Friday, 4 May 2018

DEEP REVIEW : 102 Not Out

Rating- 2*

'ओ माय गॉड' जैसी बेहतरीन फिल्म बनाकर सुर्खियों में आए उमेश शुक्ला की यह फिल्म अमिताभ बच्चन व ऋषि कपूर जैसे शानदार कलाकारों के लंबे अरसे बाद एक साथ आने की वजह से आप देख जरूर सकते हैं लेकिन आपको लगेगा कि आपके पैसे वसूल नहीं हुए। फिल्म ईमानदारी से अपनी बात जरूर कहती है लेकिन यह एक ऐसे वर्ग को छूने का प्रयास करती है जिसकी संख्या देश में बहुत कम है। हमारे समाज में बुजुर्गों की समस्याओं को समझाने के लिए पहले भी 'बागबां', 'पीकू' और ऐसी कई अन्य फिल्में बन चुकी हैं लेकिन सबके विषय अलग-अलग थे। यह फिल्म उन लोगों के बारे में बताती है जिनके अपने उन्हें छोड़कर विदेश चले गए हैं और केवल जरूरत के समय ही मां-बाप को याद करते हैं।

मेरे एक मित्र ने अचानक एक दिन बातचीत में यूं ही कह दिया कि अरे भाई विदेश में चले गए बच्चों को मां-बाप की याद तब आती है जब वे खुद मां-बाप बनने वाले होते हैं। यानी जब बीवी गर्भवती होती है तो उसकी देखभाल से लेकर बच्चा पैदा होने व उसके बाद कम से कम 5-6 महीने बाद तक बच्चे के संभलने तक ही मां की जरूरत महसूस होती है। मैंने पूछा क्यों? उनका जवाब था कि भाई विदेश में आया यानी बच्चों का ख्याल रखने वाली औरत बहुत ही महंगी पड़ती है और मां तो फ्री में ये सब कर देती है। बस टिकट का खर्चा ही तो उठाना है। शायद उमेश शुक्ला के दिमाग में भी कहीं ऐसी ही घटना से यह कहानी आई होगी।

कहानी छोटी सी है। 102 साल के अमिताभ बच्चन अपने 64 साल के बेटे ऋषि कपूर के साथ एकाकी जीवन गुजार रहे हैं। ऋषि का बेटा 20 साल पहले अमेरिका जा चुका है और फिर कभी नहीं आया। बेटे की याद में ऋषि कपूर परेशान रहते हैं और अपनी उम्र से ज्यादा बड़े दिखने लगे हैं। एक दिन अमिताभ को सूझता है कि क्यों न वे दुनिया के सबसे बुजुर्ग आदमी का 118 साल तक जीने का रिकार्ड तोडऩे का प्रयास करें। अमिताभ ऋषि को वृद्धाश्रम भेजने की सोचने लगते हैं और ऋषि के सामने शर्त रखते हैं कि अगर वे उनकी पांच शर्तों को मान लें तो वे अपना इरादा बदल सकते हैं। शर्तें अजीबो गरीब थी लेकिन सबका एक ही उद्देश्य था कि ऋषि की जिंदगी में फिर से बहार कैसे लाई जाए। अमिताभ इसमें कामयाब रहते हैं लेकिन अचानक एक दिन ऋषि के बेटे का फोन आता है कि वह भारत आ रहा है पिता से मिलने तो ऋषि भावुक हो उठते हैं। अमिताभ उनसे कहते हैं कि बेटा केवल जायदाद के चक्कर में आ रहा है तो ऋषि नाराज हो जाते हैं। उनका तर्क था कि अमिताभ सही नहीं हैं और बेटा उनसे मिलने ही आ रहा है। दोनों में झगड़ा होता है और ऋषि कपूर चेतावनी देते हैं कि वे अपना हिस्सा अपने बेटे को देंगे और अगर अमिताभ बीच में आए तो उन पर भी मुकदमा कर देंगे। तब अमिताभ बताते हैं कि वे मुकदमेबाजी के लिए ज्यादा समय तक जिंदा नहीं रहेंगे क्योंकि उनके दिमाग में ट्यूमर है और वे कभी भी मर सकते हैं। ऋषि के पैरों के नीचे से जमीन खिसक जाती है। उन्हें अहसास होता है कि उनके पिता ने उन्हें खुश करने के लिए क्या नहीं किया। अंत में वे अपने बेटे की बजाय पिता का साथ देने का फैसला करते हैं।

फिल्म अच्छी है लेकिन मनोरंजन का अभाव है। जब मैंने यह फिल्म देखी तो 50 प्रतिशत से ज्यादा दर्शक बुजुर्ग थे। उनके साथ उनके बच्चे व पोते-पोती भी थे। बच्चों को फिल्म बोर लगी। एक किशोर को तो यह भी कहते सुना कि क्या अच्छा है फिल्म में एक भी गाना नहीं था। गाने से याद आया। फिल्म का एक गाना काफी प्रचार के बाद जारी हुआ था 'बडुम्बा'। इस गीत के पीछे खुद बच्चन साहब का दिमाग बताया जाता है लेकिन यह गाना अंत में आने वाले क्रेडिट्स के भी बाद में रखा गया। गाने के लिए इतनी बड़ी क्रेडिट्स लाइन देखना किसी ने गंवारा नहीं समझा और पूरा थियेटर खाली हो गया। फिल्मकार का यह आइडिया समझ से बाहर है। गाना व क्रेडिट्स एक साथ भी चलाए जा सकते थे, जैसा कि अक्सर फिल्मों में होता भी है।


