Friday, 13 July 2018

DEEP REVIEW : Soorma

बच्चों के साथ देखें ये फिल्म, आपको गर्व महसूस होगा

  • दिलजीत दोसांझ संदीप के रोल में एकदम परफेक्ट लगे हैं। अंगद बेदी तो कमाल ही कर देते हैं। अंगद लंबी रेस का घोड़ा हैं बस उन्हें रोल अच्छे नहीं मिल रहे। तापसी पन्नू तो जैसे ऐसे किरदारों के लिए ही बनी हैं। वे जो भी करती हैं वही अच्छा लगता है। खूबसूरत तो वे हैं ही साथ ही जिस तरह से वे रोल में घुसती हैं वो कमाल है।

Rating 3*
खेल-खिलाडिय़ों पर जब भी कोई फिल्म बनती है तो बहुत अच्छा लगता है। लगता है कि कोई नया करने का प्रयास कर रहा है। नहीं तो हमारे देश में भेड़चाल में फार्मूला फिल्में बनाने का चलन तो बरसों बरस चलता रहा है। अब तो फिल्मकार नए नाम ढूंढने का भी कष्ट नहीं करते। पार्ट 1, 2 व 3 आदि बनाए जा रहे हैं। इनमें स्टारकास्ट पहले तय की जाती है और कहानी बाद में गढ़ी जाती है। खिलाडिय़ों के जीवन पर फिल्में बनाने का काम चुनौतीपूर्ण भी है और आसान भी है। इनमें सबसे बड़ी चुनौती होती है यथार्थ के ज्यादा से ज्यादा करीब जाने की और आसानी है जनता का दल जीतने की। क्योंकि खिलाडिय़ों के जीवन में सबसे बड़ी बात होती है एक हीरोइज्म, जो आम दर्शकों से बड़ी आसानी से कनेक्ट हो जाता है। यही कारण है कि हाल के सालों में 'मैरीकॉम', 'एमएस धोनी', 'दंगल' जैसी ब्लॉकबस्टर फिल्में बनी हैं। और शायद जल्द ही कुछ और बनें भी। इससे पहले लगभग एक दशक पूर्व शाहरुख खान की 'चक दे इंडिया' व श्रेयस तलपड़े की 'इकबाल' आई थी, जो भले ही सच्ची कहानियों पर नहीं थी लेकिन खेलों की दुनिया को ग्लोरीफाई करती थी और सुपर हिट रही थी।
'सूरमा' की कहानी इन सबसे अलग है। यह संदीप सिंह नामक पंजाब के एक ऐसे हॉकी खिलाड़ी पर आधारित है जो दस साल पहले ही भारतीय हॉकी टीम का कप्तान होने के बाद भी गुमनामी के अंधेरे में खोकर रह गया। अर्जुन अवार्डी संदीप सिंह को जब हॉकी टीम की कप्तानी सौंपी गई थी तो मुझे खूब याद है कि भारी बवाल हुआ था। वे कई साल टर्फ पर वापसी कर रहे थे और उन्हें सीधे ही कप्तान बना दिया गया था। इसकी आलोचना भी हुई थी। बाद में संदीप ने सबको गलत साबित किया और भारत को न केवल कई टूर्नामेंट जिताए बल्कि उनके नाम पर सबसे ज्यादा गोल करने का रिकॉर्ड भी है। उन्हें फ्लिकर किंग भी कहा जाता है।
सूरमा का ट्रेलर देखें-


इस कहानी को सोनी पिक्चर्स व चित्रांगदा सिंह ने फिल्म बनाने के लिए चुना यह बहुत बड़ी बात है और दोनों ही निर्माताओं को इसके लिए दिल से बधाई। चित्रांगदा तो पहली फिल्म बना रही थी और उनका इस विषय को चुनना दिखाता है कि वे खूबसूरत व प्रतिभाशाली कलाकार ही नहीं है बल्कि एक जहीन दिमाग की भी मालिक हैं। उनके दौर की कई हिरोईन के पास इसकी कमी है। फिल्म बढिय़ा बनी है, और बढिय़ा बनाई जा सकती थी लेकिन जैसी भी बनी है परिवार के साथ देखने लायक है। कम से कम हाल ही के हफ्तों में आई 'रेस 3' व 'धड़क' जैसी फिल्मों से तो कई गुना बेहतर है। मुझे खुद अफसोस है कि एक सप्ताह देरी से इसे देख पाया और देरी से ही रिव्यू कर रहा हूं। पर आप देरी न करें और तुरंत देखकर आएं।
 संदीप सिंह की कहानी जानें-
संदीप सिंह (दिलजीत दोसांझ) बचपन में स्कूल कोच की पिटाई के डर से हॉकी खेलना बंद कर देता है। उसका बड़ा भाई बिक्रमजीत सिंह (अंगद बेदी) अच्छा खिलाड़ी होने के बाद भी भारतीय टीम के लिए नहीं चुना जाता। संदीप को अपने कस्बे की एक हॉकी खिलाड़ी प्रीति (तापसी पन्नू) से प्यार हो जाता है। प्रीति कहती है कि अगर वह हॉकी खेलेगा तो ही उनकी बात बनेगी। प्रीति का दिल जीतने के लिए संदीप फिर से हॉकी खेलने लगता है। खेतों में चिडिय़ों को उड़ाने के लिए वह हॉकी से पत्थर उड़ाया करता था। उसका यह कारनामा देख बिक्रम दंग रह जाता है। बिक्रम कहता है कि इसे हॉकी की भाषा में ड्रैग फ्लिक कहा जाता है और बरसों लग जाते हैं इसे सीखने में। बिक्रम संदीप का अपने कोच हैरी (विजय राज) से मिलवाता है और उसकी किस्मत चमक उठती है। संदीप जल्द ही भारतीय टीम का स्टार खिलाड़ी बन जाता है। प्रीति और संदीप का प्यार परवान चढऩे ही लगता है कि अचानक एक हादसा दोनों के जीवन को झकझोर कर रख जाता है।

सूरमा के गीत देखें- 
 


ट्रेन में सफर के दौरान एक पुलिसवाले की गोली गलती से संदीप की पीठ में जा घुसती है। संदीप को कई महीने अस्पताल में गुजारने पड़ते हैं। उसके शरीर का निचली हिस्सा लकवाग्रस्त हो जाता है। प्रीति, जो अब भारत के लिए खेल रही थी, संदीप से मिलने अस्पताल आती है तो देखती है कि अब उसके मन में हॉकी में वापस आने की तमन्ना ही खत्म हो चुकी है। बस प्रीति उसके पास है वो यही सोचकर खुश है। प्रीति को लगता है कि अगर वह उसके जीवन में आ गई तो फिर वह कभी खड़ा नहीं हो पाएगा। प्रीति उसे छोड़कर लंदन चली जाती है। उससे फोन पर भी बात नहीं करती। संदीप हिल जाता है और नई जिंदगी जीने की ठान लेता है। हॉकी फेडरेशन के चेयरमैन (कुलभूषण खरबंदा) की वजह से उसे 35 लाख रुपये मंजूर किए जाते हैं, जिससे वह इलाज के लिए हॉलैंड जा सके । संदीप छह महीने में पूरी तरह से फिट होकर वापसी करता है और इस बार प्रीति के लिए नहीं भारत के लिए हॉकी खेलता है और कामनवेल्थ गेम्स में टीम को गोल्ड दिलाता है।
सूरमा के गीत देखें-  

