Friday, 30 March 2018

DEEP REVIEW : Baaghi 2


टाइगर श्राफ को अब आप हल्के में ना लें
 
Rating: 3*
फिल्म कैसी है यह तो बाद में बताऊंगा लेकिन एक बात पहले ही साफ कर दूं कि इस फिल्म के बाद आप टाइगर श्राफ को हल्के में लेना बंद ही कर दें। टाइगर ने अब तक रिलीज हुई अपनी दोनों फिल्मों के मुकाबले इसमें बहुत सुधार दिखाया है। भले ही फिल्म के कुछ दृश्यों में उनसे सनी देयोल की नकल कराई गई हो लेकिन वह अपनी पहचान बनाने में सफल रहे हैं। इस फिल्म में वह काफी मैच्योर भी लगे हैं और कुछ सींस में इमोशंस भी अच्छे दिखाए हैं। उन्हें अब केवल अपनी डायलाग डिलीवरी पर ध्यान देने की जरूरत है। जब वे धीरे-धीरे संवाद बोलते हैं तो अच्छे लगते हैं लेकिन जब तेजी से चीखने की कोशिश करते हैं तो उनकी आवाज बच्चों जैसी लगने लगती है। वैसे यह फिल्म उनके करियर की सबसे बड़ी हिट फिल्म साबित होने जा रही है।
'बागी 2' एक आर्मी अफसर रणवीर प्रताप सिंह उर्फ रोनी (टाइगर) की कहानी है। उसकी पूर्व गर्लफ्रेंड नेहा (दिशा पटानी) उससे अपनी 3 साल की बेटी को बचाने की गुजारिश करती है, जिसका अपहरण कर लिया गया है। रोनी गोवा में तलाश शुरू करता है तो पता चलता है कि नेहा की कोई बेटी थी ही नहीं। उसका पति (दर्शन), पुलिस डीआईजी (मनोज वाजपेयी) आदि सभी यही कहते हैं कि वह किसी बीमारी से पीडि़त है और किसी दूसरे की बेटी को अपनी बेटी मान बैठी है यही नहीं रिया उसकी बेटी का नहीं बल्कि मां का नाम था। रोनी को भी इस पर यकीन होने लगता है और वह नेहा की मदद करने से इंकार कर देता है। इस पर निराश नेहा बिल्ंिडग से छलांग लगाकर अपनी जान दे देती है। नेहा की आत्महत्या से रोनी को लगता है कि वह शायद सही कह रही थी। जब वह और गहराई में जाता है तो परत दर परत केस खुलने लगता है और उसे पता चलता है कि नेहा की बेटी का अपहरण उसके पति व देवर (प्रतीक बब्बर) ने ही मिलकर किया था। इंटरवल के बाद कहानी मे कई मोड़ आते हैं और अंत में पता चलता है कि जिस बच्ची को बचाने के लिए नेहा उससे कह रही थी दरअसल वह तो रोनी और नेहा के प्यार की निशानी ही थी।

 फिल्म का कथानक काफी उलझा हुआ है लेकिन फिर भी आप समझने में सफल रहते हैं क्योंकि कुछ बातें बीच-बीच में फ्लैशबैक में दिखाकर साफ करने की कोशिश की गई है। हालांकि कहानी में बहुत से झोल भी हैं। सीसीटीवी कैमरे की फुटेज गायब कर देने वाला मामला कुछ ऐसा ही है। डीआईजी को ही अंत में सबसे बड़ी विलेन दिखा देना भी आसानी से हजम नहीं होता। ऐसी बहुत सी गुत्थियां हैं जिन्हें सुलझाने की कोशिश निर्देशक ने नहीं की हैं।


गीत संगीत तो जैसे फिल्म की स्पीड को बाधित करने के लिए ही आता है। केवल एक गीत- 'साथी तेरे बिनाÓ ही अच्छा लगता है। दूसरे हाफ में जबरन ठूंसा गया जैकलीन फर्नांडीज का आइटम नंबर 'एक दो तीनÓ बिल्कुल भी नहीं भाता। न सुनने में अच्छा लगता है ना देखने में। इस समय बालीवुड की सबसे सुंदर हिरोइनों में से एक जैकलीन को इस गाने में वेस्ट किया गया है। एक बात और जैकलीन के लिए कहना चाहूंगा। उन्हें अपनी फिटनेस पर इतना ज्यादा ध्यान नहीं देना चाहिए। इस डांस में जिस तरह से उनकी बॉडी मसल्स व बायसप्स नजर आते हैं वे एक नाजुक नृत्यांगना कम बॉडी बिल्डर ज्यादा नजर आती हैं। उन्हें ज्यादा जिम नहीं करना चाहिए। उनकी सुंदरता में नाज ओ अदा कम बल्कि कठोरता ज्यादा दिखने लगी है।

एक्टिंग के लिहाज से टाइगर ने बेहतरीन काम किया है। वे अब धीरे-धीरे बड़ा स्टार बनने की ओर बढ़ रहे हैं। एक्शन सींस में तो टाइगर जान डाल ही देते हैं और हर तरह के एक्शन में सहज भी नजर आते हैं लेकिन फिल्म के क्लाइमैक्स में जिस तरह उन्हें सैकड़ों लोगों से अकेले लड़ते दिखा दिया गया है उसे देखकर आपकी हंसी भी निकल सकती है। 'घायल ' के सनी देयोल के लाकअप वाले सीन को हू ब हू कापी करने की वजह मेरी समझ में नहीं आई?

