शानदार अनुष्का शर्मा के लिए देखें 'जब हैरी मेट सेजल'
शाहरुख खान 50 की उम्र पार कर चुके हैं और इस फिल्म में वे बिल्कुल नहीं जमे हैं। सब जानते हैं कि अनुष्का शर्मा ने अपने कैरियर की शुरूआत शाहरुख के साथ (रब ने बना दी जोड़ी) ही की थी लेकिन दोनों की जोड़ी पसंद की गई थी यश चोपड़ा की 'जब तक है जान में' । यश चोपड़ा की अंतिम फिल्म थी और उसमें शाहरुख ने एक मैच्योर किरदार निभाया था जिसके साथ कम उम्र की एक लड़की एकतरफा प्यार में पड़ जाती है लेकिन बाद में शाहरुख अपने असली प्यार (कैटरीना) के साथ चले जाते हैं। उस कहानी में शाहरुख खान बहुत जमे थे लेकिन 'जब हैरी मेट सेजल' में यूरोप की गलियों में बिंदास और युवा अनुष्का के साथ लड़कों वाली हरकतें करते हजम नहीं होते। शाहरुख ने 'रईस' में एक्शन के साथ झटका खाने के बाद कुछ नया करने की कोशिश की और इम्तियाज अली को बतौर निर्देशक भी लिया लेकिन सब कुछ गड़बड़ हो गया।
इम्तियाज अली जिस तरह की फिल्में बनाते हैं वे शाहरुख खान के लिए सही नहीं हैं। शाहरुख खान ने फिल्म के लिए अपने गेटअप को बदलने व युवा दिखने की नाकाम कोशिश की है। ओपन चेस्ट शर्ट पहनना, सीने पर बड़ा सा टैटू बनाना और बिगडै़ल युवकों की तरह हरकतें भी खूब की हैं लेकिन वे जमते नहीं इस रोल में। रही सही कसर पूरी कर दी कमजोर कहानी में। आज के दौर की 90 प्रतिशत फिल्मों की तरह यह फिल्म भी बिना कहानी के शुरू की गई लगती है।
एक लाइन की कहानी है। सेजल यूरोप में अपने मंगेतर के साथ सगाई करने आती है लेकिन अपनी रिंग खो देती है। मंगेतर नाराज होता है तो रिंग ढूंढने के लिए यूरोप में रुक जाती है और अपने गाइड हैरी के साथ उन सब जगहों पर जाती है जहां-जहां वह घूमते समय गई थी। खुद को बिंदास व बोल्ड लड़की दिखाने के लिए सेजल खुद को हैरी की गर्लफ्रेंड बना लेती है और दोनों करीब आ जाते हैं। सेजल यह सोचने लगती है कि काश उसकी अंगूठी न मिले और उसका व हैरी का सफर यूं ही चलता रहे। पर अंगूठी तो उसके अपने पर्स में ही मिल जाती है। अंत में वह भारत लौट आती है और शादी से इनकार कर देती है। हैरी उसे ढूंढता हुआ भारत आता है और इसके बाद हैप्पी एंड। दोनों शादी कर लेते हैं और हैरी अपने साथ सेजल को लेकर पंजाब लौट जाता है।
इस जरा सी कहानी में झोल ही झोल हैं। पंजाब वाला एंगल फिल्म में क्यों डाला गया है समझ से परे है। सपने में बार-बार शाहरुख को ंपंजाब क्यों दिखता था यह समझाने में निर्देशक विफल रहे हैं। जबकि दर्शक सोच रहा होता है कि शायद इसकी भी कोई कहानी होगी। ढाई घंटे लंबी इस फिल्म में इम्तियाज अली ने संगीत के जरिये रंग भरने की कोशिश की है। जहां भी कहानी आगे बढ़ती नजर नहीं आती वहीं पर एक गाना डाल दिया गया है। हालांकि गाने इतने छोटे-छोटे हैं कि जल्दी ही निकल जाते हैं लेकिन कोई भी ऐसा नहीं है कि जिसे आप याद रख सकें या बार-बार सुन सकें। जबकि इससे पहले इम्तियाज की फिल्मों में संगीत बहुत ही मजबूत पक्ष रहा है।