फिल्म में संगीत न के बराबर ही है। इसके अलावा कला निर्देशन भी कमजोर है। सेट बहुत ही नकली नजर आते हैं। घर पूरी तरह से सेट ही लगता है। अगर रियल लोकेशंस पर फिल्म शूट की जाती तो और अधिक प्रभावशाली हो सकती थी। कुछ संवाद अच्छे लिखे गए हैं और फिल्म के साथ अच्छे लगते हैं। गनीमत है कि फिल्म की लंबाई 1 घंटा 41 मिनट ही रखी गई नहीं तो झेल नहीं पाते दर्शक।

अभिनय की बात करें तो अमिताभ बच्चन व ऋषि कपूर, दोनों ने ही अपने किरदारों को जीवंत कर दिया है। यही फिल्म अगर किसी और जोड़ी को लेकर बनाई जाती तो शायद बिजनेस जीरो ही रहता। पहले हाफ में तो दोनों मिलकर काफी हंसाते भी हैं। इसलिए इंटरवल कब हो गया पता ही नहीं चलता। कुल मिलाकर फिल्म एक बार देखी जा सकती है परिवार के साथ। साफ सुथरी है। वैसे अगर अब तक नहीं देखी है तो कुछ समय बाद टीवी पर आ ही जाएगी। ऐसा कुछ नहीं है जो आप बड़ी स्क्रीन पर ही देखें।



फिल्म एक ही सबक देती है कि जिंदगी जिंदादिली का नाम है। और यह तो सच है सब जानते हैंं।

-हर्ष कुमार सिंह

Friday, 13 April 2018

DEEP REVIEW : October

इमोशंस से भरी 'अक्टूबर' में चमके वरुण धवन

Rating- 5*
वरुण धवन एक अच्छे अभिनेता हैं इससे तो किसी को इंकार नहीं था लेकिन वे इतने अच्छे अभिनेता हैं यह किसी को यकीन नहीं था। धवन ने ‘अक्टूबर’ में कमाल कर दिया है। मनोरंजन के तमाम तत्वों- नाच गाना, कॉमेडी, एक्शन आदि से दूर यह फिल्म आपको एक सेकेंड के लिए भी बोर नहीं होने देगी। अगर आप मानवीय संवेदनाओं और इमोशंस वाली फिल्में देखने के शौकीन हैं तो यह फिल्म आपके लिए है। छोटी सी कहानी को शूजीत सरकार ने जिस तरह से पेश किया है वह दिल को छू जाता है। सब कुछ बहुत ही वास्तविक लगता है। ऐसा लगता ही नहीं कि आप फिल्म देख रहे हैं। आपको लगेगा कि आप उन लम्हों को जी रहे हैं जो फिल्म के कलाकारों के साथ गुजर रहे हैं। 

कहानी को अगर मैं पूरी तरह से रोमांटिक ही कहूं तो गलत नहीं होगा। यह ऐसा रोमांस है जो संवेदना से जन्म लेता है, भावनाओं से आगे बढ़ता है और फिर भावनाओं में ही सिमटकर रह जाता है। दानिश वालिया उर्फ डेन (वरुण धवन) दिल्ली के द्वारका में मौजूद रेडिसन ब्लू होटल में इंटर्न है। होटल मैनेजमेंट का कोर्स करने के बाद जरूरी ट्रेनिंग कर रहा है और रोजाना कोई न कोई गलती करता रहता है। लापरवाही भी करता है और बदतमीजी भी करता है। उसके तमाम साथी उसे बचाते रहते हैं। शिवली (बनीता संधू) भी साथ ही इंटर्न है और डेन से सहानुभूति रखती है। नए साल की रात में सारे इंटर्न होटल की छत पर पार्टी कर रहे थे कि अचानक शिवली फिसलकर नीचे गिर जाती है। शिवली गंभीर रूप से घायल हो जाती है। उसे एक बड़े महंगे अस्पताल में भर्ती कराया जाता है। डेन दो दिन बाद लौटकर आता है तो उसे पता चलता है कि ऐसा हादसा हो गया। शिवली कोमा में जा चुकी थी। उसका बचना मुश्किल था। डेन उसका हाल पूछने जाता है तो उसे पता चलता है कि छत से गिरने से पहले शिवली ने साथियों से डेन के बारे में पूछा था कि वह कहां है? यहीं से डेन के मन में शिवली के प्यार का अंकुर फूटता है। वह दिन रात अस्पताल के चक्कर लगाने लगता है। शिवली अचेत पड़ी हुई है लेकिन डेन उसकी छोटी-छोटी हरकतों में अपने प्रति प्यार के संकेत ढूंढने लगता है। डेन जब शिवली के पसंदीदा फूल बाग से उठाकर लाता है तो उसके अचेत शरीर में हरकत होती है। यहां से डेन के यकीन हो जाता है कि शिवली भी उसे प्यार करती है। अस्पताल में ही शिवली को महीनों गुजर जाते हैं। इस बीच अपनी हरकतों की वजह से डेन को होटल से निकाल दिया जाता है। डेन की मां को यह पता चलता है कि उनका बेटा एक बीमार लड़की से प्यार करने लगा है तो वह परेशान हो जाती हैं और शिवली से मिलने अस्पताल में आती हैं। शिवली की मां को लगता है कि डेन, जो अब तक उनके परिवार से घुलमिल चुका था, का कैरियर उनकी बेटी की वजह से बरबाद हो रहा है। वह उसे चले जाने के लिए कहती हैं। डेन वहां से चला जाता है और हिमाचल प्रदेश में किसी होटल में नौकरी करने लगता है। महीनों गुजर जाते हैं। एक दिन फोन पर शिवली की मां बताती है कि उसकी तबीयत और बिगड़ गई है तो डेन फिर वापस आ जाता है। अंत में शिवली दुनिया से चली जाती है। शिवली की मां दिल्ली छोड़कर जाने लगती है तो शिवली के पसंदीदा फूल के पेड़ का जिम्मा डेन पर छोड़ जाती है। यहीं से डेन को अपने प्यार को पाने का नया मकसद मिल जाता है। 