मुझे नहीं मालूम की प्रीति और संदीप का लव एंगल कितना सही और कितना काल्पनिक है लेकिन फिल्म बेहतरीन बनी है। फिल्म को सत्यता के नजदीक रखने के लिए ज्यादातर शूटिंग पंजाब की ओरिजनल लोकेशंस पर की गई है और इसलिए फिल्म दिल को छू जाती है। कभी 'साथिया' व 'बंटी और बबली' जैसी फिल्में दे चुके शाद अली का निर्देशन अच्छा है लेकिन उतना अच्छा नहीं जितना उन दो फिल्मों में था। पता नहीं शाद को क्या हो गया है? कुछ सीन कच्चे लगते हैं। थोड़ा जल्दी में शूट किए गए लगते हैं। अगर और तफ्सील में जाते तो फिल्म और मजबूत बन सकती थी। संगीत ठीक-ठाक है। गीत फिल्म में बहुत शानदार लगते हैं लेकिन बाद में याद नहीं रहते। गुलजार ने लिखे हैं तो शब्द तो बेहतरीन होने ही थे।
 क्या है ड्रैग फ्लिक, जानें संदीप सिंह से 


दिलजीत दोसांझ संदीप के रोल में एकदम फिट हैं। हालांकि उनकी उम्र थोड़ी ज्यादा लगती है लेकिन फिर भी सिख होने के कारण वे इस रोल में एकदम परफेक्ट लगे हैं। अंगद बेदी तो कमाल ही कर देते हैं। अंगद लंबी रेस का घोड़ा हैं बस उन्हें रोल अच्छे नहीं मिल रहे। तापसी पन्नू तो जैसे ऐसे किरदारों के लिए ही बनी हैं। वे जो भी करती हैं वही अच्छा लगता है। खूबसूरत तो वे हैं ही साथ ही जिस तरह से वे रोल में घुसती हैं वो कमाल है। बाकी कलाकारों में विजय राज, सतीश कौशिक भी प्रभाव छोडऩे में सफल रहे हैं। विजय राज तो जब भी आते हैं छा जाते हैं।
 भाइयों की कहानी जानें-


'सूरमा' उस श्रेणी की फिल्म है जो न केवल आपको रूलाती है, हंसाती है या फिर मनोरंजन देती है बल्कि आपको जीवन जीने की प्रेरणा देती है। खासतौर से युवा पीढ़ी और बच्चों के लिए तो ऐसी फिल्में पथप्रदर्शक बन सकती हैं। आप भी देखिए और हां बच्चों को साथ लेकर जाईये। आपको बहुत कुछ हासिल होगा। आप महसूस करेंगे कि आपने अपने बच्चों के लिए कुछ अच्छा किया।

- हर्ष कुमार सिंह 

Friday, 6 July 2018

DEEP PreVIEW : Fanney Khan

खूबसूरत ऐश्वर्या, इमोशंस और संगीत रहेंगे फिल्म की हाईलाइट

लगता है कि 'सीक्रेट सुपरस्टार' का एक और वर्जन आ रहा है। सपनों को जीने की कला, सफलता की ऊंचाइयां छूने को तमन्ना, गिरकर उठने की कहानी को दिखाने वाली ही एक फिल्म नजर आ रही है 'फन्ने खां'।
ट्रेलर से ही पूरी कहानी साफ है। टैक्सी चालक फन्ने खां (अनिल कपूर) की बेटी लता शर्मा (पीहू सैंड) सिंगर बनना चाहती है। गाती अच्छा है लेकिन शरीर से मोटी है। अनिल भी कभी मो. रफी की तरह सिंगर बनना चाहते थे लेकिन ऐसा कर नहीं सके। बेटी का नाम लता रखा और अपने अरमान पूरा करने का  ख्वाब देखने लगे।

पत्नी कविता शर्मा (दिव्या दत्ता) को अनिल की इस योजना में कोई यकीन नहीं है लेकिन फन्ने खां तो ठहरे फन्ने खां। अनिल बेटी को लता मंगेशकर के पुराने गानों की तरह गाने की कहते हैं लेकिन बेटी का मानना है कि आज के मॉडर्न दौर में पॉप संगीत की ज्यादा डिमांड है। कालेज में हूटिंग होने के बाद बेटी मशहूर पॉप सिंगर बेबी सिंह (ऐश्वर्या राय) की तरह दिखना-गाना चाहती है। फन्ने खां इससे सहमत नहीं हैं। उनका मानना है कि असली संगीत लता जी का ही था।
हालांकि फिल्म में बेबी सिंह को लता जी के पुराने गीतों को ही रिमिक्स करके गाते हुए दिखाया गया है। निर्देशक अतुल मंजरेकर ने यह दिखाने का प्रयास किया है कि फन्ने खां का तर्क सही है। पुराने गीतों में जो बात थी वो आज के संगीत में नहीं। फिल्म में अधीर (राजकुमार राव) का भी दिलचस्प किरदार है। अधीर और फन्ने खां मिलकर बेबी सिंह का अपहरण करते हैं। योजना बनाते हैं कि फिरौती से जो पैसा आएगा उससे वे लता के सपनों को साकार बना सकेंगे। यानी फिल्म में कॉमेडी की भी भरपूर गुंजाइश है।
ट्रेलर देखने के बाद इमोशंस की इसमें भरमार नजर आती हैं। 'सीक्रेट सुपरस्टार' की तरह का ही क्लाइमैक्स मुझे इसमें नजर आ रहा है। संगीत दिया है प्रतिभाशाली अमित त्रिवेदी ने। संगीत अच्छा लग रहा है। पुराने गीतों को री-क्रिएट किया गया है जो देखने में अच्छा लग रहा है।

फिल्म पूरी तरह अनिल कपूर पर ही फोकस नजर आ रही है। वे इसके सहनिर्माता भी हैं। ऐश का रोल छोटा ही लग रहा है। फिर भी उनकी उपस्थिति फिल्म के स्टैंडर्ड को एकदम से उठा देती है। ऐश को इसमें से अलग करके देखें तो यह एक साधारण सा प्रोजेक्ट नजर आएगी। देखते हैं बाक्स आफिस पर जनता का रिस्पांस कैसा रहता है।



फिल्म का पहला गीत भी रिलीज हो गया है आनलाइन। आप भी देखिए। ऐश्वर्या क्या कमाल लग रही हैं-


International choreographer Frank Gatson Jr, who choreographs for Beyoncé and Usher, choreographs a song for #FanneyKhan... Here's #Mohabbat, featuring Aishwarya Rai Bachchan... Link:


- हर्ष कुमार सिंह 

(फिल्म 3 अगस्त 2018 को रिलीज हो रही है)

Thursday, 5 July 2018

जानिएः Sanju में क्या दिखाया क्या छिपाया

हाल में रिलीज हुई संजय दत्त का बायोपिक 'संजू' में उनके जीवन के कुछ खास हिस्से तो दिखाए गए लेकिन कुछ को बिल्कुल भी नहीं छुआ गया। जो दिखाया गया उसे भी काफी हद तक मनमाफिक दिखाया गया। उनकी पहली गर्लफ्रेंड को दिखाया लेकिन उसका नाम व किरदार बदल दिया गया। कौन थी उनकी पहली गर्लफ्रेंड, क्यों नहीं खोली गई उसकी हकीकत ? कौन था वह नेता जो बात सुनते-सुनते ही सो जाता था ? अगर उसकी हकीकत खोली जाती तो शायद फिल्म ही रिलीज नहीं हो पाती। 

कुछ ऐसी सनसनीखेज जानकारियों को देने का प्रयास मैंने किया है अपने इस वीडियो में - 
( अगर आपको यह वीडियो अच्छा लगा तो शेयर करें और मेरे यूट्यूब चैनल को सब्सक्राइब करें और बेल आइकन को क्लिक करें। मेरा कोई भी नया वीडियो आएगा तो आपको नोटिफिकेशन आएगा। धन्यवाद) 

  • संजू का ये क्लाइमैक्स गीत पूरा देखें , मजा आएगा- 


Friday, 29 June 2018

DEEP REVIEW : Sanju

संजय दत्त को रील से रीयल लाइफ हीरो बनाने की कहानी 
'संजू' फिल्म के बारे में कुछ भी लिखने से पहले यह बता दूं कि यह फिल्म संजय दत्त की बायोपिक नहीं है। यह फिल्म संजय दत्त के जीवन के केवल दो पहलुओं पर बात करती है। एक- उनकी ड्रग्स में डूबी जिंदगी और उससे बाहर आने की लड़ाई। दूसरी- उन पर लगे आतंकवादियों से संबंध होने के इल्जाम, जेल, सजा और रिहाई की जंग। इस फिल्म में दिखाया गया है कि कैसे संजय दत्त हालात के शिकार बने और एक के बाद एक गलतियां करके भी अपने पिता स्व. सुनील दत्त की वजह से सब मुसीबतों से लड़ते रहे।