दिशा पटानी का फ्यूचर अच्छा है लेकिन उन्हें अच्छे रोल चुनने होंगे। अपनी पहली दोनों ही फिल्मों में वे इंटरवल से पहले मर जाती हैं। उन्हें ऐसी बातों को ध्यान रखना होगा। उनमें बड़ी स्टार बनने की तमाम संभावनाएं हैं। मनोज वाजपेयी, रणदीप हुड्डा ने अपना काम ठीक-ठाक किया है। दीपक डोबरियाल तो खैर अच्छे कलाकार हैं ही लेकिन प्रतीक बब्बर को ऐसा घटिया रोल करते देख दुख हुआ है। इस तरह के एक दो रोल और उन्होंने किए तो वे बरबाद हो जाएंगे। अरे हां, निर्देशक के बारे में तो बताना भूल ही गया। डांस डायरेक्टर अहमद खान इसके निर्देशक हैं और उन्होंने अच्छा काम किया है।
कुल मिलाकर 'बागी 2' एक एक्शन से भरपूर फिल्म है। इसे मनोरंजन के लिए देखा जा सकता है।

- हर्ष कुमार सिंह 
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Friday, 16 March 2018

DEEP REVIEW : Raid


अजय देवगन की अच्छी फिल्में में से एक है 'रेड', जरूर देखें  

Rating 4*

अजय देवगन अपने कैरियर में दो तरह की फिल्में करते रहे हैं। एक तो हैं 'एक्शन जैक्सन', 'सिंघम', 'बादशाहो' और 'शिवाय' जैसी और दूसरी हैं 'जख्म', 'गंगाजल' और 'दृश्यम' जैसी। ये दूसरी वाली कैटेगरी की फिल्म है। 'रेड' में अजय देवगन ने एक परिपक्व रोल किया है जो उम्र के हिसाब से उन पर फिट बैठता है। फिल्म बांधकर रखती है। यदि आपको बेहतर कहानी, संवाद और थोड़ी सी यथार्थवादी फिल्में पंसद आती हैं तो यह आपके लिए है, लेकिन यदि आप वीकेंड पर फैमिली के साथ मनोरंजन से भरपूर मसला फिल्म देखने के मूड में रहते हैं तो फिर यह फिल्म आपके लिए नहीं है। बच्चों के लिए फिल्म में कुछ नहीं है। न गीत संगीत न कॉमेडी और न नाच गाना।
फिल्म जिस अंदाज में बनाई गई है यह आपको नीरज पांडे की 'स्पेशल 26' की याद दिलाती है। हालांकि यह उसके स्तर की फिल्म नहीं बन पाई। इसके बावजूद यह एक अच्छी फिल्म है। विषय एकदम नया है और इस तरह की कहानी अब तक हिंदी फिल्मों में नहीं दिखाई गई है। छोटे से घटनाक्रम को दो घंटे की फिल्म में बहुत ही संजीदा अंदाज में पेश किया गया है। जिन लोगों का देश की समस्याओं व ज्वलंत मुददों से सरोकार है उन्हें इसमें मजा आएगा।

कहानी 1981 की है जो लखनऊ में हुई एक सच्ची घटना पर आधारित है। अमय पटनायक (अजय देवगन) आयकर विभाग के अफसर हैं और ईमानदारी की वजह से बार-बार उनका तबादला होता रहता है। इस बात से उनकी पत्नी मालिनी (इलियाना डि क्रूज) परेशान भी रहती है। लखनऊ आकर वह एक दबंग सांसद रामेश्वर सिंह (सौरभ शुक्ला) से भिड़ जाते हैं। उन्हें गुप्त सूचना मिलती है कि सांसद महोदय के पास 400 करोड़ की ब्लैक मनी है। टैक्स चोरी व बेनामी संपत्ति भी है। अजय वहां रेड डालने की योजना बनाते हैं। पूरी फिल्म इसी रेड पर आधारित है। रेड चलती रहती है। अजय अपने फर्ज पर डटे रहते हैं। सौरभ रेड रुकवाने के लिए प्रधानमंत्री तक पहुंच जाते हैं, लेकिन अजय अपना फर्ज निभाते हैं और जान की बाजी लगाकर सच्चाई तक पहुंचने में सफल रहते हैं। फिल्म में अंत में उस सस्पेंस का भी खुलासा किया जाता है कि ये सूचना अजय को किसने दी थी।
फिल्म के निर्देशक राजकुमार गुप्ता ने इससे पहले नो वन किल्ड जेसिका, आमिर जैसी फिल्में बनाई हैं। इसलिए वे जानते हैं कि सत्य कहानी को कैसे फिल्माया जाता है। फिल्म कई हिस्सों में अपना प्रभाव छोड़ती है। फिल्म में पहले ही सीन में अजय देवगन व सौरभ की मुलाकात एक पार्टी में दिखाई गई है। इसमें अजय की ईमानदारी को जिस तरह से स्थापित किया गया है वह फिल्म का टेंपो सेट कर देता है। इसी सीन की वजह से अमय पटनायक का किरदार बड़ा व मजबूत लगने लगता है। एक अन्य सीन-जब अजय मंदिर जाने की बात कहते हैं तो इलियाना कहती हैं कि तुम तो नास्तिक हो, भारत माता के अलावा किसी को मानते ही नहीं? यह दृश्य फिल्म में अच्छे संवाद होने की गवाही देता है।
रेड के दौरान वैसे तो कई दिलचस्प मौके आते हैं लेकिन मुझे तो फिल्म में सबसे ज्यादातर मजेदार सीन वे लगे जिनमें सौरभ शुक्ला की बुजुर्ग मां आती हैं। इस रोल को निभानी वाली वृद्ध महिला ने कमाल कर दिया है। फिल्म में टर्निंग प्वाइंट लाने के साथ-साथ वे दर्शकों का अच्छा खासा मनोरंजन भी करती हैं। फिल्म का क्लाईमैक्स अच्छा फिल्माया गया है जिसमें सारी जनता सांसद के समर्थन में एकत्र होकर हमला बोल देती है और अजय अपने सभी साथी अफसरों को वहां से भगाकर खुद मुकाबला करने की ठान लेते हैं।
इलियाना डि क्रूज इससे पहले अजय के साथ बादशाहो में भी आई थी और बड़े ही ग्लैमरस अवतार में थी। रेड में वे एकदम साधारण महिला के रूप में आई हैं लेकिन बादशाहो से ज्यादा सुंदर लगी हैं। अभिनय भी उन्होंने ठीक-ठाक किया है। अजय और सौरभ तो हैं ही मंजे हुए कलाकार।

