Thursday, 25 August 2016

DEEP REVIEW: A Flying Jatt

खामियों और भूलों से भरी हुई फिल्म है 'ए फ्लाइंग जट' 

RATING- 1*


अगर निर्देशक के नजरिये से देखा जाए तो उसने इस फिल्म के जरिये दो संदेश देने की कोशिश की है। पहली, दुनिया के लिए प्रदूषण सबसे बड़ा खतरा है और इसे केवल पेड़ लगाकर ही खत्म किया जा सकता है। दूसरा, सिखों का 12 बजे वाला मजाक उन्हें नीचा दिखाने के लिए चलाया गया है जबकि इसका ताल्लुक उनकी बहादुरी से जुड़े तीन सौ साल पुराने एक किस्से से है। दोनों ही अच्छे प्रयास हो सकते थे अगर इन्हें थोड़ा गंभीरता से दिखाया गया होता।

दरअसल जब फिल्म शुरू होती है तो दर्शकों की लगता है कि ये किसी कृष टाइप सुपर हीरो की कहानी है। इंटरवल तक यही होता भी है। टाइगर श्राफ सुपरमैन की तरह उड़ते रहते हैं और उटपटांग हरकतें करते हैं। इंटरवल के बाद भाषणबाजी का सिलसिला शुरू होता है कि प्रदूषण कितना खतरनाक है। प्रदूषण को लेकर सबसे पहले चिंता होती है विलेन के के मेनन को। जैसे ही उन्हें पता चलता है कि उनकी बेटी को अस्थमा हो गया है वे तुरंत ही सुधर जाते हैं। वाह क्या बात है। कहानी एक लाइन की है। एक जमीन है जिस पर टाइगर व उसकी मां अमृता रहते हैं। उसे के के खाली कराना चाहते हैं अपने व्यवसायिक हित के लिए। बस यही आधार है बाकी सब पुरानी फिल्मों की जूठन है।

कई बार तो फिल्म देखते हुए ऐसा लगने लगता है कि शायद निर्देशक रेमो डिसूजा को कुछ याद आ गया तो उन्होंने तुरंत कहानी में जोड़ दिया। हां, याद आया। जैकलीन फर्नांडीज भी है फिल्म में। निर्देशक इंटरवल तक उन्हें भी भूल जाते हैं। फिर अचानक ही उन्हें याद आता है कि जैकलीन भी तो हैं। इंटरवल से पहले जैकलीन को जहां एक संवाद भी बोलने का मौका नहीं मिला था वहीं अचानक उनके लिए दो-दो गाने सेकेंड हाफ में फिट कर दिए गए हैं। फस्र्ट हाफ में तो ऐसा लग रहा था कि शायद फिल्म में कोई गीत है ही नहीं। एक भांगड़ा गीत था वह भी लीड स्टार के बजाए साइड हीरो पर फिल्माया गया था। हां, याद आया। फिल्म में सुपर हीरो का एक भाई भी है। ये भाई पूरी फिल्म में हीरो के दोस्त की तरह व्यवहार करता है लेकिन है वह उसका भाई। निर्देशक ने हीरो के भाई का प्रयोग मनचाहे तरीके से किया है। जब कभी उसे फ्लाइंग जट बनाना होता था तो सुपर हीरो की ड्रैस पहना दी जाती थी और जब टाइगर का भाई बनाना होता था तो साधारण कपड़े पहना दिए जाते थे। कई बार उसे कामेडियन की तरह पेश कर दिया जाता है। इंटरवल के बाद अचानक ही डिसूजा को याद आता है कि फिल्म में हंसी मजाक बहुत हो गई और अब इमोशन होना चाहिए। इसके लिए उन्होंने टाइगर के भाई की कुर्बानी देने में एक मिनट की देर नहीं लगाई। के के मेनन द्वारा तैयार किए गए महामानव राका (हल्क टाइप हालीवुड स्टार नाथन जोंस) के हाथों हीरो के भाई को कुत्ते की मौत मरवा दिया जाता है। हां, याद आया। खैर अंत में फ्लाइंग जट राका को मारता है। उसे मारने के लिए निर्देशक ने क्या जोरदार आइडिया निकाला। राका को मारने के लिए फ्लाइंग जट उसे धकेल कर चांद पर ले जाता है। क्योंकि वहां प्रदूषण नहीं है। शायद चांद पर आक्सीजन थी वरना टाइगर सांस कैसे ले रहे थे? हां, यहां ये भी बता दूं कि राका को कोई भी घाव इसलिए नहीं होता था क्योंकि वह धुआं सूंघकर खुद को ठीक कर लेता था और चांद पर उसे जब धुंआ नहीं मिलता है तो वह आसानी से मर जाता है। क्या गजब की स्टोरी बनाई है लेखक ने। यानी हर बात का तोड़ है।

टाइगर श्रॉफ को भी शायद ये लगने लगा है कि लोग उनकी मार्शल आर्ट व डांस की कला को ही पसंद करते हैं। लगातार तीसरी फिल्म में भी टाइगर वही सब करते नजर आ रहे हैं जो वे पहले भी कर चुके हैं। उनके लिए चिंता की बात यह है कि उनकी फिल्मों का स्तर भी लगातार गिरता जा रहा है। 'हीरोपंती' औसत थी, 'बागी' ठीक ठाक थी लेकिन 'ए फ्लाइंग जट' तो कुछ भी नहीं है। यानी धीरे-धीरे उनका ग्राफ नीचे आ रहा है। टाइगर की डायलाग डिलीवरी तो खराब है ही साथ ही उनकी हिंदी भी खराब है। उन्हें अपनी इस कमजोरी को सुधारना होगा नहीं तो उन्हें लोग केवल नाच गाने व एक्शन के लिए ही कब तक झेलते रहेंगे। इस फिल्म के प्रमोशन के दौरान टाइगर ने यह कहा है कि बचपन में उनका मजाक भी उड़ाया जाता था, वे सही कहते हैं। कई बार वे एकदम लड़कियों की तरह कमनीय नजर आते हैं तो कभी एकदम ही मैन। फिल्म में भी सनी लियोनी के गाने पर उन्हें नचवा कर निर्देशक ने उनका मजाक उड़वाने में कोई कसर नहीं छोड़ी।


जैकलीन फर्नांडीज की ये लगातार तीसरी फिल्म है (हाउसफुल 3 और ढिशूम के बाद) जिसमें वे फालूत का किरदार निभाते नजर आई हैं। जिस तरह से उनकी फिल्म में एंट्री होती है समझ में नहीं आता कि निर्देशक उनसे क्या कराना चाहता है। टाइगर इस तरह उन्हें देखते हैं कि जैसे शायद पहली बार देख रहे हैं लेकिन अगले ही सीन में वे उनकी साथी स्कूल टीचर के रूप में नजर आ जाती हैं। उन्हें जिस तरह चशमिश के रूप में दिखाया जाता है उसे देखकर लगता है कि शायद कहानी कुछ इस तरह आगे बढ़ेगी कि उनके लुक के कारण सुपर हीरो उन्हें पसंद नहीं करेगा लेकिन ऐसा नहीं होता और फ्लाइंग जट उन पर हर हाल में लट्टू रहता है। यानी आप जो सोचते हैं निर्देशक वही नहीं होने देता। जैकलीन भी टाइगर की तरह हिंदी नहीं बोल पाती हैं और उनके लिए डबिंग आर्टिस्ट की मदद ली जाती है। उन्हें अपनी इसे सुधारना चाहिए। श्रीदेवी से लेकर श्रुति हसन तक तमाम ऐसी हिरोईनें बालीवुड में आई हैं जो हिंदी भाषी नहीं थी लेकिन फिर बाद में हिंदी सीखकर अच्छे किरदार करने में सफल रही। वैसे फिल्म में जैकलीन के साथ कुछ ज्यादा ही अन्याय किया गया है। उनके कास्ट्यूम बहुत ही घटिया हैं। एक गाना तो नाइट सूट में ही फिल्मा दिया गया। फिल्म के एक गाने 'बीट पे बूटी' के बारे में बहुत कुछ सुना था लेकिन इस गाने को बहुत ही घटिया तरीके से फिल्माया गया है। लगता है एकता कपूर ने बजट कम कर दिया था। उन्हें लगा होगा कि क्यों फिल्म को ओवर बजट किया जाए। रेमो से भी इतने खराब फिल्मांकन की उम्मीद नहीं थी।

फिल्म में लंबे अर्से बाद अमृता सिंह नजर आई हैं। वे पूरी फिल्म में शराबी महिला की ओवर एक्टिंग करती नजर आती हैं। उनकी शराब पीने की आदत किसी को नहीं भाती है। न ही इससे हास्य पैदा होता है और न ही किरदार में कोई विशेषता आती है। कई बार तो अमृता सिंह को देखकर दया आती है। वे अपने समय में अच्छी कलाकार रही हैं और अब उन्हें किस तरह के वाहियात रोल मिल रहे हैं। फिल्मी दुनिया भी कितनी अजीब है। अमृता मां के किरदार निभा रही हैं वहीं उनके पूर्व पति सैफ अली खां एक बार फिर पिता बनने जा रहे हैं। वैसे टाइगर के पिता जैकी श्राफ भी अमृता के साथ हीरो आ चुके हैं इसलिए वे टाइगर की मां के रोल में अटपटी नहीं लगती।