'संजू' देखने के बाद सबसे पहले जिसकी तारीफ करने को मन चाह रहा है वो है संजय दत्त के दोस्त कमलेश कन्हैयालाल कपासी का रोल निभाने वाले विक्की कौशल। संजय दत्त के जीवन के इस अछूते हिस्से के बारे में बहुत कम लोग जानते थे और इस फिल्म के बाद कमलेश उर्फ कमली के किरदार से आपको प्यार हो जाएगा। संजय दत्त के जीवन में आए सबसे महत्वपूर्ण लोगों में से एक है कमलेश और इस रोल को विक्की ने दिल से निभाया है। बल्कि कई सीन में तो उन्होंने परेश रावल व रणबीर कपूर को भी पानी पिला दिया है।

रणबीर कपूर की क्या तारीफ करें। वे तो देश की वर्तमान पीढ़ी के सबसे आला दर्जे के कलाकारों में पहले से गिने जाते हैं। इस फिल्म ने उनके स्थान को और भी ऊंचा कर दिया है। कई बार तो यह लगता ही नहीं कि हम रणबीर कपूर को देख रहे हैं। ऐसा लगता है कि जैसे हम संजय दत्त को ही देख रहे हैं या संजय दत्त खुद ही अपने किरदार को निभा रहे हैं।

Video Blog- Harh Kumar Singh, Deep Review - watch in two minutes: 

इस तरह की फिल्मों में हमेशा ही सही कास्टिंग करना चुनौतीपूर्ण काम होता है और यह काम कास्टिंग डायरेक्टर मुकेश छाबड़िया और उनकी टीम ने शानदार तरीके से किया है। संजय दत्त के जीवन के लगभग 35-40 साल के दौर को दिखाने के लिए कई तरह के छोटे-छोटे किरदारों को दिखाया जाना था और इसे मुकेश की टीम ने बहुत ही बढिया तरीके से किया है। 

किसी भी फिल्म का रीव्यू लिखने के लिए उसकी कहानी को बताना भी जरूरी होता है। कहानी के नाम पर कुछ ज्यादा नहीं है लेकिन कहानी में कुछ अनछुए पहलुओं को छूकर और कुछ मार्मिक लम्हों को जोड़कर राजकुमार हिरानी ने फिल्म को इतना बेहतर बना दिया है कि आपको कहानी की कमी महसूस नहीं होती। कई बार आपकी आंखों में आंसू भी आते हैं। फिल्म की शुरूआत वहां से होती है जब संजय दत्त आखिरी बार साढ़े तीन साल के लिए जेल गए थे। वे चाहते थे कि उनके जीवन की कहानी कोई अच्छा लेखक लिखे। लंदन की प्रसिद्ध बायोग्राफर विन्नी डियाज (अनुष्का शर्मा) से संजय (रणबीर) व उनकी पत्नी मान्यता (दिया मिर्जा) निवेदन करते हैं कि वे यह जिम्मा लें। विन्नी उनके बारे में जानना शुरू करती है। इस तरह एक के बाद एक किरदार सामने आते हैं और शुरूआती दौर में इंकार करने के बाद विन्नी उनकी बायोग्राफी (कुछ तो लोग कहेंगे) लिखने को राजी हो जाती हैं। विन्नी के जरिए ही कहानी आगे बढ़ती है और जब संजय 2015 में जेल से बाहर आते हैं तो वे किताब उन्हें सौंपती हैं।

फिल्म के क्लाइमैक्स में आने वाले इस गीत में रणबीर व संजय दत्त साथ नजर आते हैं। देखिए आपको पसंद आएगा ये गीत- 

जाहिर है संजय दत्त की लाइफ पर फिल्म बन रही थी तो सब कुछ संजय दत्त के हिसाब से ही दिखाया जाना था। डायरेक्टर राजकुमार हिरानी ठहरे संजू बाबा के मुरीद। उन्होंने फिल्म को इस तरीके से रचा है कि देखने वाले को संजय दत्त बेदाग हीरो के रूप में नजर आते हैं। हो सकता है कि संजू में जो भी दिखाया गया है वो सब कुछ सही हो। हो सकता है कि संजय दत्त के खिलाफ मीडिया ने कुछ ज्यादा ही लिखा हो और हो सकता है कि वे हालात के शिकार भी हुए हों लेकिन इतना तय है कि उनका जीवन बहुत ही उतार चढ़ाव भरा रहा। इसी वजह से दर्शक फिल्म को देख भी रहे हैं। 

फिल्म में दिखाया गया है कि संजय दत्त को नशे के दलदल में धकेलने वाला उनका दोस्त जुबिन मिस्त्री किस तरह उनसे पैसा ऐंठकर बड़ा बिजनेसमैन बन गया। जुबिन संजय को नशे की दवाएं देता था और खुद मीठा ग्लुकोज खाता था। अब इतने साल तक संजय दत्त कैसे उसकी इस बात को नहीं पकड़ पाए यह भी सोच में डालने वाली बात है ? खैर राजकुमार हिरानी ने जैसा संजय दत्त ने बताया वैसे ही फिल्म बनाई है और कहानी को सस्पेंस, इमोशन व हास्य के तानेबाने में पिरोया है। गंभीर सीन भी हल्के में दिखा गए हैं वे। इस कला के तो वे मास्टर माने जाते हैं। 
संजू के लुक में कैसे आए रणबीर सिंह, ये वीडियो जरूर देखें- 

फिल्म में कुछ चौंकाने वाली बातें भी बताई गई हैं। दिखाया गया है कि कैसे संजय दत्त ने अपने पहली प्रेमिका (शायद टीना मुनीम) रूबि (सोनम कपूर) के परिवार के साथ बुरा व्यवहार किया। मंगलसूत्र की जगह उसके गले में कमोड का सीट कवर पहना दिया। इसके अलावा अंडरवर्ल्ड के साथ उनके संबंधों को लेकर सामने आई खबरों आदि को किस तरह से उन्होंने हैंडल किया आदि-आदि तमाम ऐसी बाते हैं जिन्हें इस फिल्म के माध्यम से दिखाया गया है। 

अभिनय के मामले में विक्की कौशल और रणबीर कपूर का कोई तोड़ नहीं है। सुनील दत्त के रोल को परेश रावल ने बहुत ही शिद्दत से निभाया है। नरगिस दत्त के रोल में मनीषा कोईराला को कुछ ज्यादा ही बूढ़ी दिखा दिया गया। कुछ मेकअप की कमी रही शायद लेकिन वे बहुत अच्छी लगी हैं। अनुष्का भी लेखिका के रोल में जमी हैं। फिल्म में संजय दत्त की पहली (स्व.रिचा शर्मा) व दूसरी पत्नी (रिया पिल्लै), पहली बेटी (त्रिशाला दत्त), उनके बहनोई (कुमार गौरव) आदि के बारे में कोई जिक्र नहीं किया गया है। इसलिए मैंने कहा भी कि यह फिल्म उनकी बायोपिक नहीं है। हां यह फिल्म संजय दत्त को रील लाइफ की तरह रीयल लाइफ में भी हीरो बना देती है। 