हालांकि फिल्म का अंत बताना नहीं चाहता था लेकिन फिल्म की कहानी ही इतनी दिल को छू जाने वाली है कि बताए बिना नहीं रहा गया। यह फिल्म बताने या सुनने वाली नहीं बल्कि देखने वाली है। वरुण धवन की तारीफ जितनी भी की जाए कम है। वरुण धवन तो फिल्म की जान हैं। अपने कैरियर की शुरूआत में ही वरुण ने ऐसी फिल्म चुनकर खुद को रणवीर सिंह व रनबीर कपूर की क्लास में ला खड़ा किया है। अब आप उनकी तुलना उनकी उम्र के दूसरे अभिनेताओं से नहीं कर सकते। लेखिका जूही चतुर्वेदी की भी तारीफ करना चाहूंगा। उन्होंने ‘पीकू’ के बाद एक और शानदार फिल्म लिखी है। फिल्म का एक एक सीन दिल को छू जाता है। आप फिल्म में खो जाते हैं और कब आपकी आंखों में आंसू तैर आएंगे आपको पता ही नहीं चलेगा। बनीता संधू सारे समय बिस्तर पर पड़ी रहती हैं और उन्होंने अपने रोल को बखूबी निभाया है। बनीता की मां के रोल में स्टेज कलाकार गीतांजलि राव ने जान डाल दी है। वे जोरदार अदाकारा हैं। संगीत नहीं है लेकिन शांतुन मित्रा ने बैकग्राउंड संगीत से फिल्म को बांधे रखा है। लोकेशंस एकदम ओरिजनल हैं और फोटोग्राफर ने उन्हें खूबसूरती से कैद किया है। दिल्ली की मैट्रो, सर्दियों की रातों को सुंदरता से शूट किया गया है। 

कुल मिलाकर यह फिल्म देखने लायक है इसे जरूर देखें। ऐसी फिल्में रोज-रोज नहीं बनती। 

- हर्ष कुमार सिंह

Friday, 30 March 2018

DEEP REVIEW : Baaghi 2


टाइगर श्राफ को अब आप हल्के में ना लें
 
Rating: 3*
फिल्म कैसी है यह तो बाद में बताऊंगा लेकिन एक बात पहले ही साफ कर दूं कि इस फिल्म के बाद आप टाइगर श्राफ को हल्के में लेना बंद ही कर दें। टाइगर ने अब तक रिलीज हुई अपनी दोनों फिल्मों के मुकाबले इसमें बहुत सुधार दिखाया है। भले ही फिल्म के कुछ दृश्यों में उनसे सनी देयोल की नकल कराई गई हो लेकिन वह अपनी पहचान बनाने में सफल रहे हैं। इस फिल्म में वह काफी मैच्योर भी लगे हैं और कुछ सींस में इमोशंस भी अच्छे दिखाए हैं। उन्हें अब केवल अपनी डायलाग डिलीवरी पर ध्यान देने की जरूरत है। जब वे धीरे-धीरे संवाद बोलते हैं तो अच्छे लगते हैं लेकिन जब तेजी से चीखने की कोशिश करते हैं तो उनकी आवाज बच्चों जैसी लगने लगती है। वैसे यह फिल्म उनके करियर की सबसे बड़ी हिट फिल्म साबित होने जा रही है।
'बागी 2' एक आर्मी अफसर रणवीर प्रताप सिंह उर्फ रोनी (टाइगर) की कहानी है। उसकी पूर्व गर्लफ्रेंड नेहा (दिशा पटानी) उससे अपनी 3 साल की बेटी को बचाने की गुजारिश करती है, जिसका अपहरण कर लिया गया है। रोनी गोवा में तलाश शुरू करता है तो पता चलता है कि नेहा की कोई बेटी थी ही नहीं। उसका पति (दर्शन), पुलिस डीआईजी (मनोज वाजपेयी) आदि सभी यही कहते हैं कि वह किसी बीमारी से पीडि़त है और किसी दूसरे की बेटी को अपनी बेटी मान बैठी है यही नहीं रिया उसकी बेटी का नहीं बल्कि मां का नाम था। रोनी को भी इस पर यकीन होने लगता है और वह नेहा की मदद करने से इंकार कर देता है। इस पर निराश नेहा बिल्ंिडग से छलांग लगाकर अपनी जान दे देती है। नेहा की आत्महत्या से रोनी को लगता है कि वह शायद सही कह रही थी। जब वह और गहराई में जाता है तो परत दर परत केस खुलने लगता है और उसे पता चलता है कि नेहा की बेटी का अपहरण उसके पति व देवर (प्रतीक बब्बर) ने ही मिलकर किया था। इंटरवल के बाद कहानी मे कई मोड़ आते हैं और अंत में पता चलता है कि जिस बच्ची को बचाने के लिए नेहा उससे कह रही थी दरअसल वह तो रोनी और नेहा के प्यार की निशानी ही थी।

 फिल्म का कथानक काफी उलझा हुआ है लेकिन फिर भी आप समझने में सफल रहते हैं क्योंकि कुछ बातें बीच-बीच में फ्लैशबैक में दिखाकर साफ करने की कोशिश की गई है। हालांकि कहानी में बहुत से झोल भी हैं। सीसीटीवी कैमरे की फुटेज गायब कर देने वाला मामला कुछ ऐसा ही है। डीआईजी को ही अंत में सबसे बड़ी विलेन दिखा देना भी आसानी से हजम नहीं होता। ऐसी बहुत सी गुत्थियां हैं जिन्हें सुलझाने की कोशिश निर्देशक ने नहीं की हैं।