कुल मिलाकर 'ए फ्लाइंग जट' एक ऐसी फिल्म है जिसमें कुछ भी ओरिजनल नहीं है। अंग्रेजी व हिंदी की पुरानी फिल्मों से ही तमाम आइडिया चुराकर फिल्म बना दी गई है। हालीवुड की फिल्मों के एक्शन सीन हू ब हू कापी कर दिए गए हैं। सिनेमा के अंदर बैठे दर्शक, यहां तक की बच्चे भी बताने लगते हैं कि अरे ये सीन तो फलां फिल्म में भी था। अंत में यही कहना चाहूंगा कि सुपर पावर वाले हीरो की एक फिल्म तीन दशक पहले शेेखर कपूर ने भी बनाई थी 'मिस्टर इंडिया' के नाम से। इस फिल्म में सुपर पावर का प्रयोग कॉमेडी के अंदाज में बहुत ही शानदार तरीके से दिखाया गया था। उसमें नायक ने कोई स्पेशल ड्रैस भी नहीं पहनी थी। बस एक ट्वीड का पुराना कोट ही पहने नजर आता था मिस्टर इंडिया लेकिन क्या गजब की फिल्म बनी थी। हालीवुड की फिल्मों से प्रेरणा लेने के बजाय अगर हमारे निर्देशक पुरानी हिंदी फिल्मों से ही कुछ सीख लें तो बहुत ही अच्छी फिल्म बनाई जा सकती है। संजय लीला भंसाली ने डंके की चोट पर पुराने दिग्गजों की निर्देशन कला को अपनाया और 'बाजीराव मस्तानी' जैसी ब्लाक बस्टर फिल्म बना डाली।


-हर्ष कुमार सिंह

Friday, 29 July 2016

DEEP REVIEW: Dishoom


टाइम पास फिल्म भी नहीं बन पाई 'ढिशूम'

RATING- 1*


डेविड धवन के निर्देशक बेटे रोहित धवन अब पूरी तरह से अपने पिता की लाइन पर चल निकले हैं। उन्होंने 'ढिशूम’ को वर्तमान दौर की 'बड़े मियां छोटे मियां’ बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। अब चूंकि वरुण धवन उनके भाई हैं तो उन पर तो विशेष ध्यान दिया ही जाना था। फिल्म में अगर कोई चीज परफेक्ट है तो वह है वरुण धवन का किरदार। कई बार तो उन्हें ऐसे दिखाया गया है कि जैसे फिल्म के मुख्य हीरो वे हैं जॉन अब्राहम नहीं। रोहित धवन ने कुछ साल पहले 'देसी ब्वॉयज’ नाम की एक फिल्म लिखी व डायरेक्ट की थी। हालांकि फिल्म ज्यादा चली नहीं थी लेकिन फिर भी अक्षय कुमार व जॉन अब्राहम की जोड़ी की वजह से लोगों ने उसे देखा तो और पंसद भी किया था। हालांकि बाक्स आफिस पर वह कोई बड़ा तीर नहीं मार सकी थी। कुछ ऐसी ही 'ढिशूम’ के साथ भी होने वाला है।

फिल्म की स्टोरी लाइन बहुत ही मामूली है। गल्फ के एक देश में भारत और पाकिस्तान के बीच क्रिकेट टूर्नामेंट का फाइनल मैच खेला जाना है। भारतीय टीम के स्टार प्लेयर विराज शर्मा (विराट कोहली से प्रेरित) की वजह से लगातार घाटा खा रहा एक बुकी उसे किडनेप करा लेता है और उसे अपने हिसाब से खेलने के लिए कहता है। मैच में केवल 36 घंटे बचे हैं। विराज की हकीकत खुलने पर देश में दंगे हो सकते हैं और इसलिए भारत सरकार अपने अधिकारी जॉन को वहां भेजती है विराज को ढूंढने के लिए। वरुण गल्फ कंट्री में ही ट्रेनी पुलिस अफसर है जो जॉन की मदद करता है विराज को ढूंढने में। इसी तलाश के बीच जैकलीन फर्नांडीज, नरगिस फाखरी, अक्षय कुमार, अक्षय खन्ना, राहुल देव आदि एक-एक करके आते रहते हैं। अंत में सब लोग विराज को ढूंढने में विफल रहते हैं तो एक कुत्ता इत्तेफाक से उसका पता बता देता है। सब कुछ बहुत ही बचकाने ढंग से होता है।

क्रिकेटर की तलाश के दौरान जो कुछ भी घटित होता है उसे देखकर कहीं भी ये नहीं लगता कि कुछ ऐसा देख रहे हैं जो पहले नहीं दिखाया गया। फिल्म में नयापन डालने के लिए निर्देशक ने शूटिंग के लिए गल्फ के छोटे-छोटे देशों की लोकेशंस के जरिये आकर्षक बनाने का प्रयास किया है। महेंद्र अमरनाथ, अतुल वासन व रमीज राजा जैसे क्रिकेटर कमेंटटेर के रूप में भी आते हैं। वरुण धवन के मुंह से मोदी जी की तारीफ भी कराई गई है लेकिन इससे भी बात नहीं बन पाई। फिल्म का स्क्रीन प्ले बेहद कमजोर है। कब क्या होने वाला है और क्या हो सकता है इसमें किसी की भी दिलचस्पी नहीं रहती।

एक दो बार वरुण धवन जरूर हंसाने में सफल रहते हैं। फिल्म में कुछ डायलाग मजेदार हैं और लोगों को हंसा देते हैं। म्यूजिक के नाम पर फिल्म में केवल दो ही गाने हैं और वे भी दूसरे हाफ के अंतिम 30 मिनट में। दर्शक इंतजार करते रहते हैं कि कोई गाना ही जाए। पहला हाफ तो यूं ही गुजर जाता है। दोनों ही गीत किसी काम के नहीं हैं। एक गाना फिल्म के अंत में ठूंसा गया है। इसमें परिणीति चोपड़ा आइटम गर्ल के रूप में आई हैं लेकिन गाना इतना कमजोर है कि पहले ही फिल्म से ऊब चुके दर्शक सिनेमा हाल से बाहर निकल लेते हैं और गाना बस यूं ही चलता रह जाता है। ये कमजोर निर्देशन की पहचान है। निर्देशक सोच रहा था कि शायद लोग गाने की इंतजार में अंत तक बैठे रहेंगे। वे भूल गए थे कि यदि गाना जोरदार हो तो वह फिल्म के पहले 10 मिनट में भी अपना असर छोड़ सकता है। 80 के दशक में 'तेजाब' फिल्म की प्रसिद्ध गीत 'एक दो तीन’ शुरू के दस मिनट में ही था और फिल्म जबर्दस्त चली थी। खैर उस फिल्म से तो इसकी तुलना करना ही बेमानी है।

फिल्म में अभिनय के नाम पर जॉन अब्राहम हमेशा की तरह जीरो हैं। जैकलीन बहुत ही चुलबुली लगती हैं लेकिन उनका रोल बहुत ही कम है। इंटरवल से पहले तो वे एक ही सीन में नजर आती हैं। वे अगर अच्छे रोल चुनें तो उनका कैरियर पटरी पर आ सकता है। वरुण धवन ने रोल अच्छा किया है। या यूं कहें कि उनके लिए अच्छे सीन लिखे गए हैं तो ज्यादा सही होगा। अक्षय खन्ना का विलेन के रूप में आना ये साबित कर रहा है कि उनके पास अब काम नहीं है और उन्हें कोई भी रोल मिले वे हां कर देंगे। अक्षय कुमार कैसे एक गे कैरेक्टर करने के लिए राजी हो गए ये समझ में नहीं आया। वे इतने बड़े स्टार हैं उन्हें ऐसे रोल में देखना अजीब लगा। वैसे वे हंसा जाते हैं लोगों को। नरगिस फाखरी क्यों बालीवुड में हैं समझ से बाहर है। दो सीन हैं उनके और उसमें से एक में वे बिकिनी में ही रही हैं।

कुल मिलाकर यदि फिल्म से वरुण धवन को निकाल दिया जाए तो इसमें कुछ भी देखने के लायक नहीं बचेगा। आप किसी के कहने में न आएं। फिल्म बिल्कुल भी देखने के काबिल नहीं है। इस पर दस रुपये भी खराब न करें। बैटर ये होगा कि आप अगर वीकेंड पर फिल्में देखने के आदी हैं तो एक बार 'सुल्तान’ ही दोबारा देख लें।

- हर्ष कुमार सिंह

Thursday, 7 July 2016

DEEP REVIEW [Business] : Salman Khan is only "Sultan" in Bollywood

सलमान तो बाक्स आफिस के 'सुल्तान’ हैं तो 'सुल्तान’ ही बनेंगे

Business Rating: 5*


मेगा स्टार अमिताभ बच्चन के बाद सलमान खान पहले सुपर स्टार हैं जिनके नाम पर ही लोग फिल्म देखने चले आते हैं। क्यों? जानिए इस बिजनेस रीव्यू में:-


जैसी की उम्मीद थी सलमान खान की ‘सुल्तान’ ने बाक्स आफिस पर सफलता का परचम लहरा दिया है। इस फिल्म में ऐसा कुछ भी नहीं है जो पहले नहीं दिखाया गया लेकिन फिर भी ये फिल्म एक ही दिन में 35 करोड़ रुपये से ऊपर कलेक्ट कर रही है। एक ऐसा आंकड़ा जो कई फिल्मों के लाइफटाइम बिजनेस से भी ज्यादा है। इस बार लगातार दो दिन तक इसके लिए मनपंसद सिनेमा में मनचाहे शो टाइम का मनचाहा टिकट ले पाने में विफल होने के बाद मैंने इस बार इस फिल्म का बिजनेस रीव्यू करने की कोशिश की और फिल्म डिस्ट्रीब्यूशन से जुड़े खास लोगों से भी बात की कि आखिर सलमान की फिल्म ही ऐसा बिजनेस क्यों कर रही है? वैसे मेरा मानना है कि यदि फिल्म के टिकट रेट न बढ़ाए जाते तो फिल्म और भी बड़ी ओपनिंग ले सकती थी। वीकेंड तक तो ठीक है लेकिन सोमवार से फिल्म के टिकट रेट कम करने ही होंगे।

पहली बार पहलवान का किरदार निभा रहे सलमान खान की इस फिल्म ने पूरे देश की तरह दिल्ली-एनसीआर में भी बंपर ओपनिंग ली। 5 दिन लंबे वीकेंड में यह फिल्म ओपनिंग के तमाम कीर्तिमान ध्वस्त कर हिंदी सिनेमा की पिछले कुछ सालों की सबसे बड़ी हिट साबित होने जा रही है। मैं समझ रहा था कि फिल्म का बिजनेस 'बजरंगी भाईजान’ के आसपास होगा लेकिन शायद ये फिल्म उसकी कलेक्शन तो पार नहीं कर पाए। 'बजरंगी भाईजान’ का बिजनेस 300 करोड़ के पार गया था। क्रिटिक्स का मानना है कि फिल्म का सेकेंड हाफ वीक है और 'बजरंगी भाईजान’ की तरह जोरदार क्लाइमेक्स इस फिल्म में नहीं है। फिर भी सलमान खान की फिल्म है और 200 करोड़ का आंकड़ा तो एक हफ्ते के भीतर ही पार कर सकती है।