फिल्म के सभी तकनीकी पहलू बहुत ही सशक्त हैं। 80, 90 के दशक के माहौल को एकदम सही दिखाने की कोशिश इसमें की गई है। कास्ट्यूम डायरेक्टरों की भी मेहनत साफ नजर आती है। संगीत के लिहाज से यह फिल्म ज्यादा कुछ स्कोप नहीं रखती थी लेकिन हिरानी ने इसमें कुछ अच्छे गीत डाले हैं। कई संगीतकार जुटाए हैं। पर सब गानों पर भारी पड़ता है- सुखविंदर व श्रेया घोषाल का गाया 'कर हर मैदान फतेह'। इसे संगीतबद्ध किया है विक्रम मोंत्रोश ने। बाकी गीत फिल्म में अच्छे लगे हैं लेकिन बाहर आने पर याद नहीं रहते। वैसे भी हिरानी कभी म्यूजिकल फिल्में बनाने वालों में नहीं रहे हैं। उनकी फिल्मों की ताकत कहानी और उसका प्रस्तुतिकरण रहा है और संजू में भी यही हिस्सा सबसे मजबूत है। 

Rating 4*

- हर्ष कुमार सिंह

Friday, 15 June 2018

DEEP REVIEW : Race 3

सलमान खान के जबर्दस्त फैन हैं तो देख लीजिए, वर्ना जाने दीजिए 

फ्रेंचाइजी फिल्मों को बनाने वालों को न जाने किसने कह दिया है कि ये फिल्में अपने नामों की वजह से हिट हो रही हैं। यही कारण है कि 'हाउसफुल' और 'हेट स्टोरी' के नाम से 4-4, 'धूम', 'दबंग' और 'रेस' के नाम से 3-3 फिल्में बन चुकी हैं। और भी बहुत सी फिल्में इस तरह बनाई जा रही हैं। हकीकत यह है कि फिल्में कहानी से चलती हैं और जिसकी कहानी अच्छी होगी उसे देखने के लिए लोग किसी भी नाम से आएंगे। हालीवुड में यह चलन था जहां एक ही नाम से सीरीज चलती हैं और 20-20 फिल्में तक बन चुकी हैं।


'रेस 3' का दुर्भाग्य यह है कि इसकी कहानी 80 के दशक में आने वाले वेदप्रकाश शर्मा व सुरेंद्र मोहन पाठक के जासूसी उपन्यासों की तरह है। यानी कभी भी कहीं भी कहानी में कोई नया पेंच ला दीजिए और फिर एक फ्लैशबैक दिखाकर उसे साबित कर दीजिए। इस फिल्म में भी ऐसा कई बार किया गया है। बल्कि मैं तो यह कहूंगा कि इतनी बार किया गया है कि दर्शक कंफ्यूज हो जाता है कि जैकलीन फर्नांडीज किसकी तरफ है और बॉबी देयोल किसका बेटा है।
ईद पर हर साल आने वाली सलमान खान की फिल्में बिजनेस तो बढिय़ा कर ही लेती हैं लेकिन कुछ ऐसी होती हैं जो यादगार बन जाती हैं। उनकी 'बजरंगी भाईजान', 'सुल्तान' जैसी फिल्मों को आप कितनी बार देख लीजिए मजा आएगा लेकिन 'ट्यूबलाइट', 'जय हो', 'दबंग 2' आदि एक बार भी नहीं झेली जाती। 'रेस 3' भी दूसरी श्रेणी की फिल्मों में है। यानी वन टाइम मूूवी। 'रेस 2' भी खराब थी लेकिन 'रेस 3' तो सबसे ज्यादा खराब है। पूरी फिल्म में या तो पार्टी चलती रहती है या फिर एक्शन होता रहता है। एक्शन सीन इतने लंबे-लंबे हैं कि अगर इन्हें फिल्म से हटा दें तो फिल्म 40 मिनट की ही रह जाएगी।

कहानी आधा दर्जन किरदारों के ईर्द गिर्द घूमती है। शमशेर सिंह (अनिल कपूर) भारत का भगौड़ा है और अल शिफा नाम के एक काल्पनिक देश में रहता है। सूरज (शाकिब सलीम) व संजना (डेजी शाह) शमशेर के जुड़वां बच्चे हैं और सिकंदर (सलमान खान) उनका सौतेला भाई है। यश (बॉबी देयोल) भी शमशेर की टीम का हिस्सा है। जेसिका (जैकलीन) एक जासूस है और राना (फ्रेडी दारूवाला) व शमशेर के पीछे लगी है। सूरज व संजना को सिकंदर नहीं जरा नहीं भाता जबकि शमशेर उस पर भरोसा करता है। सब मिलकर साजिश करते हैं सिकंदर को रास्ते से हटाने की क्योंकि वह उनकी आधी जायदाद का वारिस है। कई रहस्यों से परदा उठने के बाद कहानी अंत तक पहुंचती है। अंत में शमशेर व यश जेल में पहुंच जाते हैं और सिकंदर, सूरज व संजना मिल जाते हैं। इससे ज्यादा बताऊंगा तो आप फिल्म को एक बार भी नहीं झेल पाएंगे।
फिल्म से सलमान खान को अगर हटा दें तो आप इसे एक बार देखने लायक भी नहीं पाएंगे। सलमान आते हैं तो फिल्म में कुछ करंट आता है नहीं तो फिल्म बहुत सुस्त बनी रहती है। असली बात यह है कि कहानी कुछ इस तरह से अनफोल्ड की गई है कि सब कुछ इंटरवल के बाद ही घटता है। जैसे ही रहस्य पर से परदा उठता है वैसे ही फिल्म का दि एंड हो जाता है।

एक और बहुत खराब चीज है इस फिल्म में। इसका संगीत किसी काम का नहीं है। 'रेस' व 'रेस 2' का संगीत अच्छा था लेकिन इसमें एक भी गीत ऐसा नहीं है जिसे आप याद रख सकें या गुनगुना सकें। जबकि सलमान की फिल्मों के गीत बहुत हिट होते हैं। जग घुमेया, बेबी को बेस पसंद है, मुन्नी बदनाम हुई, तेरी-मेरी प्रेम कहानी, स्वैग से करेंगे सबका स्वागत, को कौन भूल सकता है? पर 'रेस 3' में कोई गीत थियेटर से बाहर निकलने के बाद याद नहीं रहा। विशाल मिश्रा, मीत ब्रदर्स व सलीम-सुलेमान ने मिलकर गीत गढ़े हैं और सब कबाड़ा हो गया है। गीतकारों की लिस्ट में सलमान खान का नाम देखकर ही लग गया था कि संगीत को लेकर निर्माता कितने गंभीर थे।

 'रेस' व 'रेस 2' का निर्देशन अब्बास-मस्तान की जोड़ी ने किया था और सस्पेंस थ्रिलर बनाने में उनका कोई सानी नहीं। रेमो डिसूजा नृत्य निर्देशक अच्छे होंगे लेकिन मजेदार व जीवंत फिल्म बनाने की कला उन्हें नहीं आती। गीतों का फिल्मांकन वे अच्छा कर लेते हैं पर उनके भीतर का डांस डायरेक्टर बार-बार बाहर आ जाता है। तभी तो लद्दाख में रोमांटिक गीत के दौरान डेजी शाह हवा में झूल-झूलकर डांस करने लगती हैं। यही नहीं जब डेजी व जैकलीन में फाइट होती है तो लगता है कि डांस कंपीटिशन चल रहा है। रेमो के निर्देशन में दम नहीं है। वे 'एबीसीडी' जैसी फिल्में ही बना सकते हैं।


अभिनय में किसी को कुछ करने का मौका ही नहीं था। अनिल कपूर ने साधारण काम किया है। सलमान पर कुछ ज्यााद फोकस किया गया तो वे सही लगे हैं। बॉबी देयोल इसमें अच्छे लगे हैं लेकिन अंत में उन्हें विलेन दिखा दिया गया। उन्हें इस फिल्म से कुछ फायदा नहीं होने वाला है। शाकिब ठीक-ठाक हैं। डेजी शाह की कद काठी ऐसी है कि कभी कभी तो वे सलमान पर भी भारी पड़ती हैं। जैकलीन का काम ग्लैमर परोसना था और यही उन्होंने किया है। वे सुंदर लगती हैं और जब भी स्क्रीन पर आती हैं तो अच्छी लगती हैं। अभिनय करने के लिए तो उनसे कभी कहा ही नहीं जाता है शायद।