गीत संगीत तो जैसे फिल्म की स्पीड को बाधित करने के लिए ही आता है। केवल एक गीत- 'साथी तेरे बिनाÓ ही अच्छा लगता है। दूसरे हाफ में जबरन ठूंसा गया जैकलीन फर्नांडीज का आइटम नंबर 'एक दो तीनÓ बिल्कुल भी नहीं भाता। न सुनने में अच्छा लगता है ना देखने में। इस समय बालीवुड की सबसे सुंदर हिरोइनों में से एक जैकलीन को इस गाने में वेस्ट किया गया है। एक बात और जैकलीन के लिए कहना चाहूंगा। उन्हें अपनी फिटनेस पर इतना ज्यादा ध्यान नहीं देना चाहिए। इस डांस में जिस तरह से उनकी बॉडी मसल्स व बायसप्स नजर आते हैं वे एक नाजुक नृत्यांगना कम बॉडी बिल्डर ज्यादा नजर आती हैं। उन्हें ज्यादा जिम नहीं करना चाहिए। उनकी सुंदरता में नाज ओ अदा कम बल्कि कठोरता ज्यादा दिखने लगी है।

एक्टिंग के लिहाज से टाइगर ने बेहतरीन काम किया है। वे अब धीरे-धीरे बड़ा स्टार बनने की ओर बढ़ रहे हैं। एक्शन सींस में तो टाइगर जान डाल ही देते हैं और हर तरह के एक्शन में सहज भी नजर आते हैं लेकिन फिल्म के क्लाइमैक्स में जिस तरह उन्हें सैकड़ों लोगों से अकेले लड़ते दिखा दिया गया है उसे देखकर आपकी हंसी भी निकल सकती है। 'घायल ' के सनी देयोल के लाकअप वाले सीन को हू ब हू कापी करने की वजह मेरी समझ में नहीं आई?

दिशा पटानी का फ्यूचर अच्छा है लेकिन उन्हें अच्छे रोल चुनने होंगे। अपनी पहली दोनों ही फिल्मों में वे इंटरवल से पहले मर जाती हैं। उन्हें ऐसी बातों को ध्यान रखना होगा। उनमें बड़ी स्टार बनने की तमाम संभावनाएं हैं। मनोज वाजपेयी, रणदीप हुड्डा ने अपना काम ठीक-ठाक किया है। दीपक डोबरियाल तो खैर अच्छे कलाकार हैं ही लेकिन प्रतीक बब्बर को ऐसा घटिया रोल करते देख दुख हुआ है। इस तरह के एक दो रोल और उन्होंने किए तो वे बरबाद हो जाएंगे। अरे हां, निर्देशक के बारे में तो बताना भूल ही गया। डांस डायरेक्टर अहमद खान इसके निर्देशक हैं और उन्होंने अच्छा काम किया है।
कुल मिलाकर 'बागी 2' एक एक्शन से भरपूर फिल्म है। इसे मनोरंजन के लिए देखा जा सकता है।

- हर्ष कुमार सिंह 
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Friday, 16 March 2018

DEEP REVIEW : Raid


अजय देवगन की अच्छी फिल्में में से एक है 'रेड', जरूर देखें  

Rating 4*

अजय देवगन अपने कैरियर में दो तरह की फिल्में करते रहे हैं। एक तो हैं 'एक्शन जैक्सन', 'सिंघम', 'बादशाहो' और 'शिवाय' जैसी और दूसरी हैं 'जख्म', 'गंगाजल' और 'दृश्यम' जैसी। ये दूसरी वाली कैटेगरी की फिल्म है। 'रेड' में अजय देवगन ने एक परिपक्व रोल किया है जो उम्र के हिसाब से उन पर फिट बैठता है। फिल्म बांधकर रखती है। यदि आपको बेहतर कहानी, संवाद और थोड़ी सी यथार्थवादी फिल्में पंसद आती हैं तो यह आपके लिए है, लेकिन यदि आप वीकेंड पर फैमिली के साथ मनोरंजन से भरपूर मसला फिल्म देखने के मूड में रहते हैं तो फिर यह फिल्म आपके लिए नहीं है। बच्चों के लिए फिल्म में कुछ नहीं है। न गीत संगीत न कॉमेडी और न नाच गाना।
फिल्म जिस अंदाज में बनाई गई है यह आपको नीरज पांडे की 'स्पेशल 26' की याद दिलाती है। हालांकि यह उसके स्तर की फिल्म नहीं बन पाई। इसके बावजूद यह एक अच्छी फिल्म है। विषय एकदम नया है और इस तरह की कहानी अब तक हिंदी फिल्मों में नहीं दिखाई गई है। छोटे से घटनाक्रम को दो घंटे की फिल्म में बहुत ही संजीदा अंदाज में पेश किया गया है। जिन लोगों का देश की समस्याओं व ज्वलंत मुददों से सरोकार है उन्हें इसमें मजा आएगा।