इस फिल्म को देखकर मेरा मन अजय देवगन को एक सलाह देने का भी हो रहा है। उनके बारे में अक्सर कहा जाता है कि उन्हें अच्छी कहानियों की समझ नहीं है। अगर वे इसी तरह की कुछ और फिल्में और कर लें तो लोगों की यह गलतफहमी दूर हो जाएगी। शाहरुख खान को भी कुछ ऐसी फिल्में करनी चाहिएं। आमिर व अक्षय तो लगातार ऐसा कर ही रहे हैं। 

-   हर्ष कुमार सिंह



Tuesday, 6 March 2018

DEEP REVIEW : Sonu Ke Titu Ki Sweety

खूबसूरत नुसरत भरूचा के लिए देख सकते हैं  'सोनू के टीटू की स्वीटी'

 Rating - 2*

मेरी आदत है कि जो फिल्म देखने के लायक लगती है वही देखने जाता हूं। कहने का मतलब यह है कि फिल्म की प्रोडक्शन वैल्यू आदि ऐसी लगनी चाहिए कि वह कुछ अलग है या फिर बड़ी फिल्म है, स्टार कास्ट व निर्देशक के लिहाज से। इसके अलावा कुछ फिल्में ऐसी होती हैं जिन्हें उनके बाक्स आफिस पर अनपेक्षित रूप से सफल हो जाने के बाद देखता हूं। पहले भी कई बार ऐसा हुआ है। एक या दो हफ्ते बाद रीव्यू करने का कोई मतलब नहीं रह जाता इसलिए समीक्षा नहीं करता हूं। ऐसा कई बार हुआ है जैसे- ‘गोलमाल अगेन’, ‘करीब करीब सिंगल’, ‘सीक्रेट सुपर स्टार’ आदि फिल्में बाद में देखीं लेकिन ऐसा कुछ नहीं लगा कि उनकी समीक्षा करूं। दो साल पहले ‘की एंड का’ को भी दो सप्ताह बाद देखा था और समीक्षा करने से रह नहीं पाया था। फिल्म कामयाब भी थी और बेहतरीन भी। ‘की एंड का’ के रीव्यू को हजारों लोगों ने पढ़ा था दो सप्ताह बाद भी।

पिछले हफ्ते रिलीज हुई ‘सोनू के टीटू की स्वीटी’ की जहां भी देख रहा था तारीफ हो रही थी। रीव्यू भी अच्छे-अच्छे आ रहे हैं। बाक्स आफिस पर दो हफ्ते का कलेक्शन शानदार हुआ है सोचा देख ही लूं कहीं अच्छी फिल्म मिस न कर दूं। इस फिल्म को अब तक न देखने के पीछे एक वजह यह भी थी कि ‘प्यार का पंचनामा’ की टीम की फिल्म थी यह। ‘प्यार का पंचनामा’ को जरा भी झेल नहीं पाया था। कुल मिलाकर फिल्म देखने की बिल्कुल मन नहीं था। केवल इसकी बाक्स आफिस सफलता की वजह से देखा और पाया कि फिल्म को एक बार देखने में कोई बुराई नहीं है।

इस फिल्म के सफल होने की सबसे बड़ी वजह यह नजर आ रही है कि इस समय बाजार में आ रही फिल्मों का स्तर बहुत ही खराब है। फिल्मों में कहानी और अभिनय का अभाव है। संगीत का स्तर बेहद खराब हो गया है। ऐसे में थोड़ी सी काम चलाऊ फिल्म भी आ जाती है तो वीकेंड पर फिल्म देखने के आदि हो चुके मल्टीप्लेक्स के दर्शक उसे देख ही लेते हैं। कुछ ऐसा ही ‘सोनू के टीटू की स्वीटी’ के साथ भी हुआ है। फिल्म अपने हास्य के कारण दर्शकों को गुदगुदा रही है और इसलिए पसंद की जा रही है।
कहानी तो इसकी एक लाइन की है। सोनू (कार्तिक आर्यन) का दोस्त टीटू (सन्नी सिंह) जिस लड़की स्वीटी (नुसरत भरूचा) के साथ शादी करने वाला है उसे सोनू बिल्कुल पसंद नहीं करता। सोनू को लगता है कि लड़की कुछ ज्यादा ही परफेक्ट बनने की कोशिश कर रही है इसलिए वह ठीक नहीं है । बस सोनू और स्वीटी में ठन जाती है दोनों में जंग शुरू हो जाती है। जीत किसकी होती है यह फिल्म में देखिए। हालांकि यह कहीं भी तार्किक रूप से स्थापित नहीं हो सका कि आखिर स्वीटी में खराबी क्या थी ? निर्देशक ने स्वीटी को गलत दिखाने के लिए इंटरवल से ठीक पहले उसी के मुंह से कहलवाया कि वह चालू है। लेकिन चालू कैसे है यह कहीं साबित नहीं हो पाया।


कार्तिक औसत अभिनेता हैं लेकिन स्क्रीन पर हैंडसम नजर आते हैं। उनके डायलाग बहुत ही चुटीले हैं इसलिए वे सबको पसंद आते हैं। सन्नी साधारण हैं और ऐसा ही रोल उनको मिला है। अलबत्ता नुसरत में बड़ी स्टार बनने के तमाम लक्षण मौजूद हैं। वे बेहद खूबसूरत नजर आती हैं और उन्हें स्क्रीन पर देखना अच्छा लगता है। अगर उन्हें अच्छा ब्रेक मिला तो वे कैटरीना कैफ को पानी पिला सकती हैं। संगीत तो ऐसा है कि सिनेमा से बाहर निकलते ही भूल जाता है। हंस राज हंस के हिट गीत ‘दिल चोरी साड्डा हो गया’ को नए अवतार में पेश किया गया है जो अच्छा लगता है इसके अलावा संगीत के नाम पर कुछ खास नहीं है। हमेशा शराब पीते रहने वाले जीजा-साले के रोल में आलोकनाथ व वीरेंद्र सक्सेना खूब जमते हैं। बाकी कलाकारों का काम भी ठीक ठाक है।