फिल्म देखने के बाद दर्शकों की प्रतिक्रिया बहुत खराब थी। उन्हें लग रहा था कि शायद वे ठगे गए। मुझे भी ऐसा लगा। इसलिए मैं गुस्से में थ्री डी चश्मा ही लेता आया। कुछ तो भरपाई होगी। वैसे आप वीकेंड पर इसे देखने की योजना बना रहे हैं तो मत देखिए। पछताएंगे और चश्मा लेकर आने का मौका भी सबको नहीं मिलता है।

Rating 1*

- हर्ष कुमार सिंह 

Monday, 11 June 2018

DEEP PreVIEW : Dhadak

जहानवी कपूर के रूप में एक बड़ी स्टार की दस्तक

श्रीदेवी की बेटी जहानवी कपूर के रूप में बालीवुड को एक और बेहद चार्मिंग फेस मिलने जा रहा है। वे स्क्रीन पर आती हैं तो छा जाती हैं। उनके चेहरे में एक ग्लैमर है जो आप कैटरीना कैफ, प्रियंका चोपड़ा या फिर दीपिका पादुकोण में देखते हैं। एक मासूमियत है जो आलिया भट्ट या श्रद्धा कपूर में नजर आती है। उनकी पहली फिल्म 'धड़क' के ट्रेलर को देखने के बाद तो यही लगा कि बालीवुड को एक और बड़ी स्टार मिल गई है।
11 जून को 'धड़क' का ट्रेलर रिलीज कर दिया गया और सबने महान श्रीदेवी की बेटी को पहली बार स्क्रीन पर देखा। इस फिल्म में उनके नायक ईशान खट्टर (शाहिद कपूर के सौतेले भाई) हैं। ईशान को हम कुछ महीने पहले 'बियांड द क्लाउड्स' में देख चुके हैं। ईशान प्रतिभाशाली हैं लेकिन उनमें स्टारडम नहीं नजर आता। वे बालक लगते हैं। 'धड़क' के तीन मिनट का ट्रेलर देखने के बाद यह तो लगा कि ईशान ने मजेदार काम किया है या उनका किरदार लोगों को भाएगा लेकिन वे जहानवी की खूबसूरती या उनकी दमदार उपस्थिति के सामने टिक पाएंगे इसमें शक है।



मराठी फिल्म 'सैराट' के इस रीमेक को करण जौहर ने निर्मित किया है और इसके निर्देशक शशांक खेतान हैं। 'सैराट' की सफलता में उसके संगीत का बहुत बड़ा योगदान था। बिना किसी बड़े बैनर या स्टारकास्ट की वह फिल्म पहली मराठी फिल्म बन गई थी जिसने 100 करोड़ का कारोबार कर डाला। फिल्म मुख्य रूप से ऑनर किलिंग के मुद्दे पर बनी थी। इसी कहानी को शशांक खेतान ने राजस्थानी परिवेश में बदल डाला है। जबकि 'सैराट' महाराष्ट्र की बैकग्राउंड पर ही आधारित थी।


राजस्थान की बैकग्राउंड आ जाने से फिल्म में भव्यता के रंग भर देना आसान हो गया। यही कारण है कि 'धड़क' का ट्रेलर एक बड़ी कमर्शियल फिल्म होने का इशारा करता है। वैसे भी करण जौहर जैसा नाम जुड़ गया तो फिल्म का स्केल तो बढऩा तय है ही।


संगीत भी लगता है कि 'सैराट' की तरह बनाया गया है। 'सैराट' का सबसे हिट गीत 'झिंग झिंग झिंग झिंगा' तो हू ब हू ले लिया गया है। यानी इस पर कोई समझौता नहीं किया गया। कमर्शियल लिहाज से यह सही कदम है। जब संगीत हिट था तो उससे छेड़छाड़ करने की क्या जरूरत है?


ट्रेलर में मुझे जो चीज सबसे ज्यादा खटकी वो है लीड कलाकारों का राजस्थानी अंदाज में डायलॉग बोलना। जहानवी बेहद ग्लैमरस नजर आती हैं। उन्हें डिजाइनर कपड़े पहनाए गए हैं पर वे थारे-म्हारे अंदाज में डायलाग बोलती हुई उतनी सहज नहीं लगी। 'सैराट' की हिरोईन बहुत ही साधारण और एक अनजान चेहरा थी। जबकि जहानवी के साथ श्रीदेवी व बोनी कपूर का नाम जुड़ा है।

हो सकता है कि लोग 'धड़क' में जहानवी को एकदम से स्वीकार न करें लेकिन उनकी स्क्रीन पर उपस्थिति जादुई है और उनमें बड़ी स्टार बनने की सारी खूबियां मौजूद हैं। वे पूरी तैयारी के साथ आई हैं और पारी लंबी खेलेंगी।
सैराट का ट्रेलर भी देखें


- हर्ष कुमार सिंह 
(फिल्म 20 जुलाई 2018 को रिलीज हो रही है।)

Friday, 1 June 2018

Deep Review : Veere Di Wedding

Rating- 2*
‘वीरे दि वेडिंग’ के रिलीज होने से पहले ही इसकी तारीफों का सिलसिला शुरू हो गया था। बालीवुड की नामचीन हस्तियों ने इस फिल्म को देखने के बाद सोशल मीडिया के माध्यम से इसकी तारीफ करनी शुरू कर दी थी। फिर सोनम कपूर की ही शादी हो गई। फिल्म को रिलीज से पहले ही इतना हाइप मिल गया था कि इसकी बंपर ओपनिंग लगनी तय थी। इस फिल्म को बिंदास महिलाओं की फिल्म के रूप में प्रचारित किया जा रहा था, तो जाहिर है आज के जमाने की महिलाएं तो इसे देखेंगी। यही हो भी रहा है।

जिस शो में मैंने यह फिल्म देखी उसमें 90 प्रतिशत महिलाएं थी। मैट्रो शहरों की आधुनिक महिलाएं अपनी दोस्तों के साथ फिल्म देखने आई हुई थी। कुछ के साथ उनके पति थे कुछ के साथ उनके पुरुष दोस्त। गौर से देखा तो बहुत कम महिलाएं ऐसी थी जो अपने व्यस्क बच्चों के साथ थी। चूंकि फिल्म को ए सर्टिफिकेट मिला है तो छोटे बच्चे तो जा ही नहीं सकते। फिल्म में बीच-बीच में महिलाओं के ठहाके भी चल रहे थे क्योंकि फिल्म की चार मुख्य पात्रों को खुलकर बोल्ड डायलाग दिए गए है। जिन गालियों को हम गलियों, बस या ट्रेन की भीड़ में किसी के मुंह से सुनकर शर्मिंदा या नाराज हो जाया करते हैं उन्हें यहां लीड कलाकारों के मुंह से बोलते हुए सुनकर हंसी छूट रही थी। यही तो आधुनिकता है। सार्वजनिक स्थान पर आप सुसंस्कृत व सभ्य हो जाते हैं लेकिन जैसे ही निजी मनोरंजन की बात आती है तो हम यह आवरण उतार फेंकते हैं।
सुमित व्यास आपको पसंद आएंगे
इस फिल्म में कई अनूठे प्रयोग किए गए हैं। हिंदी सिनेमा के इतिहास में शायद यह पहला मौका होगा जब female masturbation को खुलेआम स्क्रीन पर दिखाया गया है। स्वरा भास्कर को अपने बिस्तर पर पति के सामने ऐसा करते हुए दिखाया गया है। भले ही सीन उतनी गंभीरता से नहीं फिल्माया गया है लेकिन दिखाया तो masturbation ही है। शायद निर्देशक की यह सोच रही होगी कि अगर वे महिलाओं को लेकर एक बोल्ड फिल्म बना रहे हैं तो यह भी दिखा सकते हैं। वे जानते थे कि फिल्म को ए सर्टीफिकेट मिलना तय है। इसलिए जितनी भी गालियां दिलवानी हैं, जितने भी कपड़े उतरवाने हैं उतरवा लो लड़कियों से। चारों ही हिरोइनों ने इसमें कोई कसर नहीं छोड़ी है। बेड से लेकर बिकिनी, सिगरेट से लेकर दारू तक सब कुछ दिखा दिया गया है। किस भी हद तक चले गए हों लेकिन निर्देशक शशांक घोष फिल्म स्वरा भास्कर के masturbation सीन के अलावा कुछ भी ऐसा नहीं दिखा सके हैं जो पहले आपने नहीं देखा हो। सब कुछ देखा हुआ लगता है।