'सुल्तान’ ईद पर रिलीज होनी है ये तो सबको साल भर पहले से ही पता था लेकिन इसका पहला वीकेंड पांच दिन लंबा होगा ये किसी ने नहीं देखा था। चूंकि ईद की तारीख पहले से फाइनल नहीं की जा सकती इसलिए अनुमान के आधार पर ही ये मान लिया गया था कि 6 जुलाई को ईद होगी और इसलिए बुधवार होने के बावजूद सारी स्क्रीन बुधवार से ही बुक कर ली गई। इससे पहले सलमान की 'किक’ वीरवार को रिलीज हुई थी। ईद 7 जुलाई की हो गई लेकिन इससे फिल्म की एडवांस बुकिंग पर फर्क नहीं पड़ा। बुधवार को दिल्ली में सारे शो एडवांस में ही फुल रहे। वीरवार को तो खैर ईद थी इसलिए यही हालत रही दूसरे दिन भी। मल्टीप्लेक्सों में कुछ सीट बहुत आगे की पंक्ति में पड़ जाने की वजह से जरूर खाली रह जाती हैं। चूंकि हर 20 मिनट में शो शुरू हो रहा है ऐसे में दर्शकों के पास च्वाइस है कि वह मनपसंद सीट न मिलने पर अगले शो में अपनी पसंद की सीट चुन ले। इसलिए कुछ सीट तो बच ही जाती हैं।

मशहूर फिल्म निर्माता-निर्देशक सुभाष घई की वितरण कंपनी मुक्ता आट्र्स के (दिल्ली-एनसीआर, वेस्ट यूपी व पंजाब) सीईओ संजय घई ने बताया कि दिल्ली व एनसीआर में लगभग 400 स्क्रीन हैं और सभी 'सुल्तान’ के लिए बुक हैं। उन्होंने बताया कि 400 स्क्रीन का मतलब है कि एक दिन में कम से कम 1700 शो चल रहे हैं और 90 से 100 प्रतिशत के बीच बुकिंग है। ऐसे में फिल्म की ओपनिंग का अंदाज लगाया जा सकता है। संजय घई से जिस समय मैंने बात की वो देहरादून में थे और वहां सपना सिनेमा की ओपनिंग में भाग ले रहे थे। संजय मुक्ता द्वारा दिल्ली-एनसीआर, वेस्ट यूपी व उत्तराखंड में संचालित की जा रही 50 से भी ज्यादा स्क्रीन का भी काम देखते हैं। उन्होंने बताया कि हर ओर सलमान ही सलमान की धूम है। संजय का मानना है कि सलमान खान की फिल्म की सबसे खास बात ये होती है कि उनकी फिल्में पूरी तरह से पारिवारिक होती हैं। उन्होंने आज तक आन स्क्रीन किसिंग सीन नहीं किया है। 'सुल्तान’ भी पूरी तरह से परिवार के साथ बैठकर देखने वाली फिल्म है।

वीरवार से ईद का जश्न शुरू हो गया है और ये कम से कम रविवार तक पूरे जोर से चलना तय मानिए। ऐसे में एक दिन का बिजनेस पूरे देश में कम से कम 35 करोड़ भी लगा लिया जाए तो 175 करोड़ से ज्यादा का बिजनेस तो इसी हफ्ते मान लीजिए। यहां ये ध्यान रखने वाली बात है कि पहले दिन की कलेक्शन 36 करोड़ रही जो सलमान की 'प्रेम रतन धन पायो’ (38) से कम रही। जबकि 'प्रेम रतन धन पायो’ को रीव्यू बहुत ही खराब मिले थे। 'सुल्तान’ के रीव्यू तो बहुत ही अच्छे हैं। इसका फायदा भी फिल्म को मिलना चाहिए। कोई माने या न माने लेकिन फिल्म के रीव्यू अच्छे आते हैं तो बिजनेस बढ़ता है। इसका ताजा उदाहरण है 'बाजीराव मस्तानी’।

दिल्ली में सलमान के फैंस की दीवानगी का आलम ये है कि बुधवार व वीरवार को कनाट प्लेस में मौजूद रीगल, रिवोली, ओडियन, प्लाजा सिनेमा में कहीं भी करंट की टिकट नहीं थी। एडवांस में ही सब स्क्रीन फुल थी। रीगल सिनेमा सिंगल स्क्रीन है और आज भी परंपरागत रूप से चार शो ही चलाता है। इसमें चार क्लास हैं और सबसे महंगा टिकट 120 से 150 के बीच ही रहता है लेकिन 'सुल्तान’ के लिए टिकट के रेट 200 रुपये कर दिए गए हैं।

एनसीआर में एक ही स्थान पर 15 स्क्रीन संचालित करने वाले उत्तर भारत के सबसे बड़े सिनेमा कांपलेक्स 'पीवीआर लॉजिक्स’ नोएडा सिटी सेंटर में 50 से भी ज्यादा शो एक ही दिन में हो रहे हैं। हर 20 मिनट में एक शो। यहां प्रीमियर श्रेणी (सबसे सस्ती क्लास) के शो में वीकेंड में 200 रुपये की टिकट रहती है लेकिन 'सुल्तान’ के लिए ये भी 300 रुपये कर दी गई है। जबकि यूपी में मनोरंजन कर दिल्ली से कम है। पीवीआर लॉजिक्स में ही मौजूद गोल्ड व आईमैक्स श्रेणी में टिकटों के रेट 800 से 2000 रुपये हैं लेकिन सब हाउस फुल हैं। फिल्म विशेषज्ञों का मानना है कि इसका बिजनेस 'बजरंगी भाईजानÓ, 'पीके’ से भी ज्यादा होगा।

मार्किटिंग का कमाल देखिये। ई वॉलेट साइट PayTM ने EIDwithSULTAN प्रोमो कोड दिया है और दो से ज्यादा टिकट लेने पर 100 रुपये कैश बैक की आफर है। इसके लिए बाकायदा लोगों को एसएमएस किए जा रहे हैं। ऐसे में फिल्म अगर थोड़ी बुरी भी है तो चल सकती है लेकिन ये फिल्म तो देखने वाले अच्छी ही बता रहे हैं ऐसे में इसे हिट होने से कौन रोक सकता है भला?


स्क्रीन: 
कुल 5450
भारत 4350
ओवरसीज 1100
दिल्ली-एनसीआर 400

- हर्ष कुमार सिंह




Friday, 3 June 2016

DEEP REVIEW: Housefull3

कम से कम एक बार तो देखी ही जा सकती है 'हाउसफुल 3'
RATING- 3*


'हाउसफुल-3' एक माइंडलैस कॉमेडी है। यानी दिमाग घर पर रखकर जाएं। ऐसा लगता है कि कॉमेडी फिल्मों की फ्रेंचाइजी  फिल्मकारों के लिए फायदे का सौदा साबित होती हैं। हाउसफुल पर तीन फिल्में बन चुकी हैं। इसके अलावा वेलकम, ग्रैंड मस्ती, गोलमाल सीरीज की भी कई फिल्में बन चुकी हैं। इन फिल्मों में निर्माताओं को सीमित निवेश में अच्छा खासा लाभ मिल जाता है और इसलिए इन फिल्मों में कहानी की कोई ज्यादा गुंजाइश नहीं होती। इन फिल्मों की सबसे खास बात ये होती है कि इनकी स्टार कास्ट भी जल्द ही फाइनल हो जाती है। जो कलाकार पहले की फिल्मों में काम कर चुके होते हैं उन्हें एकाध बदलाव के साथ अगली फिल्म में भी काम मिल जाता है। 'हाउसफुल' में अक्षय कुमार, जैकलीन फर्नांडीज, रीतेश देशमुख पहले से ही काम करते रहे हैं। अब अभिषेक बच्चन, लीजा हेडन व नरगिस फाखरी को भी जोड़ दिया गया। बोमन ईरानी तो स्थायी हैं ही। कुल मिलाकर कहने का मतलब ये है कि ये फिल्में केवल पैसा कमाने के लिए बनाई जाती हैं और लगता है कि 'हाउसफुल 3' भी पैसा कमा ही लेगी।