कहानी 1981 की है जो लखनऊ में हुई एक सच्ची घटना पर आधारित है। अमय पटनायक (अजय देवगन) आयकर विभाग के अफसर हैं और ईमानदारी की वजह से बार-बार उनका तबादला होता रहता है। इस बात से उनकी पत्नी मालिनी (इलियाना डि क्रूज) परेशान भी रहती है। लखनऊ आकर वह एक दबंग सांसद रामेश्वर सिंह (सौरभ शुक्ला) से भिड़ जाते हैं। उन्हें गुप्त सूचना मिलती है कि सांसद महोदय के पास 400 करोड़ की ब्लैक मनी है। टैक्स चोरी व बेनामी संपत्ति भी है। अजय वहां रेड डालने की योजना बनाते हैं। पूरी फिल्म इसी रेड पर आधारित है। रेड चलती रहती है। अजय अपने फर्ज पर डटे रहते हैं। सौरभ रेड रुकवाने के लिए प्रधानमंत्री तक पहुंच जाते हैं, लेकिन अजय अपना फर्ज निभाते हैं और जान की बाजी लगाकर सच्चाई तक पहुंचने में सफल रहते हैं। फिल्म में अंत में उस सस्पेंस का भी खुलासा किया जाता है कि ये सूचना अजय को किसने दी थी।
फिल्म के निर्देशक राजकुमार गुप्ता ने इससे पहले नो वन किल्ड जेसिका, आमिर जैसी फिल्में बनाई हैं। इसलिए वे जानते हैं कि सत्य कहानी को कैसे फिल्माया जाता है। फिल्म कई हिस्सों में अपना प्रभाव छोड़ती है। फिल्म में पहले ही सीन में अजय देवगन व सौरभ की मुलाकात एक पार्टी में दिखाई गई है। इसमें अजय की ईमानदारी को जिस तरह से स्थापित किया गया है वह फिल्म का टेंपो सेट कर देता है। इसी सीन की वजह से अमय पटनायक का किरदार बड़ा व मजबूत लगने लगता है। एक अन्य सीन-जब अजय मंदिर जाने की बात कहते हैं तो इलियाना कहती हैं कि तुम तो नास्तिक हो, भारत माता के अलावा किसी को मानते ही नहीं? यह दृश्य फिल्म में अच्छे संवाद होने की गवाही देता है।
रेड के दौरान वैसे तो कई दिलचस्प मौके आते हैं लेकिन मुझे तो फिल्म में सबसे ज्यादातर मजेदार सीन वे लगे जिनमें सौरभ शुक्ला की बुजुर्ग मां आती हैं। इस रोल को निभानी वाली वृद्ध महिला ने कमाल कर दिया है। फिल्म में टर्निंग प्वाइंट लाने के साथ-साथ वे दर्शकों का अच्छा खासा मनोरंजन भी करती हैं। फिल्म का क्लाईमैक्स अच्छा फिल्माया गया है जिसमें सारी जनता सांसद के समर्थन में एकत्र होकर हमला बोल देती है और अजय अपने सभी साथी अफसरों को वहां से भगाकर खुद मुकाबला करने की ठान लेते हैं।
इलियाना डि क्रूज इससे पहले अजय के साथ बादशाहो में भी आई थी और बड़े ही ग्लैमरस अवतार में थी। रेड में वे एकदम साधारण महिला के रूप में आई हैं लेकिन बादशाहो से ज्यादा सुंदर लगी हैं। अभिनय भी उन्होंने ठीक-ठाक किया है। अजय और सौरभ तो हैं ही मंजे हुए कलाकार।

इस फिल्म को देखकर मेरा मन अजय देवगन को एक सलाह देने का भी हो रहा है। उनके बारे में अक्सर कहा जाता है कि उन्हें अच्छी कहानियों की समझ नहीं है। अगर वे इसी तरह की कुछ और फिल्में और कर लें तो लोगों की यह गलतफहमी दूर हो जाएगी। शाहरुख खान को भी कुछ ऐसी फिल्में करनी चाहिएं। आमिर व अक्षय तो लगातार ऐसा कर ही रहे हैं। 

-   हर्ष कुमार सिंह



Tuesday, 6 March 2018

DEEP REVIEW : Sonu Ke Titu Ki Sweety

खूबसूरत नुसरत भरूचा के लिए देख सकते हैं  'सोनू के टीटू की स्वीटी'

 Rating - 2*

मेरी आदत है कि जो फिल्म देखने के लायक लगती है वही देखने जाता हूं। कहने का मतलब यह है कि फिल्म की प्रोडक्शन वैल्यू आदि ऐसी लगनी चाहिए कि वह कुछ अलग है या फिर बड़ी फिल्म है, स्टार कास्ट व निर्देशक के लिहाज से। इसके अलावा कुछ फिल्में ऐसी होती हैं जिन्हें उनके बाक्स आफिस पर अनपेक्षित रूप से सफल हो जाने के बाद देखता हूं। पहले भी कई बार ऐसा हुआ है। एक या दो हफ्ते बाद रीव्यू करने का कोई मतलब नहीं रह जाता इसलिए समीक्षा नहीं करता हूं। ऐसा कई बार हुआ है जैसे- ‘गोलमाल अगेन’, ‘करीब करीब सिंगल’, ‘सीक्रेट सुपर स्टार’ आदि फिल्में बाद में देखीं लेकिन ऐसा कुछ नहीं लगा कि उनकी समीक्षा करूं। दो साल पहले ‘की एंड का’ को भी दो सप्ताह बाद देखा था और समीक्षा करने से रह नहीं पाया था। फिल्म कामयाब भी थी और बेहतरीन भी। ‘की एंड का’ के रीव्यू को हजारों लोगों ने पढ़ा था दो सप्ताह बाद भी।