फिल्म का पहला काम मनोरंजन देना होता है और यह फिल्म कम से कम एक बार तो ऐसा करने में सफल रहती ही है। आप इसे परिवार के साथ देख सकते हैं। ज्यादा दिमाग लगाना नहीं है बस फिल्म देखकर घर आ जाना है।

- हर्ष कुमार सिंह

Monday, 26 February 2018

...और अभिशप्त रही इस 'चांदनी' के जीवन की रात

श्रीदेवी की मौत से सब इसलिए भी ज्यादा स्तब्ध हैं क्योंकि वे न तो बीमार थी और न ही खराब दौर से गुजर रही थीं। इन दिनों वे अपनी बेटी जहानवी के करियर को लेकर व्यस्त थीं। जहानवी की पहली फिल्म 'धड़क' जुलाई में रिलीज होने के लिए तैयार है। काम पूरा हो चुका है और शायद श्रीदेवी भी अपने बेटी को बड़ी स्क्रीन पर देखने के लिए बेचैन रही होंगी लेकिन ईश्वर ने उन्हें वह समय दिखाया ही नहीं। इससे बड़ा दुर्भाग्य और क्या होगा? यहां ये भी बता दूं कि बोनी कपूर की पहली पत्नी मोना भी अपने बेटे अर्जुन की पहली फिल्म की रिलीज तक जिंदा नहीं रही थी।

भले ही हम श्रीदेवी के जीवन की सतरंगी कहानियों को देखकर यह समझ रहे हों कि उनकी निजी जीवन बहुत ही सुखी रहा लेकिन यह पूरी तरह सही नहीं है। श्रीदेवी के करियर में जब भी कोई महत्वपूर्ण समय आया उन्हें निजी जीवन में कठिन दौर से गुजरना पड़ा। जिस समय श्रीदेवी ने बोनी कपूर से शादी की थी तो उस समय बोनी की पहली पत्नी मोना शौरी कपूर  जिंदा थी। उन्होंने बीमारी के बाद 25 मार्च 2012 को दम तोड़ा। श्रीदेवी से शादी करने के लिए बोनी और मोना में 1996 में ही अलगाव हो गया था। उसी साल 2 जून को बोनी ने श्रीदेवी से शादी की थी। कहा जाता है कि दोनों ने शादी इसलिए की थी क्योंकि श्रीदेवी मां बनने वाली थी। शादी के ठीक 9 माह बाद जहानवी का जन्म हुआ था। कहा जाता है कि श्रीदेवी और बोनी की शादी बैकडेट में दिखाई गई जिससे की जहानवी के जन्म की अवधि को सही दिखाया जा सके। सब कुछ आनन-फानन में हुआ था।



बोनी कपूर की सास सत्ती शौरी, जो फिल्म निर्माता भी थीं, ने श्रीदेवी को लेकर 'फरिश्ते' जैसी मल्टीस्टारर फिल्म बनाई थी। इसमें विनोद खन्ना, रजनीकांत व धर्मेंद्र जैसे सितारे भी थे। सत्ती शौरी ने श्रीदेवी-बोनी की शादी के बाद कहा था कि वे श्रीदेवी को कभी माफ नहीं करेंगी। उन्होंने उनकी बेटी का घर तोड़ा है। अर्जुन कपूर ने कभी श्रीदेवी को अपनी मां नहीं माना। वे उनके पिता की दूसरी पत्नी मात्र थी। श्रीदेवी की दोनों बेटियां उन्हें भाई  मानती हैं लेकिन अर्जुन ने कभी उन्हें अपनी बहनें नहीं माना।

बोनी से पहले श्रीदेवी की शादी मिथुन चक्रवर्ती से भी होते-होते रह गई, लेकिन मिथुन अपनी पहली पत्नी योगिता बाली को छोडऩे के लिए तैयार नहीं हुए। कहा तो यह भी जाता है कि श्रीदेवी व मिथुन ने गुप्त शादी कर ली थी जो बाद में टूट गई। श्रीदेवी के दुर्भाग्य ने उनकी पीछा कभी नहीं छोड़ा। जब वे 'मि. इंडिया' की अपार सफलता के बाद बोनी कपूर की 'रूप की रानी चोरों का राजा' के लिए विदेश में शूटिंग कर रही थीं तो उनके पिता का निधन हो गया था। वे श्रीदेवी का घर बसता नहीं देख पाए। यही नहीं श्रीदेवी की छोटी बहन श्रीलता की शादी भी उनसे पहले हो गई थी और उनका भरा पूरा परिवार है। अगर श्रीदेवी की निजी जिंदगी को श्रापित जीवन कहा जाए तो गलत नहीं होगा।
       
 - हर्ष कुमार सिंह

first published in Navodaya Times , 26 February 2018 



नवोदय टाइम्स की वेबसाइट पर ब्लॉग में प्रकाशित लेख को पढ़ने के लिए क्लिक करें ये लिकं--

https://www.navodayatimes.in/news/khabre/night-of-the-life-of-this-moonlight-being-cursed/74792/