फिल्म में कई सीन ऐसे हैं जिन पर लोग खूब हंसते हुए नजर आते हैं। निर्देशक जोड़ी साजिद-फरहाद ने खुद ही कहानी व डायलाग लिखे हैं। लेखन का काम उन्होंने वैसा ही किया है जैसा कि इस तरह की फिल्मों के लिए जरूरी होता है। खासतौर से अंग्रेजी के शब्दों को हिंदी में अनुवाद करके डायलाग बना देने का अंदाज खास पसंद आएगा दर्शकों को। उदाहरण के तौर पर- सम टाइम बैक को घड़ी के पीछे, किक माई ऐस की जगह मेरे गधे पर मारो जैसे शब्दों का इस्तेमाल सभी कलाकारों से जमकर कराया गया है और लोग खूब हंसते हैं। फिल्म में अंग्रेजी का इस्तेमाल कुछ ज्यादा ही हुआ है। यहां तक की तीनों हिरोईन तो 90 प्रतिशत समय अंग्रेजी में ही बात करती नजर आती हैं।ऐसे में इस फिल्म में मल्टीप्लैक्स की आडियंस के लिए तो बहुत कुछ है लेकिन सिंगल स्क्रीन के लिए कुछ ज्यादा नहीं है। फिल्म में एक्शन बिल्कुल नहीं है। क्लाइमैक्स में कुछ एक्शन की गुंजाइश थी लेकिन डायरेक्टर ने वैक्स म्यूजियम का सीन डालकर उसकी संभावनाओं को कम कर दिया। उनकी लक्ष्य लोगों को हंसाने का था और उसमें वे सफल रहे हैं।
फिल्म की कहानी लंदन के रईस बटुक (बोमन ईरानी) की तीन बेटियों गंगा, जमुना व सरस्वती (जैकलीन, लीजा और नरगिस) की है। तीनों अपने प्रेमियों (अक्षय कुमार, रीतेश और अभिषेक) से शादी करना चाहती हैं लेकिन बटुक, जो वास्तव में उनका पिता नहीं है, चाहता है वे तीनों उसके तीन बेटों से शादी करे जिससे वह उनके असली पिता व अंडरवल्र्ड डॉन ऊर्जा नागरे (जैकी श्राफ) की सारी संपत्ति हड़प सके। नागरे ने पुलिस के हाथों गिरफ्तार होने के बाद बटुक को अपनी बेटियों के साथ बचपन में ही लंदन भेज दिया था। वे तीनों बटुक को ही अपना पिता मानती थीं। अंत में नागरे जेल से छूटकर लंदन ही पहुंच जाता है। बटुक की पोल खुलती है और बाप को बेटियां व बेटियों को उनके प्रेमी मिल जाते हैं। इससे पहले बोमन का बेवकूफ बनाने के लिए तीनों हीरो उसकी बेटियों की सहमति से अंधा (रीतेश), लंगड़ा (अक्षय) और गूंगा (अभिषेक) बनकर आते हैं और खूब कॉमेडी होती है।
वैसे फिल्म कहानी के फ्रंट पर बहुत कमजोर है लेकिन फिल्म को संवाद अच्छे मिल गए हैं और सारी भरपाई हो जाती है। कुछ कमजोरियां भी हैं। जैसे- पहले ही सीन में तीन नकाबपोश लंदन में हीरों की चोरी करते हुए दिखाए जाते हैं। ये सीन काफी लंबा है और बहुत ही स्टाइलिश है। सब समझते हैं कि शायद ये तीनों नायक ही हैं लेकिन निकलते हैं बटुक के खलनायक टाइप बेटे। ये बात समझ में नहीं आती कि फिल्म के पहले ही सीन में इन तीनों को नायकों की तरह से क्यों दिखाया गया जबकि उन्हें इंटरवल के समय जेल से बाहर आते हुए ही वापस दिखाया जाना था। उन्हें जेल ही भेजा जाना था तो किसी भी मामले में भेजा जा सकता था, या पहले से ही जेल में दिखाया जा सकता था। केवल उन्हें खलनायक दिखाने के लिए शायद यह सीन क्रिएट किया गया।

फिल्म में जिस तरह से कलाकारों की भीड़ है उसमें सबके लिए करने को बहुत ही सीमित संभावनाएं थी। फिर भी जिस तरह से कलाकारों को मौके दिए गए हैं उससे लगता है कि अक्षय कुमार व जैकलीन की जोड़ी निर्माता-निर्देशक की फेवरेट रही। अक्षय तो खैर बड़े स्टार हैं ही, उन्हें ज्याादा स्पेस मिलना ही था। उनके किरदार को दो तरह की पर्सनेलिटी (सैंडी और सुंडी) में तब्दील करके उनके लिए गुंजाइश बढ़ा दी गई और अक्षय ने मौके का पूरा फायदा भी उठाया। खासतौर से सुंडी के किरदार में उन्होंने मजा लगा दिया।
हिरोईनों में जैकलीन को ज्यादा तवज्जो दी गई है। वह 'हाउसफुल' के हर भाग में रही हैं इसलिए उन्हें मेन रोल में रखा गया। वैसे जैकलीन ने मौके का फायदा भी खूब उठाया। वे तीनों हिरोइनों में सबसे ज्यादा आकर्षक भी लगी हैं। उन्होंने अपने अभिनय, नृत्य व हाव-भाव सभी में सुधार दिखाया है। वे आत्मविश्वास से लबरेज हैं और उनमें बड़ी स्टार बनने के तमाम गुण मौजूद हैं। फिल्म देखने के बाद ये साफ हो गया कि क्यों नरगिस फाखरी निर्माता से नाराज हो गई और प्रमोशन में बहुत कम नजर आई। उनका रोल बहुत ही कम है। गानों में भी जैकलीन को हाईलाइट किया गया है। दूसरे कलाकारों में अभिषेक व रीतेश ने अच्छी कॉमिक टाइमिंग दिखाई है। अभिषेक ने पहली बार कॉमेडी की कोशिश की है और वे अच्छी खासी कॉमेडी कर लेते हैं। नरगिस व लीजा के लिए करने को कुछ था ही नहीं और न ही उन्होंने कुछ करने की कोशिश की है। कुछ स्थानों पर हिरोइनों के मेकअप में खामियां नजर आती हैं। चेहरे पर पिंपल तक साफ नजर आ जाते हैं। लीजा के लिप कलर तक कई बार उड़े व खराब तरीके से लगे नजर आते हैं। ये कमियां मल्टीप्लैक्स आडियंस आसानी से पकड़ लेती है। 
गीत संगीत अच्छा है। कोई भी गीत बहुत बड़ा हिट नहीं है लेकिन दो गीत ठीक-ठाक हैं और देखते समय सुनने में भी अच्छे लगते हैं। फिल्म का मकसद सबको हंसाना था और इसमें ये सफल रहती है।  फिल्म में अगर रीतेश देशमुख के कुछ डबल मीनिंग संवादों को छोड़ दिया जाए तो ये एक फैमिली फिल्म है और एक बार परिवार के साथ वीकएंड पर देखी जा सकती है। 


- हर्ष कुमार सिंह

Friday, 20 May 2016

DEEP REVIEW: Sarbjit- watch it for Randeep Hooda only

सरबजीतः रणदीप हुड्डा के बेमिसाल अभिनय के लिए देखें 

RATING- 4*

पाकिस्तान की जेल में कई साल तक बंद रहने के बाद वहां कैदियों द्वारा मार दिए गए भारतीय कैदी सरबजीत का कहानी को अखबारों में पढ़ा तो आप सबने होगा लेकिन इसे फिल्म के रूप में देखना एक अलग ही अनुभव है। कमजोर निर्देशन के बावजूद फिल्म प्रभाव छोड़ने में सफल रहती है। जब आप सिनेमाहाल से बाहर निकलते हैं तो दिमाग में सरबजीत के रूप में रणदीप हुड्डा ही छाए रहते हैं। उन्होंने किरदार को जीवंत कर दिया है, अभिनय से भी और अपने शरीर से भी। अच्छी फिल्म के शौकीनों को कम से कम एक बार जरूर ये फिल्म देखनी चाहिए।

सरबजीत से पहले बाक्सर मैरीकाम की लाइफ पर फिल्म बना चुके ओमंग कुमार ने एक बार फिर अच्छा प्रयास किया है लेकिन जो कमी ‘मैरीकाम’ में रह गई थी वो ‘सरबजीत’ में भी है। लगता है कि फिल्म जल्दी निपटाने के चक्कर में ओमंग कलाकारों को रीटेक का मौका ज्यादा नहीं देते। कुछ सीन अच्छे लिखे गए हैं लेकिन उन्हें बहुत ही जल्दबाजी में शूट किया गया है इसलिए वे प्रभावित नहीं कर पाते। जेल में बंद कैदी सरबजीत के रूप में रणदीप हुड्डा ने कमाल कर दिया है। अपने शरीर को जिस तरह से उन्होंने उन प्रताडना भरे लम्हों के लिए तैयार किया है वो बालीवुड के दूसरे अभिनेताओं के लिए सबक देने वाला है। पिछले कुछ साल में तो किसी अभिनेता ने ऐसा जीवंत कैरेक्टर नहीं निभाया है। कई बार तो रणदीप को देखकर ऐसा प्रतीत होने लगता है कि वह वास्तव में सरबजीत ही हैं। पाकिस्तान की जेल में उन्हें यातनाएं देकर विकलांग बना दिया जाता है उसके बाद तो हुड्डा ने अपनी संवाद अदायगी ही बदल दी। टूटे हुए दांतों से सिसक-सिसककर बाहर आती आवाज ने उनके अभिनय में और भी चार चांद लगा दिए हैं। ये रणदीप हुड्डा के कैरियर की सबसे बेहतरीन फिल्म है और निश्चित रूप से उन्हें इससे बहुत फायदा मिलने वाला है। पुरस्कार तो मिलेंगे ही।
कायदे से सरबजीत पंजाब के उस नौजवान की कहानी है जो शराब के नशे में गलती से बोर्डर पारकर पाकिस्तान की सीमा में चला जाता है और पाकिस्तानी रेंजर उसे जासूस समझकर धर लेते हैं। इसके बाद सिलसिला शुरू होता है संघर्ष का। सरबजीत की बहन दलबीर कौर (ऐश्वर्या राय) उसे छुड़ाने के लिए कई साल तक संघर्ष करती है। सरबजीत की पत्नी (रिचा चड्ढा) व उसकी दो बेटियों व एक बूढ़े पिता के संघर्ष की कहानी भी साथ-साथ चलती है। सरबजीत 1990 में पाकिस्तान की सीमा में घुसा था और 2 मई 2013 को उसकी लाहौर की कोट लखपत जेल में कुछ कैदियों ने हत्या कर दी थी। चूंकि घटनाक्रम लगभग 23 साल के अंतराल को लेकर था इसलिए घटनाक्रम बहुत तेजी से चलता है। कहानी में वास्तविकता का पुट होने के कारण नकारात्मकता बेहद है इसलिए बीच-बीच में फ्लैशबैक में सरबजीत की जवानी के सीन व पति पत्नी के बीच के रोमांस आदि से जुड़े सीन भी रखे गए हैं लेकिन यकीन मानिये इनमें किसी की दिलचस्पी नहीं पैदा होती, बल्कि ये बाधा ही बनते हैं। सब सरबजीत व दलबीर की कहानी ही देखना चाहते हैं।