कई बार तो ऐसा लगता है कि शाहरुख को इम्तियाज अली के साथ हर हाल में फिल्म करनी थी इसलिए कर ली। बिना कहानी के ही फिल्म शुरू हो गई, बन गई और रिलीज हो गई। संवाद भी संगीत की तरह ही कमजोर हैं। इस तरह की फिल्में संवादों के दम पर ही आगे बढ़ती हैं लेकिन यहां वह भी मिसिंग है। अभिनय के लिहाज से शाहरुख तो उम्दा हैं ही बस कमी यही है कि किरदार उन्हें सूट नहीं करता। अनुष्का शर्मा को तो मैं हमेशा बेहतरीन अदाकारा बताता रहा हूं। कैटरीना व प्रियंका से वे आगे निकल चुकी हैं। 'सुल्तान' जैसी फिल्म में भी अनुष्का ने अपनी उपस्थिति का अहसास करा दिया था। वे वर्तमान दौर की सबसे उम्दा अदाकारा हैं। उनमें ताजगी है और एक बिंदासपन है जो उन्हें करीना व दीपिका जैसी अभिनेत्रियों की श्रेणी में ला खड़ा करता है। यह अनुष्का ही हैं जो 'ऐ दिल है मुश्किल' व 'जब हैरी मेट सेजल' जैसी फिल्मों में भी दमदार काम करके दिखा देती हैं। मेरा मानना है कि यह फिल्म केवल अनुष्का के लिए तो देखी जा सकती है बाकी इसमें देखने लायक कुछ नहीं है।
इस फिल्म को मोबाइल पर देखने के लिए यहां क्लिक करें
शाहरुख खान जब से निर्माता बने हैं तब से उनकी फिल्मों के स्तर में गिरावट आई है। आमिर खान व सलमान खान उनसे बेहतर इसलिए हैं क्योंकि वे कहानी चुनने के बाद फिल्म में हाथ डालते हैं जबकि शाहरुख के साथ ऐसा नहीं है। उन्हें अपने समकक्ष अक्षय कुमार से सीखना चाहिए जो एक से एक विविधता वाली कहानी चुनते हैं और एक से एक बेहतरीन फिल्म करते हैं।
- हर्ष कुमार सिंह
Ratings- 2*
शाहरुख खान ने 'जब हैरी मेट सेजल' के साथ ट्रैक बदलने की नाकाम कोशिश की है। माना कि शाहरुख रोमांटिक फिल्मों के बादशाह रहे हैं लेकिन 90 के दशक में। आज के दौर में जिस तरह की रोमांटिक फिल्में बन रही हैं उनमें शाहरुख फिट नहीं बैठते। इम्तियाज अली इससे पहले 'तमाशाÓ बना चुके हैं जो बिल्कुल इसी तरह के कथानक पर आधारित थी। पर उसमें नायक के रूप में रनबीर कपूर थे और वे इस तरह की फिल्मों के मास्टर हैं। इससे पहले रनबीर ने 'ये जवानी है दीवानी में' भी इसी तरह का किरदार निभाया था और वह ब्लॉक बस्टर साबित हुई थी। हालांकि 'तमाशा' उतनी नहीं चली थी लेकिन जिस तरह के युवा किरदार को रनबीर ने निभाया था वो लोगों को पसंद आया था।शाहरुख खान 50 की उम्र पार कर चुके हैं और इस फिल्म में वे बिल्कुल नहीं जमे हैं। सब जानते हैं कि अनुष्का शर्मा ने अपने कैरियर की शुरूआत शाहरुख के साथ (रब ने बना दी जोड़ी) ही की थी लेकिन दोनों की जोड़ी पसंद की गई थी यश चोपड़ा की 'जब तक है जान में' । यश चोपड़ा की अंतिम फिल्म थी और उसमें शाहरुख ने एक मैच्योर किरदार निभाया था जिसके साथ कम उम्र की एक लड़की एकतरफा प्यार में पड़ जाती है लेकिन बाद में शाहरुख अपने असली प्यार (कैटरीना) के साथ चले जाते हैं। उस कहानी में शाहरुख खान बहुत जमे थे लेकिन 'जब हैरी मेट सेजल' में यूरोप की गलियों में बिंदास और युवा अनुष्का के साथ लड़कों वाली हरकतें करते हजम नहीं होते। शाहरुख ने 'रईस' में एक्शन के साथ झटका खाने के बाद कुछ नया करने की कोशिश की और इम्तियाज अली को बतौर निर्देशक भी लिया लेकिन सब कुछ गड़बड़ हो गया।
इम्तियाज अली जिस तरह की फिल्में बनाते हैं वे शाहरुख खान के लिए सही नहीं हैं। शाहरुख खान ने फिल्म के लिए अपने गेटअप को बदलने व युवा दिखने की नाकाम कोशिश की है। ओपन चेस्ट शर्ट पहनना, सीने पर बड़ा सा टैटू बनाना और बिगडै़ल युवकों की तरह हरकतें भी खूब की हैं लेकिन वे जमते नहीं इस रोल में। रही सही कसर पूरी कर दी कमजोर कहानी में। आज के दौर की 90 प्रतिशत फिल्मों की तरह यह फिल्म भी बिना कहानी के शुरू की गई लगती है।