Friday, 9 February 2018

DEEP REVIEW : Padman

Rating: 5*
अक्षय कुमार को फिल्म नहीं एक क्रांति के लिए बधाई
“पुरस्कार मिले या न मिले लेकिन अविष्कार होता रहना चाहिए।"  फिल्म में यह डॉयलाग सुपर स्टार अमिताभ बच्चन ने बोला है। और यही फिल्म का सार है। “पैडमैन” उस क्रांति की कहानी कहती है जो अभी देश में शुरू हो रही है और जिसे अभी बहुत लंबा व महत्वपूर्ण सफर पूरा करना है। यह एक ऐसे विषय को बहुत ही सजगता, गंभीरता और डंके की चोट पर उठाती है जिसे अब तक देश में जरूरी विषय माना ही नहीं गया है। हालांकि हम सब पढ़े लिखे लोग पैड्स के महत्व को समझते हैं लेकिन हम भी उस समय बहुत चौंकते जाते हैं जब पता चलता है कि देश की केवल 18 प्रतिशत महिलाएं ही पैड्स का इस्तेमाल करती हैं। इससे भी बुरी बात यह है कि पीरियड्स के दिनों को लेकर आज भी अनेक भ्रांतियां व अंधविश्वास प्रचलित हैं। उनकी तो कोई बात ही नहीं करता। यह फिल्म तो केवल पैड्स की कीमत के मसले को ही हल करने की कोशिश कर रही है जबकि समस्याएं तो इससे कहीं अधिक हैं। एक सत्यकथा से प्रेरित होकर ट्विंकल खन्ना ने अपने पति के सहयोग से फिल्म बनाई और क्या फिल्म बनाई है।

लक्ष्मीकांत चौहान (अक्षय कुमार) को पत्नी गायत्री (राधिका अप्टे) को माहवारी के समय होने वाली दिक्कत का पता चलता है तो वह उसके लिए पैड्स खरीद लाता है। पर पैड इतने महंगे थे कि पत्नी स्वीकार करने से मना कर देती है और गंदा कपड़ा ही प्रयोग करना बेहतर समझती है। चौहान तमाम प्रयास करता है लेकिन सस्ते व सफल पैड नहीं बना पाता। महिलाओं से फीडबैक लेने के चक्कर में बदनाम अलग से हो जाता है। सब उसे चरित्रहीन समझने लगते हैं। बहनें व पत्नी साथ छोड़ देती हैं। मां भी अलग हो जाती है। चौहान सबकी नजर में गिर जाता है और अंत में सम्मान अर्जित करने के लिए घर से निकल लेता है। आखिरकार सफल होता है। सम्मान भी पाता है और ईनाम भी।
फिल्म की विषय जितना गंभीर था उसके लिहाज से आर बल्कि का निर्देशक के रूप में चुनाव एकदम सही है। “पा” और “की एंड का” जैसी संवेदनशील फिल्में बनाने वाले बल्कि ने फिल्म को बहुत ही शिद्दत से बनाया है। विषय से न भटकते हुए वे फिल्म के मूल तत्व को लगातार कहानी के प्रवाह में बनाए रखते हैं। चौहान का किरदार हर समय यही सोचता रहता है कि किस तरह सस्ते सेनेटरी पैड्स बनाए जाएं और यही लगन व इच्छा शक्ति फिल्म की जान है। अक्षय का किरदार दर्शकों के दिलों दिमाग पर इस तरह से छा जाता है कि वे कभी उसकी हरकतों पर हंसते हैं तो कभी तालियां बजाने पर मजबूर हो जाते हैं। पहला हाफ चौहान के संघर्ष की कहानी है तो दूसरे हाफ में उसके उत्कर्ष की दास्तान दिखाई गई है।
मध्यांतर के बाद कई दृश्यों में अक्षय ने कमाल कर दिया है। छोटे-छोटे सीन में उन्होंने अपने अभिनय की रेंज दिखाई है। न्यूयार्क में युनाइटेड नेशंस के दफ्तर में दी गई स्पीच फिल्म का सबसे बेहतरीन सीन है। अंग्रेजी बोलकर वे दिल को छू जाते हैं। इसके अलावा राधिका अप्टे से जुदा होने वाला सीन भी मार्मिक है। राधिका तो खैर हैं ही कमाल की अदाकारा। वे बेहद नेचुरल लगती हैं और किरदार में जीवंत नजर आती हैं। सोनम कपूर ने भी अपने रोल को बढ़िया निभाया है। पात्र के हिसाब से उनका चयन एकदम सही है।


फिल्म में गीत संगीत को केवल आवश्यकता के अनुरूप ही प्रयोग किया गया है और इसलिए फिल्म कहीं से बोझिल नहीं लगती। घटनाक्रम तेजी से घटता रहता है और दर्शक बोर नहीं होते। तकनीकी रूप से फिल्म बहुत ही मजबूत है और लोकेशंस एकदम रीयल होने के कारण बहुत ही मोहक नजर आती हैं। नर्मदा का किनारा और घाट, पुराने जमाने के मकान आदि सब कुछ मोहक लगता है। फिल्म के संवादों की भी तारीफ करनी होगी। एक सीन में सोनम के पिता अक्षय से बात करते हुए कहते हैं - मर्द होने का मजा अपने अंदर की औरत को जगा के ही आता है। यूएन में अक्षय कहते हैं- मैंने आईआईटी नहीं पढ़ी, आईआईटी ने मुझे पढ़ा। अनेक स्थान पर संवादों पर तालियां बजाने का मन करता है। कई स्थान पर व्यंग्य भी करारा है। दिखाया गया है कि महिलाओं को अपना पैड महंगा लगता है लेकिन भगवान को प्रसाद चढ़ाने के लिए वे फट से 51 रुपये दे देती है।

आप सेः

जिस विषय को फिल्म ने उठाया है वह किसी भी सरकारी एजेंडे में नहीं है। जिस तरह से देश में बालिकाओं के लिए हर स्कूल में शौचालय का अभियान प्रधानमंत्री ने चलवाया उसी प्रकार इस मसले को लेकर भी बड़े पैमाने पर काम किए जाने की जरूरत है। इस फिल्म को एक संपूर्ण पारिवारिक फिल्म कहूं तो अतिश्योक्ति नहीं होगी। हालांकि आप व हम सब पढ़े लिखे लोग हैं। हमारे घरों की महिलाएं पीरियड्स की जरूरतों व सेनेटरी पैड्स के प्रयोग को भली भांति समझती हैं लेकिन फिर भी हमें अपने बच्चों व खासतौर से बेटियों के साथ यह फिल्म देखनी चाहिए। जिससे कि वे भी समझ सकें कि हमारे देश में किस-किस तरह की समस्याओं से महिलाओं को गुजरना पड़ता है। हो सकता है फिल्म देखने के बाद आप या आपके बच्चे किसी ऐसे ही अभियान का हिस्सा बनने की प्रेरणा ले लें। इसलिए फिल्म को अवश्य देखें और परिवार के साथ देखें।