ऐश्वर्या राय के लिए ये टेलर मेड रोल था। एक युवती से बुजुर्ग महिला के किरदार तक, रोल को निभाने के लिए उन्होंने बहुत मेहनत की है और वे दलबीर कौर को जीने में सफल रही हैं। हालांकि जिन लोगों ने दलबीर कौर को देखा है तो वे समझ सकते हैं कि दोनों की शारीरिक संरचना में कोई समानता नहीं है। फिर भी सवाल ये था कि इस किरदार को निभाता कौन। किसी नई कलाकार को लिया जाता तो फिल्म की बाक्स आफिस पर पकड़ कमजोर हो जाती। रणदीप ने उम्र बढ़ने के साथ-साथ अपने शरीर को उसी तरह से ढाला है लेकिन ऐश्वर्या राय को मेकअप में उतनी सावधानी नहीं बरती गई। उनके बाल जरूर सफेद हो जाते हैं लेकिन चेहरे पर रौनक बनी रहती है जो बहुत बड़ी खामी है। निर्देशक ने ऐसी गलती कैसे कर दी ?
जैसा कि मैंने लिखा है ओमंग कुमार सीन जल्दी में फिल्माते हैं और इसकी वजह से सीन प्रभाव पैदा नहीं कर पाते। उदाहरण के तौर पर वो सीन देखें जहां पाकिस्तान में सरबजीत के दूसरे वकील (दर्शन कुमार) को अपना ही पुतला जलाते हुए दिखाया गया है। ये सीन इतनी तेजी से आता है और खत्म हो जाता है कि दर्शक ये भी समझ नहीं पाते कि आखिर हुआ क्या है। ये सीन बहुत ही बेहतरीन लिखा गया है और इसे और थोड़ी गंभीरता से फिल्माया जाता तो ये अपना प्रभाव छोड़ने में सफल रहता और लोग इस सीन के मर्म को भी समझ पाते। इस तरह की गलती कई सीन में की है ओमंग कुमार है। लगता है कि उन्हें केवल सरबजीत व दलबीर के किरदारों में ही ज्यादा दिलचस्पी थी। उन्हें ही ज्यादा तवज्जो दी गई है। रिचा चड्ढा जैसी अच्छी कलाकार को वेस्ट कर दिया गया है। उन्हें फिल्म के अंत में एक ही सीन करने को मिला और उसी में वे छा गई।
फिल्म का संगीत भी बहुत कमजोर है। एक भी गीत प्रभावित नहीं करता। हालांकि फिल्म देखते समय सभी गीत ठीक-ठाक लगते हैं लेकिन हॉल से निकलने के बाद एक भी याद नहीं रहता। ‘मैरीकॉम’ में भी ऐसा ही हुआ था। संगीत अच्छा हो तो फिल्म की रिपीट वैल्यू बढ़ जाती है। ‘एयरलिफ्ट’ भी सच्चे घटनाक्रम पर आधारित थी लेकिन तीन गाने अच्छे होने के कारण उसकी सफलता भी बड़ी ही रही। अब देखना ये है कि ‘सरबजीत’ का बाक्स आफिस पर भविष्य क्या होता है।

नोटः अगर आप अच्छे अभिनय पर आधारित फिल्म देखने के इच्छुक हैं तो ये फिल्म आपके लिए है। रणदीप के लिए ये फिल्म देखें।

- हर्ष कुमार






Friday, 29 April 2016

DEEP REVIEW: Baaghi- an overdose of action

बागीः एक्शन के बोझ से दबी हुई एक कमजोर फिल्म

RATING- 1*
जब सलमान खान ने ‘मैंने प्यार किया’ (1989) के साथ जोरदार एंट्री की थी तो उन्हें उसी वक्त ये बात समझ आ गई थी कि उनसे अब लोगों की अपेक्षाएं बहुत ज्यादा हैं। ऐसे में उन्हें सोच समझकर फैसला लेना होगा कि उनकी अगली रिलीज कौन सी होनी चाहिए। उस समय वे दो फिल्में कर रहे थे। एक तो सुपर हिट डायरेक्टर सावन कुमार की ‘सनम बेवफा’ और दूसरी दीपक शिवदासानी की ‘बागी’। सावन कुमार बड़ा नाम थे और उनकी फिल्म पूरी तरह तैयार भी थी लेकिन सलमान ने अपनी दूसरी रिलीज ‘बागी’ को बनाया। ‘बागी’ रोमांस व एक्शन से भरपूर फिल्म थी। युवा दर्शक जो सलमान के पीछे पागल हो चुके थे उन्हें ‘बागी’ में सलमान का अवतार बहुत पसंद आया। बाद में ‘सनम बेवफा’ भी रिलीज हुई और बहुत बड़ी ब्लाकबस्टर साबित हुई। तब से आज तक सलमान ने पीछे मुड़कर नहीं देखा है।
इस कहानी को यहां बताने का उद्देश्य मेरा केवल इतना था कि टाइगर श्राफ व श्रद्धा कपूर जैसे उभरते सितारों को भी फिल्म साइन करने से पहले उसकी कहानी पर जरूर गौर करनी चाहिए। श्रद्धा कपूर की कई फिल्में आ चुकी हैं। वे बहुमुखी-प्रतिभाशाली हैं और बड़ी सफलता का स्वाद चख चुकी हैं। उनके लिए तो कोई खतरा नहीं है लेकिन टाइगर की ये केवल दूसरी फिल्म है ऐसे में उन्हें बहुत सोच समझकर फिल्में करनी होंगी। क्योंकि उनकी सीमाएं हैं। ‘बागी’ में टाइगर को एक्शन करने के अलावा कुछ भी नहीं करना था और डायरेक्टर ने इतना एक्शन फिल्म में भर दिया कि कहानी उसके बोझ तले दबकर मर ही जाती है।
फिल्म में कहानी बिल्कुल नहीं है। केवल एक्शन ही एक्शन है और कंफ्यूज निर्देशक साबिर खान (उन्होंने ‘हीरोपंती’ में टाइगर को लांच भी किया था) शुरू से आखिर तक ये ही तय नहीं कर पाए कि वे रोमांटिक फिल्म बनाना चाह रहे हैं, एक्शन फिल्म बनाना चाह रहे हैं या दक्षिण भारत की एक मार्शल आर्ट को प्रमोट करना चाह रहे हैं। बस जैसे ही उन्हें लगने लगता है कि फिल्म सुस्त हो रही है वे टाइगर के लिए एक एक्शन सीन लेकर आ जाते हैं और बाकी सारा काम तो एक्शन डायरेक्टर को ही करना होता है। टाइगर श्राफ ने अपने शरीर को इस तरह से गढ़ा है कि एक्शन सींस में वे कमाल कर देते हैं लेकिन इसके अलावा वे कुछ भी नहीं कर पाते। जब वे डांस करते हैं तो बिल्कुल भी नेचुरल नहीं लगते। बल्कि ऐसा लगता है कि जैसे वे एक्शन ही कर रहे हैं। ये हकीकत है और उन्हें इससे बचना होगा। वे हृतिक रोशन नहीं हैं। ना ही उनके पीछे राकेश रोशन जैसा घर का डायरेक्टर है जो लगातार हिट फिल्में बनाता रहेगा। अगर अच्छा निर्देशक न हो तो हृतिक रोशन भी एक बहुत ही सतही किस्म के एक्टर बन जाते हैं। टाइगर की तो खैर बात ही छोड़िए वे तो बिल्कुल नए हैं।
‘बागी’ का कहानी कुछ तो है ही कमजोर ऊपर से फ्लैश बैक में सब कुछ दिखाने के चक्कर में फिल्म को और अधिक उबाऊ बना दिया गया है। श्रद्धा कपूर पर टाइगर व खलनायक सुधीर बाबू (तेलुगु फिल्मों के जाने-माने कलाकार व पूर्व बैडमिंटन स्टार) दोनों ही फिदा हैं। सुधीर पहले ही सीन में श्रद्धा को किडनैप करके थाईलैंड ले जाते हैं। टाइगर उसे छुड़ाने के लिए वहां जाते हैं और खूब एक्शन करके अपने काम में सफल रहते हैं। बस ये ही कहानी है बाकी सब कुछ मसाला है।
फिल्म में एक के बाद एक कई गीत भी आते हैं लेकिन इनमें से कोई भी ऐसा नहीं है जिसे आप थियेटर से बाहर आकर याद रख सकें। यानी जब भी कोई गीत आता है तो लगता है कि उसे ठूंसा गया है और जबरन उसकी सिचुएशन बनाई गई है। गानों से बेहतर तो सुनील ग्रोवर हैं। वे श्रद्धा के पिता के रोल में जब भी आते हैं तभी गुदगुदा जाते हैं। उनकी कॉमिक टाइमिंग गजब की है और वे फिल्मों में कॉमेडियन के रूप में अपनी जगह बना सकते हैं।
प्रतिभा व एक्टिंग के मामले में श्रद्धा कपूर बाजी मारती हैं। कमजोर कहानी व निर्देशन के बावजूद वे अपनी छाप छोड़ने में सफल रहती हैं। उनकी आवाज इतनी मधुर है कि संवाद बोलते समय भी उसमें एक खनक महसूस होती है। श्रद्धा अपनी सिंगिंस को भी सीरियसली लें तो उनके लिए बेहतर होगा। वे पहले भी गाती रही हैं और उन्हें इसे जारी रखना चाहिए। इस फिल्म में वे सुंदर भी लगती हैं लेकिन डायरेक्टर ने एक तरह से उन्हें वेस्ट ही किया है। उनका सारा ध्यान केवल टाइगर पर था। जबकि फिल्म में लंबे-लंबे एक्शन सींस ने टाइगर के अंदर के कलाकार को बाहर ही नहीं आने दिया। टाइगर की डायलाग डिलीवरी बहुत ही कमजोर है। वे हिंदी सही तरह से नहीं बोल बाते। ये उनके लिए घातक साबित हो सकता है। पहले रणवीर सिंह के साथ भी कुछ ऐसा ही महसूस होता था लेकिन बाजीराव के रोल में उन्होंने शुद्ध हिंदी में संवाद बोलकर ये सिद्ध कर दिया कि इरादा मजबूत हो तो कुछ भी संभव है। टाइगर को ऐसा ही करना होगा। उन्हें बहुत कुछ सीखना होगा।

दो सवालः
1. कोई बताएगा कि फिल्म में बार-बार बारिश क्यों आती थी?
2. श्रद्धा कपूर को भी एक्शन में इतना परफेक्ट क्यों दिखाया गया, टाइगर तो उन्हें बचाने के लिए आ रहे थे?