एक लाइन की कहानी है। सेजल यूरोप में अपने मंगेतर के साथ सगाई करने आती है लेकिन अपनी रिंग खो देती है। मंगेतर नाराज होता है तो रिंग ढूंढने के लिए यूरोप में रुक जाती है और अपने गाइड हैरी के साथ उन सब जगहों पर जाती है जहां-जहां वह घूमते समय गई थी। खुद को बिंदास व बोल्ड लड़की दिखाने के लिए सेजल खुद को हैरी की गर्लफ्रेंड बना लेती है और दोनों करीब आ जाते हैं। सेजल यह सोचने लगती है कि काश उसकी अंगूठी न मिले और उसका व हैरी का सफर यूं ही चलता रहे। पर अंगूठी तो उसके अपने पर्स में ही मिल जाती है। अंत में वह भारत लौट आती है और शादी से इनकार कर देती है। हैरी उसे ढूंढता हुआ भारत आता है और इसके बाद हैप्पी एंड। दोनों शादी कर लेते हैं और हैरी अपने साथ सेजल को लेकर पंजाब लौट जाता है।
इस जरा सी कहानी में झोल ही झोल हैं। पंजाब वाला एंगल फिल्म में क्यों डाला गया है समझ से परे है। सपने में बार-बार शाहरुख को ंपंजाब क्यों दिखता था यह समझाने में निर्देशक विफल रहे हैं। जबकि दर्शक सोच रहा होता है कि शायद इसकी भी कोई कहानी होगी। ढाई घंटे लंबी इस फिल्म में इम्तियाज अली ने संगीत के जरिये रंग भरने की कोशिश की है। जहां भी कहानी आगे बढ़ती नजर नहीं आती वहीं पर एक गाना डाल दिया गया है। हालांकि गाने इतने छोटे-छोटे हैं कि जल्दी ही निकल जाते हैं लेकिन कोई भी ऐसा नहीं है कि जिसे आप याद रख सकें या बार-बार सुन सकें। जबकि इससे पहले इम्तियाज की फिल्मों में संगीत बहुत ही मजबूत पक्ष रहा है।
कई बार तो ऐसा लगता है कि शाहरुख को इम्तियाज अली के साथ हर हाल में फिल्म करनी थी इसलिए कर ली। बिना कहानी के ही फिल्म शुरू हो गई, बन गई और रिलीज हो गई। संवाद भी संगीत की तरह ही कमजोर हैं। इस तरह की फिल्में संवादों के दम पर ही आगे बढ़ती हैं लेकिन यहां वह भी मिसिंग है। अभिनय के लिहाज से शाहरुख तो उम्दा हैं ही बस कमी यही है कि किरदार उन्हें सूट नहीं करता। अनुष्का शर्मा को तो मैं हमेशा बेहतरीन अदाकारा बताता रहा हूं। कैटरीना व प्रियंका से वे आगे निकल चुकी हैं। 'सुल्तान' जैसी फिल्म में भी अनुष्का ने अपनी उपस्थिति का अहसास करा दिया था। वे वर्तमान दौर की सबसे उम्दा अदाकारा हैं। उनमें ताजगी है और एक बिंदासपन है जो उन्हें करीना व दीपिका जैसी अभिनेत्रियों की श्रेणी में ला खड़ा करता है। यह अनुष्का ही हैं जो 'ऐ दिल है मुश्किल' व 'जब हैरी मेट सेजल' जैसी फिल्मों में भी दमदार काम करके दिखा देती हैं। मेरा मानना है कि यह फिल्म केवल अनुष्का के लिए तो देखी जा सकती है बाकी इसमें देखने लायक कुछ नहीं है।
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शाहरुख खान जब से निर्माता बने हैं तब से उनकी फिल्मों के स्तर में गिरावट आई है। आमिर खान व सलमान खान उनसे बेहतर इसलिए हैं क्योंकि वे कहानी चुनने के बाद फिल्म में हाथ डालते हैं जबकि शाहरुख के साथ ऐसा नहीं है। उन्हें अपने समकक्ष अक्षय कुमार से सीखना चाहिए जो एक से एक विविधता वाली कहानी चुनते हैं और एक से एक बेहतरीन फिल्म करते हैं।
- हर्ष कुमार सिंह
Watch Video : DEEP REVIEW : Jab Harry Met Sejal



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