पिछले हफ्ते रिलीज हुई ‘सोनू के टीटू की स्वीटी’ की जहां भी देख रहा था तारीफ हो रही थी। रीव्यू भी अच्छे-अच्छे आ रहे हैं। बाक्स आफिस पर दो हफ्ते का कलेक्शन शानदार हुआ है सोचा देख ही लूं कहीं अच्छी फिल्म मिस न कर दूं। इस फिल्म को अब तक न देखने के पीछे एक वजह यह भी थी कि ‘प्यार का पंचनामा’ की टीम की फिल्म थी यह। ‘प्यार का पंचनामा’ को जरा भी झेल नहीं पाया था। कुल मिलाकर फिल्म देखने की बिल्कुल मन नहीं था। केवल इसकी बाक्स आफिस सफलता की वजह से देखा और पाया कि फिल्म को एक बार देखने में कोई बुराई नहीं है।

इस फिल्म के सफल होने की सबसे बड़ी वजह यह नजर आ रही है कि इस समय बाजार में आ रही फिल्मों का स्तर बहुत ही खराब है। फिल्मों में कहानी और अभिनय का अभाव है। संगीत का स्तर बेहद खराब हो गया है। ऐसे में थोड़ी सी काम चलाऊ फिल्म भी आ जाती है तो वीकेंड पर फिल्म देखने के आदि हो चुके मल्टीप्लेक्स के दर्शक उसे देख ही लेते हैं। कुछ ऐसा ही ‘सोनू के टीटू की स्वीटी’ के साथ भी हुआ है। फिल्म अपने हास्य के कारण दर्शकों को गुदगुदा रही है और इसलिए पसंद की जा रही है।
कहानी तो इसकी एक लाइन की है। सोनू (कार्तिक आर्यन) का दोस्त टीटू (सन्नी सिंह) जिस लड़की स्वीटी (नुसरत भरूचा) के साथ शादी करने वाला है उसे सोनू बिल्कुल पसंद नहीं करता। सोनू को लगता है कि लड़की कुछ ज्यादा ही परफेक्ट बनने की कोशिश कर रही है इसलिए वह ठीक नहीं है । बस सोनू और स्वीटी में ठन जाती है दोनों में जंग शुरू हो जाती है। जीत किसकी होती है यह फिल्म में देखिए। हालांकि यह कहीं भी तार्किक रूप से स्थापित नहीं हो सका कि आखिर स्वीटी में खराबी क्या थी ? निर्देशक ने स्वीटी को गलत दिखाने के लिए इंटरवल से ठीक पहले उसी के मुंह से कहलवाया कि वह चालू है। लेकिन चालू कैसे है यह कहीं साबित नहीं हो पाया।


कार्तिक औसत अभिनेता हैं लेकिन स्क्रीन पर हैंडसम नजर आते हैं। उनके डायलाग बहुत ही चुटीले हैं इसलिए वे सबको पसंद आते हैं। सन्नी साधारण हैं और ऐसा ही रोल उनको मिला है। अलबत्ता नुसरत में बड़ी स्टार बनने के तमाम लक्षण मौजूद हैं। वे बेहद खूबसूरत नजर आती हैं और उन्हें स्क्रीन पर देखना अच्छा लगता है। अगर उन्हें अच्छा ब्रेक मिला तो वे कैटरीना कैफ को पानी पिला सकती हैं। संगीत तो ऐसा है कि सिनेमा से बाहर निकलते ही भूल जाता है। हंस राज हंस के हिट गीत ‘दिल चोरी साड्डा हो गया’ को नए अवतार में पेश किया गया है जो अच्छा लगता है इसके अलावा संगीत के नाम पर कुछ खास नहीं है। हमेशा शराब पीते रहने वाले जीजा-साले के रोल में आलोकनाथ व वीरेंद्र सक्सेना खूब जमते हैं। बाकी कलाकारों का काम भी ठीक ठाक है।

फिल्म का पहला काम मनोरंजन देना होता है और यह फिल्म कम से कम एक बार तो ऐसा करने में सफल रहती ही है। आप इसे परिवार के साथ देख सकते हैं। ज्यादा दिमाग लगाना नहीं है बस फिल्म देखकर घर आ जाना है।

- हर्ष कुमार सिंह

Monday, 26 February 2018

...और अभिशप्त रही इस 'चांदनी' के जीवन की रात

श्रीदेवी की मौत से सब इसलिए भी ज्यादा स्तब्ध हैं क्योंकि वे न तो बीमार थी और न ही खराब दौर से गुजर रही थीं। इन दिनों वे अपनी बेटी जहानवी के करियर को लेकर व्यस्त थीं। जहानवी की पहली फिल्म 'धड़क' जुलाई में रिलीज होने के लिए तैयार है। काम पूरा हो चुका है और शायद श्रीदेवी भी अपने बेटी को बड़ी स्क्रीन पर देखने के लिए बेचैन रही होंगी लेकिन ईश्वर ने उन्हें वह समय दिखाया ही नहीं। इससे बड़ा दुर्भाग्य और क्या होगा? यहां ये भी बता दूं कि बोनी कपूर की पहली पत्नी मोना भी अपने बेटे अर्जुन की पहली फिल्म की रिलीज तक जिंदा नहीं रही थी।

भले ही हम श्रीदेवी के जीवन की सतरंगी कहानियों को देखकर यह समझ रहे हों कि उनकी निजी जीवन बहुत ही सुखी रहा लेकिन यह पूरी तरह सही नहीं है। श्रीदेवी के करियर में जब भी कोई महत्वपूर्ण समय आया उन्हें निजी जीवन में कठिन दौर से गुजरना पड़ा। जिस समय श्रीदेवी ने बोनी कपूर से शादी की थी तो उस समय बोनी की पहली पत्नी मोना शौरी कपूर  जिंदा थी। उन्होंने बीमारी के बाद 25 मार्च 2012 को दम तोड़ा। श्रीदेवी से शादी करने के लिए बोनी और मोना में 1996 में ही अलगाव हो गया था। उसी साल 2 जून को बोनी ने श्रीदेवी से शादी की थी। कहा जाता है कि दोनों ने शादी इसलिए की थी क्योंकि श्रीदेवी मां बनने वाली थी। शादी के ठीक 9 माह बाद जहानवी का जन्म हुआ था। कहा जाता है कि श्रीदेवी और बोनी की शादी बैकडेट में दिखाई गई जिससे की जहानवी के जन्म की अवधि को सही दिखाया जा सके। सब कुछ आनन-फानन में हुआ था।