- हर्ष कुमार

Thursday, 14 April 2016

DEEP REVIEW: Ki & Ka- A must watch, movie with a message

की एंड काः नसीहत कम सबक ज्यादा, देखें जरूर 

RATING- 4*


अक्सर हमें निजी व सार्वजनिक जीवन में ऐसे तमाम उदाहरण मिलेंगे जहां महिलाओं, खासकर प्रतिभाशाली महिलाओं, को घर की चौखट के अंदर रसोई में मरते-खपते देखते हैं। इसके लिए उन्हें कभी कोई क्रेडिट नहीं दिया जाता, ये कहकर कि ये तो उनका काम है। कभी ये किसी के दिमाग में नहीं आया कि क्या मर्द भी औरतों की भूमिका में आ सकते हैं ? हमेशा चुनौतीपूर्ण विषयों पर फिल्में बनाने वाले डायरेक्टर आर बल्की ने इस बार इसी मसले पर फिल्म बनाई है। फिल्म एक प्रयोग के साथ शुरू होती है और बहस करते हुए समाधान पर खत्म होती है। ये बात और है कि अपनी बात कहने के लिए फिल्म में कुछ नाटकीयता भी रखी गई है लेकिन फिल्म अपने मकसद में पूरी तरह कामयाब रहती है।

फिल्म की समीक्षा इसकी रिलीज के दूसरा हफ्ता खत्म होने पर करने की सबसे बड़ी वजह ये है कि फिल्म के प्रोमो व इसके बारे में आ रहे इंप्रेशन से इसे देखने का मन ही नहीं हो रहा था। पर फिल्म के बारे में अलग-अलग माध्यमों से कई तरह का फीडबैक मिल रहा था और खासतौर से करीना कपूर के अभिनय के बारे में जो प्रतिक्रियाएं आ रही थी उसी की वजह से फिल्म मैंने देखी। फिल्म देखने के बाद लगा कि अगर नहीं देखता तो गलती होती। फिल्म अपने विषय को पूरी ईमानदारी के साथ फोकस करती है। अगर औरतें चूल्हा चौका कर सकती हैं तो मर्द क्यों नहीं। जिस तरह से हर सफल आदमी के पीछे एक औरत का हाथ होता है उसी तरह से एक सफल औरत के पीछे मर्द का हाथ क्यों नहीं हो सकता।

फिल्म की सबसे बड़ी खासियत है इसकी परेफेक्ट कास्टिंग। करीना व अर्जुन कपूर इस प्रयोगधर्मी फिल्म के लिए एकदम फिट हैं। करीना उम्र में अर्जुन से बड़ी हैं और वर्किंग हैं। दूसरी ओर अर्जुन आईआईएम-बी का टापर है लेकिन फिर भी सफलता की अंधी दौड़ में शामिल नहीं होना चाहता। वह चाहता है कि जिस तरह से उसकी मां ने अपने घर-परिवार के लिए अपना सब कुछ दे दिया वह भी कुछ ऐसा ही करे। इसके पीछे अर्जुन का तर्क है कि घर चलाना और संवारना एक आर्ट है और इसलिए उसकी मां एक बड़ी आर्टिस्ट थी। अर्जुन के पिता (रजत कपूर) दिल्ली के सबसे बड़े बिल्डर हैं और दूसरे पिताओं की तरह चाहते हैं कि वह उनका कारोबार संभाले। शुरू में करीना को भी यह लगता है कि शायद वह मजाक कर रहा है लेकिन अर्जुन गंभीरता से अपने काम को लेता और शादी के पहले दिन से ही कुशल ग्रहणी की तरह अपना जिम्मेदारी संभाल लेता है। जो चुनौतियां उसके सामने आनी थी वो आती हैं और अंत में वह यह साबित करने में सफल होता है कि मर्द भी किसी से कम नहीं।

फिल्म में कई बार मौके आते हैं जब झूठ का सहारा लिया जा सकता था लेकिन बल्की ने ऐसा नहीं किया और अपने विषय के प्रति ईमानदार रहे। अलबत्ता ये बात और है कि जिस वर्ग के किरदारों के माध्यम से उन्होंने अपने सच को स्थापित किया है वह वर्ग ही फिलहाल इसे स्वीकार कर सकता है। आम भारतीय समाज में शायद इस तरह के प्रयोग न चल पाएं। बहरहाल बल्की की तारीफ की जानी चाहिए कि उन्होंने इस विषय पर फिल्म बनाई और काफी हद तक दर्शकों को आकर्षित करने में भी सफल रहे।

अभिनय के लिहाज से करीना कपूर सब पर भारी पड़ती हैं। वे यह साबित कर देती हैं कि अगर उन्हें अच्छा रोल मिले और निर्देशक थोड़ी सी छूट दे दे तो वे कमाल कर सकती हैं। उनका अभिनय ‘जय गंगाजल’ की प्रियंका व ‘नीरजा’ की सोनम कपूर से कहीं ऊंचे दर्जे का है। वे कहीं भी नाटकीय नहीं होती। बेहद सुंदर लगती हैं और एक कामकाजी महिला के किरदार को उन्होंने इतने बेहतरीन तरीके से निभाया है कि कहीं लगता ही नहीं कि वे अभिनय कर रही हैं। दफ्तर की कामकाजी महिला के अलावा अपने पति के साथ रोमांस करने के लिए उत्तेजित महिला के चरित्र को भी उन्होंने शानदार तरीके से निभाया है। उनके कास्ट्यूम भी बेहतर डिजाइन किए गए हैं। अगर बेस्ट सीन की बात करें तो करीना अस्पताल में जब अर्जुन पर फटती हैं तो कमाल कर देती हैं। उनके अभिनय के सामने आज के दौर की तमाम हिरोइन बौनी नजर आती हैं।
अर्जुन कपूर अब तक जिस तरह के रोल करते रहे हैं उससे अलग नजर आए हैं और दर्शकों को खूब भाते हैं। खासतौर से जब वे अपनी जीवनशैली को लेकर टीवी पर इंटरव्यू देते हैं तो बहुत ही सहज और वास्तविक नजर आते हैं। रोमांटिक सीन में उनकी करीना के साथ जबर्दस्त कैमिस्ट्री नजर आई है। सारे रोमांटिक सीन बहुत ही कमाल के हैं और बेहतरीन तरीके से फिल्माए गए हैं। एक सीन के लिए अमिताभ बच्चन व जया बच्चन भी आए हैं और फिल्म के एक खास मोड़ पर उनके किरदार कहानी के लिए सहायक साबित होते हैं।
संगीत के लिहाज से भी फिल्म ठीक-ठाक है। गीत भले ही सुनने में एक ही (हाई हील) अच्छा है लेकिन फिल्म देखते समय वे सीन की डिमांड के हिसाब से बहुत ही अच्छे लगे हैं।
सीख:- अगर आप शादीशुदा हैं तो ये फिल्म मियां-बीवी के लिए है, और अगर शादी नहीं हुई और करने का इरादा है तो फिर तो इसे जरूर देखें, आपकी कुछ मुश्किल ही कम करेगी।

- हर्ष कुमार

Thursday, 10 March 2016

‘DOUBLE’ DEEP REVIEW: 'Neerja' & 'Jai Gangajal'

NEERJA- RATING- 3*

JAI GANGAJAL- RATING- 2*

 रीयल होकर भी रीयल नहीं लगती दोनों ही महिला प्रधान फिल्में 

सोनम और प्रियंका की बेस्ट फिल्म नहीं, कई कमजोरियां दोनों में 


शायद ये पहला मौका है कि दो फिल्मों का रीव्यू एक साथ कर रहा हूं। पहले किसी ने ऐसा नहीं किया है लेकिन मेरा इरादा कोई ऐसा रिकार्ड बनाने का नहीं था। इसकी दो वजह थी- एक तो दोनों ही महिला प्रधान फिल्में हैं और दूसरे दोनों ही एक-दो हफ्ते के अंतर पर रिलीज हो रही थी। इसलिए मैंने तय किया कि इनका एक साथ रीव्यू किया जाए। पहले से ही ये तो पता चल रहा था कि ‘नीरजा’ सत्यकथा पर आधारित है लेकिन ट्रेलर व प्रोमो से ‘जय गंगाजल’ भी वास्तविक किरदारों के करीब ही जान पड़ रही थी। इसलिए फैसला किया कि इस बार कुछ नया तरीका अपनाया जाए और दो फिल्मों की समीक्षा को एक साथ किया जाए। देखते हैं कि ये प्रयोग कितना सफल रहता है और आप सबका फीडबैक कैसा मिलता है:-

‘नीरजा’ की सोनम कपूर और ‘जय गंगाजल’ की प्रियंका चोपड़ा, दोनों ही रीयल लाइफ कैरेक्टर हैं। नीरजा के बारे में तो सब जानते ही हैं और ‘जय गंगाजल’ की महिला आईपीएस अधिकारी जैसे किरदार आपको असली जिंदगी में देखने के लिए मिल जाएंगे। जो लोग यूपी, बिहार व मध्य प्रदेश जैसे राज्यों से संबंध रखते हैं वे इस तरह की महिला आईपीएस अफसरों को देख भी चुके होंगे। ‘जय गंगाजल’ में दावा किया गया है कि ये सत्य कथा पर आधारित नहीं है और काल्पनिक है लेकिन फिल्म देखकर आप भी समझ जाएंगे कि ये प्रकाश झा की अपनी ही फिल्म ‘गंगाजल’ की सीक्वल है। ‘गंगाजल’ की कहानी बिहार में हुए सच्चे वाकये पर आधारित थी और ‘जय गंगाजल’ में प्रकाश झा ने इसी तरह का एक काल्पनिक वाकया गढ़ा है। फर्क केवल ये कर दिया है कि इस बार उन्होंने सब्जेक्ट को बिहार में केंद्रित न करके मध्य प्रदेश से जोड़ दिया है। इसके पीछे उनका क्या तर्क है ये तो समझ से बाहर है लेकिन जिस तरह से किरदार बोलते हैं और व्यवहार करते हैं उसे देखकर लगता है कि हम बिहार या पूर्वी यूपी के किसी जिले की कहानी देख रहे हैं। ये निर्देशक की कमजोरी है। ऐसी ही कमजोरी नीरजा में राम माधवानी ने की है। उन्होंने सच्चे घटनाक्रम पर एक बहुत ही नकली फिल्म बनाई है। फिल्म में हवाई जहाज का सेट लगाया गया है जो बिल्कुल भी असली प्लेन की फीलिंग नहीं देता है। एक नहीं कई ऐसे मौके आते हैं जब ‘नीरजा’ में इस तरह की कमजोरियां नजर आती हैं।