अबू जानी-संदीप खोसला की एक खूबसूरत ड्रैस में करीना।

कहानी में कुछ भी ऐसा नहीं है जो लिखा जा सके। या यूं कहूं कि कहानी जीरो है तो गलत नहीं होगा। कुछ साल पहले आई जोया अख्तर की फिल्म ‘जिंदगी ना मिलेगी दोबरा’ को देखने के बाद ही शायद शशांक को इस फिल्म को बनाने की प्रेरणा मिली होगी। कालिंदी (करीना कपूर), अवनी (सोनम कपूर), साक्षी (स्वरा भास्कर) व मीरा (शिखा तलसानिया) स्कूल से ही पक्की दोस्त हैं। पहले सीन में वे स्कूल की घंटी बजाकर छुट्टी कर शरारती होने की सबूत देती हैं और फिर फिल्म दस साल आगे चली जाती है। दिखाया जाता है कि सबकी जिंदगी में कुछ न कुछ समस्या है। साक्षी का तलाक होने वाला है, मीरा ने घरवालों से छिपकर विदेश में शादी कर ली है बच्चा भी है, अवनी की शादी नहीं हो रही और कालिंदी की होने वाली है। कालिंदी की शादी के लिए ही चारों फिर से मिलती हैं और फिर वही धमाल मचाती हैं।

निर्देशक ने फिल्म को बोल्ड बनाने के लिए चारों को खूब दारू व सिगरेट पिलाई हैं। पर कोई भी हिरोइन उन सींस में सहज नहीं लगती। करीना कपूर शानदार काम करती रही हैं और यहां भी वे अपना रोल बखूबी निभा ले गई हैं। स्वरा को तो किरदार ही ऐसा मिला है जो सबको पसंद आएगा। अगर ये कह दूं कि इस फिल्म से सबसे ज्यादा फायदा स्वरा को ही होगा तो गलत नहीं होगा। सोनम कपूर पता नहीं क्यों इस फिल्म में बहुत ही खराब लगी हैं। कई बार तो कैमरा इतने गंदे तरीके से उनके चेहरे पर फोकस किया गया है कि वे बेहद कमजोर व बीमार नजर आती हैं। सोनम की तो होम प्रोडक्शन है। पिता अनिल कपूर के नाम पर उनकी बहन रिया कपूर ने फिल्म का निर्माण किया है। एकता कपूर तो को-प्रोड्यूसर हैं। उन पर तो विशेष फोकस किया जाना चाहिए था। नीना गुप्ता, विवेक मुश्रान आदि साथी कलाकार छोटे-छोटे रोल में ठीक हैं। प्रमुख कलाकारों में सबसे ज्यादा प्रभावित किया सुमित व्यास ने। वे थोड़े मैच्योर लगते हैं और हल्के फुल्के किरदारों की भीड़ में बहुत ही सहज नजर आते हैं।

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फिल्म का संगीत अच्छा है। बादशाह का गाया गीत ‘तारीफें’ अंत में आता है लेकिन लोग उसे देखने के लिए सिनेमा में बैठे रहते हैं। इसके अलावा ‘लाज शरम’, ‘वीरे’, ‘आ जाओ ना’ भी अच्छे हैं। संगीत के लिए शाश्वत सचदेव व विशाल मिश्रा की तारीफ की जानी चाहिए। अबु जानी- संदीप खोसला ने लंबे समय बाद किसी फिल्म के लिए कास्ट्यूम डिजाइन किए हैं और शानदार तरीके से किए हैं। यह फिल्म की सबसे बड़ी खासियतों में से एक है। लोकेशन अच्छी हैं और दिल्ली वालों को पसंद आएंगी। बाराखंबा रोड का बंगला, ग्रेटर कैलाश की कोठियां, सरोजिनी नगर की मार्किट आपको जाने पहचाने लगेंगे।

अगर आप फिल्में मनोरंजन के लिए देखते हैं तो यह आपको अच्छी लग सकती है लेकिन अगर आप कुछ गंभीर व अच्छा काम देखने के शौकीन हैं तो यह फिल्म आपके लिए नहीं है। फैमिली एंटरटेनमेंट तो यह नहीं है। मां-बहन की गालियां, एफ शब्द का हर बात में इस्तेमाल आपको कोफ्त पैदा कर देगा।

- हर्ष कुमार सिंह

Friday, 11 May 2018

DEEP REVIEW : Raazi

Rating- 4*
आलिया भट्ट बालीवुड की सबसे प्रतिभाशाली अभिनेत्री हैं ये तो सब जानते हैं लेकिन वे अभिनय को इन बुलंदियों पर भी ले जा सकती हैं यह नहीं सोचा था। इस फिल्म की सबसे बड़ी खासियत तो यही है कि आलिया भट्ट ने किरदार में ढल जाने की कला को नए आयाम दे दिए हैं। उन्हें आप अमिताभ बच्चन, रेखा, श्रीदेवी या फिर स्मिता पाटिल जैसे सर्वकालीन महान कलाकारों की श्रेणी में अब रख सकते हैं। आलिया ( Alia Bhatt ) को सादगी में भी सुंदर लगना आता है। और वे लगी हैं। बिना किसी मेकअप के भी वे किरदार की खाल में घुस सकती हैं यह तो वे 'हाईवे' व 'उड़ता पंजाब' में दिखा ही चुकी हैं। यह फिल्म पूरी तरह से आलिया भट्ट की फिल्म है। उनके अभिनय की रेंज के सामने मेघना गुलजार का निर्देशन, गुलजार साहब के लिखे सारगर्भित गीत और लंबे अरसे के बाद शंकर अहसान लॉय द्वारा दिया गया मधुर संगीत, सब कुछ पीछे रह जाते हैं।
मेघना गुलजार ( (Meghna Gulzar) की यह दूसरी फिल्म है। बरसों पहले उन्होंने 'फिलहाल' बनाई थी जो अपने विषय के कारण ही चर्चाओं में रही थी। इस बार भी उन्होंने विषय बढिय़ा चुना है। 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के काल को केंद्र में रखकर बुने गए इस कथानक में रोमांच है जो आपको अंतिम सीन तक बांधे रखता है। कई स्थान पर दर्शक अनुमान लगाने लगते हैं कि शायद फिल्म का अंत यह होगा या वो होगा। लेकिन ऐसा कुछ नहीं होता और फिल्म अपने निर्धारित अंत पर जाकर खत्म हो जाती है। फिल्म के विदाई गीत में गुलजार साहब ने लिखा है- कट चुकी फसलें फिर आती नहीं हैं, विदा हो चुकी बेटियां लौटकर आती नहीं हैं। फिल्म में आलिया भट्ट कहती हैं कि क्या देश पर मर मिटने का जज्बा बेटों में ही होता है? क्या उन्हें ही यह हक है? इसी थीम को लेकर फिल्म चलती है।