समीक्षकों सेः

फिल्म के कई रीव्यू मैंने पढ़े हैं। अच्छे व बुरे सभी प्रकार के। स्टार रेटिंग देने में बड़े-बड़े समीक्षकों ने कंजूसी की है। किसी ने भी 5 स्टार नहीं दिए। पता नहीं हमारे समीक्षकों ने 5 स्टार किस महान फिल्म के लिए बचाकर रखे हुए हैं? मैं फिल्म को 5 स्टार के लायक ही मानता हूं। अगर कोई सर्वश्रेष्ठ नहीं है तो फिर आपको जो उपलब्ध हैं उन्हीं में से बेहतर को चुनना चाहिए। पिछले कुछ साल में कई कमजोर व बेसिर पैर की फिल्मों को 4 स्टार दिए हैं हमारे महान समीक्षकों ने लेकिन “टायलेट एक प्रेम कथा” या “पैडमैन” जैसी फिल्म को देने में झिझक महसूस करते हैं। मेरे हिसाब से यह दोगलापन है। कुछ सराहना तो उस सोच की भी की जानी चाहिए जिसकी वजह से ऐसी फिल्में बनती हैं। अक्षय कुमार व टिवंकल, आप बधाई के पात्र हैं। ऐसी कुछ और फिल्में बनाएं।

- हर्ष कुमार सिंह






Tuesday, 30 January 2018

स्वरा भास्कर के भंसाली को लिखे पत्र का जवाब

स्वरा जी,

सबसे पहले तो बधाई ! आपने जो पत्र संजय लीला भंसाली को लिखा है उसका एक-एक शब्द दिल से लिखा है। आपकी पीड़ा समझ में आती है। तीसरे पैरे में सही मतलब समझ में आया। भंसाली ने बरसों पहले आपको ‘गुजारिश’ में रोल दिया था वो भी छोटा सा। इसके बाद वे आपको भूल ही गए शायद। वैसे भी भंसाली की आदत है कि वे छोटे से छोटे रोल में भी बड़े कलाकारों को लेकर भूल जाया करते हैं। बताइए, ‘पदमावत’ में अदिति राव हैदरी को लिया भी तो एक छोटे से रोल के लिए। शायद उन्हें भी भूल जाएंगे वे। लेकिन इसके बाद भी उनके साथ काम करने वाले कलाकार उनके साथ किए काम का अनुभव कभी नहीं भूल पाते। आपने भी लिखा है कि आप कभी नहीं भूल सकती कि किस तरह से छोटे से छोटे से सीन के लिए भंसाली फिल्म में मगन हो जाते हैं। वे डायरेक्टर ही कमाल के हैं। इसलिए तो उनकी फिल्में देखने के लिए सबसे पहले उनके आलोचक ही भागते हैं।

मेरी समझ में नहीं आता कि आपने ‘पदमावत’ क्यों देखी। सब जानते थे कि रानी पदमावती की कहानी का अंत जौहर पर ही होता है। आपने इतिहास नहीं पढ़ा क्या ? जहां तक मेरी जानकारी है आप दिल्ली में ही पली बढ़ी हैं। जेएनयू जैसे प्रतिष्ठित संस्थान से आपका सीधा ताल्लुक रहा है और वहां कोई भी ऐसा इतिहासकार आपको नहीं मिला जो यह बता सके कि पदमावती की कहानी जौहर के साथ खत्म होती है? इतिहास में जो लिखा हुआ है उसे भंसाली को बदल देना चाहिए था ? जौहर शब्द का अर्थ हिम्मत व साहस से जुड़ा हुआ है। और जिन हालात में यह जौहर हुआ था उन हालात में तो यह हिम्मत का ही काम था। हो सकता है जौहर के समय उन महिलाओं के भाव ऐसे न रहे हों जैसे फिल्म में दिखाए गए हैं। शायद वे विलाप करती हुई आग में कूदी हों। लेकिन अगर ऐसा दिखाया जाता तो क्या उससे महिलाओं का सम्मान बढ़ जाता ?

सही बताऊं, आपने जिस तरह से vagina शब्द का प्रयोग करके अपने खत को सुर्खियों में लाने का प्रयास किया है वह दिखाता है कि दरअसल आपकी मंशा केवल सस्ती लोकप्रियता हासिल करना था। पूरे हिंदुस्तान में और किसी महिला को इस तरह की फीलिंग क्यों नहीं आई? अंग्रेजी में सोचने वालों को ही इस तरह के विचार आते हैं? और बेहतर होता यदि आपने पत्र हिंदी में लिखा होता और vagina शब्द की जगह हिंदी का शब्द प्रयोग किया होता। वैसे मीडिया ने आपके पत्र का हिंदी में तर्जुमा छापा है। उसमें उन्होंने शालीनता दिखाते हुए इसके स्थान पर योनि शब्द का प्रयोग किया है। वैसे vagina के लिए और भी शब्द प्रचलित हैं हिंदी में लेकिन उनका प्रयोग कोई शरीफ आदमी सोशल मीडिया के मंच पर नहीं करना चाहेगा। लेकिन आपने अंग्रेजी शब्द vagina का खुलकर इस्तेमाल किया और जो आप फिल्मों में नहीं कर पा रही हैं वह इस पत्र के माध्यम से कर लिया।

हर अभिनेत्री चाहती है कि लाखों करोड़ों लोग उसके फैन बनें। उसे चाहें, खून से लिखे पत्र भेजें आदि-आदि। कौन हिरोईन नहीं चाहती कि उसे ग्लैमरस रोल करने के लिए मिलें और मुख्य धारा की हिरोईनों में उसे भी प्रियंका चोपड़ा, दीपिका या कैटरीना की तरह गिना जाए। आपने भी तो कोशिश की थी ? Maxim मैगजीन के लिए आपने कुछ साल पहले ये फोटो शूट कराया था। याद है आपको ? फोटो साथ में ही पोस्ट कर रहा हूं।