बोनी कपूर की सास सत्ती शौरी, जो फिल्म निर्माता भी थीं, ने श्रीदेवी को लेकर 'फरिश्ते' जैसी मल्टीस्टारर फिल्म बनाई थी। इसमें विनोद खन्ना, रजनीकांत व धर्मेंद्र जैसे सितारे भी थे। सत्ती शौरी ने श्रीदेवी-बोनी की शादी के बाद कहा था कि वे श्रीदेवी को कभी माफ नहीं करेंगी। उन्होंने उनकी बेटी का घर तोड़ा है। अर्जुन कपूर ने कभी श्रीदेवी को अपनी मां नहीं माना। वे उनके पिता की दूसरी पत्नी मात्र थी। श्रीदेवी की दोनों बेटियां उन्हें भाई  मानती हैं लेकिन अर्जुन ने कभी उन्हें अपनी बहनें नहीं माना।

बोनी से पहले श्रीदेवी की शादी मिथुन चक्रवर्ती से भी होते-होते रह गई, लेकिन मिथुन अपनी पहली पत्नी योगिता बाली को छोडऩे के लिए तैयार नहीं हुए। कहा तो यह भी जाता है कि श्रीदेवी व मिथुन ने गुप्त शादी कर ली थी जो बाद में टूट गई। श्रीदेवी के दुर्भाग्य ने उनकी पीछा कभी नहीं छोड़ा। जब वे 'मि. इंडिया' की अपार सफलता के बाद बोनी कपूर की 'रूप की रानी चोरों का राजा' के लिए विदेश में शूटिंग कर रही थीं तो उनके पिता का निधन हो गया था। वे श्रीदेवी का घर बसता नहीं देख पाए। यही नहीं श्रीदेवी की छोटी बहन श्रीलता की शादी भी उनसे पहले हो गई थी और उनका भरा पूरा परिवार है। अगर श्रीदेवी की निजी जिंदगी को श्रापित जीवन कहा जाए तो गलत नहीं होगा।
       
 - हर्ष कुमार सिंह

first published in Navodaya Times , 26 February 2018 



नवोदय टाइम्स की वेबसाइट पर ब्लॉग में प्रकाशित लेख को पढ़ने के लिए क्लिक करें ये लिकं--

https://www.navodayatimes.in/news/khabre/night-of-the-life-of-this-moonlight-being-cursed/74792/



Friday, 9 February 2018

DEEP REVIEW : Padman

Rating: 5*
अक्षय कुमार को फिल्म नहीं एक क्रांति के लिए बधाई
“पुरस्कार मिले या न मिले लेकिन अविष्कार होता रहना चाहिए।"  फिल्म में यह डॉयलाग सुपर स्टार अमिताभ बच्चन ने बोला है। और यही फिल्म का सार है। “पैडमैन” उस क्रांति की कहानी कहती है जो अभी देश में शुरू हो रही है और जिसे अभी बहुत लंबा व महत्वपूर्ण सफर पूरा करना है। यह एक ऐसे विषय को बहुत ही सजगता, गंभीरता और डंके की चोट पर उठाती है जिसे अब तक देश में जरूरी विषय माना ही नहीं गया है। हालांकि हम सब पढ़े लिखे लोग पैड्स के महत्व को समझते हैं लेकिन हम भी उस समय बहुत चौंकते जाते हैं जब पता चलता है कि देश की केवल 18 प्रतिशत महिलाएं ही पैड्स का इस्तेमाल करती हैं। इससे भी बुरी बात यह है कि पीरियड्स के दिनों को लेकर आज भी अनेक भ्रांतियां व अंधविश्वास प्रचलित हैं। उनकी तो कोई बात ही नहीं करता। यह फिल्म तो केवल पैड्स की कीमत के मसले को ही हल करने की कोशिश कर रही है जबकि समस्याएं तो इससे कहीं अधिक हैं। एक सत्यकथा से प्रेरित होकर ट्विंकल खन्ना ने अपने पति के सहयोग से फिल्म बनाई और क्या फिल्म बनाई है।