कहानी ज्यादा तफ्सील से बताऊंगा तो आपका फिल्म देखने का मजा खराब हो जाएगा। बस इतना बता देता हूं कि सेहमत खान (आलिया) पाकिस्तान में काम करने वाले एक भारतीय जासूस की बेटी है। जो पिता का अधूरा काम करने का जिम्मा लेती है और उसे पूरा करती है। सेहमत का शादी पाकिस्तान के एक बड़े आर्मी अफसर के बेटे से कराई जाती है। इस तरह वह भारत को पाकिस्तान के सारे राज बताती रहेगी। उसे पूरी तरह ट्रेनिंग भी दी जाती है। बस यही कहानी है। वह कैसे अपना काम करती है और किस तरह सारी मुश्किल घडिय़ों से निकलती है यही फिल्म का कहानी व रोमांच है।
फिल्म में आलिया के अभिनय के सामने और किसी कलाकार की उपस्थिति नजर नहीं आती। हालांकि सभी ने काम बढिय़ा किया है लेकिन हर किरदार के लिए कलाकार ऐसे चुने गए हैं जो याद नहीं रहते। उदाहरण के तौर पर आलिया के पति के रोल में विकी कौशल हैं जिन्हें ज्यादा लोग नहीं जानते। आलिया के पिता के रोल में रजित कपूर हैं लेकिन उनका पात्र इंटरवल से पहले ही मर जाता है। आलिया की मां के रोल में उनकी रीयल मां सोनी राजदान एकदम परफेक्ट हैं। इसके अलावा जयदीप अहलावत (खालिद मीर), अमृता खानविलकर (मुनिरा) ने अपने किरदार बखूबी निभाए हैं।
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पता है फिल्म की असली जान है क्या है? इसकी रीयल लोकेशंस। जिस गंदे टायलेट में आलिया कपडे बदलते है या छतरी को ठिकाने लगाती है वह एकदम वास्तविक लगती है। कश्मीर के शॉट खूबसूरत हैं। हालांकि पाकिस्तान की शूटिंग नहीं की गई लेकिन जिन पुराने बंगलों में वे हिस्से शूट किए गए हैं वे काफी हद तक वास्तविक लगते हैं। कुछ खामियां भी हैं पर उन्हें नजर अंदाज किया जा सकता है। जैसे- आलिया का घर में ट्रांसमिशन सेटअप लगाने का किसी को पता नहीं चलता? घर पर लगी तारें भी किसी को नहीं दिखी? इतने बड़े आर्मी अफसर के घर पर रात में कोई गार्ड ही तैनात नहीं? ऐसी कई गलतियां हो गई हैं निर्देशक से।

लंबे समय बाद किसी फिल्म में संगीत मधुर लगा है। तीन ही गीत हैं और सभी कर्णप्रिय हैं। गुलजार साहब के बोलों का तो कोई तोड़ ही नहीं। ए वतन , राजी और दिलबरो फिल्म में सुनने में भी अच्छे लगते हैं और देखने में भी।

रीमेक और पार्ट 1, 2 व 3 के इस दौर में इस तरह की फिल्में कम बनती हैं इसलिए जाइए और इसे परिवार के साथ देखकर आइए।



-हर्ष कुमार सिंह
 (Harsh Kumar )

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Friday, 4 May 2018

DEEP REVIEW : 102 Not Out

Rating- 2*

'ओ माय गॉड' जैसी बेहतरीन फिल्म बनाकर सुर्खियों में आए उमेश शुक्ला की यह फिल्म अमिताभ बच्चन व ऋषि कपूर जैसे शानदार कलाकारों के लंबे अरसे बाद एक साथ आने की वजह से आप देख जरूर सकते हैं लेकिन आपको लगेगा कि आपके पैसे वसूल नहीं हुए। फिल्म ईमानदारी से अपनी बात जरूर कहती है लेकिन यह एक ऐसे वर्ग को छूने का प्रयास करती है जिसकी संख्या देश में बहुत कम है। हमारे समाज में बुजुर्गों की समस्याओं को समझाने के लिए पहले भी 'बागबां', 'पीकू' और ऐसी कई अन्य फिल्में बन चुकी हैं लेकिन सबके विषय अलग-अलग थे। यह फिल्म उन लोगों के बारे में बताती है जिनके अपने उन्हें छोड़कर विदेश चले गए हैं और केवल जरूरत के समय ही मां-बाप को याद करते हैं।

मेरे एक मित्र ने अचानक एक दिन बातचीत में यूं ही कह दिया कि अरे भाई विदेश में चले गए बच्चों को मां-बाप की याद तब आती है जब वे खुद मां-बाप बनने वाले होते हैं। यानी जब बीवी गर्भवती होती है तो उसकी देखभाल से लेकर बच्चा पैदा होने व उसके बाद कम से कम 5-6 महीने बाद तक बच्चे के संभलने तक ही मां की जरूरत महसूस होती है। मैंने पूछा क्यों? उनका जवाब था कि भाई विदेश में आया यानी बच्चों का ख्याल रखने वाली औरत बहुत ही महंगी पड़ती है और मां तो फ्री में ये सब कर देती है। बस टिकट का खर्चा ही तो उठाना है। शायद उमेश शुक्ला के दिमाग में भी कहीं ऐसी ही घटना से यह कहानी आई होगी।

कहानी छोटी सी है। 102 साल के अमिताभ बच्चन अपने 64 साल के बेटे ऋषि कपूर के साथ एकाकी जीवन गुजार रहे हैं। ऋषि का बेटा 20 साल पहले अमेरिका जा चुका है और फिर कभी नहीं आया। बेटे की याद में ऋषि कपूर परेशान रहते हैं और अपनी उम्र से ज्यादा बड़े दिखने लगे हैं। एक दिन अमिताभ को सूझता है कि क्यों न वे दुनिया के सबसे बुजुर्ग आदमी का 118 साल तक जीने का रिकार्ड तोडऩे का प्रयास करें। अमिताभ ऋषि को वृद्धाश्रम भेजने की सोचने लगते हैं और ऋषि के सामने शर्त रखते हैं कि अगर वे उनकी पांच शर्तों को मान लें तो वे अपना इरादा बदल सकते हैं। शर्तें अजीबो गरीब थी लेकिन सबका एक ही उद्देश्य था कि ऋषि की जिंदगी में फिर से बहार कैसे लाई जाए। अमिताभ इसमें कामयाब रहते हैं लेकिन अचानक एक दिन ऋषि के बेटे का फोन आता है कि वह भारत आ रहा है पिता से मिलने तो ऋषि भावुक हो उठते हैं। अमिताभ उनसे कहते हैं कि बेटा केवल जायदाद के चक्कर में आ रहा है तो ऋषि नाराज हो जाते हैं। उनका तर्क था कि अमिताभ सही नहीं हैं और बेटा उनसे मिलने ही आ रहा है। दोनों में झगड़ा होता है और ऋषि कपूर चेतावनी देते हैं कि वे अपना हिस्सा अपने बेटे को देंगे और अगर अमिताभ बीच में आए तो उन पर भी मुकदमा कर देंगे। तब अमिताभ बताते हैं कि वे मुकदमेबाजी के लिए ज्यादा समय तक जिंदा नहीं रहेंगे क्योंकि उनके दिमाग में ट्यूमर है और वे कभी भी मर सकते हैं। ऋषि के पैरों के नीचे से जमीन खिसक जाती है। उन्हें अहसास होता है कि उनके पिता ने उन्हें खुश करने के लिए क्या नहीं किया। अंत में वे अपने बेटे की बजाय पिता का साथ देने का फैसला करते हैं।

फिल्म अच्छी है लेकिन मनोरंजन का अभाव है। जब मैंने यह फिल्म देखी तो 50 प्रतिशत से ज्यादा दर्शक बुजुर्ग थे। उनके साथ उनके बच्चे व पोते-पोती भी थे। बच्चों को फिल्म बोर लगी। एक किशोर को तो यह भी कहते सुना कि क्या अच्छा है फिल्म में एक भी गाना नहीं था। गाने से याद आया। फिल्म का एक गाना काफी प्रचार के बाद जारी हुआ था 'बडुम्बा'। इस गीत के पीछे खुद बच्चन साहब का दिमाग बताया जाता है लेकिन यह गाना अंत में आने वाले क्रेडिट्स के भी बाद में रखा गया। गाने के लिए इतनी बड़ी क्रेडिट्स लाइन देखना किसी ने गंवारा नहीं समझा और पूरा थियेटर खाली हो गया। फिल्मकार का यह आइडिया समझ से बाहर है। गाना व क्रेडिट्स एक साथ भी चलाए जा सकते थे, जैसा कि अक्सर फिल्मों में होता भी है।