Maxim मैगजीन जानती हैं किस लिए जानी जाती है ? Nude यानी नग्न तस्वीरों के लिए। फोटो शूट कराने से पहले आपको भी पता होगा इसका ? और महिलाओं की नग्न (और भी शब्द हैं इसके लिए) तस्वीरें छापने के पीछे vagina के अलावा और दूसरा क्या कारण हो सकता है ? या आपको पता नहीं था कि इस तरह का फोटो शूट कराने के बाद उनका क्या इस्तेमाल होगा ? पता होगा आपको जरूर। तभी तो आपने कराया था यह फोटो सेशन। पर अफसोस आपको उससे कुछ लाभ नहीं हो सका। एक भी फिल्म में आपको ऐसा रोल नहीं मिला जिसे देखकर युवा आहें भर सकें। आपको रोल मिला तो ‘प्रेम रतन धन पायो’ में सलमान खान की बहन का। क्या आपको नहीं लगता कि आप इसी तरह के रोल में फिट हैं ?

और हां आपकी एक फिल्म आई थी- अनारकली आफ आरा। इस फिल्म में भी तो सारा लफड़ा vagina के लिए हो रहा था। क्या आपको इस फिल्म का विषय नहीं पता था ? जबकि ये तो एक काल्पनिक कहानी थी। पदमावती तो फिर भी इतिहास में दर्ज एक झूठी सच्ची कहानी है। ऐसे में आपको संजय लीला भंसाली से शिकायत केवल यह हो गई कि उन्होंने जौहर को महिमामंडित कर दिया। जौहर के इस तथाकथित महिमा मंडन को देखकर मुझे तो नहीं लगा कि किसी महिला का मन जौहर के लिए किया होगा। अलबत्ता सिनेमाघर में तालियां जरूर बजती सुनी मैंने। पर यकीन मानिए Maxim के लिए किया गया आपका फोटो शूट जरूर युवकों को vagina की ओर आकर्षित करने की कोशिश था। यह बात और है कि आपको देखकर युवकों को ऐसी भावनाएं कम ही आई होंगी। और यही बात आपको सता रही है शायद।

“You may be wondering why the hell I am going on and on thus about vaginas. Because Sir, that’s what I felt like at the end of your magnum opus. I felt like a vagina. I felt reduced to a vagina–only. I felt like all the ‘minor’ achievements that women and women’s movements have made over the years– like the right to vote, the right to own property, the right to education, equal pay for equal work, maternity leave, the Vishakha judgement, the right to adopt children…… all of it was pointless; because we were back to basics.”

आपके खत का यह पैराग्राफ मुझे बहुत ही आपत्तिजनक लगा। ‘पदमावत’ फिल्म से इन सब बातों का क्या ताल्लुक? क्या आपकी फिल्मों में इन सब सामाजिक समस्याओं को हाईलाइट किया गया था? क्या आपकी आने वाली फिल्म ‘वीरे दि वेडिंग’ महिलाओं की समस्याओं को जोर-शोर से उठाने जा रही है ? नाम से तो ऐसा लगता है कि जैसे शादी ब्याह और नाच गाने में रची बसी कोई कहानी होगी। वैसे आपके हिसाब से शादी क्या है ? सामाजिक रस्म या महिलाओं के उत्थान की कोई मुहीम ? जहां तक मेरा ख्याल है आपके नजरिए से शादी का अंत भी vagina पर ही होता होगा ? सैकड़ों लोग शादी को सेलीब्रेट करने के लिए नहीं बल्कि vagina के लिए ही तो एकत्र होते हैं।

बहरहाल आपका पत्र बहुत बड़ा है और तमाम बातों का जवाब इसी प्रकार दिया भी जा सकता है लेकिन मेरा उद्देश्य कतई आपको अपमानित करना नहीं है। मुझे आप किसी फिल्म में अच्छी नहीं लगी तो इसका मतलब यह नहीं कि मैं आपको अपमानित करूं। मेरे कहने का मतलब केवल यह है कि अगर फिल्मों को हम इस तरह के नजरिए से आंकना शुरू कर देंगे तो आपको सभी अभिनेत्रियां vagina ही नजर आने लगेंगी। जबकि ऐसा है नहीं। हमारी फिल्मों में नायिकाओं ने कई मानदंड स्थापित किए हैं केवल vagina आधारित रोल करके ही। आप 80 के दशक की ‘मंडी’ में शबाना आजमी और स्मिता पाटिल को देख लीजिए या फिर 15 साल पहले आई तब्बू की ‘चांदनी बार’ को देख लीजिए। ‘चांदनी बार’ में तो सब कुछ vagina के लिए ही हो रहा था। फिल्में आपको केवल समाज का एक रूप दिखाती हैं और यह आप पर होता है कि आप उसे स्वीकारें या अस्वीकारें। ‘पदमावत’ को जनता ने स्वीकार किया है और ऐसे में आपका यह विचारोत्तेजक पत्र केवल पब्लिसिटी स्टंट ही नजर आता है।



- हर्ष कुमार सिंह

Thursday, 25 January 2018

DEEP REVIEW : Padmaavat

रणवीर सिंह पर दिलोजान से फिदा है भंसाली की फिल्म 

Rating- 3*

संजय लीला भंसाली की यह चर्चित फिल्म सही मायने में रणवीर सिंह की फिल्म है। हर सीन में रणवीर छाए हुए हैं और जिस सीन में वे मौजूद नहीं रहते वहां भी उनके किरदार की उपस्थिति आपको लगातार महसूस होती रहती है। लगता है ‘बाजीराव मस्तानी’ में रणवीर सिंह से भंसाली ज्यादा ही प्रभावित हो गए और तुरंत उन्हें लेकर अगली फिल्म बना ली। फिल्म पहले ‘पदमवती’ थी बाद में ‘पदमावत’ बनी। यही नाम सही है। पदमावती नाम इस पर ज्यादा फिट नहीं बैठता क्योंकि दीपिका पादुकोण का रोल फिल्म में संक्षिप्त है और कुछेक सीन के अलावा वे पर्दे पर नहीं नजर आती।