दोनों ही फिल्मों में कई कमजोरियां कॉमन ही हैं। भले ही ये फिल्में प्रियंका चोपड़ा व सोनम के किरदारों के लिए लिखी गई हैं लेकिन यह कड़वा सच है कि दोनों में ही कुछ सहायक कलाकारों के कैरेक्टर व एक्टिंग मुख्य एक्टर पर भारी पड़ जाते हैं। ‘नीरजा’ में शबाना आजमी सबको पानी पिला देती हैं तो ‘जय गंगाजल’ में प्रकाश झा का पात्र दर्शकों के दिल को भा जाता है। ये तो गनीमत रही कि प्रकाश झा संभल गए और उन्होंने अंत में प्रियंका को ही फिल्म की हीरो बना दिया लेकिन ‘नीरजा’ में ऐसा नहीं हो पाया। नीरजा की मौत के एक साल बाद हुए कार्यक्रम में शबाना का स्पीच देने वाला सीन पूरी फिल्म पर भारी पड़ गया। ये सीन लोगों की आंखों में आंसू ला देता है जबकि ‘जय गंगाजल’ का क्लाईमैक्स अधूरा सा लगता है। बस एक एक्शन सीन में ही आईपीएस अफसर ने विधायक को ठिकाने लगा दिया ? शायद इसी फर्क की वजह से ‘जय गंगाजल’ उतना प्रभाव नहीं छोड़ पाई जितना कि ‘नीरजा’।

भले ही दोनों फिल्मों के रीव्यू में ये कहा जा रहा हो कि ये फिल्में प्रियंका व सोनम की बेस्ट फिल्में हैं लेकिन ऐसा है नहीं। प्रियंका चोपड़ा आईपीएस अफसर की वर्दी में जमती हैं लेकिन सोनम कपूर एयर होस्टेस के रूप में प्रभाव नहीं छोड़ती। वास्तविक नीरजा भनोट बेहद खूबसूरत थी और किसी सुंदर सी हिरोईन को इस रोल के लिए चुना जाता तो बेहतर होता। नीरजा भनोट की मां ने भी कहीं कहा था कि मेरी बेटी सोनम से सुंदर थी और उनकी ये बात सही है। दोनों ही फिल्मों में एक भी सीन ऐसा नहीं डवलेप किया गया है जिसमें प्रियंका व सोनम की एक्टिंग का लोहा आप मान सकें।

दोनों ही फिल्मों की सबसे बड़ी कमजोरी हैं इसके डायलाग। ‘नीरजा’ में तो दमदार डायलाग के लिए गुंजाइश कम ही थी और उसमें ठीक-ठाक संवाद लिखे गए हैं लेकिन ‘जय गंगाजल’ में तो इसकी अपार संभावना थी और यहां लेखक चूक गए हैं। कुछ सीन ऐसे थे जहां लेखक चाहता तो तालियां बजवा सकता था। उदाहरण के तौर पर जब प्रियंका प्रकाश झा से कहती हैं कि वर्दी की गंदगी को गंदे पानी से नहीं धोया जा सकता तो इसके जवाब में वे कह सकते थे कि मैं अपने खून से इसे धोऊंगा, तो तालियां बज जातीं।

दोनों ही फिल्मों के निर्देशकों ने नाटकीयता का सहारा ज्यादा लिया है। कहीं भी रीयल होने की कोशिश नहीं की। ‘नीरजा’ में हाईजैक हो चुके जहाज के भीतर का घटनाक्रम कुछ और लंबा व रोमांचक हो सकता था लेकिन ये बोझिल सा लगता है। दर्शक सोचता है कि जल्द ही सेना हमला करे और कहानी को खत्म करे। हालांकि ‘नीरजा’ में 30 साल पुराना घटनाक्रम दिखाया गया है और इस वजह से ये आज के संदर्भ में कमजोर लगती है लेकिन इससे पहले ‘एयरलिफ्ट’ में कुछ इसी तरह की हकीकत को बहुत ही रीयल तरीके से दिखाया गया था और उसे बहुत ही पसंद किया गया था। ‘जय गंगाजल’ में प्रकाश झा ने काफी रीयल होने की कोशिश की लेकिन वे ओवर हो गए। वे भूल गए कि वे माहौल तो जरूर वास्तविकता की ओर बनाने की कोशिश कर रहे हैं लेकिन वर्तमान समय में आए बदलावों के बारे में वे भूल ही गए। वे भूल गए कि आज के दौर में इस तरह का नंगा नाच संभव नहीं है जैसा वे दिखा रहे हैं। खुलेआम लोगों को मारा जा रहा है और किसी के पास कोई सबूत नहीं। हर किरदार पांच मिनट में आईफोन पर बात करता नजर आता है। यहां तक की आईफोन के फेसटाइम (वीडियो कॉलिंग) के जरिये विधायक को ये तक दिखा दिया जाता है कि बच्चे का अपहरण कर लिया गया है लेकिन जब सरे आम विधायक के आदमियों को पेड़ से लटकाकर मारा जाता है तो कोई उसकी मोबाइल से क्लिप नहीं बना पाता। चलो मान लिया कि आम पब्लिक ने जानबूझकर ऐसा किया क्योंकि वे विधायक के आदमियों से पीड़ित थे, लेकिन जब विधायक बबलू पांडे खुलेआम लोगों को देख लेने की धमकी देता है और पुलिस अफसर को बीच चौराहे पर अधमरा कर देता है तो आम पब्लिक में से तब भी कोई इसकी वीडियो नहीं बनाता या फोटो नहीं खींचता। ये बहुत बड़ी खामी है जो अखरती है। अजय देवगन की ‘गंगाजल’ तो उन्होंने उस दौर से ली थी जिस दौर में मोबाइल नहीं थे लेकिन ‘जय गंगाजल’ तो आज की फिल्म है इसमें ऐसी गलती कैसे हो गई प्रकाश झा से?

कुल मिलाकर बार ‘नीरजा’ एक बार देखने लायक फिल्म है। बच्चों के साथ इसे देखें तो बेहतर होगा क्योंकि फिल्म ये सिखाती है कि किसी भी हालात में हार नहीं माननी चाहिए लेकिन ‘जय गंगाजल’ में ऐसा कुछ नहीं है। ये फिल्म केवल हमारे पुलिस अफसरों व नेताओं को देखनी चाहिए और इससे सबक लेने का प्रयास करना चाहिए। पर ऐसा हुआ नहीं होगा।

- हर्ष कुमार सिंह


Friday, 5 February 2016

DEEP REVIEW: Ghayal once again - But don’t expect another Ghayal

सनी के फैन हैं तो जरूर देखें पर फिर से ‘घायल’ की उम्मीद न करें 

RATING- 2*

25 साल पहले आई ‘घायल’ अगर आपने देखी है तो आप उसकी एनर्जी, डायरेक्शन के लेवल, कलाकारों के दमदार अभिनय से अब तक जरुर जुड़े हुए होंगे। जब वह फिल्म आई तो उसने बाकी सभी फिल्मों को बौना साबित कर दिया था। 11 फिल्मफेयर पुरस्कार जीतकर इस फिल्म ने कामयाबी के झंडे गाड़ दिए थे। सनी देयोल के कैरियर की ट्रेड मार्क माइलस्टोन फिल्म ‘घायल’ के अलावा कोई दूसरी नहीं है। शायद यही वजह है कि बढ़ती उम्र के इस दौर में खुद को फिर से रिइस्टेबलिश करने के लिए सनी ने ‘घायल’ को हथियार बनाते हुए कम बैक करने की कोशिश की है।

अब घायल के निर्देशक राजकुमार संतोषी में भी वो बात नहीं रही और न ही वे ऐसी फिल्में बना रहे हैं। शायद इसलिए सनी ने डायरेक्शन का भी जिम्मा अपने ऊपर ले लिया। वैसे ये कोई पहला मौका नहीं है जब सनी ने निर्देशन किया है। करीब 15 साल पहले सनी ने ‘दिल्लगी’ बनाई थी जिसमें वे खुद, भाई बॉबी देयोल व उर्मिला मातोंडकर थे। फिल्म चली नहीं थी। वैसे आज आप ‘दिल्लगी’ देखेंगे तो ये आपके दिल को छू जाएगी। रोमांस से भरपूर व बिना एक्शन की इस फिल्म का आपको सब कुछ अच्छा लगेगा लेकिन चूंकि उस समय सनी देयोल एक्शन फिल्मों के बेताज बादशाह हुआ करते थे इसलिए दर्शकों ने उन्हें ऐसी फिल्म में नकार दिया था। अब खुद को व अपने बैनर ‘विजेता फिल्म्स’ की कमबैक कराने के लिए सनी ने फिर एक्शन की राह पकड़ी है और इस फिल्म में एक्शन ही एक्शन है।