फिल्म में संगीत न के बराबर ही है। इसके अलावा कला निर्देशन भी कमजोर है। सेट बहुत ही नकली नजर आते हैं। घर पूरी तरह से सेट ही लगता है। अगर रियल लोकेशंस पर फिल्म शूट की जाती तो और अधिक प्रभावशाली हो सकती थी। कुछ संवाद अच्छे लिखे गए हैं और फिल्म के साथ अच्छे लगते हैं। गनीमत है कि फिल्म की लंबाई 1 घंटा 41 मिनट ही रखी गई नहीं तो झेल नहीं पाते दर्शक।

अभिनय की बात करें तो अमिताभ बच्चन व ऋषि कपूर, दोनों ने ही अपने किरदारों को जीवंत कर दिया है। यही फिल्म अगर किसी और जोड़ी को लेकर बनाई जाती तो शायद बिजनेस जीरो ही रहता। पहले हाफ में तो दोनों मिलकर काफी हंसाते भी हैं। इसलिए इंटरवल कब हो गया पता ही नहीं चलता। कुल मिलाकर फिल्म एक बार देखी जा सकती है परिवार के साथ। साफ सुथरी है। वैसे अगर अब तक नहीं देखी है तो कुछ समय बाद टीवी पर आ ही जाएगी। ऐसा कुछ नहीं है जो आप बड़ी स्क्रीन पर ही देखें।



फिल्म एक ही सबक देती है कि जिंदगी जिंदादिली का नाम है। और यह तो सच है सब जानते हैंं।

-हर्ष कुमार सिंह

Friday, 13 April 2018

DEEP REVIEW : October

इमोशंस से भरी 'अक्टूबर' में चमके वरुण धवन

Rating- 5*
वरुण धवन एक अच्छे अभिनेता हैं इससे तो किसी को इंकार नहीं था लेकिन वे इतने अच्छे अभिनेता हैं यह किसी को यकीन नहीं था। धवन ने ‘अक्टूबर’ में कमाल कर दिया है। मनोरंजन के तमाम तत्वों- नाच गाना, कॉमेडी, एक्शन आदि से दूर यह फिल्म आपको एक सेकेंड के लिए भी बोर नहीं होने देगी। अगर आप मानवीय संवेदनाओं और इमोशंस वाली फिल्में देखने के शौकीन हैं तो यह फिल्म आपके लिए है। छोटी सी कहानी को शूजीत सरकार ने जिस तरह से पेश किया है वह दिल को छू जाता है। सब कुछ बहुत ही वास्तविक लगता है। ऐसा लगता ही नहीं कि आप फिल्म देख रहे हैं। आपको लगेगा कि आप उन लम्हों को जी रहे हैं जो फिल्म के कलाकारों के साथ गुजर रहे हैं। 

कहानी को अगर मैं पूरी तरह से रोमांटिक ही कहूं तो गलत नहीं होगा। यह ऐसा रोमांस है जो संवेदना से जन्म लेता है, भावनाओं से आगे बढ़ता है और फिर भावनाओं में ही सिमटकर रह जाता है। दानिश वालिया उर्फ डेन (वरुण धवन) दिल्ली के द्वारका में मौजूद रेडिसन ब्लू होटल में इंटर्न है। होटल मैनेजमेंट का कोर्स करने के बाद जरूरी ट्रेनिंग कर रहा है और रोजाना कोई न कोई गलती करता रहता है। लापरवाही भी करता है और बदतमीजी भी करता है। उसके तमाम साथी उसे बचाते रहते हैं। शिवली (बनीता संधू) भी साथ ही इंटर्न है और डेन से सहानुभूति रखती है। नए साल की रात में सारे इंटर्न होटल की छत पर पार्टी कर रहे थे कि अचानक शिवली फिसलकर नीचे गिर जाती है। शिवली गंभीर रूप से घायल हो जाती है। उसे एक बड़े महंगे अस्पताल में भर्ती कराया जाता है। डेन दो दिन बाद लौटकर आता है तो उसे पता चलता है कि ऐसा हादसा हो गया। शिवली कोमा में जा चुकी थी। उसका बचना मुश्किल था। डेन उसका हाल पूछने जाता है तो उसे पता चलता है कि छत से गिरने से पहले शिवली ने साथियों से डेन के बारे में पूछा था कि वह कहां है? यहीं से डेन के मन में शिवली के प्यार का अंकुर फूटता है। वह दिन रात अस्पताल के चक्कर लगाने लगता है। शिवली अचेत पड़ी हुई है लेकिन डेन उसकी छोटी-छोटी हरकतों में अपने प्रति प्यार के संकेत ढूंढने लगता है। डेन जब शिवली के पसंदीदा फूल बाग से उठाकर लाता है तो उसके अचेत शरीर में हरकत होती है। यहां से डेन के यकीन हो जाता है कि शिवली भी उसे प्यार करती है। अस्पताल में ही शिवली को महीनों गुजर जाते हैं। इस बीच अपनी हरकतों की वजह से डेन को होटल से निकाल दिया जाता है। डेन की मां को यह पता चलता है कि उनका बेटा एक बीमार लड़की से प्यार करने लगा है तो वह परेशान हो जाती हैं और शिवली से मिलने अस्पताल में आती हैं। शिवली की मां को लगता है कि डेन, जो अब तक उनके परिवार से घुलमिल चुका था, का कैरियर उनकी बेटी की वजह से बरबाद हो रहा है। वह उसे चले जाने के लिए कहती हैं। डेन वहां से चला जाता है और हिमाचल प्रदेश में किसी होटल में नौकरी करने लगता है। महीनों गुजर जाते हैं। एक दिन फोन पर शिवली की मां बताती है कि उसकी तबीयत और बिगड़ गई है तो डेन फिर वापस आ जाता है। अंत में शिवली दुनिया से चली जाती है। शिवली की मां दिल्ली छोड़कर जाने लगती है तो शिवली के पसंदीदा फूल के पेड़ का जिम्मा डेन पर छोड़ जाती है। यहीं से डेन को अपने प्यार को पाने का नया मकसद मिल जाता है। 

हालांकि फिल्म का अंत बताना नहीं चाहता था लेकिन फिल्म की कहानी ही इतनी दिल को छू जाने वाली है कि बताए बिना नहीं रहा गया। यह फिल्म बताने या सुनने वाली नहीं बल्कि देखने वाली है। वरुण धवन की तारीफ जितनी भी की जाए कम है। वरुण धवन तो फिल्म की जान हैं। अपने कैरियर की शुरूआत में ही वरुण ने ऐसी फिल्म चुनकर खुद को रणवीर सिंह व रनबीर कपूर की क्लास में ला खड़ा किया है। अब आप उनकी तुलना उनकी उम्र के दूसरे अभिनेताओं से नहीं कर सकते। लेखिका जूही चतुर्वेदी की भी तारीफ करना चाहूंगा। उन्होंने ‘पीकू’ के बाद एक और शानदार फिल्म लिखी है। फिल्म का एक एक सीन दिल को छू जाता है। आप फिल्म में खो जाते हैं और कब आपकी आंखों में आंसू तैर आएंगे आपको पता ही नहीं चलेगा। बनीता संधू सारे समय बिस्तर पर पड़ी रहती हैं और उन्होंने अपने रोल को बखूबी निभाया है। बनीता की मां के रोल में स्टेज कलाकार गीतांजलि राव ने जान डाल दी है। वे जोरदार अदाकारा हैं। संगीत नहीं है लेकिन शांतुन मित्रा ने बैकग्राउंड संगीत से फिल्म को बांधे रखा है। लोकेशंस एकदम ओरिजनल हैं और फोटोग्राफर ने उन्हें खूबसूरती से कैद किया है। दिल्ली की मैट्रो, सर्दियों की रातों को सुंदरता से शूट किया गया है। 

कुल मिलाकर यह फिल्म देखने लायक है इसे जरूर देखें। ऐसी फिल्में रोज-रोज नहीं बनती। 

- हर्ष कुमार सिंह