हाईलाइट- फिल्म का सबसे विवादित जौहर वाला सीन फिल्म की जान है। इसे भंसाली ने जिस तरह से फिल्माया है वह रोमांचित कर देता है। इसे फिल्म की हाईलाइट कह दूं तो कोई गलत नहीं होगा। इस सीन पर सिनेमाहाल में तालियां बज उठती हैं। अलबत्ता ‘पदमावत’ भंसाली की पूर्व फिल्म ‘बाजीराव मस्तानी’ के स्थापित मानदंडों को नहीं छू पाती है।

संगीत- भंसाली शानदार निर्देशक होने के साथ-साथ संगीत के बहुत जबर्दस्त जानकार हैं। संगीत में वे कितना डूब जाते हैं इसका अंदाज इसी से लगाया जाता है कि पिछली कुछ फिल्मों (गुजारिश के बाद से) का संगीत वे खुद ही देने लगे हैं। पर इस फिल्म का सबसे कमजोर पक्ष यही है। फिल्म का एक भी गीत ऐसा नहीं है जिसे आप गुनगुना सकें या फुरसत मे सुन सकें। पापुलर हो चुका ‘घूमर-घूमर’ गीत देखने में अच्छा लगता है लेकिन आप इसे बार-बार नहीं सुन सकते। फिल्म में संगीत के लिए ज्यादा गुंजाइश नहीं थी लेकिन फिर भी जो भी गीत हैं वे मन को भाते नहीं हैं। अलाउद्दीन खिलजी (रणवीर सिंह) का किरदार फिल्म में भंसाली को कितना प्यारा था इसका अनुमान इसी से लगा सकते हैं कि उन पर दो-दो सोलो गीत फिल्माए गए हैं। दोनों ही गीत बचकाने व साधारण है। किसी में भी मल्हारी जैसी मस्ती नहीं आ पाई। जंग के मैदान में खिलजी के गुलाम द्वारा उनके लिए गीत गाना बहुत ही हास्यास्पद लगता है। गाना भी क्या था समझ से बाहर है। भंसाली का संगीत नौशाद साहब की झलक देता है। ‘बाजीराव मस्तानी’ में ‘मुगले आजम’ की छाप थी तो इसमें ‘मदर इंडिया’ की। घूमर गीत में कोरस एकदम वही है जो ‘मदर इंडिया’ में था। यह उनकी पिछली फिल्मों के मुकाबले हल्की लगती है लेकिन फिर भी इस दौर में आने वाली ‘गोलमाल’, ‘बरेली की बर्फी’, ‘शुभ मंगल सावधान’ और तमाम ऐसी छोटी-बड़ी फिल्में इसके सामने कहीं नहीं टिकती। यह एक बड़े पर्दे की फिल्म है और अगर आपने इसे बड़े पर्दे पर नहीं देखा तो गुनाह करेंगे।
कहानी- अलाउद्दीन खिलजी अपने चाचा को मारकर दिल्ली का बादशाह बन जाता है। एय्याश है। मेवाड़ की रानी पदमावती की सुंदरता की कहानी सुनकर उस पर मुग्ध हो जाता है और मेवाड़ को जीतने के लिए निकल लेता है। उसे हर तरह से हासिल करना चाहता है। पदमावती के पति व मेवाड़ के राजा रतन सिंह से युद्ध करता है और उसे छल कपट से मार देता है। अपनी इज्जत बचाने के लिए पदमावती किले की सैकड़ों महिलाओं के साथ जौहर की आग में कूद जाती हैं और खिलजी के हाथ कुछ नहीं आता।
एक्शन- फिल्म में एक और कमी बहुत अखरती है। वह है शानदार एक्शन की। पूरी फिल्म युद्धों की चुनौती पर टिकी है लेकिन इसके बावजूद एक भी एक्शन सीन जोरदार नहीं बन पाया। ‘बाजीराव मस्तानी’ का वो सीन याद है जब बाजीराव हाथी पर चढ़कर दुश्मन का सिर काटता है, रोंगटे खड़े कर दिए थे उस सीन ने। इस फिल्म में एक भी सीन वैसा नहीं है। कम से कम उस सीन को तो यादगार बनाया जा सकता था जिसमें खिलजी व रतन सिहं भिड़ते हैं।
अभिनय- रणवीर सिंह फिल्म में छाए हुए हैं। कहने के लिए वे विलेन हैं लेकिन दर्शकों को उनका किरदार ही भाता है। रतन सिंह के रोल में शाहिद कपूर पूरी तरह से मिसफिट हैं। उनकी कद काठी बहुत ही हल्की है और वे न तो दीपिका के साथ फिट लगते हैं न ही रणवीर के सामने टिकते हैं। कहने का मतलब यह है कि वे एकदम गलत चुनाव रहे। दीपिका पादुकोण बेहद खूबसूरत लगी हैं और वर्तमान दौर में उनके अलावा यह रोल कोई निभा भी नहीं सकता। वे एकदम सही चुनाव रही लेकिन स्क्रिप्ट ने उन्हें सपोर्ट नहीं किया। बहरहाल जितनी भी फुटेज उन्हें मिली उन्होंने महफिल लूट ली।
निर्देशन- भंसाली का निर्देशन शानदार है और उन्होंने एक भव्य फिल्म बनाई है। सीन बड़े कैनवास पर शूट किए गए हैं और आपको बार-बार चौंका देते हैं। शुरूआती हिस्से में सिंहल देश का सेट बहुत ही आकर्षक लगाया गया है। जौहर वाला सीन का सेट भी भव्य है। कहने का मतलब है कि जाइये और बच्चों के साथ यह फिल्म देख आइए।

- हर्ष कुमार सिंह