25 साल पहले आई ‘घायल’ और अब ‘घायल वंस अगेन’ में एक पूरी पीढ़ी का अंतर आ गया है इसलिए फास्ट टेक्नोलोजी और यंग जनरेशन के प्रतिनिधि किरदारों का फिल्म में भरपूर इस्तेमाल किया गया है। चार युवा एक बड़े कारोबारी के बिगडैल बेटे की एक हत्या करते हुए वीडियो फुटेज अनायास ही हासिल कर लेते हैं। फुटेज हासिल करने के लिए कारोबारी अपनी पूरी ताकत लगा देता है और सारा सरकारी सिस्टम उसके बेटे को बचाने के लिए लग जाता है। उसकी मुश्किल उस समय बढ़ जाती है जब ये बच्चे एक सच्चे पत्रकार अजय मेहरा (सनी) की मदद लेते हैं। फिल्म के पहले हाफ में ये बच्चे उस फुटेज को अजय तक पहुंचाने के लिए जिस हिम्मत का परिचय देते हैं वो देखने वाला है। कम से कम एक घंटे तक चेज होती है जो बहुत ही रोमांचक तरीके से फिल्माई गई है। फिल्म कमजोर पड़ती है दूसरे हाफ में। पुरानी घायल से इस घायल को जोड़ने के लिए बार-बार इस्तेमाल किए गए फ्लैश बैक फिल्म को वीक बनाते हैं। उस समय तो फिल्म लगभग ढेर ही हो जाती है जब इन चार बच्चों में से एक लड़की सनी की बेटी निकल आती है। जहां पहले फिल्म ये सिखाने की कोशिश कर रही थी कि सच्चाई हर रिश्ते नाते संबंध से बड़ी होती है वहीं अंत में ये फिल्म केवल एक ही ढर्रे पर चल निकलती है कि मां-बाप के लिए औलाद से प्यारा कोई नहीं होता। सनी अपनी बेटी को बचाने के लिए विलेन के घर में हेलीकाप्टर लेकर घुस जाते हैं। एक्शन होता है और सनी सबको मार-पीटकर जीत हासिल करने में सफल होते हैं।

अगर आप सनी देयोल के फैन हैं तो ये फिल्म आपके लिए है। इसमें झुर्रियों से भरे चेहरे वाले सनी देयोल हैं जो समय-समय पर अपने पुराने तेवर में नजर आते दिखते हैं लेकिन ये कहना होगा कि सनी देयोल अभिनेता से बेहतर अच्छे डायरेक्टर हैं। कई बार वे अपनी निर्देशन क्षमता से प्रभावित करते हैं। फिल्म में शुरू में कथानक बहुत ही उलझे हुए तरीके से शुरू होता है लेकिन बाद में फिल्म एक ही पटरी पर दौड़ने लगती है। बस आप देखते जाइये, एक्शन होता रहता है और फिल्म कब खत्म हो जाती है पता ही नहीं चलता। सनी फिल्म में गति बनाने में सफल रहते हैं लेकिन पुरानी घायल से जुड़े किस्से फ्लैश बैक में दिखाने के चक्कर में वे फिल्म में बाधा खड़ी करते हैं।

ओम पुरी एकमात्र किरदार हैं जो पुरानी व नई घायल में कॉमन हैं। घायल में वे एक ऐसे पुलिस अफसर बने थे जो अजय मेहरा की मदद करता है। वे पुलिस की नौकरी छोड़ने के बाद आरटीआई एक्टिविस्ट के रूप में सक्रिय दिखाए गए हैं। लगता है कि वे कोई बड़ा खुलासा करेंगे और फिल्म आगे बढ़ेगी, लेकिन उन्हें मार दिया जाता है और फिर बदले की कहानी शुरू हो जाती है। शुरू में सनी अपने ‘आदर्श दोस्त’ ओम पुरी के लिए लड़ते हैं और फिर अपनी बेटी के लिए।

फिल्म में गीत-संगीत बिल्कुल नहीं है। जरूरत भी नहीं थी। बैकग्राउंड संगीत की ही जरूरत थी और उस पर काफी काम हुआ है। पुरानी घायल के बैकग्राउंड म्यूजिक की छाप लगातार इस पर बनी रहती है। एक्शन कुछ जगह पर जोरदार है। खासतौर से बच्चों के पीछे विलेन की फौज जिस तरह से टूट पड़ती है वो सीन जोरदार तरीके से शूट किया गया है। अलबत्ता एक्शन में एक कमी खलती है कि सनी देयोल कभी भी पुराने तेवर में नहीं दिखाए गए हैं। लगता है कि अब सनी देयोल का एक्शन होगा, अब सनी ढाई किलो का हाथ उठाएंगे लेकिन ऐसा होता नहीं। क्लाइमैक्स में वे जिस तरह से हेलीकाप्टर हाईजैक कर विलेन के घर में घुसते हैं वो बचकाना सा लगता है। यहां जोरदार एक्शन की गुंजाइश थी लेकिन चूक गए हैं।

बहरहाल सनी ने अपनी उम्र के हिसाब से किरदार प्ले करने का प्रयास किया है और वे सहज लगते हैं। ‘यमला पगला दीवाना’ जैसी बेहूदा कॉमेडी फिल्में उन पर नहीं जंचती हैं। थोड़ा वजन भी उनका ज्यादा बढ़ गया है उन्हें अपने समकालीन अनिल कपूर से सबक लेना चाहिए। फिल्म में विलेन राज बंसल के रूप में नरेंद्र झा ने जोरदार काम किया है। वैसे अनजाने में फिल्म एक सबक दे जाती है कि अगर जरूरत पड़े तो बच्चों को प्यार के साथ दो चार तमाचे भी लगा देने चाहिए नहीं तो वे बिगड़ जाते हैं और बेकाबू हो जाते हैं।

- हर्ष कुमार


Friday, 22 January 2016

DEEP REVIEW: Airlift- A strong film with good ‘Political Message’

एयरलिफ्टः  गंभीर राजनीतिक संदेश वाली मजबूत फिल्म 

 RATING- 4*

अक्षय ‘भारत’ कुमार की नई फिल्म ‘एयरलिफ्ट’ जो काम सबसे बेहतर तरीके से करने में सफल हुई है वो है ‘राजनीतिक मैसेज’ देने का काम। पिछले कुछ समय में भारत सरकार ने कुछ अशांत देशों में फंसे भारतीयों को निकालने के काम तत्परता और प्राथमिकता से किए हैं। इस फिल्म को देखने के बाद आपको आभास हो जाएगा कि इस तरह के अभियानों में तेजी की जरूरत क्यों आवश्यक है।
 -मुसीबत में फंसे लोगों पर क्या गुजर रही है उसे भारत में बैठे हुक्मरान व डिप्लोमेट नहीं समझ पाते। ये फिल्म यही सिखाने का संदेश सबसे पहले देती है।
 -इसके अलावा ये फिल्म उन लोगों को भी मैसेज देती है जो भारत से दूसरे देशों में जाते हैं और वहां पैसा कमाकर अपने देश को भूल जाते हैं। वे भूल जाते हैं कि उनकी सबसे बड़ी पहचान भारतीय होना ही है।
-तीसरा सबसे अहम व बड़ा मैसेज ‘एयरलिफ्ट’ यह देती है कि भारत से ज्यादा शांत व सुरक्षित देश कोई दूसरा नहीं हो सकता।

फिल्म की कहानी सच्ची घटना पर आधारित है। 90 के दशक में कुवैत में फंसे डेढ़ लाख भारतीयों को निकालने के लिए वहां रहने वाले कुछ भारतीयों के प्रयासों को ये फिल्म सलाम करने की सफल कोशिश करती है। फिल्म की पटकथा कसी हुई है और आपको एक मिनट के लिए भी अपनी सीट से हिलने की इजाजत नहीं देती। एक के बाद एक घटनाएं होती रहती हैं और फिल्म कब खत्म हो जाती है पता ही नहीं चलता।

फिल्म में गीत-संगीत को जितना जरूरी है उतना ही स्थान दिया गया है। क्लाइमेक्स के सींस में बजने वाला गीत दिल में देश के प्रति सम्मान की भावनाएं जगाने में सफल रहता है। फिल्म में गीत संगीत पर ज्यादा फोकस न करके स्क्रीनप्ले को गतिमान बनाए रखने पर जोर रहता है और इसलिए फिल्म अपेक्षित प्रभाव छोड़ने में सफल रहती है।

अक्षय कुमार फिल्म की जान हैं। वे इस रोल के लिए एकदम परफेक्ट हैं। बढ़ती उम्र के साथ जिस तरह के रोल वे कर रहे हैं वे उन्हें बतौर अभिनेता स्थापित कर रहे हैं। ‘होलीडे’, ‘बेबी’ और ‘एयरलिफ्ट’, लगातार तीन अच्छी फिल्में करने वाले अक्षय कुमार अब ‘मिशन-आपरेशन टाइप’ की फिल्मों के स्पेशलिस्ट बनते जा रहे हैं। वे इन रोल्स में जमते हैं और कभी ये नहीं लगता कि उनके अलावा भी कोई ऐसे किरदार निभा सकता है।

फिल्म में सबसे ज्यादा चौंकाया है निमरत कौर ने। लग नहीं रहा था कि अक्षय कुमार की फिल्म में हिरोईन भी अपना प्रभाव जमा सकती है। मुसीबत के समय अपने पति व परिवार के लिए चिंतित हो जाने वाली महिला के किरदार को उन्होंने बखूबी निभाया है। वे परिपक्व नजर आती हैं और ऐसे रोल्स के लिए परफेक्ट हैं। इंटरवल के बाद, एक सीन में जब वे अक्षय के समर्थन में रिफ्यूजी कैंप में अपना मत जाहिर करती हैं तो छा जाती हैं। आप ताली भी बजा सकते हैं। बहरहाल वे बालीवुड की टिपिकल हिरोइन के खांचे में फिट हो पाएंगी या नहीं ये देखने वाली बात होगी। उन्हें रोल चुनते समय ध्यान रखना होगा कि वो उन्हें फबता है या नहीं। कुछ वैसे ही जैसे विद्या बालन को करना होता है।

अगर आप अच्छी फिल्म देखने ही थियेटर जाते हैं तो इस फिल्म को जरूर देखें। खासतौर से युवा पीढ़ी जो खाड़ी संकट के इतिहास से वाकिफ नहीं हैं उन्हें ये फिल्म देखनी चाहिए। वैसे फिल्म जिस ईमानदारी से बनाई गई है उसे देखते हुए इसके बाक्स आफिस पर पैसा बरसाने की संभावनाएं कम हैं पर तारीफ खूब मिलने वाली हैं।

- हर्ष कुमार