लक्ष्मीकांत चौहान (अक्षय कुमार) को पत्नी गायत्री (राधिका अप्टे) को माहवारी के समय होने वाली दिक्कत का पता चलता है तो वह उसके लिए पैड्स खरीद लाता है। पर पैड इतने महंगे थे कि पत्नी स्वीकार करने से मना कर देती है और गंदा कपड़ा ही प्रयोग करना बेहतर समझती है। चौहान तमाम प्रयास करता है लेकिन सस्ते व सफल पैड नहीं बना पाता। महिलाओं से फीडबैक लेने के चक्कर में बदनाम अलग से हो जाता है। सब उसे चरित्रहीन समझने लगते हैं। बहनें व पत्नी साथ छोड़ देती हैं। मां भी अलग हो जाती है। चौहान सबकी नजर में गिर जाता है और अंत में सम्मान अर्जित करने के लिए घर से निकल लेता है। आखिरकार सफल होता है। सम्मान भी पाता है और ईनाम भी।
फिल्म की विषय जितना गंभीर था उसके लिहाज से आर बल्कि का निर्देशक के रूप में चुनाव एकदम सही है। “पा” और “की एंड का” जैसी संवेदनशील फिल्में बनाने वाले बल्कि ने फिल्म को बहुत ही शिद्दत से बनाया है। विषय से न भटकते हुए वे फिल्म के मूल तत्व को लगातार कहानी के प्रवाह में बनाए रखते हैं। चौहान का किरदार हर समय यही सोचता रहता है कि किस तरह सस्ते सेनेटरी पैड्स बनाए जाएं और यही लगन व इच्छा शक्ति फिल्म की जान है। अक्षय का किरदार दर्शकों के दिलों दिमाग पर इस तरह से छा जाता है कि वे कभी उसकी हरकतों पर हंसते हैं तो कभी तालियां बजाने पर मजबूर हो जाते हैं। पहला हाफ चौहान के संघर्ष की कहानी है तो दूसरे हाफ में उसके उत्कर्ष की दास्तान दिखाई गई है।
मध्यांतर के बाद कई दृश्यों में अक्षय ने कमाल कर दिया है। छोटे-छोटे सीन में उन्होंने अपने अभिनय की रेंज दिखाई है। न्यूयार्क में युनाइटेड नेशंस के दफ्तर में दी गई स्पीच फिल्म का सबसे बेहतरीन सीन है। अंग्रेजी बोलकर वे दिल को छू जाते हैं। इसके अलावा राधिका अप्टे से जुदा होने वाला सीन भी मार्मिक है। राधिका तो खैर हैं ही कमाल की अदाकारा। वे बेहद नेचुरल लगती हैं और किरदार में जीवंत नजर आती हैं। सोनम कपूर ने भी अपने रोल को बढ़िया निभाया है। पात्र के हिसाब से उनका चयन एकदम सही है।


फिल्म में गीत संगीत को केवल आवश्यकता के अनुरूप ही प्रयोग किया गया है और इसलिए फिल्म कहीं से बोझिल नहीं लगती। घटनाक्रम तेजी से घटता रहता है और दर्शक बोर नहीं होते। तकनीकी रूप से फिल्म बहुत ही मजबूत है और लोकेशंस एकदम रीयल होने के कारण बहुत ही मोहक नजर आती हैं। नर्मदा का किनारा और घाट, पुराने जमाने के मकान आदि सब कुछ मोहक लगता है। फिल्म के संवादों की भी तारीफ करनी होगी। एक सीन में सोनम के पिता अक्षय से बात करते हुए कहते हैं - मर्द होने का मजा अपने अंदर की औरत को जगा के ही आता है। यूएन में अक्षय कहते हैं- मैंने आईआईटी नहीं पढ़ी, आईआईटी ने मुझे पढ़ा। अनेक स्थान पर संवादों पर तालियां बजाने का मन करता है। कई स्थान पर व्यंग्य भी करारा है। दिखाया गया है कि महिलाओं को अपना पैड महंगा लगता है लेकिन भगवान को प्रसाद चढ़ाने के लिए वे फट से 51 रुपये दे देती है।

आप सेः

जिस विषय को फिल्म ने उठाया है वह किसी भी सरकारी एजेंडे में नहीं है। जिस तरह से देश में बालिकाओं के लिए हर स्कूल में शौचालय का अभियान प्रधानमंत्री ने चलवाया उसी प्रकार इस मसले को लेकर भी बड़े पैमाने पर काम किए जाने की जरूरत है। इस फिल्म को एक संपूर्ण पारिवारिक फिल्म कहूं तो अतिश्योक्ति नहीं होगी। हालांकि आप व हम सब पढ़े लिखे लोग हैं। हमारे घरों की महिलाएं पीरियड्स की जरूरतों व सेनेटरी पैड्स के प्रयोग को भली भांति समझती हैं लेकिन फिर भी हमें अपने बच्चों व खासतौर से बेटियों के साथ यह फिल्म देखनी चाहिए। जिससे कि वे भी समझ सकें कि हमारे देश में किस-किस तरह की समस्याओं से महिलाओं को गुजरना पड़ता है। हो सकता है फिल्म देखने के बाद आप या आपके बच्चे किसी ऐसे ही अभियान का हिस्सा बनने की प्रेरणा ले लें। इसलिए फिल्म को अवश्य देखें और परिवार के साथ देखें।

समीक्षकों सेः

फिल्म के कई रीव्यू मैंने पढ़े हैं। अच्छे व बुरे सभी प्रकार के। स्टार रेटिंग देने में बड़े-बड़े समीक्षकों ने कंजूसी की है। किसी ने भी 5 स्टार नहीं दिए। पता नहीं हमारे समीक्षकों ने 5 स्टार किस महान फिल्म के लिए बचाकर रखे हुए हैं? मैं फिल्म को 5 स्टार के लायक ही मानता हूं। अगर कोई सर्वश्रेष्ठ नहीं है तो फिर आपको जो उपलब्ध हैं उन्हीं में से बेहतर को चुनना चाहिए। पिछले कुछ साल में कई कमजोर व बेसिर पैर की फिल्मों को 4 स्टार दिए हैं हमारे महान समीक्षकों ने लेकिन “टायलेट एक प्रेम कथा” या “पैडमैन” जैसी फिल्म को देने में झिझक महसूस करते हैं। मेरे हिसाब से यह दोगलापन है। कुछ सराहना तो उस सोच की भी की जानी चाहिए जिसकी वजह से ऐसी फिल्में बनती हैं। अक्षय कुमार व टिवंकल, आप बधाई के पात्र हैं। ऐसी कुछ और फिल्में बनाएं।

- हर्ष कुमार सिंह