता चुका हूं। जहानवी व ईशान को भविष्य उज्जवल है। ईशान नेचुरल हैं वे 'बियोंड द क्लाउड्स' में पहले ही खुद को साबित कर चुके हैं। और जहानवी तो पैदाईशी स्टार हैं ही। आज नहीं तो कल वे अपना स्थान बना ही लेंगी। पर मेरा मानना है कि उन्हें लांच करने के लिए यह कहानी सही नहीं थी। एक दो फिल्में करने के बाद वे इस तरह का रोल करती तो बेहतर होता।
वीकेंड में अगर आप फिल्म देखने के शौकीन हैं तो यह फिल्म आप एक बार देख सकते हैं और अगर नहीं देख पाते हैं तो अफसोस न करें, यह एक महान फिल्म नहीं है। केवल साधारण फिल्म है।